भोपाल स्टेशन पर एक मजेदार घटना
Posted by सागर नाहर on 4, April 2009
कई बार कैसे कैसे मजेदार वाकये हो जाते हैं कि वे हमें जिन्दगी भर याद रह जाते हैं। कल ऐसा ही वाकया मेरे साथ हुआ।
कल शाम (2-04-2009) भोपाल रेल्वे स्टेशन पर मैं, मेरी बहन किरन और चाचीजी सिकन्दराबाद आने के लिये ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। भारतीय रेल की परंपरा को कायम रखते हुए संपर्क क्रान्ति एक्सप्रेस मात्र एक घंटे लेट थी।
हम तीनों आपस में बात कर ही रहे थे कि मैने एक आदमी को देखकर एकदम से चाचीजी से कहा देखो डायचन्दजी! (डायचन्द जी हमारे रिश्तेदार हैं) चाचीजी ने देखा वाकई डायचन्दजी आ रहे थे हम बात कर ही रहे थे कि डायचन्दजी पास आये तो पता चला कि वे डायचन्दजी से मिलती जुलती शक्ल वाले कोई और ही इन्सान हैं।
थोड़ी देर बाद किरन बोली देखो शेषगिरी राव! ( शेषगिरी राव मेरे चाचाजी के खास दोस्त हैं) हमने देखा कि शेषगिरी राव आ रहे हैं पर ये भी शेषगिरी राव नहीं थे। हम इस बात पर खुब हंस ही रहे थे कि एक युवक मेरे सामने से अपने दोस्त के साथ बात करते निकले मैने तुरंत उन्हें आवाज दी नितिन जी – नितिनजी, पर नितिनजी ने सुना ही नहीं। चाचीजी और किरन मजाक करने लगे आज सबको मिलती जुलती शक्ल वाले इन्सान कैसे दिख रहे हैं!
मेरा मन नहीं माना मैं उन नितिनजी के पीछे भागा पीछे से ध्यान से देखा वे हल्के से लंगड़ा कर चल रहे थे और कपड़े भी नितिनजी के व्यक्तित्व से मेल खाते नहीं दिख रहे थे, मैने आज तक नितिनजी को ऐसे कपड़े पहले नहीं देखा था, पर फिर भी मन नहीं माना मैं पीछे चलता रहा, अब वे स्टेशन के मेन गेट पर खड़े खड़े अपने दोस्त से बातें करने लगे। मैं एकदम उनके पीछे खड़ा हो गया कि शक्ल से कन्फ्यूजन हो सकता है आवाज से तो नहीं। आवाज से तो पता चल जायेगा कि वे नितिनजी हैं या नहीं।
कुछ देर खड़ा रहा पर स्टेशन के शोरगुल में उनकी आवाज मुझे सुनाई नहीं दी, अब मैं उनके सामने खड़ा हो गया शायद उनकी नजर मुझ पर पड़ जाये तो हो सकता है कि वे अगर नितिनजी ही हों तो मुझे पहचान लेंगे पर उनकी नजर मुझ पर पड़ी ही नहीं और मेरी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि मैं उनसे जाकर पूछ लूं कि आप नितिनजी हैं या कोई और…।
थक कर मैं वापस अपने परिजनों के पास आ गया और चाचीजी ने भी खासा मजाक उड़ाया पर मेरा मन नहीं मान रहा था मैने कहा इस बात का पता कल लगाना ही पड़ेगा।
आज नितिनजी ओनलाईन दिखे, देखिये हम दोनों के बीच क्या बात हुई
4:21 PM me: नितिनजी, नमस्कार।
क्या आप कल भोपाल रेल्वे स्टेशन पर थे?
4:22 PM Nitin: jee haa
namaste maalik
kyo? aap bhi the?
