उपर वाला हमारा साथ देता है!
Posted by सागर नाहर on 18, February 2008
अमृता सुरेश २३ साल की हैं और इतनी कम उम्र में अपनी पहली किताब When a lawyer falls in love छपवा चुकी है, और मेरे कॉफे की नियमित ग्राहक हैं। अमृता इतनी सीधी हैं कि मेरे यहाँ जब जेरॉक्स करवाती हैं और किसी कारण से कोई कागज खराब हो जाता है तो उसके भी पैसे लेने के लिये मुझे कहती है। वह खुद कहती है भैया हमें डिस्काऊंट नहीं चाहिये, आपका नुकसान नहीं होना चाहिये।
अमृता की माताजी रेनू आंटी, पापा डॉ सुरेश और दो बहनें सब के सब एक ही जैसे स्वभाव के हैं। एक दिन रेनू आंटी से बात चली तो मैने पूछ लिया आंटी आप इतनी सीधी हैं; ना कभी किसी चीज भाव कम करवाती है और दुकानदार को सामने से कहती हैं कि भैया हमें डिस्काऊंट नहीं चाहिये! ऐसे में लोग आपका गलत फायदा नहीं उठाते; आपको ठग नहीं लेते? रेनू आंटी आसमान की तरफ हाथ उठा कर कहने लगी, उपर वाला हमारे साथ है वह सब देखता है। मैं अक्सर हंसता और आंटी नाराज नहीं होती।
तीन चार दिन पहले एक बड़ा मजेदार संयोग हो गया, रात को पौने दस बजे अमृता दो किताबें ले कर आई और कहने लगी ” भैया मुझे कल सुबह ११ बजे इन दोनों किताबों की जेरॉक्स किसी भी हालत में चाहिये वरना ये किताबें मुझे पढ़ने को कभी नहीं मिलेगी। मैने किताबें ले ली और अगली सुबह तेज बारिश चालू हो गई।
ऐसी बारिश में तुरंत लाईट काट दी जाती है पर पता क्यों उस दिन लाईट कट नहीं हुई और जब नौ बजे मैने कॉफे खोला, दुकान के बाहर एक वृद्घा सोई हूई थी, वे बारिश और सर्दी की वजह से काँप रही थी। पता नहीं किस धुन में मैने जेब में हाथ डाला और दस रुपये निका्ल कर उन्हें दिये और कहा मांजी सामने रेस्टोरेंट से इडली खा लीजिये और चाय पी लीजिये।
अब मन में एक ही चिंता थी कि कैसे अमृता का काम होगा क्योंकि ऐसी बारिश में कागज नम हो जाता है और बेक टू बेक जेरॉक्स करना बड़ा ही मुश्किल हो जाता है। जैसे तैसे काम निबटा कर डरते हुए काम शुरु किया। ४०० पन्नों को एक घंटे में जेरॉक्स करनी थी, काम शुरु किया तो पता नहीं क्यों बिना रुके, बिना कागज परेशान किये, बिना एक भी कागज़ बिगड़े ४०० पन्नों की किताब जेरॉक्स ४५ मिनिट में पूरी हो गई और अमृता का काम पूरा होने के बाद जैसे ही दूसरे ग्राहक का काम हाथ में लिया, मशीन को पता नहीं क्या हुआ कागज़ फंसने लगे। पाँच जेरॉक्स करने में दस कागज़ खराब हो गये और आखिरकार मशीन बंद करनी पड़ी और लीजिये थोड़ी देर में बारिश बंद हुई और करंट भी चला गया!!
मुझे समझ में नहीं आया कि ये क्या आश्चर्य है कि वही कागज है फिर अमृता के काम के लिये मशीन ने परेशान नहीं किया और अब… क्या वाकई अमृता जैसे लोगों का भगवान साथ देते हैं या फिर उन वृद्धा का आशीर्वाद…?
अमृता की पुस्तक A lawyer falls in love के बारे में जानकारी
अमृता के अंग्रेजी ब्लॉग पर पोस्ट Arranged /Deranged Marriage


18, February 2008 at 9:56 am
अच्छे लोगों के साथ हमेशा अच्छा होता है
18, February 2008 at 10:17 am
उपर वाला हमारा साथ देता है!
