॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

वाह स्वामी रामदेव

Posted by सागर नाहर on 30, November 2006

हम भारतीयों की एक बहुत बड़ी कमजोरी है कि हम सत्य को कभी स्वीकार नहीं कर सकते और जिनको हम महान मान लेते हैं उनके बारे में कही गई किसी भी अच्छी बुरी बात को सहन  करने की हममें हिम्मत नहीं होती। कल योग गुरु स्वामी रामदेव ने गांधीजी के बारे में कुछ बात कह दी कि लोग माफ़ी मंगवाने के लिये उनके पीछे टूट पड़े।
क्यों आज भी हम यह मानने को तैयार नहीं है कि आजादी की सफ़लता का श्रेय सिर्फ़ अकेले गाँधीजी को दिया जाना गलत है, अगर वाकई सिर्फ़ गांधीजी की वजह से हमें आजादी मिलनी होती तो कई वर्षों पहले मिल गयी होती जब उन्होने असहयोग आन्दोलन शुरु किया और बाद में उसे बन्द कर दिया था। आजादी दिलवाने में सुभाष बाबू, चन्द्र शेखर, भगत सिंह और हजारों शहीदों जिनका हम नाम भी नहीं जानते, का योगदान कम नहीं है। मेरे व्यक्तिगत मत से तो भारत की आजादी में अप्रत्यक्ष रूप से द्वितीय विश्व के खलनायक हिटलर का योगदान भी कम नहीं था जिसने विश्व युद्द के दौरान ब्रिटेन की हालत इतनी खोखली कर दी कि मजबूरन अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा।
अगर स्वामी रामदेव ने यह बात कही है तो इसमे कुछ भी गलत नहीं है, हमं इस बात का स्वीकार करना चाहिये कि सिर्फ़ गांधीजी को आजादी का श्रेय देने से उन हजारों शहीदों का अपमान होता है जिन्होने अपनी जानें दी। क्रान्तियाँ कभी बिना खडग और बिना ढ़ाल के नहीं मिलती, अगर सिर्फ़ गांधीजी के तरीकों से आजादी की कामना करते तो शायद आज भी हम गुलाम ही होते!
आजकल देश में एक ट्रेंड चला है जिसमें आप गांधीजी, गांधीवाद या गांधीगिरी की बात करने वालों को बुद्धिजीवी समझा जाता है और उनके बारे में कुछ भी कहने वालों को देशद्रोही जैसा समझा जाने लगा है। कांग्रेसियों के लिये तो सत्ता में आगे बढ़ने का जरिया भी है, आचरण भले ही गाँधीवादी ना हो पर बातें तो बड़ी बड़ी हाकेंगे।
सृजन शिल्पी जी ने लिखा
“लेकिन मैं कुछ विद्वानों के इस मत से सहमत हूँ कि गाँधीजी यदि लॉर्ड इरविन के साथ समझौते के समय अड़ गए होते तो भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी नहीं हुई होती और यदि गाँधी एवं नेहरू के मन में सुभाष चन्द्र बोस के प्रति दुराग्रह नहीं होता तो आजाद भारत को अपने उस अनमोल रत्न की सेवाओं से वंचित नहीं होना पड़ता। शायद गाँधीजी के मन में कहीं न कहीं यह महत्वाकांक्षा थी कि लोकप्रियता के मामले में कोई उनसे आगे नहीं निकल जाए, खासकर कोई ऐसा व्यक्ति जो उनके विचारों का विरोधी हो। उन्हें भगत सिंह और सुभाष चन्द्र बोस की बढ़ती लोकप्रियता रास नहीं आई थी। लेकिन गाँधीजी के मन में इस तरह की भावना जगाने वाले जवाहरलाल नेहरू थे, जो अपने भावी प्रतिद्वंद्वियों को रास्ते से हटाना चाह रहे थे। जवाहरलाल नेहरू को अपना उत्तराधिकारी चुनकर उन्होंने संभवत मोतीलाल नेहरू के अहसान को चुकाने की कोशिश की थी। कभी मोतीलाल नेहरू ने भी कांग्रेस में गाँधीजी के नेतृत्व को स्थापित करने में सहयोग किया था। नेहरू परिवार को भारतीय लोकतंत्र का शाही घराना बनाने में गाँधीजी की अहम भूमिका थी। नेहरू ने अपने उस वंशवाद को आगे बढ़ाया और कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं को दरकिनार करते हुए उन्होंने अपने जीते जी इंदिरा गाँधी को कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बना दिया। वंशवाद को आगे बढ़ाने का यह सिलसिला आज तक जारी है और अब इसे तमाम दूसरे राजनीतिक दलों ने भी अपना लिया है। नेहरू परिवार को चुनौती दे सकने वाले किसी शख्स की कांग्रेस पार्टी में कभी अहमियत नहीं रही। विडंबना की बात यह रही कि जिस नेहरू परिवार ने गाँधी का सबसे अधिक इस्तेमाल किया, वह वास्तव में हमेशा गाँधीवाद के आदर्शों के विपरीत दिशा में सक्रिय रहा है।

