॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

क्षमापना: संवत्सरी

Posted by सागर नाहर on 28, August 2006

जैन धर्म के पावन पर्व पर्युषण के आज सातवें दिन संवत्सरी के शुभ अवसर पर प्रतिक्रमण करते समय जैसे सभी जीवों और प्राणियों से क्षमा याचना की है, वैसे ही आप सभी मित्रों, भाईयों और  बहनों से; पिछले वर्ष में मेरे किसी बर्ताव, लेखन या टिप्पणी से आपके मन को ठेस लगी हो तो हाथ जोड़ कर क्षमायाचना करता हुँ।

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