॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

Archive for the ‘मनोरंजन’ Category

1970 में भी चिट्ठे लिखे जाते थे?

Posted by सागर नाहर on 21, मार्च 2009

चिट्ठाजगत.इन से लिया गया यह स्क्रिन शॉट तो यही कहता है! :)

chitthajagat.in

chitthajagat.in1

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दानवीर कर्ण अफ्रीका में जन्मे थे!

Posted by सागर नाहर on 1, जनवरी 2008

चिट्ठाजगत प्रतियोगिता में विजेता प्रविष्टी
चजई (चिट्ठाजगत) में तृतीय पुरुस्कार विजेता प्रविष्टी

मैने अपना पहला पहला  मेल आई डी याहू में सन 1997  में बनाया था,  जिस दिन से मेरा आई डी बना उस दिन से आज तक औसतन महीने की दस  से बीस  मेल मिलती है.. मैं फलाणां बैंक का मैनेजर ढींमका हूँ। हमारे बैंक के एक खातेदार मिस्टर नाहर अरबों रुपये की दौलत अपने पीछे बैंक में छोड़कर स्वर्गवासी हो गये हैं। अब चूंकि आप भी नाहर हैं सो इस दौलत पर आपका हक बनता है सो हम आपको उस दौलत का एक छोटा सा हिस्सा यानि २ मिलियन डॉलर आपको देना चाहते हैं… लीजिए २ मिलियन उनके लिये मामूली रकम है।
कभी मेल आती है आपके मेल आईडी ने हमारी ओनलाईन लॉटरी में  २० मिलीयन का पहला इनाम जीता है.. शायद मेरे नये पुराने मिलाकर पाँच छ: आई डी होंगे, उनमें अगर रिडिफ को छोड़ दिया जाये तो महीने की लगभग सौ मेल मिलती है  और उन सब में  रकम  दो चार मिलीयन डॉलर से नीचे कभी नहीं होती।

( रिडीफ की कहानी कुछ अलग ही है; रिडीफ में इस  तरह की मेल नहीं तो आती, पर दूसरी फालतू की मेल रोज की बीस के हिसाब से आती है. मसलन शॉपिंग, बीमा ज्योतिष आदि, आप डीलीट करते करते थक जाओ पर वे दूसरी भेज देंगे)

अब महीने की सौ  और साल की लगभग 1200 मेल और दस साल में 12000 मेल… 12000 मेल में औसतन २० मिलीयन डॉलर … भारतीय मुद्रा में… आगे हिसाब नहीं आता, आलोक पुराणिकजी मदद करिये!

आज तक जितनी मेल मिली है अगर वास्तव में वो सारा पैसा मुझे  मिल जाता तो  अब तक दो चार अमरीका और एकाद चीन  तो अपन खरीद चुके होते। :)

सबसे बड़े   आश्‍चर्य की बात यह है कि यह  है कि आज तक जितनी मेल मुझे मिली है वे सब की सब अफ्रीका से आई थी, एक भी किसी  और देश से नहीं।  कई देश के तो नाम ही ऐसे होते हैं कि पढ़ कर  हंसी आती है, मसलन lome-Togo! इस देश से Ecobank PLC के रीजनल मैनेजर  Mr Walla K.Kadanga  मुझे 4.5M(Four million five hundred thousand United States Dollars)  लेने का आग्रह कर रहे हैं, मैं बड़े धर्म संकट में फंस गया हूँ कि इतनी दौलत लूं या ना लूं? उनका इतना आग्रह कैसे टालूं मैं? मैं तो वैसे भी आग्रह का जरा कच्चा हूँ।

तो क्या यह समझा जाये कि या तो दानवीर कर्ण अफ्रीका में जन्मे थे इसलिये उनके वशंजों में दान देने की प्रवृति का जीन अब तक उनमें  है या फिर    दानवीर कर्ण अब अफ्रीका में जन्म लेने लगे हैं।

तीन चार दिन पहले मेरे एक नियमित ग्राहक दुकान में आये  और जब  केबिन में बैठने लगे उनके मुंह से धीमे  से यह निकला साले सब  के सब !@#$%^&*()  बनाते हैं। बाद में उन्होने एक मेल का प्रिंट आऊट निकाला और मुझे कहा इसे पढ़ो,  इमेल लिखने वाले का पता देखते ही मैने उन ग्राहक से कहा यह तो फर्जी मेल है, आपने इसका जवाब तो नहीं दिया? कहीं आपने अपने क्रेडिट कार्ड का नंबर या बैंक खाते का नंबर तो नहीं  दिया ना?