यह एक कटु सत्य है कि गांधीजी को भी अपनी लोकप्रियता कम होने का खतरा था इस वजह से हमें भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को खोना पड़ा। जितना नुकसान देश का गाँधीजी के सिद्धान्तों और नेहरूजी की वजह से हुआ उतना किसी और वजह से नहीं हुआ। जो लोग वाकई जानना चाहते हैं कि देश को क्या नुकसान हुआ गाँधीजी के सिद्धान्तों की वजह से वे जरा एक बार यहाँ क्लिक करें। ना गाँधीजी ने नेहरूजी को प्रधानमंत्री बनाया होता, ना कश्मीर की समस्या पैदा हुई होती, जिसमें अब तक लगभग 70000 निर्दोष लोग मारे जा चुके हैं।

कोई माने या नामाने पर मैं यह मानता हूँ कि सिर्फ़ स्वामी रामदेव में हिम्मत है इतना कहने कि वरना आधे से ज्यादा तो मुँह पर कुछ और कहते हैं और पीछे कुछ और!
एक बात और
क्या गाँधी भक्ति ही देश प्रेम का पैमाना है?

32 Responses to “वाह स्वामी रामदेव”

  1. आशीष Says:

    क्रान्तियाँ कभी बिना खडग और बिना ढ़ाल के नहीं मिलती, अगर सिर्फ़ गांधीजी के तरीकों से आजादी की कामना करते तो शायद आज भी हम गुलाम ही होते!

    आप दक्षिण अफ्रिका के वर्ण भेद विरोधी संघर्ष को भूल रहे है।

    स्वामी रामदेव ? मै स्वामी रामदेव का एक सबसे बडा विरोधी हूं। क्यों ये बात फिर कभी !

  2. संजय बेंगाणी Says:

    मेरा मानना हैं की भारत की आज़ादी में हिटलर ने परोक्ष रूप से अनजाने में जो योगदान दिया था, वह बेहद महत्वपुर्ण था. पर भारत के इतिहास मेंशायद ही कभी इसका उल्लेख हो.

  3. Pratik Pandey Says:

    मैं स्वामी रामदेव की इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि आज़ादी की लड़ाई में अन्य क्रान्तिकारियों का भी उतना ही बड़ा योगदान है, जितना कि गांधीजी का है। इस बात पर विवाद होना लोगों की संकुचित सोच और इतिहास की जानकारी के अभाव को दर्शाता है।

    आशीष भाई, आप स्वामी रामदेव के “सबसे बड़े” विरोधी क्यों हैं? मेरा सुझाव है कि आप इस विषय पर एक पोस्ट लिखें। संजय भाई से जानना चाहूँगा कि देश की आज़ादी में हिटलर ने कैसे योगदान दिया? कृपया स्पष्ट करें।

  4. प्रियंकर Says:

    सागर भाई! साक्षर और शिक्षित होने में फ़र्क होता है . शिक्षित और संस्कारित होने में तो और भी फ़र्क होता है . ऐतिहासिक मूल्यांकन और फ़ैसले बहुत गंभीर अध्ययन और वस्तुनिष्ठ आलोचना-पद्धति की मांग करते हैं . पर जब ज्ञान और भरोसे का केन्द्र नाथूराम गोडसे हों तब किसी गंभीर बहस की गुंजाइश कहां है .

    हां ! गांधी पर हर दृष्टि से और हर कोण से बहस होनी चाहिये, इस बात का समर्थन करूंगा . गांधी कोई बताशा तो हैं नहीं कि आलोचना की जरा सी बारिश से गल जाएंगे .

    हम और आप क्या हैं . सबसे बड़ा समालोचक तो समय है . उसका फ़ैसला ही अंतिम और मान्य होगा .

