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	<title>Comments on: भैया है आपके पास कोई जवाब?</title>
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	<description>गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं</description>
	<pubDate>Wed, 23 Jul 2008 13:21:43 +0000</pubDate>
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		<title>By: tasleem</title>
		<link>http://nahar.wordpress.com/2008/05/06/hai-koi-jawaab-aapake-paas/#comment-2160</link>
		<dc:creator>tasleem</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 May 2008 08:10:07 +0000</pubDate>
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		<description>aapne ek sanvedansheel mudda uthaya hai. paathkon ki maang par ise aage bhi badhhayen.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>aapne ek sanvedansheel mudda uthaya hai. paathkon ki maang par ise aage bhi badhhayen.</p>
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		<title>By: कुश</title>
		<link>http://nahar.wordpress.com/2008/05/06/hai-koi-jawaab-aapake-paas/#comment-2159</link>
		<dc:creator>कुश</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 06 May 2008 16:42:29 +0000</pubDate>
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		<description>सागर जी सर्वप्रथम तो आपका धन्यवाद जो आपने मेरी रचना की चर्चा अपनी मित्र से की.. आपकी मित्र का सवाल पूर्णतया सही भी नही है और ग़लत भी नही .. परंतु अभी मैं केवल अपने विचार रखूँगा.. मैं ब्लॉग के माध्यम से अपनी भावनाए व्यक्त करता हू.. मेरा ऐसा सोचना है की यदि मैं किसी के लिए कुछ कर नही 
पाया कम से कम कोई जो सक्षम हो कुछ करने में वो तो इसे पढ़कर कुछ करे.. यदि ना कर पाने की वजह से मैने लिखना ही छोड़ दिया तो ये भी कायरता ही होगी.. एक सवाल मेरा भी आपकी मित्र से.. की यदि मैं ये नही लिखता तो क्या आप इस बारे मैं सागर जी से चर्चा करती.. क्या गुड़िया के विषय में कोई बात होती..  कही पढ़कर या देखकर ही तो हम जान पाएँगे.. और कुछ करेंगे.. फिर जो लिखा गया है उसे किसी ने देखा भी तो होगा..
एक और बात कोई भी कवि किसी घटना का तमाशा नही बनाता .. और मैने तो बिल्कुल नही बनाया.. आप खुद लेखिका है.. खुद लिखती है.. क्या कवि के शब्द आपको तमाशा नज़र आते है.. क्रपया दोबारा सोचिए और लिखिए.. आपका लिखना ही इस कड़ी में एक योगदान है.. कवि समाज का आईना होता है.. हम ही नही कहेंगे तो कौन कहेगा? आपके नही लिखने से कोई गुड़िया के दर्द समझ ही नही पाएगा.. 
और रही वाह वाही की बात तो मुझे नही लगता की मैं या कोई भी कवि लिखते समय ये सोच कर लिखता होगा की उसे कितनी वाह वाही मिलेगी.. हो सकता है मैं ग़लत भी रहु.. पर ये मेरा निजी दृष्टिकोण है.. और भी कई बात करनी है सोच रहा हू एक पोस्ट ही लिख दु.. फिर भी आपका प्रश्न कबिले तारीफ है.. सागर जी आपका भी बहुत बहुत शुक्रिया इस प्रश्न को यहा पोस्ट करने के लिए..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सागर जी सर्वप्रथम तो आपका धन्यवाद जो आपने मेरी रचना की चर्चा अपनी मित्र से की.. आपकी मित्र का सवाल पूर्णतया सही भी नही है और ग़लत भी नही .. परंतु अभी मैं केवल अपने विचार रखूँगा.. मैं ब्लॉग के माध्यम से अपनी भावनाए व्यक्त करता हू.. मेरा ऐसा सोचना है की यदि मैं किसी के लिए कुछ कर नही<br />
