मैं बीमार होना चाहता था?
Posted by सागर नाहर on 21, June 2008
कल श्रीमतीजी की तबियत जरा नासाज हो गई, मैने कहा चलो डॉक्टर के यहाँ चलते हैं तो उनका कहना था कि नहीं वैसे ही ठीक हो जायेगा। डॉक्टर के यहाँ जाने से वह दो-तीन सौ रुपये तो फीस ले लेगा, एकाद टेस्ट करवाने को बोलेगा और फिर कहेगा तुम्हे कुछ नहीं हुआ है। इन सब में कम से कम एक हजार रुपये फालतू खर्च हो जायेंगे।
यह सुनते ही मेरे दिमाग में चार साल पहले हुई एक बात घूम गई। मैं जब सिकन्दराबाद में नया नया आया था, मुझे तेज जुकाम हुआ था। इतना तेज की दिन भर नाक में से एकदम गाढ़ा द्रव ( पानी नहीं) बहता था, साफ करते करते पूरे चेहरे की मांस पेशियाँ दर करने लगती थी। उसके अलावा पेट में दाहिनी और बहुत दर्द होता था, लोग कहते थे कि अपेंडिक्स हो सकता है तुम्हे।
खैर यहाँ आने के बाद डॉक्टर को दिखलाया तो उन्होने चेहरे के एक्स-रे के अलावा पेट और नाक के कई सारे टेस्ट करवाने को कहा। टेस्ट करवाने में लगभग बारह सौ रुपये खर्च हो गये। टेस्ट रिपोर्ट आने के बाद मैने वह रिपोर्ट डॉक्टर को दिखलाई तो उसने रिपोर्ट्स देखने के बाद उन्हें एक ओर फेंक दिया और बोले जाओ तुम्हे कुछ भी नहीं हुआ है। जुकाम दवाईयाँ लेने से ठीक हो जायेगा और पेट; लीवर में सूजन है वह भी दवा लेने से ठीक हो जायेगा।
इतना सुनते ही मैं मायूस हो गया कि जब कुछ हुआ ही नहीं तो टेस्ट के पैसे फालतू में खर्च किये। फिर कुछ मिनिटों के बाद अपनी बात पर गौर किया तो मैं एकदम से सन्न रह गया क्या मैं बारह सौ रुपये में रिपोर्ट में कोई बड़ी बीमारी देखना चाहता था? क्या मैं यह चाहता था कि रिपोर्ट में कुछ तो निकले जिससे मेरे बारह सौ रुपये वसूल हों? जहां मुझे खुश होना चाहिये था कि मुझे कोई बड़ी बीमारी नहीं है उस जगह मैं बारह सौ रुपये को लेकर उदास हुआ जा रहा था।
हमारा मन क्यों ऐसा है, हम क्यों खुश होने की बात पर खुश नहीं हो पाते और उस खुशी के कारण में भी उदासी खोज लेते हैं।
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कुश said
शानदार पोस्ट.. सागर जी बहुत सही कहा आपने.. शत प्रतिशत सहमत हू आपसे
Dr Anurag said
shukr hai aap khud samajh gaye …ham ye bat mareejo ko samjhate hai.
SHUAIB said
तीन दिनों से मुझे ज़ुकाम है और पेट मे दाहिनी ओर दर्द भी हो रहा है। अभी तक मैं ने कोई दवाई नहीं ली इस हालत मे भी बाकाईदा नौकरी कर रहा हूं। चाहे जितना भी तेज़ बुखार हो मैं डॉक्टर्स के पास बिलकुल नहीं जाता क्योंकि वो बात बात पे इंजेकशन निकाल लेते हैं और मुझे इंजेकशन से बहुत डर लगता है।
बहुत बुरी बात है शुऐब जी..
डॉक्टर को तो दिखाना ही चाहिये, डॉक्टर की सुई से इतना डर..! और कोई जरूरी है कि डॉक्टर सुई दे ही? बिना सुई, दवाईयों के भी शायद आपकी तकलीफ हल हो जाये।
चलिये उठिये फटाफट डॉक्टर के यहाँ जा कर आईये।
ranjanabhatia said
इंसानी फितरत से मजबूर हैं ..:) चलो यह लेख पढ़ कर बहुत से लोग पोजिटिव सोच रख सकेंगे यही उम्मीद करते हैं
arun said
चलिये आप ठीक है यही खुशी की बात है
जुकाम के लिये गरम तवे पर हल्दी का पाऊडर डालकर उसे जितना सूघ सकते है सूघे , दिन मे तीन चार बार करके देखे जुकाम गायब हो जायेगा
mahendra mishra said
हर मौसम के संक्रमण काल में सर्दी बुखार वाइरल फीवर के चक्कर ज्यादा होते है . ख़ुद समझ कर इलाज करना चाहिए , भला तो डाक्टरों का होता है उन्हें आपके खर्चे से क्या लेना . परिक्षण सेंटर से कमीशन पहुच ही जाता है . हकीकत बयानी के लिए धन्यवाद.
संजय बेंगाणी said
महंगाई के समय में खर्चे गए पैसों का दर्द अन्य खुशी पर हावी रहता है, इसलिए.
