किकोड़े मात्र अस्सी रुपये किलो!
Posted by सागर नाहर on 25, September 2009
बिल्कुल हद हो गई जी। किकोड़ा की सब्जी और अस्सी रुपये किलो!! आश्चर्य ही हो गया । कल बाजार सब्जी लेने गये और कुछ ठेलों पर बड़े करीने से सजाये एकदम हरे हरे किकोड़े दिख गये। बरसों बाद दिखे सो बड़े उत्साह से जाकर भाव पूछा .. जवाब मिला साठ रुपये किलो।
बच्चों का पता नहीं क्यों पर वे वैसे भी आधी हरी सब्जियों से नाक- भौं सिकोड़ते हैं, वे तो खाने से रहे, सो हमने ढ़ाई सौ ग्राम मांगे तो ठेले वाले का कहना था, मैने किलो का भाव बताया है, पाव लेने हों तो पूरे बीस लगेंगे!!
हमारा तो मूड खराब हो गया, सब्जी वाले से बहस करने की इच्छा थी परन्तु श्रीमती जी ने हाथ खींच लिया। मोंडा मार्केट में जाने के बाद दूसरी सब्जियां खरीदी गई पर हमारा मन तो उन्हीं किकोड़ों में अटका रहा । एकाद और जनों के पास दिखा फटाफट एक से (पाव का) भाव पता किया। भाव तो पचास ही था पर ना जाने क्यों उसने सामने से ही दस रुपये कह दिया हमने फटाफट उसके हाथ में दस रुपये थमा दिये।
आज सुबह बरसों बाद सब्जी भी खाई, और गांव को, खेतों को और बचपन को भी याद कर लिया। अरे ये वे किकोड़े हैं जो खेतों की बाड़ पर और इधर उधर यों ही उग आते हैं, इन्हें कोई भी तोड़ कर नहीं ले जाता क्यों कि हरेक के घर, खेत या बाड़े में मिल/उग जाते हैं। इन्हें तिनकों से जोड़ कर और ताजा लाल मिर्च की एक कतरन को बीच में जोड़कर हम तोता और ना जाने कौन कौन से जानवर बनाया करते थे। आज हंसी आती है कि उसे (तोते को) खड़े रखने के लिये हम प्रकृति से भी छेड़छाड़ कर लिया करते थे। वो कैसे? वो ऐसे कि हम एक पक्षी के चार पाँव लगाया करते थे, अलबत्त ति
नकों के।
इस सब्जी का जिक्र पढ़ कर आपका भी मन हुआ होगा कि आखिर यह सब्जी है कैसी जिसके लिये एकाद महीने बाद एक पोस्ट ठेलने का मन बन गया।
तो आपको सब्जी का फोटो बताने के लिये गूगल पर बहुत खोज की।
कई नामों से सर्च किया। करेले को bitter gourd कहते हैं सो इसकी बिरादरी से मिलते शब्दों को खोजा तो भी नहीं मिला। अचानक याद आया कि इन्हें गुजराती में कंटोळा (કંટોળા-Kantola) भी तो कहते है। अरे ये क्या! Kantola नाम खोजते ही तुरंत इसके फोटो मिल गये। लीजिये आपके लिये भी प्रस्तुत हैं कंटॊले का फोटो… आपकी भाषा में इन्हें क्या- क्या कहते हैं ये भी बताईये।
अब आपके मन में कंटोले की सब्जी खाने की इच्छा हुई होगी तो यह लीजिये इसकी सब्जी बनाने की रेसेपी-
कटोले की सब्जी
…..हां अगर भिण्डी फ्राई की तरह किकोड़े फ्राई बनायें जाये तो भी यह बहुत अच्छे लगते हैं।
फोटो इस जाल स्थल से लिया है, अगर किसी को आपत्ति हो तो बतायें, हटा दिया जायेगा।


दिनेशराय द्विवेदी said
यहाँ तो ककोड़ा ही कहते हैं। बाजार में खूब आता है। इस का अचार भी बनता है।
ajit gupta said
सागर जी