  5. पंकज बेंगाणी Says:

    अच्छे अच्छे मार्केटिंग के बन्दे देखे पर रामदेव जैसा नहीं देखा। उनको अपने आपको बेचना बहुत ही अच्छी तरह से आता है।

    वरना सोचिए प्राणायाम तो योग का एक अंग है, पर रामदेव ने इसकी इतनी जबरदस्त पैकेजिंग की कि अब दुनिया भर में यह जाना जाने लगा है।

    रामदेव को सुर्खियों मे रहना आता है। और टीवी पर चमकना भी।

    गान्धीजी को राष्ट्रपिता का दर्जा तो मै भी नही स्विकार करता। आगे की ब्लोग मे लिखता हुँ

  6. mksekhani Says:

    सागर जी , आपने एक ऐसे कटु सत्य को कहने की हिम्म्त कि है जो हमारे देश मे बहुत कम लोग ही कह पाते है ।
    भगत सिंग़, सुखदेव ,राजगुरु कि फांसी के लिये केवल और केवल गाँधी ही जिम्मेदार है ।
    क्यो कि अगर वो रह् जाते तो आज गाँधी को कौन पुछ्ता और यही बात वो जानता था ।
    गाँघी कि दुकान चलती रहे इन लोगो को फांसी जरुरी थी जो हुई भी ।

  7. आशीष Says:

    सागर भाई,
    कृपया आप सृजन शिल्पी की पोष्ट पर प्रियंकरजी की टिप्पणी भी देखें

  8. मुकेश बंसल Says:

    भाई साहब, आप स्वामी रामदेव के कन्धे पर रख कर बन्दूक तो नहीं चला रहे? स्वामी जी की तो सब बात मुझे ठीक लग रही थी। जहां तक श्रेय देने का सवाल है, गान्धी जी का श्रेय पर एकाधिकार कदापि नहीं है।
    परन्तु गान्धी जी की वजह से देश को नुकसान हुआ अथवा वो लोकप्रियता के पीछे भाग रहे थे - ऐसा कहना ऐतिहासिक रूप से भी गलत है और न्याय की दृष्टि से भी। यह जो लेख के आखिरी भाग में आप ने लिखा है, वैसा कहने की स्वामी रामदेव की मन्शा तो नहीं थी।

  9. Pramendra Pratap Singh Says:

    गांधी जी, महान थे, महान है और महान रहेगे, पर उन्‍हे जितना महान बना दिया गया वे महान बने रहे किन्‍तु उनकी महानता के आगे अन्‍य स्‍वातंत्रता संग्राम सेनानियों के महत्‍व को नही भूलना चाहिये। तत्कालीन काग्रेसी सरकार भारत मे एक प्रकार से नेहरू गांधी परिवार की अघोषित राजतन्‍त्र लाना चाहती थी। इसी के परिपेक्ष मे भारतीय राजनीत‍ि के स्‍वरूप को नेहरू गांधी तक सीमित रखा गया। तत्‍कालीन सरकार की सोची समझी नीति थी कि भारतीयों मे गांधी के नाम को इस प्रकार रमा बसादिया जाये कि जनता इसी मे बसी रहे। पहले तो गांधी की कीमत एक रूपये कि थी, अब उसे एक हजार मे बदल दिया गया है1 पहले टिकट मे थे अब नोटो मे। क्‍या सराकर के नजरो मे गांधी से महान और कोई नही है, क्‍या नोटो पर गांधी जी का एकाधिकार बरकारार रहेगा।
    भारत रत्‍न मुद्दे की बात कहू तो सुभाष चन्‍द्र बोस, सरदार पटेल और गुलजारी लाल नन्‍दा की औकात इतनी गिरि हुई थी कि इनहे राजीव गान्‍धी को बाद भारत रत्‍न दिया गया। यही इन्दिरा गान्‍धी के लिये उन्‍हे 1971 मे दिया गया और सुभाष चन्‍द्र बोस, सरदार पटेल और गुलजारी लाल नन्‍दा और अन्‍य देश भक्‍तो को उनसे बाद यह पुरस्‍कार दिया गया क्‍या यह अपमान नही है।
    जिस प्रकार महात्‍मा गांधी को भारत रत्‍न नही दिया दिया था (सम्‍मान मे क्‍योकि वे भारत रत्‍न से बढ़कर थे) उसी प्रकार अन्‍य राष्‍ट्र भक्‍तो के अपने से कनिष्‍टो के बाद यह सम्‍मान देना उनका अपमान नही है। सर्वोच्‍च न्‍यायालय मे एक बार ऐसा ममला हुआ था जब तत्‍कालीन सरकार ने अपने चहेते को मुख्‍य न्‍यायधीश बनाने के लिये उच्‍च न्‍यायालय की वरिष्‍ठता का उल्‍लंघन करते हुये कई न्‍यायधीशो से कनिष्‍ट को मुख्‍य नयायाधीश बना दिया था और सारे बरिष्‍ठ न्‍याधीशो ने अपने वरिष्‍टता के सम्‍मान के लिये अपने पद से त्‍यागपत्र दे दिया था, कोई अपने कनिष्‍ट के अधीन कैसे रहना पंसन्‍द कर सकता है और नियम-नियम होता है, वरिष्‍ठो को ही वरीयता दी जाती है। चाहे बरिष्‍ट न्‍याधीश का कार्यकाल एक दिन ही शेष क्‍यो न हो। वह दिन दूर नही जब ‘गान्‍धी सर्टिफिकेट’ के कारण सोनिया, प्रियका और रहुल गान्‍धी को भारत रत्‍न, हमारे प्रधानमन्त्री से आगे न दे दिया जाये।
    मै राष्‍ट्रपिता के रूप मे महात्‍मा गांधी को सर्वमान्य नही मानता हूँ। सरकार के द्वारा भारतीयो पर थोपा गया एक बोझ है, जिसे हम ढोरहे है। जनमत सर्वेक्षण से ही स्‍पष्‍ट हो सकता है कि महात्‍मा गांधी कितने लोकप्रिय है। धोती और लाठी के बल पर विरोध प्रर्दशन किया जा सकता है, आजादी नही प्राप्‍त की जा सकती है। गांधी जी के साथ उस समय भारत के सबसे बऐ राजनैतिक दल का्ग्रेस का हाथ था जिसे सुभाष चन्‍द्र बोस, गोपाल कृष्‍ण गोखले, मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय ने सीचा था इस दल के कारण अंग्रेज गान्‍घी जी भाव देते थे, अगर काग्रेस न होती तो गांघी जी को अग्रेजो न कब का ठिकाने लगा दिया होता। अग्रेज जानते थे कि ये बुड्डा जब तक है हम मन मानी कर सकते है और उन्‍हे भी अपने प्राण प्रिय थे, अग्रेज यह भी जानते थे कि गांधी जी ही अग्रेजो की ढाल है, गान्‍धी के रहते अग्रेजो का कोई बाल बाका नही कर सकता है। गान्‍धी को रास्‍ते से हटना उनके लिये ओखली मे सिर डालने के बराबर होगा। का्ग्रेस जो गरम-नरम दल मे बट गई थी वह गान्‍धी के हटने से फिर गरम मे परिवर्तित हो सकती थी, और अग्रेंजों के खिलाफ व्‍यापक क्रान्ति हो सकती थी। और यह अग्रेजो के हित मे न था, और गांधी जी का आग्रेजो ने गोल मेज सम्‍मेलन मे चाय पिला कर खूब भारत के खिलाफ खूब उपयोग किया।
    अब समय आ गया है कि विचार परिवर्तन कान्ति का, अपनी बात रखने का, मै रामदेव महाराज के बातो से आज ही सहमत नही हुआ हूँ, मैने अपने पहले के लेखों मे इसका वर्णन किया, आज की सरकार और काग्रेस गांधी जी को कितना ही महान कहे, किन्‍तु किसी अन्‍य देश भक्‍त के बलिदान के नगण्‍य न समझा जाये।

