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	<title>Comments on: मशहूर गायक जिन्हें अंतिम दिनों में भीख तक मांगनी पड़ी</title>
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	<description>गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं</description>
	<pubDate>Wed, 23 Jul 2008 13:24:09 +0000</pubDate>
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		<title>By: yunus</title>
		<link>http://nahar.wordpress.com/2007/11/20/lost-singers/#comment-1696</link>
		<dc:creator>yunus</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 21 Nov 2007 13:29:17 +0000</pubDate>
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		<description>सागर भाई बहुत मार्मिक मुद्दा उठाया है । इसमें कुछ नाम और भी जुडेंगे, गायकों के अलावा कई कलाकार भी मुफलिसी के दौर में गुमनाम चले गये । आज मुबारक बेगम इसी तरह गुमनाम जिंदगी जी रही हैं । 
दरअसल फिल्‍मों की दुनिया में चमकदार और उगते हुए सितारे को सलाम किया जाता है । ये सच है कि कई तरह की संस्‍थाएं आजकल फिल्‍म कलाकारों ने बनवा ली हैं । पर कोई खास काम नहीं बन सका है उससे । जरा कल्‍पना कीजिए कि किसी रतन बाई या खान मस्‍ताना को चाहने वाले लोग या फिल्‍म संसार के लोग महज एक एक रूपया भी दें तो इन कलाकारों की मदद के लिए कितने रूपये जमा हो जाएं । पर ऐसा होता कहां है ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सागर भाई बहुत मार्मिक मुद्दा उठाया है । इसमें कुछ नाम और भी जुडेंगे, गायकों के अलावा कई कलाकार भी मुफलिसी के दौर में गुमनाम चले गये । आज मुबारक बेगम इसी तरह गुमनाम जिंदगी जी रही हैं ।<br />
दरअसल फिल्‍मों की दुनिया में चमकदार और उगते हुए सितारे को सलाम किया जाता है । ये सच है कि कई तरह की संस्‍थाएं आजकल फिल्‍म कलाकारों ने बनवा ली हैं । पर कोई खास काम नहीं बन सका है उससे । जरा कल्‍पना कीजिए कि किसी रतन बाई या खान मस्‍ताना को चाहने वाले लोग या फिल्‍म संसार के लोग महज एक एक रूपया भी दें तो इन कलाकारों की मदद के लिए कितने रूपये जमा हो जाएं । पर ऐसा होता कहां है ।</p>
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		<title>By: Tarun</title>
		<link>http://nahar.wordpress.com/2007/11/20/lost-singers/#comment-1693</link>
		<dc:creator>Tarun</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 21 Nov 2007 02:05:12 +0000</pubDate>
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		<description>ये दुखद तो है लेकिन ये भी हो सकता है कि अपनी इस हालात के ये खुद जिम्मेदार हों और ये भू मुमकिन है कि इन्हें आगे काम ना मिला हो।

मैं ऐसा इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि मैने सुना है भगवान दादा जो अपने जमाने में प्रसिद्ध ही नही थे बल्कि अच्छा कमाते भी थे, अपनी रईसी शौक के कारण आखिर में मुफलिसी की जिंदगी गुजारे। शायद भारत भूषण का भी ऐसा ही हाल था।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ये दुखद तो है लेकिन ये भी हो सकता है कि अपनी इस हालात के ये खुद जिम्मेदार हों और ये भू मुमकिन है कि इन्हें आगे काम ना मिला हो।</p>
<p>मैं ऐसा इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि मैने सुना है भगवान दादा जो अपने जमाने में प्रसिद्ध ही नही थे बल्कि अच्छा कमाते भी थे, अपनी रईसी शौक के कारण आखिर में मुफलिसी की जिंदगी गुजारे। शायद भारत भूषण का भी ऐसा ही हाल था।</p>
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		<title>By: ramadwivedi</title>
		<link>http://nahar.wordpress.com/2007/11/20/lost-singers/#comment-1692</link>
		<dc:creator>ramadwivedi</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Nov 2007 17:26:19 +0000</pubDate>
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		<description>देश और देश के लोंगो के लिए सचमुच बेहद शर्म की बात है....इन्सानियत की ऐसी कमी और इस देश में????

