Posted by सागर नाहर on 27, March 2008
Go “Invisible” in Gmail, Like Yahoo Messenger !
( दो दिनों पहले यह पोस्ट पोस्ट करने के तुरंत बाद जीमेल से लोगों को अदृश्य होना सिखाता उससे पहले चिट्ठा ही अदृश्य हो गया , पता नहीं क्या हुआ कि लोगों को पोस्ट दिखी ही नहीं। शायद कुछ टेम्पलेट में लोचा हो! फिलहाल टेम्पलेट पर काम चालू है पर कई मित्रों के आग्रह पर इसए पुन: प्रकाशित कर रहा हूँ)
क्या आप भी जीमेल में कईयों की तरह मेल चैक करने आते हैं और आपके ओनलाईन होते ही मित्रों से चैट करने को मजबूर हो जाते हैं? क्या आप याहू मेसेन्जर की तरह इनविजिबल रहकर अपने किसी मित्र से चैट करना चाहते हैं?
आईये!!! इसका इलाज हमारे नितिन बागला जी ने खोज निकाला है और मुझे बताया है मैं आप सबको बता रहा हूँ।
सबसे पहले जाँच लीजिये कि आपने जीमेल का नया वर्जन प्रयोग कर रहे हैं। अब Setting में जाकर भाषा में English US पसन्द कर लीजिये
और अब इसे सेव कर लीजिये।
बस आपका काम हो चुका है, जहां से आप अपना स्टेटस बदलते हैं, वहाँ जा कर देख लीजिये.. चित्र क्रमांक २ की तरह दिखेगा।
Invisible पर क्लिक करिये… देखिये आप औरों के लिये अदृश्य हो चुके हैं। देखिये चित्र क्रमांक ३
जीमेल में इस तरीके से Invisible रहते हुए अगर जीटॉक लोगिन किया जाये तो यह संदेश मिलता है Oops! You are not invisible because you’re also using desktop software that doesn’t support invisibility, such as Google Talk.
पुन्श्च: यह प्रयोग इन्टरनेट एक्स्प्लोरर 7 या फायरफॉक्स 2+ में ही काम करेगा।
Posted in technology, तकनीकी | 6 Comments »
Posted by सागर नाहर on 23, March 2008
आम भारतीय की तरह मुझे भी होली खेलना बहुत पसन्द है। हर साल मुझे होली के दिन अगर कोई देखे तो विश्वास भी नहीं करेगा कि भीड़ से दूर रहने वाला और अक्सर चुपचाप रहने वाला सागर यही है। बरसों से मुझे होली के दिन खत्म होते ही अगले साल की होली का इंतजार रहता है तब अपने आप को खुल कर हंसने, कूदने, नाचने और हुड़दंग करने का मौका मिलता है।
आज सुबह आठ बजते ही हमेशा की भाँति नहा धोकर और अच्छा सा तेल हाथ पाँव, मुँह पर मल कर तथा पुराने कपड़े पहनकर तैयार बैठ गया कि कोई भी बुलाने आये तुरंत घर से निकल जायें। नौ बजी, दस भी बज गई पर कोई बुलाने नहीं आया। ग्यारह बजते बजते एक रिश्तेदार बुलाने आये मैं जब उनके घर गया तो उनके घर भी कोई होली खेलने के मूड में नहीं दिखा। वहां से भी मिठाई खाकर वापस सचमुच का बैरंग लौटा।
दो बजे तक इसी तरह इंतजार करते करते निकल गये, एकाद जगह गया भी तो उन्होने मना कर दिया, कि हम होली नहीं खेलेंगे। पिछले साल इन्हीं लोगों ने इतनी जबरदस्त होली खेली थी? मुझे और श्रीमतीजी को रंगने के बाद बीच में खड़ा रखकर चारों तरफ से मग में पानी भर भर कर मारा कि दो दिनों तक पीठ दर्द करती रही और पानी की मार के निशान पड़ गये।
आखिरकार तीन बजे शरीर पर चुपड़े तेल को निकालने के लिये एक बार और नहाना पड़ा। बरसों तक होली के बाद नहाते समय एक दूसरे को चेहरा दिखाते देख मेरे चेहरे पर कितना रंग बचा! पीठ पर कितना बचा! कोई कहता आपका चेहरा तो साफ दिख रहा है पर पीठ पर अभी रंग बाकी है। इस बार कुछ भी नहीं, ना रंग ना गुलाल।
आज गाँव बहुत याद आया, वहां होते तो होली और शीतला सप्तमी दो दिन होली खेलने का और हुड़दंग मनाने का मौका मिलता। आज सचमुच मन बड़ा मायूस सा हो गया, चार बजे अनमने ढंग से जब कॉफे खोला तो तो ग्राहक भी हैरान थे पिछले तीन सालों से मेरा चेहरा इतना रंगा हुआ होता है कि साफ होते होते एक हफ्ता निकल जाता है।