पाया कम से कम कोई जो सक्षम हो कुछ करने में वो तो इसे पढ़कर कुछ करे.. यदि ना कर पाने की वजह से मैने लिखना ही छोड़ दिया तो ये भी कायरता ही होगी.. एक सवाल मेरा भी आपकी मित्र से.. की यदि मैं ये नही लिखता तो क्या आप इस बारे मैं सागर जी से चर्चा करती.. क्या गुड़िया के विषय में कोई बात होती..  कही पढ़कर या देखकर ही तो हम जान पाएँगे.. और कुछ करेंगे.. फिर जो लिखा गया है उसे किसी ने देखा भी तो होगा..<br />
एक और बात कोई भी कवि किसी घटना का तमाशा नही बनाता .. और मैने तो बिल्कुल नही बनाया.. आप खुद लेखिका है.. खुद लिखती है.. क्या कवि के शब्द आपको तमाशा नज़र आते है.. क्रपया दोबारा सोचिए और लिखिए.. आपका लिखना ही इस कड़ी में एक योगदान है.. कवि समाज का आईना होता है.. हम ही नही कहेंगे तो कौन कहेगा? आपके नही लिखने से कोई गुड़िया के दर्द समझ ही नही पाएगा..<br />
और रही वाह वाही की बात तो मुझे नही लगता की मैं या कोई भी कवि लिखते समय ये सोच कर लिखता होगा की उसे कितनी वाह वाही मिलेगी.. हो सकता है मैं ग़लत भी रहु.. पर ये मेरा निजी दृष्टिकोण है.. और भी कई बात करनी है सोच रहा हू एक पोस्ट ही लिख दु.. फिर भी आपका प्रश्न कबिले तारीफ है.. सागर जी आपका भी बहुत बहुत शुक्रिया इस प्रश्न को यहा पोस्ट करने के लिए..</p>
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	<item>
		<title>By: Ghost Buster</title>
		<link>http://nahar.wordpress.com/2008/05/06/hai-koi-jawaab-aapake-paas/#comment-2158</link>
		<dc:creator>Ghost Buster</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 06 May 2008 15:17:37 +0000</pubDate>
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		<description>जिस तरह की कविताएँ आए दिन देखने पढने को मिलती हैं, उनसे कहीं, कहीं ज्यादा सच्ची संवेदना की झलक मिलती है आपकी बहन के कविता ना लिखने के प्रण में.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जिस तरह की कविताएँ आए दिन देखने पढने को मिलती हैं, उनसे कहीं, कहीं ज्यादा सच्ची संवेदना की झलक मिलती है आपकी बहन के कविता ना लिखने के प्रण में.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: - लावण्या</title>
		<link>http://nahar.wordpress.com/2008/05/06/hai-koi-jawaab-aapake-paas/#comment-2157</link>
		<dc:creator>- लावण्या</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 06 May 2008 14:27:12 +0000</pubDate>
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		<description>कविता वही है जो अनायास्, बिना प्रयास, सायास अपने आप , 
सामने आ जाये -
कवि सिर्फ माध्यम होता है और जितनी सँवेदना घनी होगी उतनी ही पढनेवाले / पाठक के मन को छूयेगी ..
जैसे अनिता जी ने महाकवि निराला जी की " वह तोडती पत्थर " कविता के बारे मेँ याद दिलाया है, और आपकी बहन / मित्र का कविता सृजन से रुकना भी एक अवस्था है !
 वे दोबारा लिखेँगीँ ..अवश्य ! 
सँवेदना भी कभी , कुँठित हो जाती है ..
परँतु, एक सच्चे ऐहसास वाला मन ,
कभी दूसरोँ के दुखोँ से ,
सदा के लिये मुख मोड नहीँ पाता - 
हाँ, हम समस्याओँ को,
 आमूल मिटा सकेँ,
 इतने समर्थ हुए नहीँ ..