4:23 PM me: हाँ, मैने आपको देखा भी, आवाज भी दी पर आपने सुना नहीं, तो आपका पीछा भी किया, आपके पीछे कई देर खड़ा रहा
आप किसी दोस्त के साथ थे
मेरी ट्रेन १ घंटे देर से थी
4:25 PM Nitin: arrre?
Sampark Kranti se aaye ho kya?
usi train me tha mai bhi
me: हाँ
देखा आपने जिन्हें मैं नितिनजी समझ रहा था वे नितिनजी ही थे। कैसा अजब संयोग था। आगे की बातचीत फोन पर हुई तब पता चला कि वे उसी ट्रेन के S2 कोच में थे और मैं S1 में|
ऐसा कोई वाकया कभी आपके साथ भी हुआ है?
नितिन बागला जी हिन्दी के जाने माने ब्लॉगर हैं।


संजय बेंगाणी said
भाई बूरा न मानना बहुत जोर से हँसने को मन कर रहा है…हा हा हा हा…..
दिनेशराय द्विवेदी said
आप के साथ बहुत अजीब हुआ, पर दूर से। मैं तो कई बार परिचित समझ कर कितनों का ही कंधा झाड़ चुका हूँ। और यह भी कि मैं होता तो नितिन जी का कंधा जरूर ठोक देता फिर चाहे वह कोई और ही क्यों न होता। मैं ने इसी तरह अनेक नए मित्र भी पाए हैं।
vidhu said
आपने जिस सच्चे अंदाज में बिना कोई दुराव -छुपाव के इसे लिखा है …तारीफे काबिल है….ऐसे वाकये होतें भी हें …बस याद रखना होता है
अजित वडनेरकर said
हुजूर…
संस्मरण तो बढ़िया है….
मगर हम राह देखते रहे….अब याद आ रहा है कि एक मिस काल दर्ज थी हमारे मोबाईल पर, क्योंकि मैं तब सो रहा था। बेटे ने उस नंबर पर जब फोन किया था तो किसी महिला से बात हुई थी, उन्होंने नाहरजी के घर का नंबर बताया था। संदर्भ वह नहीं समझ पाया था। संभवतः वह काल आपके यहां से आई थी।
आपने दोबारा फोन क्यों नहीं किया…जिम्मा तो आपने लिया था ?
राजीव जैन said
बाप रे
ऐसा हो गया
Abhishek said
कभी-कभी होता है ऐसा भी.
mamta said
है तो किस्सा मजेदार ।
Lovely said
मजेदार
कविता वाचक्नवी said
कितने अजीब….(रिश्ते,लोग,संयोग) हैं यहाँ पर….
ravikeshri said
main ne pahlibar bioggar par lika ra hua
Gyan Dutt Pandey said
वाह! रोचक संयोग!
mayur said
आप हमारे शहर मैं थे जान कर ख़ुशी हुई , अभी ये नहीं पता की आप भी भोपाल से ही तो नहीं हैं .. वाकया तो हो ही गया ..बढिया है
Girish Billore Mukul said
Anand A gay bhai ji
अनूप शुक्ल said
वाह! अब अजितजी की बात का जबाब लिखो। दुबारा फ़ोन क्यों नहीं किया?
ravikeshri said
aaj kal chuna ka mosham hai ham sabhi logo se khaha ja ki ham sabhi log ko vote karna chahiye par main vote kise karo jise main janta tak bhi nahi main ek anjan ko main vote nahi de sakta hu . kahte hai ki hamre desh me democracy hai to phir jise ham chun kar bejte hai to hame aajar unke kam pasad nahi aat hai to unhe aaps bhulne ka hak milna chahiye to main manuga ki hamre desh main democracy hai or hame yeh bhi adhikar diyagan chahiye ki koi umidbra pasad nahi aaye to hame napasad ka batan milna chahiye
कौतुक said
वाकया तो वाकई संगीन है.