  10. Pramendra Pratap Singh Says:

    मेरा यह लेख यहां उपलब्‍ध है,
    http://bharat-jagran.blogspot.com/2006/11/blog-post.html

  11. सागर चन्द नाहर Says:

    @ आशीष भाई
    कहने को तो मैं भी गाँधीजी का विरोधी हूँ इससे गांधीजी की सेहत पर क्या फ़र्क पड़ता है? यह जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति गांधीजी या स्वामी रामदेव का समर्थक हो ही, वैसे आप मेरी यह पोष्ट जरा ध्यान से पढ़िये जिसमें मैने लिख है कि मैं किसी का भक्त नहीं हूँ मैने उनके प्राणायाम के प्रयोग किये और फ़ायदा मिला बस बात इतनी ही है।

    @प्रियंकर
    भाई साहब, आप भी मेरी पुरानी पोस्ट पेढ़ेंगे तो पायेंगे कि मैं शिक्षित जरा कम हूँ पर संस्कारित हूँ या नहीं यह तो सब जानते ही हैं और यह लेख लिखने से मैं संस्कारी नहीं रहता तो आपके इस प्रमाणपत्र का मैं स्वागत करता हूँ। वैसे एक बात बताइये कि क्या सत्य बोलना असंस्कारिता कि निशानी होती है?
    क्या नाथूराम गोडसे की बात करना भी बुरी बात है, क्यॊ सरकारों का भय था कि ” मी नाथूराम गोडसे बोलतोय ” पर प्रतिबंध लगा दिया गया? की कहीं जनता सत्य ना जान जाये कि क्यों गोडसे ने गांधीजी की हत्या की?
    मीठा मीठा गप गप और कड़वा कड़वा थू थू…

    #पंकज भाई
    कैसी भी मार्केटिंग करे स्वामी रामदेव पर उन्होने जो कुछ लोगों के फ़ायदे के लिये किया है उसके लिये उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता, मैने उपर भी कहा है कि मैने उनके प्राणायाम के प्रयोग किये और फ़ायदा मिला, बाकी कोई स्वामी रामदेव मेरे रिश्तेदार नहीं है। मेरे रिश्तेदा पंकज बैंगाणी जरूर है। :)

