मशहूर गायक जिन्हें अंतिम दिनों में भीख तक मांगनी पड़ी
Posted by सागर नाहर on 20, November 2007
पिछले दिनों मेरे अनुरोध पर यूनुस भाई ने अपने लेख में हमें बताया कि किस तरह मशहूर संगीतकार रामलाल ने मुफलिसी में अपने अंतिम दिन गुजारे। मैने नेट पर इस तरह के अन्य गायकों के बारे में जानकारी पाने की कोशिश की तो नलिन शाह के एक लेख से कई ऐसे गायक संगीतकारों के बारे में पता चला जिन्होने अपने अंतिम दिन भीख मांगते हुए गुजारे।
मशहूर अभिनेता मास्टर निसार जिन्होने फिल्म शीरी फरहाद 1931 से लोगों को अपनी मधुर आवाज से लोगों को दीवाना बनाया, अपने जीवन के अंतिम दिन ब्रेड के एक-एक टुकड़े के लिये भीख मांगते हुए गुजारे। आपने राजकुमारी का नाम तो सुना ही होगा जिन्होने महल फिल्म में घबरा के सर को टकरा दें तो अच्छा हो….और बावरे नैन के सुन बैरी सच बोल जैसे सुन्दर गीत गाये थे, और फिल्म जगत में अपनी आवाज से छा गई थी, अंतिम दिनों में बहुत गरीबी में लगभग भिखारी की तरह गुजारे। मास्टर परशुराम ने फिल्म दुनिया ना माने 1937 में भिखारी का रोल निभाया और मन साफ तेरा है या नहीं पूछ ले दिल से गाना गाया, बाद में अपनी असली जिंदगी में भिखारी बने।
रतन बाई जो फिल्म भारत की बेटी फिल्म में तेरे पूजन को भगवान बना मन मंदिर आलीशान जैसा गाना गाकर प्रसिद्ध हुई अपने आखिरी दिनों में हाजी अली की दरगाह के बाहर भीख मांगती पाई गई। मशहूर संगीतकार खेमचन्द्र प्रकाश जी की दूसरी पत्नी भी मशहूर संगीतकार नौशाद को भीख मांगती मिली। कहीं पढ़ा था कि हमराज फिल्म की सुन्दर नायिका विम्मी के अंतिम दिन भी बहुत बुरे गुजरे। भारत भूषण और भगवान दादा जैसे सुपर स्टारों का हाल भी बहुत बुरा हुआ।
मैं इस लेख में खास जिनका जिक्र करना चाह रहा हूँ वे थे मशहूर संगीतकार एच खान मस्ताना (H. Khan Mastana) जिन्होने मोहम्मद रफी साहब के साथ फिल्म शहीद में वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हो जैसे कई शानदार गीत गाये और मुकाबला 1942 जैसी कई फिल्मों में संगीत भी दिया; एक दिन मोहम्मद रफी साहब को हाजी अली की दरगाह के बाहर भीख मांगते मिले। मैं आज आपको उनके गाये दो गाने सुनवा रहा हूँ जिनमें एक तो यही है वतन की राह… इस गीत के संगीतकार गुलाम मोहम्मद हैं।
वतन की राह में
दूसरा गाना फिल्म मुकाबला 1942 का है गीत के बोल हैं हम अपने दर्द का किस्सा सुनायें जाते हैं। गीतकार एम करीम और संगीतकार खुद खान मस्ताना हैं।
गाने सुनने के लिये यहाँ क्लिक करें।
Technorati Tag: H. Khan Mastana , Rajkumari , naushad , Master Nisar , Ram lal Hira panna , Master Purushottam , Ratan Bai , Khem chand Prakash , Md. Rafi , खान मस्ताना , मोहम्मद रफी , रामलाल , मास्टर पुरुषोत्तम , मास्टर निसार , खेमचन्द्र प्रकाश , महफिल


प्रियंकर said
सागर भाई,
एक समाज के रूप में हम बहुत नाशुक्रा किस्म का समाज हैं . चढते सूरज की जयजयकार करते हैं और उसके आगे बिछ-बिछ जाते हैं . पर अस्ताचल की ओर जाते सूर्य की ओर पूरी तरह पीठ कर लेते हैं . सरकार को और फ़िल्म जगत को क्या कहें जो वरिष्ठ कलाकारों और शिल्पियों की सामाजिक सुरक्षा के प्रति आपराधिक रूप से उदासीन हैं . क्रिकेट को छोड़ दें तो यही दशा अन्य खेलों के खिलाड़ियों की होती आई है . बहुत शर्म आती है .
बात होती है प्रगति की — वृद्धि दर की !
अनिता कुमार said
बहुत ही दर्दनाक पोस्ट है।पढ़ पढ़ कर खामोश कदमों से आते अपने बुढ़ापे की तरफ़ देख्ने को भी डर लगता है। भगवान न करे ऐसे दुर्दिन देखने के लिए जिन्दा रहें । गाने जरुर बड़िया हैं।
paryanaad said
मन उदास कर दिया भाई. अच्छे लोगों की दुनिया में कोई कदर नहीं है.
दीपक भारतदीप said
अपने दिल के नगीने से
सजाकर कितने भी तौह्फे दे दो
इस ज़माने को
कद्रदान कभी होगा नहीं
खुश रहते हैं वही लोग
जो बेचते हैं परछाईयाँ
झूठ बेचते हैं दिखाकर सच्चाईयां
बन जाते हैं उनके महल
ज़माना भी खो जाता है
भूलभुलैया में कहीं
दावे सभी करते हैं
पर कोई हुआ है अभी तक
सच्चे आदमी का साथी कहीं
—————————————-
आपकी इस रचना पर मेरे दिल में यह पंक्तियाँ आयीं.
दीपक भारतदीप
प्रत्यक्षा said
सचमुच बेहद दुखद ।
ramadwivedi said
देश और देश के लोंगो के लिए सचमुच बेहद शर्म की बात है….इन्सानियत की ऐसी कमी और इस देश में????
डा. रमा द्विवेदी
Tarun said
ये दुखद तो है लेकिन ये भी हो सकता है कि अपनी इस हालात के ये खुद जिम्मेदार हों और ये भू मुमकिन है कि इन्हें आगे काम ना मिला हो।
मैं ऐसा इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि मैने सुना है भगवान दादा जो अपने जमाने में प्रसिद्ध ही नही थे बल्कि अच्छा कमाते भी थे, अपनी रईसी शौक के कारण आखिर में मुफलिसी की जिंदगी गुजारे। शायद भारत भूषण का भी ऐसा ही हाल था।
yunus said
सागर भाई बहुत मार्मिक मुद्दा उठाया है । इसमें कुछ नाम और भी जुडेंगे, गायकों के अलावा कई कलाकार भी मुफलिसी के दौर में गुमनाम चले गये । आज मुबारक बेगम इसी तरह गुमनाम जिंदगी जी रही हैं ।
दरअसल फिल्मों की दुनिया में चमकदार और उगते हुए सितारे को सलाम किया जाता है । ये सच है कि कई तरह की संस्थाएं आजकल फिल्म कलाकारों ने बनवा ली हैं । पर कोई खास काम नहीं बन सका है उससे । जरा कल्पना कीजिए कि किसी रतन बाई या खान मस्ताना को चाहने वाले लोग या फिल्म संसार के लोग महज एक एक रूपया भी दें तो इन कलाकारों की मदद के लिए कितने रूपये जमा हो जाएं । पर ऐसा होता कहां है ।