चिट्ठाचर्चा और मैं
Posted by सागर नाहर on 17, March 2007
15 तारीख को दोपहर लगभग 3 बजे गिरीराज जोशीजी का बीकानेर से फोन आया कि भाईसा आपको मेरा एक छोटा(?) सा काम करना पड़ेगा, मैने कहा ठीक है भाई कहिये। उन्होने कहा पिछले शुक्रवार को भी नैट का कनेक्शन ना होने की वजह से मैं चिट्ठाचर्चा नहीं कर पाया, और संयोग से इस बार भी नहीं कर पाउंगा और यह जिम्मेदारी मैं आपको सौंप रहा हूँ।
मैने कहा ठीक है भाई आप इतने प्रेम से कह रहे हो तो जरूर कर लेंगे
मैने सोचा मामूली काम के लिये जोशीजी को मना क्य़ूं किया जाये? यह काम कितना मामूली है यह तो आगे पता चलना था।
जोशी जी ने मुझे उनका आई डी और पासवर्ड दे दिया। अब चार बजे से लिखने बैठे, एकाद बार बिजली चली गई, बीच बीच में दुकानदारी भी चलती रही पर चिट्ठे भी द्रौपदी के चीर की तरह बढ़ते (आते) ही जा रहे थे। एक एक चिट्ठे को ध्यान से पढ़ना और उसके बारे में लिखना , कुछ मैटर को कॉपी करना। ऐसे में कुछ चिट्ठों पर ताला लगा हुआ हो तो उस ताले को तोड़ कर मैटर कॉपी करना कोई आसान काम नहीं था।
मैं पढ़ते और लिखते थक चुका था, और बीच में हिन्द युग्म, आलोचक और मसीजीवीजी के चिट्ठों पर टिप्पणीयाँ आती जा रही थी। श्रेष्ठ टिप्पणी चुनने के लिये उन्हें भी देखते रहना था। इसी तरह रात के दस बज गये। यानि छ: घंटे बीत चुके थे और अभी काम पूरा नहीं हो पाया था।
एक ग्राहक का काम भी निबटाना था, सो निश्चय किया कि सुबह जल्दी आकर बाकी का काम पूरा किया जायेगा। शुक्रवार की सुबह ७ बजे केफ़े खोलना पड़ा, सबसे पहले ग्राहक का काम पूरा किया और फिर से उस रात के बाकी काम को लेकर बैठा। पता चला कि रात बारह बजे से पहले लगभग आठ- दस चिट्ठे और भी आ गये हैं यानि पचास के चिट्ठे!! एकाद चिट्ठोंको देखा और बाकी के चिट्ठों को संजय भाई के धृतराष्ट्र हवाले छोड़ व्याकरण की गल्तियाँ ढूंढना शुरू किया। सुबह के दस बज चुके थे और निश्चय किया कि अब इसे पोस्ट कर देना चाहिये।
रात को गिरीराज जी के आई डी से ब्लॉगर नहीं खुला तो अनुप जी ने आमंत्रण दिया जिससे मैने नया आई डी बना लिया था। तो सुबह उस आई डी से ब्लॉगर खोला और लेख को वहाँ चिपका कर पोस्ट करने का क्लिक किया तो सब कुछ गायब और संदेश मिला “This page can’t be displayed “, भला हो कि मैने उसे वर्ड पैड में लिख था और Save कर लिया था वरना आठ दस घंटो की मेहनत पानी में…….एक बार नहीं दो बार नहीं पूरे पाँच बार करने के बाद नया संदेश मिला कि HTML कोड में गलती है, और तभी एक बार फिर से बिजली ने धोखा दे दिया।
बिजली के जाने के बाद जोशीजी का फोन आया कि भाईसा क्या बात है अभी तक चिट्ठाचर्चा पर आपका लेख नहीं दिख रहा। मैने उन्हें सारी बात बताई तो उन्होने कहा कि आपने Draft के रूप में सेव किया है क्या? मैने उन्हें बताया कि उसका मौका ही नहीं मिला। जोशीजी ने बिजली आने पर कैसे करना है इसके लिए आवश्यक सुझाव दिये।
अब बिजली के आने का इंतजार था और बिजली महारानी १ बजे आई और तब मैं उस पोस्ट को कर पाया यानी लिखना शुरू किये से लेकर अब तक २० घंटे बीत चुके थे। एक लेख के लिये बीस घंटे?????