लेकिन बच्चों ने जम कर होली खेली घर को भी जी भर कर गंदा किया.. देखिये हर्षवर्धन और चैतन्य पिचकारी से गुब्बारे में रंग भरने की कोशिश करते हुए।

Posted in सामान्य | 17 Comments »
Posted by सागर नाहर on 12, March 2008
दो साल पहले अनायास ही चालू हुआ दस्तक का यह सफर आज अपने तीसरे पड़ाव पर आ पहुंचा है। मेरी सबसे पहली पोस्ट पर अनुनादजी ने टिप्पणी दी थी।
पिछले दो साल का अनुभव बहुत ही बढ़िया रहा। दूसरे साल में नये मित्रों में यूनूस भाई, गरिमा, अनिल रघुराज, काकेश, इरफान , अनीता कुमार, शोभा महेन्द्रु, डॉ अजीत, अजीत वडनेरकर, पूर्णिमा वर्मन, घुघुति जी, दीपा गोविन्द, रंजना भाटिया जी जैसे कई मित्र मिले। ( कई मित्रों के नाम भूल रहा हूँ, कृपया बुरा ना मानें)
संजय- पंकज-खुशी-उत्कर्ष बैंगानी, रवि कामदार, सुरेश चिपनूलकर और एक और खास मित्र से मुलाकात हुई, जिनके बारे में अगली पोस्ट में लिखूंगा। उनसे मुलाकात चिट्ठाकार मुलाकात ना होकर पारिवारिक मुलाकात बन गई।….अभी लिख दिया कि मैं तीन चार दिन पहले मुंबई आया था और उनसे बात नहीं की तो एकाद मित्र नाराज हो जायेंगे।
जहाँ परिवार होता है वहाँ कभी कभार ना चाहते हुए भी कुछ ऐसा भी हो जाता है जो मन को चुभने वाला हो; सबके साथ होता है मेरे साथ भी हुआ… खैर वह तो अब पुरानी बातें हुई।
पिछले साल ही तकनीकी लेखों को अलग जगह पर लगा कर नया चिट्ठा तकनीकी दस्तक बना और मेरा सबसे पसंदीदा शौक पुराने गानों का संग्रह और सुनना- सुनवाना गीतों की महफिल नामक चिट्ठे के रूप में अवतरित हुआ।
पिछले दो साल में जिन मित्रों ने मेरा मार्गदर्शन किया, जिन पाठकों ने मेरे लेख झेले
टिप्पणियां दी, जिन मित्रों ने हर तरह से मेरी सहायता की मैं उन सबको धन्यवाद देता हूँ।
संबंधित लेख:
Posted in सामान्य | 42 Comments »
Posted by सागर नाहर on 28, February 2008
Posted in सामान्य | 16 Comments »
Posted by सागर नाहर on 25, February 2008
कल रात एक बार फिर ढाई बजे तेज आवाज से नींद उचट गई, दरअसल मेरा घर हैदराबाद ( बेगमपेट) हवाई अड्डे से मात्र २ कि मी दूर है और रात दिन हवाई जहाज के उड़ान अभरने और उतरने का शोर इतना तेज होता है कि कई बार तो कानों पर हाथ रखना पड़ता है। खासकर श्रीलंका और दुबई (अमीरात) से आने वाले विमान तो इतने नीचे होते हैं कि आवाज सहन नहीं कर सकते।
कल रात नींद जागने के बाद कुछ देर सभी को तो नींद आ गई पर मैं करवटें बदलते रहा और मन में ऐसे अजीब से ख्याल आने लगे मानों इस बार का तेज शोर शायद विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने का है, यूं लगा विमान टूट कर हमारे घर पर ही आ गिरा है। मैं तैसे घर का दरवाजा खोलता हूँ, और अचानक घर पेट्रोल से भर जाता है और कुछ देर बाद पेट्रोल आग पकड़ लेता है और … हम सब धू धू कर जलने लगते हैं…. उफ्फ अवचेतन मन ने कल क्या दिखा दिया कल्पना कर के या उस दृश्य को एक बार याद करते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
जब भी मैं मित्रों से बातें ( चैट) करता हूँ तब कई बार उन्हें रोकना पड़ता है एक मिनिट रुकिये हवाई जहाज निकल ले बाद मे आप बोलें।
बस अब यह शोर कुछ ही दिन सहन करना होगा, अगले महीने की १६ तारीख को हैदराबाद के नये हवाई अड्ड़े का उद्घाटन होने वाला है, उसके बाद रात दिन का यह शोर यहाँ से बीस कि मी दूर चला जायेगा।
कई बार मैं अपने मित्रों से मजाक में पूछता हूँ कि क्या हवाई जहाजों में साईलेंसर नहीं होता?
