॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

सुरत से वापसी

Posted by सागर नाहर on 9, October 2006

निशा के निधन के बाद सुरत की चार दिन की यात्रा के बाद कल यानि 8-10-2006  को सुरत से वापसी हो ही गई! सुरत जाने के लिये मन बड़ा उत्साहित था पर निशा के निधन के बाद  सुरत जाना बड़ा मुश्किल लग रहा था कि कैसे निशा के पापा मम्मी से मिलना होगा, भगवान  कभी दुश्मन को भी ऐसा दुख:  ना दे।
पहली बार हिन्दी के उपयोग से तकलीफ़ हुई, दोष हिन्दी का नहीं हमारा ही था, हुआ यूँ कि सुरत से सिकदराबाद का टिकट जब मैने लिया तो उसमें RCA 28, 29, 30 था; 7.10.2006  को सुबह रेल्वे पूछताछ कार्यालय में टेलीफ़ोन पर पूछा, और उससे पहले भाषा चयन करने के समय हिन्दी पसंद कर ली। जब सामने से बताया गया कि आपके टिकट का कोच नं है एस एक  और सीट नं है 27,29,30 मैने गलती से एस एक को एस एट  सुन लिया और गाड़ी के आते ही आराम से  S8 में अपनी सीट पर जाकर पसर गये। दो टी टी ने टिकट भी देखा और कुछ नहीं कहा,रात्रि लगभग 8 बजे  पूना स्टेशन पर दूसरे यात्री आये और हमसे उठने को कहा, जब उनका टिकट देखा तो वाकई वह सीट उन्ही की थी, जा कर टी टी को पकड़ा उन्होने चार्ट देखा तो मुझसे कहा यह सीट आपकी नहीं है आपकी सीट तो एस वन में है। सुनते ही मेरे होश उड़ गये क्यों कि रेल्वे के नियम के मुताबिक दो स्टेशन तक यात्री अपनी सीट पर नहीं पाया जाता तो उसका आरक्षण रद्द हो जाता है, और गाड़ी रवाना होने के लगभग ६ घंटे और पाँच छ: स्टेशन निकल चुके थे खैर….. भाग कर जाकर एस वन के टी टी को पकड़ा तो पता चला कि अभी तक उन्होने किसी को सीट दी नहीं थी। सारा सामान और परिवार को लेकर एस एक में आये और बुद्धु कहलाये सो बोनस में…..।

सुरत यात्रा के दौरान हिन्दी के नये चिट्ठाकार श्री अफ़लातून जी से फ़ोन पर “ब्लॉगर मीट” भी हुई। श्री अफ़लातून जी, गुजराती के सुप्रसिद्ध  और साहित्य अकादमी के पुरुस्कृत साहित्यकार श्री नारायण जी देसाई के सुपुत्र है, पर बोलने के लहजे में कहीं भी गुजराती नहीं सुनाई दी तो उन्होने बताया कि वे बचपन से ही बनारस में रहे हैं सो वे ज्यादा अच्छी गुजराती बोल नहीं सकते पर पढ़ लेते हैं। बातों बातों में पता चला कि अफ़लातून जी अपने फ़ुरसतिया जी उर्फ़ अनूप शुक्ला जी के सहपाठी रह चुके है, और आजकल मलयालम लेखकों को चिट्ठाकारी सिखा रहे हैं।

सुरत में बाढ़ आए २ महीने भी नहीं हुए पर सुरत की साफ़- सफ़ाई  को देख कर लगता ही नहीं की सुरत में कभी इतनी भयंकर बाढ़ आई होगी। शरद पूर्णिमा के दूसरे दिन एक त्यौहार मनाया जाता है जिसे चंदवी पड़वो कहा जाता है। इस त्यौहार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस दिन सुरत में एक मिठाई बनती है जिसे घारी कहा जाता है, करोड़ो रुपये की खाई जाती है, गरीब से गरीब सुरती भी कम से कम १ किलो तो खरीदकर खाता ही है, घारी का भाव २००/- प्रति किलो होता है और मिठाई का एक नंग कम से कम १०० ग्राम का होता है। सुरत बाढ़ के नुकसान को देखते हुए लग रहा था कि इस बार मिठाई की खपत कम होगी पर वाह रे सुरत की जनता , सारा गम/ नुकसान भुल कर  घारी खाने दौड़ पड़ी।

4 Responses to “सुरत से वापसी”

  1. संजय बेंगाणी Says:

    मेरी इच्छा सुरत आने की थी, पर ऐसा नहीं हो पाया. पूरे सुरत में जब दो-दो हाथ गंदगी फैली हुई थी, सभी समाचार माध्यम प्लेग जैसी महामारी फैलने की भविष्यवाणी कर रहे थे. लेकिन जिस प्रकार सफाई का काम हुआ उसकी किसीने सुध नहीं ली. यह सभी के लिए शिक्षा लेने जैसा था पर शायद एक साम्प्रदायीक सरकार का काम कभी प्रशंसनीय नहीं हो सकता…

  2. समीर लाल Says:

    S-1 और S-8 का किस्सा बढ़िया रहा.

    सुरत में सफाई अभियान इतना त्वरित रहा, जानकर आश्चर्य मिश्रित हर्ष हुआ. यह तो अपने आप में एक मिसाल है, अन्यथा अन्य जगहों पर तो अभी आभावों का रोना ही मचा होता.

  3. SHUAIB Says:

    सब कुछ तो खैर आखिरकार अच्छा ही हुआ - मगर आपने ये नही बताया कि ये मिठाई किस चीज़ से बनती है और खाने मे कैसी है :)

  4. गिरिराज जोशी Says:

    मुझे भी S-1 और S-8 का किस्सा पढ़कर मजा आया लेकिन कुछ दिल को छुकर निकला तो वो संजय भाई की टिप्पणी।

    संजय भाई, हास्य-व्यंग्य श्रेणियों में कि गई पोस्ट पर भी आपकी टिप्पणीयाँ सोचने पर मजबूर कर देती है।

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