    @मनीष बंसल
    मेरे लेख को आपने शायद ध्यान से नहीं पढ़ा यह लेख स्वामी जी को सत्य बोलने के लिये धन्यवाद देने के लिये लिखा गया है बाकी इसमें कई विचार मेरे और मुझ जैसे लाखों लोगों के हैं, जो आप टिप्पणीयों में देख ही सकते हैं।
    यह लेख मैं कई दिनों से लिखना चाह रहा था खासकर २ अक्टूबर को ही पर सही मौका नहीं मिला आज जब मौका मिला अपनी बात कह दी। अब बन्दूक कैसे रखी जाती है और कैसे चलायी जाती है मैं नहीम जानता क्यों कि मैं अहिंसावादी हूँ और वह अहिंसा गांधीजी वाली नहीं महावीर वाली है।

    @प्रमेन्द्र प्रताप सिंह
    बहुत बहुत धन्यवाद इतनी शानदार टिप्प्णी के लिये, मैं जानता हूँ कि आपको इस टिप्पणी और लेख के लिये तथा आपकी टिप्प्णी को प्रोत्साहन देने के लिये कोसा जायेगा पर हमें जो कहना था कह दिया।

    पुनश्च्य: @आशीष भाई
    सृजन शिल्पी जी के लेख पर मैने प्रियंकर जी की टिप्पणी पढ़ी, अभी उनका मन अशांत है इस वजह से उन्होने यह टिप्प्णी की है, उनके पास जब कोई तर्क नहीं था तो उन्होने स्वामी रामदेव जी के बेसुरे गले की बात छेड़ दी, वे भूल गये कि शिल्पी जी ने अपने लेख के पहले पैरे में स्वामी रामदेव की खिंचाई की थी। भगवान उनके अशांत मन को शांत करे।

    दरअसल हम लोग उस धृतराष्ट्र की भाँति हो गये हैं जिसे अपने लाड़ले दुर्योधन की कोई गल्ती दिखाई नहीं देती, भगवान ना करे कल को सरकारें यह नियम बना दे कि गांधी - नेहरू या उनके परिवार के बारे में किसी भी प्रकार की टिप्पणी करने वाले पर देश द्रोह का मुकदमा चला दे।

  12. SHUAIB Says:

    अपनी बोलती बंद है - सबकी टिप्पणीयां पढ कर

  13. bhuvnesh Says:

    स्वामीजी के बयान से एक फायदा ये हो सकता है कि इससे गाँधीजी के आजादी मेँ योगदान की खुलेतौर पे समीक्षा हो सकेगी
    इसे विवाद का नाम देकर काँग्रेसी कुछ हासिल नहीँ कर पायेँगे|

  14. आशीष Says:

    सागर भाई,

    मै ये कहना चाहुंगा, गांधीजी के विरोधी होने मे और गांधीवाद के विरोधी होने मे एक अंतर है। आप फिर से सोचे कि एक ऐसा नेता जो ४० करोड मे से मान लिजिये २५% ही १० करोड लोगो को अपने पिछे ले चलने की क्षमता रखता हो , क्या महान नही है ?
    भले आपकी नजर मे गांधीजी की नितिया सही ना हो, लेकिन गाण्धीजी एक व्यक्ति , एक नेता के तौर मे क्या महान नही थे ?
    उनकी महानता का सबसे बडा कारण यह है कि वे किसी भी सिद्धांत को दूसरे पर थोपने से पहले खुद पर अमल मे लाते थे ! क्या आपकी नजर मे ऐसा कोई दूसरा नेता है ?
    गांधीजी एक इंसान थे, स्वभाविक है कि कुछ गलतिया उनसे भी हुयी होंगी। उनकी आलोचना भी होनी चाहिये। आलोचना से उनकी महानता पर कोई फर्क नही पढता। लेकिन जब आलोचना का स्तर महाशक्ति की टिप्पणी(जो आपकी नजर मे शानदार है) के रूप मे हो तो दूख होता है! इस इन्सान (महाशक्ति) को तो यह भी नही मालुम को बुजुर्गो को किस तरह से सम्बोधित किया जाता है।(वे गाण्धीजी को बुढ्ढा कह कर संबोधीत कर रहे है)

    सबसे बडी बात यह है कि किसने ऐसा कहा है कि स्वतण्त्रता के लिये सिर्फ गांधीजी का ही योगदान था ? जब ऐसा कहा ही नही गया तो विवाद क्यों ?

