रूठे रूठे भीया मनाऊँ कैसे ?
Posted by सागर नाहर on 10, November 2006
ऐ लो आज अपने बड़े भाई साहब नाराज हो गये हैं, कहते हैं कुछ चिठ्ठाकार बँधु पसड़ गये कि हमरी पोस्ट काहे नही बांची? वही कुछ अति उत्साही चर्चाकार ऐसे भी आगे आये जिन्होने चिठ्ठो के उगते ही चर्चा की गुगाली कर डाली ।
भाई साहब पसड़ेंगे काहे नहीं एक तरफ़ तो आप कहते हो क्या लिखते हो अच्छा लिखो, फ़िर महाराज जब कोई किसी का चिठ्ठा पढ़ कर अपनी राय व्यक्त नहीं करेगा तो कोई अच्छा लिखेगा कैसे? क्यों कि आप सब अच्छी तरह से जानते हैं कि लोगबाग आजकल नारद के साथ साथ चिठ्ठा चर्चा को भी देखकर चिठ्ठे पढ़ते हैं।
फ़िर जब भाई आप सब को बड़ा भाई माना है तो क्या इतना अधिकार नहीं हमारा कि आप से शिकायत कर सकें? भाई कोई माने या ना माने मैं तो अतुल जी, अनूप जी संजय जी, राकेश खंडेलवाल जी, समीरलाल जी, रवि रतलामी जी, जीतू जी (सब नाम के पीछे भाई साहब पढ़ लेवें) को ( कोई बाकी तो नहीं रह गया) अधिकार से कह सकता हूँ और कहूंगा कि मेरे चिठ्ठे कि चर्चा जरूर करो वरना मैं नाराज हो जाऊँगा।
मेरा तो मानना है चर्चा सब चिठ्ठों की हो अगर बुरा लिखा है तो खिँचाई भी कि जाये कोई हर्ज नहीं , अच्छा लिखा है तो खुल कर तारीफ़ भी की जाये।
आगे आपने लिखा है कि अतिउत्साही चर्चाकार मे चिठ्ठों के उगते ही गुगाली (?) कर डाली, भाइ साहब सब लोग कहते हैं कि हम अपने चिठ्ठे के राजा होते हैं कुछ भी लिख सकते हैं तो मै भी अपने आप को राजा समझने लगा और चिठ्ठे पर चिठ्ठों की चर्चा करदी अब अगर कर दी तो इसमें क्या हर्ज है जिसको पढ़ना होगा पढ़ेगा नहीं पढ़ना होगा तो नहीं पढ़ेगा। और आपके कीमती समय की बचत हुई कि नहीं मेरे इस महान कार्य से , आपने उस दिन मात्र तीन लाइनों में अपनी चर्चा पूरी करदी। चर्चा के लिये कोनो डिगरी विगरी की आवश्यकता है का फ़ुरसतिया जी भाई साहब ?
जब चिठ्ठा चर्चा चालू हुआ था तब लोग कहते थे कि नये लोगों कॊ भी आगे आना चाहिये तो आप इस तरह डराओगे तो आगे कैसे आयेंगे नये लोग?


10, November 2006 at 4:41 pm
कोनो फ़िकर नाही भिया. आपको किनारे कर कोई आम रास्ते से गुज़र नहीं सकेगा. अपनी सलाह तो यह है कि स्वांत सुखाय के लिए लिखते रहो. कोई टीप मारे ना मारे. चर्चा हो ना हो. मुश्किल ये हैं कि सभी पाठक ब्लॉगर हैं और सभी ब्लॉगर पाठक हैं. ऐसे में मैं चौबे-दुबे और श्रीवास्तव वगैरह को ढूंढ रहा हूं जो पढ़ने वाले हों. कुछ मिले भी थे तो बेचारे वे टीपना नहीं जानते थे. लिहाज़ा मुंह पर ही कह दिए कि “”"बहुत अच्छा लिखा है!!”"
सागर भैया, आप का ब्लॉग तो मेरे फ़ेवरिट में हैं. आपकी चर्चा हो ना हो अपन खुद घुस के देख लेते हैं - “”कोई नया आइटम है क्या इधर”"
10, November 2006 at 5:19 pm
जब नीरज भाई इतना कह दिये है, तो हम क्या कहें. बस लिखते रहें. पढ़नेवाले हम हैं ना.
10, November 2006 at 6:12 pm
नीरज भाई
चौबे -दुबे के बारे मे तो नही जानता, लेकिन हिन्दी चिठ्ठाजगत मे श्रीवास्तवो ( रवीशंकर श्रीवास्तव(raviratlami.blogspot.com/),अतुल श्रीवास्तव(http://lakhnawi.blogspot.com), अनुराग श्रीवास्तव(http://pagdandi.blogspot.com/), नीधी श्रीवास्तव(http://abhivyakta.wordpress.com/)…. और हम खुद (आशीष श्रीवास्तव))की भरमार हो गयी है। इनसे पंगे ना लिजिये । वो कहते है कि कायस्थो की तो मुई खोपडी भी बोलती है।
10, November 2006 at 6:56 pm
चर्चा के लिये कोनो डिगरी विगरी की आवश्यकता है का फ़ुरसतिया जी भाई साहब ?
आपके इस सवाल का जवाब अगर “फ़ुरसतिया जी भाई साहब” ना दे पाए तो हमें याद कीजियेगा, हमें उत्तर पता है
11, November 2006 at 6:37 am
सागर भाई


इधर देख रहा हूँ बहुत संवेदनशील टाईप के होते जा रहे हो?
अपने आप मान लिया कि वो आप ही हैं, काहे भाई, वो तो कोई भी हो सकता है, कहो हम ही न हों जिसके सबसे ज्यादा चांसेस हैं
कई बातें जिस प्रवाह में लिखी जाती हैं, पढ़ने में प्रवाह बदल जाने है ऐसा हो जाता है.
अरे भाई, दिलेरी से लिखो और लिखने दो, यही तो ब्लाग का फायदा है. वैसे, मुझे मालूम है आप मौज ले रहे हैं और मजाक के मूड में हैं.
11, November 2006 at 6:44 am
हमने तो कल ही लिखा था चिट्ठाचर्चा में:-
भाई मेरा तो यही मानना है कि सबको अपनी बात कहने रखने का अधिकार है. और जो सुनता है उसे अपने हिसाब से उसका मतलब निकालने का अधिकार है.न ही चिट्ठाचर्चा को यह अधिकार है कि किसी को रोके कि भाई तुम मत करो हम कर रहे हैं.
अभिव्यक्ति के लिये किसी डिग्री की आवश्यकता नहीं है. हमें यह देखकर अच्छा लगा कि जो ठीक लगा वह कहने ने संकोच नहीं किया सागर भाई ने.
11, November 2006 at 2:07 pm
सागर भाई, सरल और सहज होना कठिन है और तीखी बातें कह देना सरल! आप कठिन काम सरलता से कर रहे है..लिखतें रहे.
15, November 2006 at 7:53 pm
सागरभाई,बेझिझक लिखते रहो
16, November 2006 at 3:15 am
Hi
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