Rajesh Roshan said
क्या कहे सब तो आप ही बोल गए… रोने पीटने वाले लोग हमेशा रोते ही रहते हैं…
bhuvnesh said
बहुत सही रहा जो 1200 में ही निपट गये
पंगेबाज भी आपके बहाने से वैद्य बन गये…आगे भी बताते रहिएगा ऐसे नुस्खे
SHUAIB said
पैसों की कोई चिंता नहीं सागरजी, कमी तो वक़्त और जिम्मेदारीयों की है। जब जब मैं डाक्टर के पास जाता हूं मुझे याद है कि वो बगैर इंजेकशन के मुझे जाने नहीं देते और हर बार मेरी अम्मी भी साथ होती हैं और ये भी ज़बर्दस्ती करती हैं कि इंजेकशन लगवाले ज्लद ठीक हो जाएगा
आज ही किसी फ़ार्मेसी जाकर कुछ दवाई ले आता हूं मगर डाक्टर के पास नहीं जाऊंगा।
Gyandutt Pandey said
सटीक कहा। डाक्टर जुकाम के लिये ही लम्बा चौडा न समझ में आने वाला नाम दे देता तो भी १२०० रुपये वसूल हो जाते!
Pramendra Pratap Singh said
सामान्य बीमारियों में एहतियात बरतना चाहिए, डाक्टर के पास तुरंत नही जाना चाहिए।
mehek said
Satish yadav said
बिंदू यहीं विराम करता है – बीमार हो तब भी दुख , न बीमार हों, तब भी दुख
- लावण्या said
डाक्टर के पास जाने से और टेस्ट करवाने से पता चलता है कि क्या हाल है -उसमेँ खर्चा हुआ तो क्या बुराई है ?
अच्छा हुआ आप ठीक हैँ ..
आपकी पत्नी भी स्वस्थ रहेँ -
-लावण्या
समीर लाल said
क्या कहा जाये आप तो खुद ही समझदार है. अधिकतर जगह ऐसी लूट मची है कि मन दुखी हो जाता है. सही है आपकी तबीयत दुरुस्त रही. आपकी पत्नी की तबीयत भी ठीक रहे यही कामना है हमेशा की तरह.
अनिता कुमार said
अक्सर सुना है कि आज कल जिन्दगी सस्ती है बाकी जो बचा है उसे मंहगाई मार गई, इसी लिए सेहत से ज्यादा पैसों का ख्याल आया, वैसे ऐसा सोचने में आप अकेले नही। हमें भी वैसे डाक्टरों के पास जाने में और सुई लगवाने में तो और भी ज्यादा डर लगता है। शायद बरसों बीत गये डाक्टर का मुंह नही देखा। छोटी मोटी सर्दी जुकाम के लिए फ़ोन पर ही डाक्टर को पूछ लेते है जब अपने नुस्खे काम न करे तो( भला हो उस डाक्टर का भी, हसंते हंसते फ़ोन पर ही दवाइयां बता देता है) कोई फ़ीस नहीं
दीपक said
वाह वाह!!!
आज कल लोग खुश रहना ही नही चाहते. भौतिक वस्तुओं की चाह उस चमडी को भी भुला देती है जिसके लिये हम इतना करते हैं..
mamta said
पैसे से कहीं ज्यादा स्वस्थ रहना जरुरी है।
वैसे अगर डॉक्टर टेस्ट न करवाए तो भी लोग सोचते है की ये बेकार डॉक्टर है।
इंसान हर हाल मे दुखी ही रहता है।
ghughutibasuti said
बिल्कुल सही सोचा आपने ! अब यदि उस समय लिवर की दवा व परहेज नहीं किया जाता तो समस्या गंभीर हो सकती थी।
घुघूती बासूती
Ila said
आजकल कोटा से मां आयी हैं,उन्हें पिछले तीन महीनों से बुखार है.दिल्ली के नामी अस्पताल के नामचीन चिकित्सक उनकी बीमारी का कारण खोज रहे हैं,रोज़ एक नया टेस्ट,निदान कुछ नहीं.सब रिपोर्ट्स नोर्मल.फ़िर भी ये तसल्ली है कि कोई बडी बीमारी नहीं,हां मां ज़रूर थक गई हैं इस सारे तामझाम से.
garima said
ही ही होता है भईया… वैसे मानसिक तौर पर सब बीमार होना चाहते हैं… इसमे हमारी (डॊक्टर्स) की बल्ले बल्ले… जब तो लम्बा सा ताम-झाम ना दिखाओ मरीज को सन्तुष्टि नही होती… हालांकि बाद मे लोग कोसते भी हैं… पर बाप बडा न भईया सबसे बडा रूपईया
संजय पटेल said
ठीक कहा आपने सागर भाई.
हमें जाँचे करवा कर अच्छी रिपोर्ट आने पर जश्न मनाना चाहिये. मेरे घर में दो बुज़ुर्ग हैं.दोनो पिचहत्तर पार के.पिताजी बीमार होना बुरा मानते हैं और उससे भी ज़्यादा उसे प्रचारित करना.कोई भी तकलीफ़ होने पर डॉक्टर को कनसल्ट करने नहीं सकुचाते.और उसके मशवरे को पत्थर की लकीर मानते हैं.दूसरे हैं ताऊजी…बीमार होकर घबराने वाले,बीमार होते ही (चाहे हल्का सा वायरल हो)सबको फ़ोन कर के अपनी बीमारी प्रचारित करने वाले.और तो और बीमारी से पन्द्रह – बीस दिन बाद भी अपनी पीड़ा को दोस्तों और परिजनों के बीच एक बड़ी उपलब्धि की तरह स्थापित करने की कोशिश करते रहेंगे.और सबसे बुरी बात…अपने मन से अपनी व्याधि का इलाज करते रहेंगे ताऊजी ; जो कभी कभी बड़ा रिस्की हुआ करता है.
इन दो व्यक्तियों का नज़रिया पढ़ कर आप खु़द ही तय करें की किस तरह का जीवन जीना चाहिये.