पर, 
कोशिश करते जायेँगेँ -- 
That is our Humanity --
- लावण्या</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कविता वही है जो अनायास्, बिना प्रयास, सायास अपने आप ,<br />
सामने आ जाये -<br />
कवि सिर्फ माध्यम होता है और जितनी सँवेदना घनी होगी उतनी ही पढनेवाले / पाठक के मन को छूयेगी ..<br />
जैसे अनिता जी ने महाकवि निराला जी की &#8221; वह तोडती पत्थर &#8221; कविता के बारे मेँ याद दिलाया है, और आपकी बहन / मित्र का कविता सृजन से रुकना भी एक अवस्था है !<br />
 वे दोबारा लिखेँगीँ ..अवश्य !<br />
सँवेदना भी कभी , कुँठित हो जाती है ..<br />
परँतु, एक सच्चे ऐहसास वाला मन ,<br />
कभी दूसरोँ के दुखोँ से ,<br />
सदा के लिये मुख मोड नहीँ पाता -<br />
हाँ, हम समस्याओँ को,<br />
 आमूल मिटा सकेँ,<br />
 इतने समर्थ हुए नहीँ ..<br />
पर,<br />
कोशिश करते जायेँगेँ &#8212;<br />
That is our Humanity &#8211;<br />
- लावण्या</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: डॉ. अजीत कुमार</title>
		<link>http://nahar.wordpress.com/2008/05/06/hai-koi-jawaab-aapake-paas/#comment-2156</link>
		<dc:creator>डॉ. अजीत कुमार</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 06 May 2008 13:27:03 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://nahar.wordpress.com/2008/05/06/hai-koi-jawaab-aapake-paas/#comment-2156</guid>
		<description>सागर भाई,
अभी कुछ दिन पहले मैंने एक पोस्ट लिखी थी जिस पर टिप्पणी के रूप में एक बात मेरे सामने रखी गयी थी. हालाँकि मैं उस बात से पूरी तरह सहमत नहीं था. मैं उसी टिप्पणी के एक अंश को रख रहा हूँ.
"कुछ समस्याएँ कभी नहीं बदलती बल्कि और विकराल रूप में सामने आती हैं क्योंकि कविता लिखने से समस्या का समाधान नहीं होता ।"
पर क्या इससे लोग अपनी भावनायें व्यक्त करना छॊड़ दें?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सागर भाई,<br />
अभी कुछ दिन पहले मैंने एक पोस्ट लिखी थी जिस पर टिप्पणी के रूप में एक बात मेरे सामने रखी गयी थी. हालाँकि मैं उस बात से पूरी तरह सहमत नहीं था. मैं उसी टिप्पणी के एक अंश को रख रहा हूँ.<br />
&#8220;कुछ समस्याएँ कभी नहीं बदलती बल्कि और विकराल रूप में सामने आती हैं क्योंकि कविता लिखने से समस्या का समाधान नहीं होता ।&#8221;<br />
पर क्या इससे लोग अपनी भावनायें व्यक्त करना छॊड़ दें?</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अनिता कुमार</title>
		<link>http://nahar.wordpress.com/2008/05/06/hai-koi-jawaab-aapake-paas/#comment-2155</link>
		<dc:creator>अनिता कुमार</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 06 May 2008 12:56:11 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत ही विचारणीय सवाल उठाया है आप की दोस्त ने। बातें दोनों सहीं हैं। किसी की मजबूरी का मजाक न बने, तमाशा न बने, ये संवेदना रखने वाले तो बहुत बिरले ही होगें। मुझे तो वो मशहूर कविता याद आ रही है, "वो तोड़ती पत्थर" । पर दूसरी तरफ़ ये भी सही है कि अगर इन सच्चाइयों के ऊपर न लिखा जाए तो दूसरों की संवेदनाओं को जगाया कैसे जाए। दुनिया में हर अनुभव अपनी जिन्दगी से नहीं मिलता, साहित्य हमें समाज के हर रूप से वाकिफ़ कराता है और ये सच्चाई भी एक रूप है उसी समाज का। कहने का मतलब ये कि सिर्फ़ तालियां बटोरने के लिए अगर कोई किसी के आसुंओ को माध्यम बनाए तो गलत है और अगर सच में उसके दुख से व्यथित है तो जरूर लिखे और अगर हो सके तो रास्ता भी सुझाए, मदद की गुहार लगाए।