किकोडे का नाम पढकर पूरी पोस्ट पढ ली। आपके प्रिय किकोडे की शान में गुस्ताखी कर रही हूँ, एक बार हम सुदूर गाँव में गए थे। रास्ते में बस रूकी, वहाँ किकोडे बिक रहे थे, तो हमारे साथ के लोग उन पर टूट पडे। मैंने इसके पहले यह सब्जी कभी खायी नहीं थी। उन सबका किकोडा प्रेम देखकर मुझे उस दिन की ठिठोली मिल गयी। मैंने सभी को बहुत छेडा कि घरवाली पूछेगी कि हमारे लिए क्या लाए हो तो कहोगे कि किकोडे लाए हैं। लेकिन एक बार जब किसी के यहाँ मेहमान बनकर गए और उन्होंने बडे गर्व से कहा कि बीस रूपए किलों देकर किकोडे आपके लिए खरीद कर लायी हूँ तो मेरे तो पसीने छूट गए। यह बात 12 साल पुरानी है। सच में जिन्हें किकोडे पसन्द है, उन्होंने ही इसके भाव बढा रखे हैं। भैया हमने इसके भाव नहीं बढाएं हैं।
यूनुस said
इस सब्जी से परिचय मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा शहर में रहने के दौरान हुआ था । दरअसल पचमढ़ी जाने के रास्ते में बहुत सारे गांव वाले अपनी टोकरियों में भरकर इन्हें बेचते हैं । वहां इन्हें परोड़ा कहा जाता है । बंबई में तो इन्हें कन्टोला ही कहते हैं । आप सही कह रहे हैं । बीस रूपए के एक पाव मिले यहां । पर तकरीबन दो महीने हुए बाजार में इनके दर्शन नहीं हो रहे हैं । इनका सीज़न शायद गया । वैसे आपको ये भी बता दें कि नवी मुंबई वाले हाइवे पर शहर के थोड़ा बाहर गांव वाले इफरात में इनहें बहुत सस्ता बेचते हैं । कई जंगली सब्जियां होती हैं उनके पास । और गाडियों से गुज़र रहे लोग भीड़ लगाकर खरीदते हैं इन सबको ।
सुरेश चिपलूनकर said
यूनुस भाई से सहमत। फ़िलहाल उज्जैन में हम बाकियों के मु्काबले थोड़े सुखी हैं… ऐसी सब्जियाँ (जो लोग कम खाते हैं) अभी भी 20-25 रुपये किलो ही मिल रही हैं…
जो ब्लागर ये कहते हैं कि लिखने के लिये विषय नहीं मिलता, उन्हें सागर भाई को गुरु बनाना चाहिये, क्योंकि “किकोड़े” पर भी एक बेहतरीन पोस्ट ठेली जा सकती है यह उन्होंने दिखा दिया है…
रवि said
ये तो मेरी भी पसंदीदा (और इस तरह की अन्य बहुत सी जंगली सब्जियाँ और भाजियाँ भी) सब्जी है. छत्तीसगढ़ी में इसे खेकसी कहते हैं. इधर के हाल भी वही हैं – 50-60 रुपए किलो. अब जब जंगल ही नहीं बचेंगे तो जंगली फल-फूल सब्जियाँ कहां बचेंगी इसीलिए भाव आसमान छू रहे हैं.
रंजन said
८० रु किलो ठीक है.. कुछ तो कीमत लगेगी न इस स्वादिष्ट सब्जी की…
विपिन बिहारी गोयल said
इस बार तो पूरे सीजन में एक बार भी नहीं दिखी यह सब्जी.सच में तरस गए.
ghughutibasuti said
सागर जी,किकोडे के बारे में बताकर आपने उपकार किया. गुजरात में देखी तो बहुत थी किन्तु क्या है, कैसे बनानी है पता नहीं था. अब मिलेगी तो अवश्य खरीदूंगी. मुझे लगता है भोजन में जितनी विविधता हो स्वास्थ्य के लिए उतना ही लाभप्रद है.
घुघूती बासूती
सागर नाहर said
हां घुघुतिजी,
पहले मैं भी चिढ़ता था, बाद में जब खाने लगा तो अच्छी लगने लगी और आज मजबूरी बन गई है, दालों के भाव जो आसमान छूने लगे।
और हां अगर भिण्डी फ्राई की तरह किकोड़े फ्राई बनायें जाये तो भी यह बहुत अच्छे लगते हैं।
संजय बेंगाणी said
मुझे खास पसन्द नहीं, मगर घर में इसकी सब्जी बनती है. कभी जंगली सब्जी रही आज शाही हो गई
यहाँ तो कंटोळा कहते है, आपको पता ही है….