मैने भी महसुस किया है, अच्छो के साथ अच्छा होता है. अजीब लगे मगर सत्य है.
18, February 2008 at 10:18 am
आपने बहुत दिनो बाद तकनीक को छोड़ कर लिखा है, ऐसा लिखते रहें.
18, February 2008 at 11:16 am
ईश्वर ,अच्छे लोग और दुआ तीनो मिल जाए तो कोई कम कभी नही रुक सकता !!
18, February 2008 at 11:28 am
ऎसा अक्सर होता है.ईश्वर अच्छे लोगों का साथ देता ही है.
18, February 2008 at 11:49 am
जो अच्छे और सच्चे लोग होते हैं न सागर भाई, ईश्वर हमेशा उनकी मदद करता है. भले ही वो इंसानों को ही उसका माध्यम बनाता है.
प्रतिभाशाली अमृता जी को हमारी शुभकामनाएं.
धन्यवाद.
18, February 2008 at 12:10 pm
बढ़िया!!!
अच्छे के साथ अच्छा ही होता है ऐसा बुजुर्गों से सुनते आए हैं!!
18, February 2008 at 1:08 pm
बिल्कुल सही ईश्वर उनकी मदद करता है जो खुद अपनी मदद करना जानते हैं । जो शिद्दत से काम करना चाहते हैं ।
18, February 2008 at 2:18 pm
हमें भी लगता है कि अच्छे लोगों के साथ भगवान हमेशा रहता है
18, February 2008 at 2:21 pm
सागर भाई,
सरल भाषा में सामान्य सी लगने वाली घटना का बहुत बढ़िया विश्लेषण. पूरी तरह से सच है कि ईश्वर अच्छे लोगों के साथ अच्छा ही करते हैं.
18, February 2008 at 2:29 pm
सागर जी, आप इसे ईश्वरीय कृपा या दैविक चमत्कार कहिए, मैं इसे इत्तेफ़ाक ही कहूँगा।
18, February 2008 at 3:24 pm
हाँ अक्सर मैने भी पाया है कि उसकी कृपा अच्छे लोगो के साथ बनी रहती है… वैसे भईया, जो लोग मोल तोल नही करते उन्हे कोई दुकानदार कम ही बेवकुफ बनाते है, ऐसा मेरा अनुभव है…।
18, February 2008 at 3:35 pm
आम तौर पर तो अच्छे लोगों के साथ अच्छा ही होता है।
18, February 2008 at 7:00 pm
भगवान का साथ कहें, वृद्धा का आशीर्वाद या संयोग। यह तय है कि जो बोया है वही काटना है।
18, February 2008 at 7:55 pm
यह तो विलक्षण लग रहा है। मुझे लगता है कि सबसे ऊपर आपकी अच्छाई पर आस्था काम कर रही थी।
खैर, आपने सोचने का मसाला दे दिया!
18, February 2008 at 9:38 pm
सत्य वचन…पूर्णरुपेण सहमत.
19, February 2008 at 1:59 am
मेरा भी यही मानना है कि अच्छे लोगों के साथ अच्छी बातें होती रहती हैं । शायद इसीलिये आज भी अच्छे से लगने वाले भले लोगों पर भरोसा कर लेता हूँ, अभी तक तो कोई मेरी भैंस खोलकर नहीं ले गया
और आगे भी ऐसा ही रहेगा इसका विश्वास है ।
आपकी इस पोस्ट को पढकर कालेज के वे दिन याद आ गये जब हम लोग पुस्तकालय से किताबें निकलवाकर फ़ोटोस्टेट करा कर पढा करते थे । उसका भी अपना ही मजा था, और परीक्षा से एक दिन पहले फ़ोटोस्टेट पूरे हास्टल में बंटा करती थी चैप्टर के हिसाब से
19, February 2008 at 12:00 pm
ऊपर की मंजिल वाला वाकई अपने साथ है :)…लेकिन हम तो चाहकर भी ’सीधे’ नही रह पाते
19, February 2008 at 3:12 pm
MUJHE TO VIDHVA PER SHEK HAI KI ISI KI VAJAH SE YE SEB HUVA
19, February 2008 at 3:16 pm
WAISE USTAD JI, YE POST AGAR AAPKI TECHNIQUE SE ALAG HAI MAGAR IS SE BHI SABAK MILTA HAI