यह लेख लिखने का कारण यही है कि जब किसी दिन समीरलाल जी सागर चन्द या अनुज प्रमेन्द्र के चिट्ठे की चर्चा नहीं कर पाते तो दोनो के उलाहने भी सुनने पड़ते हैं कि भाई साहब आपने मेरे चिट्ठे की चर्चा तो की ही नहीं!!! उनको राजी करो और ऐसे में जब कोई यह कहे कि
“अरे भैया! जब टाइप करने से बचना चाहते थे तो चिट्ठाचर्चाकार क्यों बने थे?”
तो वाकई यह यह एक चिट्ठाकार के मन को ठेस लगने जैसा है। चर्चा करना चर्चाकार की जिम्मेदारी नहीं है, वह बस अपने विचार प्रकट करता है कि इस चिट्ठे में यह लिखा है या उसमें वह लिखा है। किसी चिट्ठाकार को यह कार्य करने के लिये मानदेय नहीं दिया जाता है। अब और कुछ कहना बाकी रह गया हो एक टिप्प्णी और आती है
जब “हिन्द-युग्म” के कर्ता-धर्ताओं ने किसी पाठकविषेश को कुछ नहीं कहा न लिखा तो “चिट्ठाचर्चा” में राजीव जी के कंधे साधकर गिरिराज जी,शैलेश जी को क्यूँ निशाना बनया गया
क्या कहा जाय इस टिप्पणी के लिये? चिट्ठाकार का मानो यही एक काम बाकी रह गया है कि वह इस तरह किसी के कंधे पर बंदूक रख कर किसी को निशाना बनाये।
कम से कम समीरलाल जी के लिये ऐसा कहना पागलपन होगा हाँ यही शब्द अगर सागर चन्द ने लिखे होते तो आपकी प्रतिक्रिया जायज होती।
भाई; (माफ कीजिये बहनजी) किसी ने किसी को निशाना नहीं बनाया था यह मजाक में लिखा था कि हम टाइप ना कर पाये तो इसका दोष जोशीजी को दीजिये। शायद आप बात को समझ नहीं पाये या अपनी पोस्ट लिखते समय स्माईली का प्रयोग करना भूल गये मैं यह समझ नहीं पा रहा हूँ। ![]()


17, March 2007 at 4:23 pm
अब पता चला कि चिट्ठा चर्चा में कितनी मेहनत है.
आपकी चर्चा मे मेरे ब्लोग के बारे मे था तो पर लिंक पर क्लिक करने से ब्लाग नहीं खुल रहा था..
17, March 2007 at 5:34 pm
sahi bat hai bhaisa
17, March 2007 at 6:05 pm
बड़ा मुश्किल काम है।
17, March 2007 at 7:58 pm
सागर जी, आपके द्वारा झेले कष्टों के बारे में सुनकर लगा जेसे यह मेरे नेट की कहानी हो । किन्तु हमारे यहां बिजली नहीं जाती बस नेट नहीं लगता ।
वैसे किसी भी काम को करने में आने वाली कठिनाइयों को केवल काम करने वाले जान सकते हैं । बाँकी लोगों को लगता है कि काम कठिन नहीं है । इसका सबसे अच्छा उपचार है, बारी बारी सबसे काम करवाना । वैसे, शायद आपका ध्यान नहीं गया, आपका काम भारी न हो जाए इसलिए मैंने तो चिट्ठा लिखा ही नहीं धा । धन्यवाद कह दीजिए !