जब मैं यह पंक्तियां टाइप कर रहा हूँ कम से कम पाँच विमान तो चढ़ उतर चुके।
Posted in सामान्य | 10 Comments »
Posted by सागर नाहर on 18, February 2008
अमृता सुरेश २३ साल की हैं और इतनी कम उम्र में अपनी पहली किताब When a lawyer falls in love छपवा चुकी है, और मेरे कॉफे की नियमित ग्राहक हैं। अमृता इतनी सीधी हैं कि मेरे यहाँ जब जेरॉक्स करवाती हैं और किसी कारण से कोई कागज खराब हो जाता है तो उसके भी पैसे लेने के लिये मुझे कहती है। वह खुद कहती है भैया हमें डिस्काऊंट नहीं चाहिये, आपका नुकसान नहीं होना चाहिये।
अमृता की माताजी रेनू आंटी, पापा डॉ सुरेश और दो बहनें सब के सब एक ही जैसे स्वभाव के हैं। एक दिन रेनू आंटी से बात चली तो मैने पूछ लिया आंटी आप इतनी सीधी हैं; ना कभी किसी चीज भाव कम करवाती है और दुकानदार को सामने से कहती हैं कि भैया हमें डिस्काऊंट नहीं चाहिये! ऐसे में लोग आपका गलत फायदा नहीं उठाते; आपको ठग नहीं लेते? रेनू आंटी आसमान की तरफ हाथ उठा कर कहने लगी, उपर वाला हमारे साथ है वह सब देखता है। मैं अक्सर हंसता और आंटी नाराज नहीं होती।
तीन चार दिन पहले एक बड़ा मजेदार संयोग हो गया, रात को पौने दस बजे अमृता दो किताबें ले कर आई और कहने लगी ” भैया मुझे कल सुबह ११ बजे इन दोनों किताबों की जेरॉक्स किसी भी हालत में चाहिये वरना ये किताबें मुझे पढ़ने को कभी नहीं मिलेगी। मैने किताबें ले ली और अगली सुबह तेज बारिश चालू हो गई।
ऐसी बारिश में तुरंत लाईट काट दी जाती है पर पता क्यों उस दिन लाईट कट नहीं हुई और जब नौ बजे मैने कॉफे खोला, दुकान के बाहर एक वृद्घा सोई हूई थी, वे बारिश और सर्दी की वजह से काँप रही थी। पता नहीं किस धुन में मैने जेब में हाथ डाला और दस रुपये निका्ल कर उन्हें दिये और कहा मांजी सामने रेस्टोरेंट से इडली खा लीजिये और चाय पी लीजिये।
अब मन में एक ही चिंता थी कि कैसे अमृता का काम होगा क्योंकि ऐसी बारिश में कागज नम हो जाता है और बेक टू बेक जेरॉक्स करना बड़ा ही मुश्किल हो जाता है। जैसे तैसे काम निबटा कर डरते हुए काम शुरु किया। ४०० पन्नों को एक घंटे में जेरॉक्स करनी थी, काम शुरु किया तो पता नहीं क्यों बिना रुके, बिना कागज परेशान किये, बिना एक भी कागज़ बिगड़े ४०० पन्नों की किताब जेरॉक्स ४५ मिनिट में पूरी हो गई और अमृता का काम पूरा होने के बाद जैसे ही दूसरे ग्राहक का काम हाथ में लिया, मशीन को पता नहीं क्या हुआ कागज़ फंसने लगे। पाँच जेरॉक्स करने में दस कागज़ खराब हो गये और आखिरकार मशीन बंद करनी पड़ी और लीजिये थोड़ी देर में बारिश बंद हुई और करंट भी चला गया!!