नितिन जी के यहाँ आपके कुछ उधार तो नहीं थे?
santhosh said
अच्छी लेखनी हे…./ पड़कर बहुत खुशी हुई…/
आप कौनसी हिन्दी टाइपिंग टूल यूज़ करते हे..? मे रीसेंट्ली यूज़र फ्रेंड्ली इंडियन लॅंग्वेज टाइपिंग टूल केलिए सर्च कर रहा था तो मूज़े मिला…. ” क्विलपॅड ” / ये बहुत आसान हे और यूज़र फ्रेंड्ली भी हे / इसमे तो 9 भारतीया भाषा हे और रिच टेक्स्ट एडिटर भी हे / आप ” क्विलपॅड ” यूज़ करते हे क्या…?
http://www.quillpad.in
नितिन बागला said
उधारी तक के इल्जाम लगवा दिये आपने
वैसे आपको एक बात कंधा थपथपा ही देना चाहिये था।
amit said
वाकई, ही ही ही!!
सागर जी, अगली बार कोई परिचित नज़र आए तो पूछ लेने में संकोच न कीजिएगा। यदि व्यक्ति परिचित नहीं हुआ तो “क्षमा कीजिए, आपकी शक्ल मेरे परिचित जैसी लगी” ही तो कहना पड़ेगा, कह दीजिएगा, कम से कम मन में दुविधा तो नहीं रहेगी ना!!
rajveer said
aap k sath jo bhi hua ussey jaan kar hansi bhi aayi aur aap par taras bhi aaya. hansi lsliye kyunki majak acha hua aap k sath aur taras isliye k aap ltne bade ho aur abhi tak sharmatey ho, pooch nahi saktey the?
Dilip kawathekar said
वाकई में ऐसा कई बार होता है. अभी परसों मैं चेन्नई स्टेशन पर भोपाल के लिये निकल ही रहा था. पांडिचेरी से लौटते हुए देर हो गयी थी और हमने भागते दौडते ट्रेन पकडी़. स्टेशन पर एक इन्दौर के मित्र दिखे जो हमारी तरफ़ देख रहे थे. मगर लगा कि शायद ये व्यक्ति अलग है, क्योंकि उन्के साथ की महिला दूसरी थी. मैने भी अनमने से उनकी तरफ़ इशारा किया, वे समझ नही पाये, और हम भीड में घुल मिल गये.
आज इन्दौर आकर उनसे बात की तो उन्होने कहा कि वे भी चेन्नई से आज ही आये थे. वे B2 में थे और मैं B1 में!!! आश्चर्य था कि भोपाल स्टेशन पर भी वे नहीं टकराये, और अलग अलग टेक्सी में इन्दौर पहुंचे!!
क्या संयोग है!!!
राहुल said
क्या बात है.सभी को भोपाल स्टेशन पर ही अपने चिर परिचित नजर आते है..जदू है भई
praviin said
bhai nahar ji chinta na kare .. aise vakye hote rahte hain…. hum ek apni ghatna suna rahe hain , mai jab bhi kisi ladke ki shadi me jau to vahan ladki walo ki taraf ka koe na koe mera parichit mil hi jata aur agar ladkivalo ki taraf se jau to ladke valo ki taraf se koe na koe mera parichit mil hi jata hai….hamare friend circle me is bat ka sab majak karte the , ek din apne friend ki shadi me gaya… invitation fon ke jariye hi mil gaya tha … wish karne stage par gaya to hamare friend yani dulhe raja ne apni patni se parichay karwaya ki a hamare jikri dost hai jab kisi shadi me jate hai to koe na koe inka parchit mil hi jata hai.. vyang karte hue kaha ki yahan to koe parchit nahi hai ? mai ne unke nahle pe dahla marte hue kaha ki BHABHI ji hi meri parchit hai aur humlog saath bachpan me khele hai …. dar asal hamare friend ki patni kafi pahle hamare yahau hi rahte the…….
rakesh singh said
ऐसा होता है कभी कभी … २-३ हमशक्ल वो भी एक साथ ….