घुघूती बासूती
17, March 2007 at 9:04 pm
सागरभाई, हम तुम्हारा दर्द समझ सकते हैं। हमारे साथ तो कई बार ऐसा हुआ कि दो-तीन घंटे का लिखा हुआ मसाला उड़ गया। लेकिन अब तुमको नियमित लिखने के लिये तैयार रहना पड़ेगा। कब यह हम बताइयेंगे।
रही समीरलाल की बात तो मेरी नजर वे सबसे पापुलर चर्चाकार हैं। उनके बिना हम चर्चा की कल्पना ही नहीं कर पाते।और कोई साथी जुड़ना चाहते हैं चर्चा करने में तो उनका सहर्ष स्वागत है।
17, March 2007 at 10:48 pm
सागरभाई
आपकी मेहनत सफल थी, आपने बेहतरीन चिठ्ठा चर्चा की थी !
17, March 2007 at 11:04 pm
सागर भाई,
आपके रुप मे चिट्ठा-चर्चा को एक सार्थक चर्चाकार मिला है। उम्मीद है आप लगातार करते रहेंगे।
चिट्ठाचर्चा करना आसान नही है। सचमुच काफी मेहनत लगती है। लेकिन सभी ऐसा समझे ये कोई जरुरी तो नही। सभी चिट्ठाकारों के अपने लेख/कविता ’कालजयी रचनाएं’ दिखती है। लेकिन चर्चाकार का निर्णय अंतिम होना चाहिए, कि वो चाहे तो उसकी चर्चा करे अथवा ना करे। किसी भी तरह का प्रलोभन, धमकी अथवा विचार, इसे चर्चाकार की नज़रों मे गिराना ही माना जाएगा।
मै प्रायोजित चर्चा नही करता, और ना ही कभी करूंगा, भले ही मेरे चिट्ठा चर्चा बन्द करनी पड़े। निष्पक्षता ही चर्चाकार की पहचान है। जो चिट्ठे मुझे पसन्द आएंगे मै उन्ही की चर्चा करुंगा, अलबत्ता कविताओं के प्रति मैने अपने रुख को काफी कुछ बदला है। अब मै कविताओं को भी पढता हूँ, जो पसन्द आती है उनकी चर्चा भी करता हूँ।
17, March 2007 at 11:09 pm
अरे सागर भाई, एक ही दिन की चिट्ठाचर्चा में पसीना आ गया?
अब सोचो मेरा क्या होता होगा क्योंकि मैं ग्लोबल वायसिस पर २ सप्ताह के चिट्ठों का अवलोकन लिखता हूँ!!
और इस बार तो ३ सप्ताह के चिट्ठों को बाँचा है!! 
18, March 2007 at 2:49 pm
सही है जी बोत मेहनत का काम है, कविराज ने एकबार मुझे प्रस्ताव रखा था, मैं तो तीन दिन डर के मारे गूगल चैट पर नहीं आया।
भाईलोग समझते क्यों नहीं चर्चाकार का काम स्वंयसेवा का है उसको कोई तनख्वाह थोड़े ही मिलती है, कहाँ तो हमें उसकी तारीफ करनी चाहिए और कहाँ हम उसमें कमियाँ निकालने लगते हैं। जिन लोगों को शिकायत हो वो भाई खुद चर्चा शुरु कर सकते हैं, इसमें कोई गलत बात नहीं। उदाहरण के लिए हिन्द युग्म पर इतने कवि हैं वे अलग से कविताओं की चर्चा कर सकते हैं उन्हें इनकी बेहतर जानकारी भी है और उनकी लेखन शैली भी अच्छी है उनमें से किसी को इस हेतु आगे आना चाहिए।
समीरलाल जी के बारे में कही कई टिप्पणी हमें बहुत बुरी लगी क्योंकि उनके जैसा निष्पक्ष चर्चाकार तो क्या चिट्ठाकार कोई और नहीं। जब भी कोई बात चलती है हम सब तो एक न एक साइट हो जाते हैं अथवा किसी एक से इतिफाक जरुर जताते हैं लेकिन समीरलाल जी को मैंने आजतक किसी के पक्ष विपक्ष में बोलते नहीं देखा, उनके बारे में ऐसा कुछ कहना तो सरासर उनका अपमान करना है।