भैया कुछ दिन पहले घी 350 किलो देख लगा ह्रदयाघात हो होगा. पता नहीं क्या होने जा रहा है…..
सागर नाहर said
350/- किलो घी!!
क्या कह रहे हैं संजय भाई? हमारे यहां तो अभी भी 250/- के अन्दर मिल जाता है। लगता है आप “जाम- खंभाळिया” का घी खरीद रहे हैं। अब इतना बढ़िया घी हो तो 350/- दिये ही जा सकते हैं।
ज्ञानदत्त पाण्डेय said
कुन्दरू! जब यह सब्जी बनती है तो मन होता है उपवास ही कर लिया जाये!
सागर नाहर said
हा हा हा
इस पोस्ट के पाठकों में से आप अकेले हैं जिन्हें यह सब्जी पसन्द नहीं है।
Abhishek said
हम तो इसे खेकसा कहते हैं !
Ghost Buster said
ककोड़ा ही कहलाता है यहां भी. जुलाई से सितम्बर तक का ही सीजन है इसका, बरसात अच्छी हो तो फ़सल भी अच्छी होती है और दाम काबू में रहते हैं. वरना वही अस्सी रुपये किलो.
अभी चालीस चल रहा है और खूब दिख रहा है. अपनी पसंदीदा सब्जियों में है, हफ़्ते में दो-तीन बार खा सकते हैं. अरहर की दाल के साथ मस्त स्वाद देता है. (करेले की तरह)
ajit gupta said
आप सब ऐसा करें कि एक किकोडा क्लब बना लें और उसके विभिन्न तरह की सब्जियों के बारे में लिखे। मैं तो समझती थी कि हमारे मेवाड़ में ही किकोडा हीरो बना हुआ है लेकिन यहाँ तो देश में ही यह लाडला बना हुआ है। बधाई आप सभी किकोडा वालों को।
muflis said
kikorhe…..kabhi khaai ti nahi ye
sabzi….lekin ab daam sun kar mn mei
aaya ki achhaa hai ise khaane ka mn nahi hai.
lekin jis kisi sabzi ke liye bhi mn ho
ussi ko aag lagi hui hai…
jaankaari ke liye shukriyaa
“geeto ki mehfil” mei mera ek udhaar hai aap pr..!?!
—MUFLIS—
प्रियंकर said
भाया ! अब बडा-बडा शहरां में कठे तो बाड़ अर कठे गुवाड़. ककोड़ा खातर पीसा तो खर्चना पडईसी . पण अता पीसा . म्हारे कलकत्ते में तो हाल चाळीस रिप्या किलो बिकै है . कदै अठे का सब्जी’आड़ा थारी पोस्ट न पढ ले . म्हे तो मारा जावांगा .
प्रियंकर said
ज्ञानजी !
ककोड़े अलग हैं और कुंदरू अलग . कुंदरू मुझे भी पसंद नहीं, पर ककोड़े भीषण पसन्द हैं . यह करेले की ही एक किस्म है जैसे कुंदरू परवल का गरीब ’कज़िन’ है .
प्रियंकर said
’जाम-खंभाळिया’
यो देसी घी कुण सो है ? अर कठै मिल सकै ? आपां मर सकां पण घी कोन छोड सकां .
गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said
दीप की स्वर्णिम आभा
आपके भाग्य की और कर्म
की द्विआभा…..
युग की सफ़लता की
त्रिवेणी
आपके जीवन से ही आरम्भ हो
मंगल कामना के साथ
matuk said
mujhe lagta hai ye chathel hai
matukjuli said
chathel!
kavita said
sagarji itani tarifon ke baad kuchh aur kahane ka sahas nahi hai.
ha bachapan mein bahut khayee hai ye
par itani jankari nahi thi iske baare mein.
Bed Prakash Singh said
क्या बात है क.कोडे. को बैठे बिठाए हीरो बना दिया…