  15. पंकज बेंगाणी Says:

    मुझे रामदेव बाबा से कोई शिकायत नही है। शिकायत होने की वजह भी नही है। सबको अपनी दुकान चलाने का अधिकार है। यह तो अच्छा है कि रामदेव ने अभी तक अपनी दुकान के आगे समाजसेवा का झुठा बैनर नही लगाया है। वरना कौन नही जानता कि आज के समाजसेवीयों की दुकाने कैसी होती है। फिर वो चाहे मेधा पाटकर हो या आमीर खान या अरून्धती।

    गान्धीजी का व्यक्तित्व इतना बडा है कि आज उनपर आरोप मढने से पहले भी दो बार सोचना पडता है क्योंकि हमारे देश के लोगों में सहनशीलता का घोर अभाव है। कोई भी महापुरूष नही होता है। भगवान राम ही नही थे महापुरूष तो ना ही गौतम बुद्ध ही थे, जो अपनी पत्नी और नवजात शिशु की जिम्मेदारीयों को छोडकर चले गए; तो फिर गान्धीजी क्या बिसात!!

    सच स्विकार करने की हिम्मत होनी चाहिए। भगतसिंह की लोकप्रियता से गान्धीजी को स्वाभाविक ही खतरा था, और उनके पास पॉवर था। जिसका उन्होने इस्तेमाल किया। ऐसे ही पॉवर का उपयोग उन्होने सरदार की जगह नेहरू को चुनकर किया।

    गान्धीजी महान हैं पर सर्वगुण सम्पन्न नही हैं। वे राष्ट्रपिता की हैसियत नहीं रखते। देश का 1.5 अरबवां नागरीक यानि कि मैं उन्हे अपना राष्ट्रपिता नही मानता।

  16. Pramendra Pratap Singh Says:

    सागर भाई, मै निन्‍दा रस से नही घबराता मेरे जुब़ान किसी की जाग़ीर नही जो उस पर प्रतिबनध लगा सकें। यह मेरी अपनी स्‍वातन्‍त्र अभिव्‍यक्ति थी, तो मैने बयान की। जो मैने कहा मुझे नही लगता है कि वह गलत है। मेरे बारे मे कौन क्‍या सोचता है, कौन मेरा बहिस्‍कार करता है मुझे परवाह नही है, मैने न तो कभी विचारो और सिद्धान्‍तों से समझौता किया है न करूंगा। आपके लेख मे मुझे सच्‍चाई लगी और मैने सच्‍चाई का सर्मथन किया है, और आगे भी करता रहूँगा, और आगे भी राष्‍ट्रहित के मुद्दे मे सदा साथ पायेगे।

  17. Pramendra Pratap Singh Says:

    मै आगे कि बात यहॉं रखना उचित समझता हूँ मै अपने ब्‍लॉग ”भारत-जागरण” पर अपनी बात रख रहा हूँ। पता है —- http://bharat-jagran.blogspot.com/

  18. SHUAIB Says:

    काश रामदेव बाबा यहां की टिप्पणीयां पढ पाते - बहुत मज़ेदार चर्चा है जारी रहे

  19. alpana Says:

    i read about swami Ramdev and i feel that he is doing all this for our motherland

  20. सागर चन्द नाहर Says:

    @ आशीष भाई
    इन दिनों स्वामी रामदेव जी के पीछे भी भारत के करोड़ों लोग हैं, उनका सम्मान करते हैं, उनके बताये तरीकों से प्राणायाम करते हैं, तो फ़िर वे भी महान ही हुए ना? फ़िर आप क्यों उनसे चिढ़ते हैं। सिर्फ़ इसी वजह से आप गाँधीजी को महान मानते हैं तो दो अलग अलग व्यक्तित्व के लिये दो अलग अलग नियम क्यों?
    प्रमेन्द्र सिंह जी अगर गाँधीजी की शान में कुछ गलत कहते हैं तो एक सच्चे गांधी वादी होने की वजह से आपको नाराज नहीं होना चाहिये क्यों कि गांधीजी कहते थे कि कोई आपके एक गाल पर थप्पड़ मारे आप दूसरा गाल आगे कर दो। गांधीजी जिन्दा थे तब भी लोग उन्हें भला बुरा कहते थे तब वे उतना नाराज नहीं होते थे जितना आप हो रहे हैं।

    @ अल्पना जी, शुऐब भाईजी, मनोज सेखानी जी, भुवनेश जी, प्रतीक भाई पाण्डे जी आदि सभी मित्रों को जिन्होने यहाँ टिप्पणी की है उन सबका धन्यवाद

  21. alpana Says:

    Pankaj ji. main kahana chanhugi ki sawmi ramdev ke pranayam try kare aour anubhv bataye ki aapane kya kharida[Ramdev baba ko marketing karna aata hai]

  22. Shrish Says:

    @ आशीष,

    आप दक्षिण अफ्रिका के वर्ण भेद विरोधी संघर्ष को भूल रहे है।

    महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष की शुरुआत अवश्य की परंतु उनके थोड़े दिनों के तमाशे से ही दक्षिण अफ्रीका को आजादी नहीं मिल गई, उसे आजादी मिली वहाँ के जनांदोलन से जो वर्षों चला।

    उनकी महानता का सबसे बडा कारण यह है कि वे किसी भी सिद्धांत को दूसरे पर थोपने से पहले खुद पर अमल मे लाते थे ! क्या आपकी नजर मे ऐसा कोई दूसरा नेता है ?