मुझे समझ में नहीं आया कि ये क्या आश्चर्य है कि वही कागज है फिर अमृता के काम के लिये मशीन ने परेशान नहीं किया और अब… क्या वाकई अमृता जैसे लोगों का भगवान साथ देते हैं या फिर उन वृद्धा का आशीर्वाद…?
अमृता की पुस्तक A lawyer falls in love के बारे में जानकारी
अमृता के अंग्रेजी ब्लॉग पर पोस्ट Arranged /Deranged Marriage
Posted in सामान्य | 20 Comments »
Posted by सागर नाहर on 29, January 2008
हिन्दी के सबसे पुराने ब्लॉगर v9y जी का बनाया हुआ एक मजेदार जाल स्थल है मनबोल।
मनबोल पर पाठक हिन्दी फिल्मों के उन गानों के बारे में जिक्र करते हैं जिनको सुनने पर गायक का सही उच्चारण उन्हें समझ में नहीं आता और फिर विनय जी या पाठक सही शब्द बताते हैं। अगर आपको सही पता हो तो आप भी सही शब्द बता सकते हैं।
कई बार श्रोताओं का गलत सुनना और उसे यहाँ बताना, पढ़कर बड़ा मजा आता है। जैसे इस गाने में तो विनय जी भी सही शब्द नहीं सुन पाये और उसे यहाँ लिखा भी:
गाना है :
baiThaa diyaa falak pe, mujhe Khaak se uThaa ke
V9Y ने सुना
baiThaa diyaa *pala.ng* pe, mujhe *khaaT* se uThaa ke 
यह देखिये- गाना है
रात में और दोपहर में, आब-ओ-दाना ढूंढते हैं
Asif ने जैसा सुना/समझा
रात में और दोपहर में, *साबुदाना* ढूँढ़ते हैं 
और लीजिये
aap jaisaa koii merii zi.ndagii me.n aaye to baat ban jaaye
vibhendu ने जैसा सुना/समझा
aap jaisaa koii merii zi.ndagii me.n aaye to *baap* ban jaaye


एक और
ai kaatib-e-taqadeer mujhe itanaa bataa de
ravi ने जैसा सुना/समझा
ai *kaash ke* taqadeer mujhe itanaa bataa de
और ये लीजिये अपने रमन कौल जी ने क्या सुना है:
असल में - aa dhoop maloo.N mai.n tere haatho.n me.n
rkaul ने जैसा सुना/समझा
aa *thook maloo.N* mai.n tere haatho.n me.n
कहीं ऐसा तो नहीं कि आप सोच रहे हों अरेऽऽऽ मैने भी यही सुना था ?
अब इससे ज्यादा हम आप को नहीं बतायेंगे। आप खुद इस मजेदार जाल स्थल पर जाकर आनंद लीजिये और हाँ आपको भी कोई ऐसा गाना ध्यान में आ रहा हो तो…. संकोच ना करें।
Posted in हास्य व्यंग्य | 16 Comments »
Posted by सागर नाहर on 26, January 2008
How to add Smiley Faces in blog post?
पिछले कुछ दिनों पहले ब्लॉग बुद्धि पर विकास जी ने मजेदार पोस्ट लिखी थी जिससे थोड़ी सी मेहनत के बाद आसानी से पोस्ट में स्माईली लगाये जा सकते थे। इस पोस्ट में एक परेशानी यह थी कि गैर तकनीकी ब्लॉगर उतनी आसानी से इस तरीके को प्रयोग नहीं कर सकता और दूसरा यह कि जब भी ब्लॉग का टेम्पलेट बदला जाये, सारी मेहनत बेकार हो जायेगी। 
आगे यहाँ पढ़ें…. तकनीकी दस्तक पर
Posted in सामान्य | No Comments »
Posted by सागर नाहर on 25, January 2008
Posted in सामान्य | 2 Comments »
Posted by सागर नाहर on 14, January 2008
मैने अपने बचपन में बहुत चोरियां की .. पता है किसकी?