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत ही विचारणीय सवाल उठाया है आप की दोस्त ने। बातें दोनों सहीं हैं। किसी की मजबूरी का मजाक न बने, तमाशा न बने, ये संवेदना रखने वाले तो बहुत बिरले ही होगें। मुझे तो वो मशहूर कविता याद आ रही है, &#8220;वो तोड़ती पत्थर&#8221; । पर दूसरी तरफ़ ये भी सही है कि अगर इन सच्चाइयों के ऊपर न लिखा जाए तो दूसरों की संवेदनाओं को जगाया कैसे जाए। दुनिया में हर अनुभव अपनी जिन्दगी से नहीं मिलता, साहित्य हमें समाज के हर रूप से वाकिफ़ कराता है और ये सच्चाई भी एक रूप है उसी समाज का। कहने का मतलब ये कि सिर्फ़ तालियां बटोरने के लिए अगर कोई किसी के आसुंओ को माध्यम बनाए तो गलत है और अगर सच में उसके दुख से व्यथित है तो जरूर लिखे और अगर हो सके तो रास्ता भी सुझाए, मदद की गुहार लगाए।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: संजय बेंगाणी</title>
		<link>http://nahar.wordpress.com/2008/05/06/hai-koi-jawaab-aapake-paas/#comment-2154</link>
		<dc:creator>संजय बेंगाणी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 06 May 2008 12:25:59 +0000</pubDate>
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		<description>जवाब में तो पोस्ट ही लिखनी पढ़ेगी...जितना समझ आया है उस पर.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जवाब में तो पोस्ट ही लिखनी पढ़ेगी&#8230;जितना समझ आया है उस पर.</p>
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	<item>
		<title>By: सागर नाहर</title>
		<link>http://nahar.wordpress.com/2008/05/06/hai-koi-jawaab-aapake-paas/#comment-2153</link>
		<dc:creator>सागर नाहर</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 06 May 2008 12:06:35 +0000</pubDate>
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		<description>समझ रही है*</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>समझ रही है*</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: arun</title>
		<link>http://nahar.wordpress.com/2008/05/06/hai-koi-jawaab-aapake-paas/#comment-2152</link>
		<dc:creator>arun</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 06 May 2008 11:58:55 +0000</pubDate>
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		<description>पहले ये बताओ " वो कौंन थी"
&lt;strong&gt;अरुण जी
वे मुझे भैया कह कर संबोधित कर रही है, समझ लीजिये मेरी  बहन ही होगी। :) &lt;/strong&gt;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पहले ये बताओ &#8221; वो कौंन थी&#8221;<br />
<strong>अरुण जी<br />
वे मुझे भैया कह कर संबोधित कर रही है, समझ लीजिये मेरी  बहन ही होगी। <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </strong></p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: सागर नाहर</title>
		<link>http://nahar.wordpress.com/2008/05/06/hai-koi-jawaab-aapake-paas/#comment-2151</link>
		<dc:creator>सागर नाहर</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 06 May 2008 11:56:04 +0000</pubDate>
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		<description>@ गौरवजी 
आपकी दूसरी बात सही है पर शायद पहली नहीं, क्यों कि वह खुद एक अच्छी कवियत्री है पर जब उन्हें लगा कि खाली बातों, कविताओं से कुछ नहीं हो रहा तब उन्होने लिखना बंद किया। और हाँ तमाशा  नहीं बना रही,  इस बात की मैं गारंटी  देता हूँ।  
ना ही उनकी बात से यह  स्पष्ट होता है कि वह इसे वाहवाही बटोरने से माध्यम समझ सही है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@ गौरवजी<br />
आपकी दूसरी बात सही है पर शायद पहली नहीं, क्यों कि वह खुद एक अच्छी कवियत्री है पर जब उन्हें लगा कि खाली बातों, कविताओं से कुछ नहीं हो रहा तब उन्होने लिखना बंद किया। और हाँ तमाशा  नहीं बना रही,  इस बात की मैं गारंटी  देता हूँ।<br />
ना ही उनकी बात से यह  स्पष्ट होता है कि वह इसे वाहवाही बटोरने से माध्यम समझ सही है।</p>
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