   डा. रमा द्विवेदी</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>देश और देश के लोंगो के लिए सचमुच बेहद शर्म की बात है&#8230;.इन्सानियत की ऐसी कमी और इस देश में????</p>
<p>   डा. रमा द्विवेदी</p>
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		<title>By: प्रत्यक्षा</title>
		<link>http://nahar.wordpress.com/2007/11/20/lost-singers/#comment-1691</link>
		<dc:creator>प्रत्यक्षा</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Nov 2007 17:15:41 +0000</pubDate>
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		<description>सचमुच बेहद दुखद ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सचमुच बेहद दुखद ।</p>
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		<title>By: दीपक भारतदीप</title>
		<link>http://nahar.wordpress.com/2007/11/20/lost-singers/#comment-1690</link>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Nov 2007 16:18:34 +0000</pubDate>
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		<description>अपने दिल के नगीने से 
सजाकर कितने भी तौह्फे दे दो
इस ज़माने को 
कद्रदान कभी होगा नहीं 
खुश रहते हैं वही लोग
जो बेचते हैं परछाईयाँ 
झूठ बेचते हैं दिखाकर सच्चाईयां 
बन जाते हैं उनके महल 
ज़माना भी खो  जाता है 
भूलभुलैया में कहीं 
दावे सभी करते हैं 
पर कोई हुआ है अभी तक 
सच्चे आदमी का साथी कहीं 
----------------------------------------
आपकी इस रचना पर मेरे दिल में यह पंक्तियाँ आयीं.
दीपक भारतदीप</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अपने दिल के नगीने से<br />
सजाकर कितने भी तौह्फे दे दो<br />
इस ज़माने को<br />
कद्रदान कभी होगा नहीं<br />
खुश रहते हैं वही लोग<br />
जो बेचते हैं परछाईयाँ<br />
झूठ बेचते हैं दिखाकर सच्चाईयां<br />
बन जाते हैं उनके महल<br />
ज़माना भी खो  जाता है<br />
भूलभुलैया में कहीं<br />
दावे सभी करते हैं<br />
पर कोई हुआ है अभी तक<br />
सच्चे आदमी का साथी कहीं<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
आपकी इस रचना पर मेरे दिल में यह पंक्तियाँ आयीं.<br />
दीपक भारतदीप</p>
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	<item>
		<title>By: paryanaad</title>
		<link>http://nahar.wordpress.com/2007/11/20/lost-singers/#comment-1687</link>
		<dc:creator>paryanaad</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Nov 2007 13:42:46 +0000</pubDate>
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		<description>मन उदास कर दिया भाई. अच्‍छे लोगों की दुनिया में कोई कदर नहीं है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मन उदास कर दिया भाई. अच्‍छे लोगों की दुनिया में कोई कदर नहीं है.</p>
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		<title>By: अनिता कुमार</title>
		<link>http://nahar.wordpress.com/2007/11/20/lost-singers/#comment-1686</link>
		<dc:creator>अनिता कुमार</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Nov 2007 13:31:13 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत ही दर्दनाक पोस्ट है।पढ़ पढ़ कर खामोश कदमों से आते अपने बुढ़ापे की तरफ़ देख्ने को भी डर लगता है। भगवान न करे ऐसे दुर्दिन देखने के लिए जिन्दा रहें । गाने जरुर बड़िया हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत ही दर्दनाक पोस्ट है।पढ़ पढ़ कर खामोश कदमों से आते अपने बुढ़ापे की तरफ़ देख्ने को भी डर लगता है। भगवान न करे ऐसे दुर्दिन देखने के लिए जिन्दा रहें । गाने जरुर बड़िया हैं।</p>
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		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://nahar.wordpress.com/2007/11/20/lost-singers/#comment-1685</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Nov 2007 13:25:47 +0000</pubDate>
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		<description>सागर भाई,
          एक समाज के रूप में हम बहुत नाशुक्रा किस्म का समाज हैं . चढते सूरज की जयजयकार करते हैं और उसके आगे बिछ-बिछ जाते हैं . पर अस्ताचल की ओर जाते सूर्य की ओर पूरी तरह पीठ कर लेते हैं . सरकार को और फ़िल्म जगत को क्या कहें जो वरिष्ठ कलाकारों और शिल्पियों की सामाजिक सुरक्षा  के प्रति आपराधिक रूप से उदासीन हैं . क्रिकेट को छोड़ दें तो यही दशा अन्य खेलों के खिलाड़ियों की होती आई है . बहुत शर्म आती है . 

बात होती है प्रगति की -- वृद्धि दर की !</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सागर भाई,<br />
          एक समाज के रूप में हम बहुत नाशुक्रा किस्म का समाज हैं . चढते सूरज की जयजयकार करते हैं और उसके आगे बिछ-बिछ जाते हैं . पर अस्ताचल की ओर जाते सूर्य की ओर पूरी तरह पीठ कर लेते हैं . सरकार को और फ़िल्म जगत को क्या कहें जो वरिष्ठ कलाकारों और शिल्पियों की सामाजिक सुरक्षा  के प्रति आपराधिक रूप से उदासीन हैं . क्रिकेट को छोड़ दें तो यही दशा अन्य खेलों के खिलाड़ियों की होती आई है . बहुत शर्म आती है . </p>
<p>बात होती है प्रगति की &#8212; वृद्धि दर की !</p>
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