    दक्षिण अफ्रीका से आने के बाद गांधी जी ने अंग्रेजों की एक लाठी भी न खाई, हाँ उनके दिखाये रास्ते पर चलते हुए जनता ने अत्याचार अवश्य सहे। भाषण देने, प्रार्थना सभाएं करने, डांडी-यात्रा करने तथा शहीदों की आलोचनाएं करने के अलावा गांधी जी ने कोई मुश्किल काम नहीं किया। उन्होंने न तो भगत सिंह आदि की तरह अविवाहित रहकर देश पर अपनी जान न्योछावर की और न ही नेल्सन मंडेला की तरह अपनी पूरी जवानी जेलों में बितायी।

    @ प्रियंकर,
    अगर गांधी जी के विचारों से असहमत होने के बावजूद यह माना जा सकता है कि वे देशभक्त थे तो नाथूराम गोडसे से असहमत होने के बावजूद भी यह सत्य है कि वह भी देशभक्त था, उसने जो किया वह सही था या नहीं यह बहस का विषय हो सकता है लेकिन गांधी के समान ही उसकी देशभक्ति पर भी शक नहीं किया जा सकता जिन्हें शक है वे उसकी पुस्तक ‘गांधीवध क्यों’ पढ़ें फिर बोलें।

    @ mksekhani,
    आपकी बात आंशिक रुप से ही लेकिन सही है, गांधी जी के अंतर्मन में भय था कि यदि भगत सिंह, सुखदेव , राजगुरु आदि के कारण भारत को आजादी मिल गई तो जनता का मेरे तथाकथित ‘अहिंसा’ के फार्मूले से विश्वास उठ जाएगा।

    @ bhuvnesh,
    भुवनेश जी, आपने सही कहा यह बहस समय की जरुरत है।

    @ पंकज बेंगाणी,
    सही कहा आपने, रामदेव जी यदि नाम तथा दाम कमा रहे हैं तो इसमें क्या गलत है, क्या हम सब यह नहीं पाना चाहते। रामदेव तो अपनी योग-विद्या, साधना, व्यक्तित्व,टेलेंट तथा विश्वनीयता से यह सब कर रहे हैं। आज लोग १९४७ की तरह भोले नहीं कि किसी के पीछे यों ही चल पड़ें, स्वामी रामदेव के उपायों को अपनाने से उनको लाभ हो रहे है तभी तो लालूप्रसाद जैसे नास्तिक टाइप लोग भी उनके शिष्य बन रहे हैं।

  23. PRABHAT TANDON Says:

    बाप रे बाप! :rolleyes: यहाँ तो बडी गजब की बहस छिडी है , सब कुछ तो आप ने कह ही दिया , मेरे लायक कुछ न बचा लेकिन एक बात बिल्कुल साफ़ है कि राम देव को मारकेटिग का फ़न्डा बहुत बढिया मालूम है तभी तो वह अखबारों की सुर्खी मे बने रहते हैं.

  24. पंकज बेंग़ाणी Says:

    अल्पनाजी,

    मैं रोज सुबह प्राणायम करता हुँ। यह विधि चाहे रामदेव बाबा बताएँ या कोई और विधि तो एक ही रहने वाली है।

    “रामदेव को मार्केटिंग करनी आती है” - मेरे कहने का आशय किसी भौतिक वस्तु को बैचने के लिए नही परंतु अपने विचारों को या युँ कहुँ कि खुद को बेचने के लिए था। और मै अपनी बात पर कायम हुँ कि यह बाबा को बहुत अच्छी तरह से आता है।

    बाबा सिर्फ समाजसेवा ही करते हैं और व्यापार नही करते हैं इससे मै सहमत नही हुँ। रामदेव बाबा के ट्रस्ट की दवाएँ पुरे भारत में बिकती है और बाबा कहीं भी सम्मेलन वगैरह करने के लाखों लेते भी हैं (कुछ दिन पहले गुवाहाटी, असम गए थे तब उन्होने बडी रकम ली थी। यह बात आयोजकों ने मुझे बताई)।

    और इसमे कुछ गलत भी नही है। मै कहाँ बाबा रामदेव को गलत कह रहा हुँ। उनमें प्रतिभा है और वे उससे कमा रहे हैं तो क्या गलत है? अब कोई यह कहे कि वो उस कमाई को अपने उपर खर्च नही करते, तो ठीक है भले ही ना करे पर कमाते तो हैं!! और अच्छा खाशा कमाते हैं। और यह सही है।