नमक की डलियों की!!!
गाँव में किराने की दुकानों के बाहर नमक की बोरियाँ पड़ी रहती थी। स्कूल आते जाते नियम से एकाद मुट्ठी नमक चुरा कर छुप छुप कर बरसों खाया। इस तरह नमक खाने की आदत इतनी खराब पड़ी कि बाद में खाने में उपर से नमक बुरका कर खाने लगा। सब्जी तो ठीक फुलके (रोटी) पर में उपर से नमक डाल कर खाने की लत लग गई।
आदत ऐसी बुरी कि सब्जी को बिना चखे उपर से नमक बुरका कर खाने की आदत से पापा-मम्मीजी, बहनें और पत्नी जी टोक टोक कर थक गये। जब चैतन्य एक साल के होंगे और बराबर बोलना भी नहीं जानते थे; मैं खाना खाने घर जाता तो साहबजादे मेरे लिये उनकी मम्मी के थाली लाने से पहले नमक का डिब्बा लेकर आ जाते। इस आदत की वजह से कई जगह मजाक उड़ाया जाता, पर लगी आदत.. मजबूरी थी, सहन करना पड़ता।
पिछले साल आज ही के दिन मैं खाना खाने बैठा और रोटी का एक कौर खाया कि अचानक मेरे मुंह से निकल गया आज आटे में नमक शायद ज्यादा पड़ गया है। श्रीमती जी हंसती हुई बोली उपर से नमक घोल घोल कर खाने वालों को नमक कब से ज्यादा लगने लगा?
मुझे यों लगा जैसे मेरा उपहास उड़ाया जा रहा है और उसी समय मैने एक निर्णय कर लिया कि “आज से खाने में उपर से नमक डालना बंद”! मैं नियम पर इतना दृढ़ रहा कि वह दिन और आज का दिन, खाने में कभी उपर से नमक नहीं डाला, जैसा खाना आ गया वैसा खा लिया। ज्यादा नमक या कम नमक! सब चलने लगा।
एकदिन सचमुच सब्जी में नमक कम था और श्रीमती जी को मेरे आधा खाना खा लेने के बाद पता चला तो वे मेरी सब्जी में नमक डालने लगी अचानक मेरा हाथ नमक के डिब्बे पर चला और बेचारा नमक का डिब्बा ….
इसी तरह कुछ सालों पहले मुझे चाय पीने की बहुत बुरी लत थी, जिस दिन आखिरी चाय पी उस दिन चाय के कप पीने का हिसाब था उन्तीसऽऽऽ कप!! दो दिन तक हाथ पाँव और सर में थोड़ा दर्द रहा, चौथे दिन से कुछ नहीं! ना सर दर्द ना बदन दर्द। उस बात को भी फरवरी में ग्यारह साल हो जायेंगे।
उन तीन दिनों में अपने मनोबल को बहुत मजबूत बनाना पड़ा, पहले लगता था कि बुरी आदतें छूटना आसान नहीं पर जब हिम्मत की तो कुछ भी मुश्किल नहीं रहा। अगर आप भी अपनी कोई बुरी आदत छोड़ना चाहते हों तो उस आदत को छोड़ने का निश्चय कर बस तीन दिन अपने आपको संभाल लीजिये , मेरा विश्वास है बाद में ज्यादा तकलीफ नहीं होगी।
मुझे अब भी दो बुरी आदतें है जिनमें से एक को मैं छोड़ना नहीं चाहता पर घर वाले छुड़वाने पर उतारू है..और वो है पढ़ना! मुझे खाते और सोते समय भी कुछ ना कुछ पढ़ने की आदत है। दूसरी आदत है अंगुलियाँ चटकाना, देखते हैं उसका नंबर कब आता है?
Posted in सामान्य | 23 Comments »