अमृता प्रीतम, इमरोज एवं साहिर लुधियानवी
Posted by सागर नाहर on 15, August 2006
परिचर्चा के ” इस गीत का अर्थ बतायें” थ्रेड के अन्तर्गत bharatwasi001 जी ने एक गाने का अर्थ पूछा था, वह गाना यह था
तारुफ (या तार्रूफ) रोग हो जाये तो उसको भूलना बेहतर,
ताल्लुक बोझ बन जाये तो उसको छोड़ना अच्छा ।
वो अफ़साना जिसे अंज़ाम तक लाना ना हो मुमकिन,
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा ।
इस पर नीरज दीवान जी की टिप्पणी थी कि “
साहिर लुधियानवी का लिखा गीत है. अमृता प्रीतम जी के लिए लिखा लगता है. इस टिप्पणी पर भारतवासी जी ने पूछा था कि “
साहिर लुधायनवी द्वारा अमृता प्रीतम के बारे लिखा जाना कुछ समझ में नहीं आया।
कृपया स्पष्ट करें। बात बहुत पुरानी हो गई परन्तु आज गूगल महाराज की कृपा से साहिर लुधियानवी एवं अमृता प्रीतम जी के बारे में कुछ जानकारी मिली जो आप सब के लिये प्रस्तुत है।
नहीं फ़िर से टाईप करने की बजाय उस लेख की कड़ी यहाँ दे रहा हुँ ताकि आप सबके सामने एक और नया हिन्दी जाल स्थल आये। यह सुरत के सुप्रसिद्ध हिन्दी अखबार लोक तेज का संसकरण है।


15, August 2006 at 11:01 am
बहुत ही ऒछी मानसिकता से लिखा हुआ लेख है यह। मर जाने के बाद किसी के बारे में इस प्रकार लिखना और लिंक देना बहुत शर्म की बात है।
अमृता के रिश्तों को समझने के लिये नाहर जी बहुत बड़ा दिल और बहुत खुला दिमाग चाहिये।
कितना जानते है आप अमृता के बारे में?
15, August 2006 at 11:21 am
आदरणीय जगदीश भाई साहब
जब तक अमृता जी जिन्दा रही वे अपने प्यार साहिर को कभी नहीं भूली। इमरोज साहब को कभी परेशानी नहीं हुई, खुद अमृता जी ने अपनी आत्मकथाओं तथा अपने कई लेखों में उन्होने साहिर के साथ अपने प्रेम का जिक्र किया है। उन्हें अपना प्रेम कभी शर्म नहीं लगा। यह लेख जिसकी कड़ी मैने यहाँ दी है वह खुद अमृता जी के लिखे लेख का हिन्दी अनुवाद है।
आप जानते हैं कि कितना खुला दिल है अपना जो आप पिछले लेखों से जान ही चुके होंगे, फ़िर भी आपको लगता है कि मेरे इस लेख से अमृता जी के प्रति अन्याय हुआ है तो मैं इस लेख को मिटा देता हुँ। और आपसे तथा सदगत अमृता प्रीतम जी से क्षमा चाहता हूँ।
आप की इस बात से जरूर सहमत हुँ ” कि कितना जानता हुँ अमृता के बारे में ?”
15, August 2006 at 11:41 am
नही भाईसा,
आपको लेख मिटाने की क्या आवश्यक्ता है? आपके लेख मे कोई दोष नहीं।
मैने आपके द्वारा दी गई लिंक पर लिखा गया लेख देखा। सचमुच औछी भाषा का प्रयोग करके बेहुदा लिखा हुआ है। भाटियाजी भी सही है कि इंसानी रिश्तों को युँ आसानी से समझाया नही जा सकता और किसी दिवंगत व्यक्ति के बारे में ऐसी बातें करने का को ओचित्य भी नही है। पर भाटियाजी ने स्पष्ट नही किया कि ओछी मानसिकता से लिखा गया लेख किसका कह रहे हैं? आपका यह लिंक मे दिया है उसका।
आपके लेख मे तो मुझे कोई दोष नही दिखता। और फिर किसी के विरोध दर्ज कराने पर लेख मिटाने की बात करने की क्या आवश्यक्ता है?
15, August 2006 at 12:06 pm
तभी अपन चुप थे उस वक़्त क्योंकि अमृता जी के बारे में बहुत कुछ छपा और पढ़ा था. लेकिन मैं इस बात से सहमत नहीं कि दिवंगत आत्माओं के अच्छे-बुरे पर चिंतन नहीं करना चाहिए. किंतु संयत शब्दों में और तथ्यपूर्ण बहस ज़रूर की जानी चाहिए. अमृता जी और साहिर दोनों महान रचनाधर्मी हैं. वे हमारे दिलों में बसे हैं और बसे रहेंगे. प्यार का विवाह से कोई नाता प्रतीत नहीं होता. विवाह संस्था है जो सामाजिक बंधनों की मोहताज होती है. जबकि प्यार किसी से भी हो जाता है. प्रेम बेशर्त होता है, बंधनों से परे. इस मसले पर विस्तृत बहस होती रही है. आगे भी चलती रहेगी. विवाहेत्तर प्रेम संबंधों पर चर्चा के लिए भी बड़ा दिल और खुला दिमाग़ चाहिए जैसे इस लेख को पढ़ने पर प्रतीत होता है.
15, August 2006 at 3:27 pm
नाहर जी,
आप लिंक पर ध्यान से देखें यह लेख अमृता जी ने नहीं किन्ही विनोद भट्ट का लिखा है जिसे नवनीत ठक्कर ने अनुवादित किया है।
रही बात पोस्ट को हटाने की तो भैया यह आपका ब्लाग है, इसका निर्धारण मुझे नहीं करना है कि आप क्या लिखें। आप हमें टिप्पणी करने का हक देते हैं तो हम टिप्पणी कर देते हैं।
और पंकज भाई, जाहिर है कि मैं लिंक में दिये गये विनोद भट्ट के लेख पर ही टिप्पणी कर रहा था।