  25. Pramendra Pratap Singh Says:

    आशीष said

    भले आपकी नजर मे गांधीजी की नितिया सही ना हो, लेकिन गाण्धीजी एक व्यक्ति , एक नेता के तौर मे क्या महान नही थे ?
    थे। मैने कब कहा कि नही थे। मैने तो यही कहा कि वे म‍हान थे, महान है और महान रहेंगे। पर गांन्‍धी के राजनैतकि चाटुकारों के बल पर नही। एक तरफ तो गांधी वादी होने का ढोग करते है दूसरी तरफ रामदेव के पुतले फुकते है। क्‍या गांधी जी कह के गये थे कि कोई मेरे बारे में कुछ कहे तो उसके पुतले फूकना। क्‍या गांधी जी के विचार आज जिन्‍दा है

    उनकी महानता का सबसे बडा कारण यह है कि वे किसी भी सिद्धांत को दूसरे पर थोपने से पहले खुद पर अमल मे लाते थे ! क्या आपकी नजर मे ऐसा कोई दूसरा नेता है ?
    आजादी के पहले ऐसे नेता मिलते थे। आज के दौर मे सम्‍भव नही है। गांधी ती ने कहा कि भारत विभाजन मेरी लाश पर होगा, पर क्‍या हुआ। गांधी जी की सोच थी कि अगर विभाजन न होगा तो खून खराबा होगा। बटवारा हुआ और खू़न ख़राबा भी। और गांधी जी के सोच से भंयकर, जिसकी कल्‍पना गांधी जी को भी न थी। पाकिस्‍तान जैसा दुश्‍मन राष्‍ट्र न होता।

    इस इन्सान (महाशक्ति) को तो यह भी नही मालुम को बुजुर्गो को किस तरह से सम्बोधित किया जाता है।(वे गाण्धीजी को बुढ्ढा कह कर संबोधीत कर रहे है)
    ‘बुढ्ढा’ शब्‍द मैने समय पर‍िस्थित के अनुसार किया था अग्रेजो के परिपेक्ष मे, अगर यही मैने वृद्ध, बुजुर्ग या अधेड़ शब्‍द का प्रयोग करता तो यह उचित न होता, गांधी जी पर बनी फिल्‍मों तथा नाटको तथा अन्‍य जगहो पर ऐसे शब्‍दों का प्रयोग, शायद लगे रहों मुन्‍ना भाई नही देखी है। मै यहां प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह के नाम से लिख रहा हूँ न कि महाशक्ति के नाम से, जहां महाशक्ति नाम का प्रयोग करूं वही मुझे इस नाम सें सम्‍बोधित करें। अन्‍यथा फिर सब ये न कहियेगा ‘प्रचार’ हो रहा है।

  26. Laxmi N. Gupta Says:

    आपने बिल्कुल सही लिखा है। इन नेताओं को अनर्गल प्रलाप करनए का ह्क है किन्तु स्वामी रामदेव को सही बात कहने का भी हक नहीं है। यह कहाँ का न्याय है?

  27. krishnshanker sonane Says:

    आपका चिट्‍ठा देखा । मैं अधिकतर साहित्‍यिक परिवेश का हूँ और
    अन्‍य टीकाओं से दूर हूँ।अत: साहित्‍यिक भी कुछ होना चाहिए।
    विचार अच्‍छे है ।बधाई ।
    –कृष्‍णशंकर सोनाने
    http://shankersonane.livejournal.com

  28. krishnshanker sonane Says:

    आपका चिट्‍ठा देखा । मैं अधिकतर साहित्‍यिक परिवेश का हूँ और
    अन्‍य टीकाओं से दूर हूँ।अत: साहित्‍यिक भी कुछ होना चाहिए।
    विचार अच्‍छे है ।बधाई ।
    –कृष्‍णशंकर सोनाने
    http://shankersonane.livejournal.com.

  29. फुरसतिया » चल पड़े जिधर दो डग-मग में Says:

    [...] पीठ ठोंक दी कि वाह स्वामी रामदेव क्या बहादुरी की बात कही [...]

  30. फुरसतिया » सबको सम्मति दे भगवान Says:

    [...] और सागर भाई के बाबा रामदेव को शाबासी देने के संदर्भ से अधिक मैंने इन [...]

  31. ::: हाम्रो ब्लग ::: » चर्चा रामदेवको Says:

    [...] वाह स्वामी रामदेव [...]

  32. हरि प्रकाश गर्ग Says:

    गांधी जी के विषय में हंसराज रहबर की लिखी हुई पुस्तक गांधी “बेनकाब” भी पढ़ने लायक है।

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