मेरे इतना कहते ही उनके चेहरे का बल्ब जैसे फ्यूज हो गया  और वे कहने लगे नहीं नहीं.. मैने  नहीं दिया।  उनके चेहरे को देखते और  उनके मूंह से निकली गाली से साफ महसूस हो रहा था कि भाइ साहब किसी  बैंक मैनेजर (?) के झांसे में आकर अपने क्रेडिट कार्ड या खाते का नंबर  दे बैठे हैं।

पुनश्च: जब मैं यह प्रविष्टी लिख रहा हूँ और मुझे अफ्रीका से एक मेल मिली है।

The Ecowas Donation has chosen you by the board of trustees as one of  the
final recipients of
a Cash Grant/Donation for your own personal educational and business development. To celebrate the 30th anniversary 2007 program We are giving out a yearly donation of US$500,000.00 to 10 lucky recipients as charity donations.

For Payment Remittance Contact
Mr. Edwin Jonhson via email below,
ecowas.africa@XXXXX.XXX

देखिये  मुझे  ५० हजार डॉलर मिल रहे हैं ले लूं क्या?

आप सब को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें

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मजेदार वीडियो

Posted by सागर नाहर on 19, अगस्त 2007

Hindi Blog Aggregator
कुछ समय पहले मैने एक पोस्ट लिखी थी मेरे मनपसन्द धारावाहिक, उसमें मैने हिन्दी के एक मशहूर धारावाहिक एक चाबी है पड़ौस में का जिक्र किया था। उस धारावाहिक के दो छोटे पर मजेदार वीडियो आपके लिये प्रस्तुत है।

पहले वीडियो में धारावाहिक की नायिका उर्मी ( सुहासी गारोडिया ) पर मुहल्ले के चार नौजवान मरते हैं, पर चारों ही बेरोजगार है। उर्मी को अपेन्डिक्स का ओप्रेशन हुआ है और चारों उसकी मिजाजपुर्सी के लिये आये हुए हैं। आगे आप देखिये।

इस दूसरे वीडियो में नायक संदीप(वरूण बड़ौला) जो अनाथ है पर उसके मित्र के पिता उसे अपने बेटे की तरह मानते हैं, नायक को उर्मी पसन्द है पर इजहार नहीं कर पाता। नायिका को भी संदीप पसन्द है पर वह पहल नहीं करती।

मित्र के पिता संदीप की शादी करना चाहते हैं और उन दोनों के बीच की बातचीत आप देखिये- सुनिये।

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यादें बचपन की

Posted by सागर नाहर on 29, मार्च 2007

लो फिर से मौसम में गर्मी गई, यहाँ हैदराबाद का तापमान २५ डिग्री से उपर जाने लगा है। दोपहर को सड़कें सूनी सूनी हो जाती है। तेज गर्म हवाओं के साथ धूलड़ने लगी है अभी से। पर देता हूँ बच्चों को चैन नहीं, धूप हो या छांव उन्हें खेलने से रोक पाना बड़ा मुश्किल काम है। आज बैठे बैठे अचानक ही बचपन की गर्मी की छूट्टियाँ याद गई। अंतिम परीक्षा के दिन पर्चा हल होते ही मानो कैद में से छूटे। कापियाँ किताबें आले में धर कर खेलने लग जाते (वैसे भी उन्हें पढ़ते थे ही कब ?)

आगे यहाँ… पढ़ें

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मनपसन्द धारावाहिक-२

Posted by सागर नाहर on 17, फ़रवरी 2007

पिछले लेख में मेने आपको मेरी पसन्द के कुछ धारावाहिकों के बारे में बताया था, लेख काफी अमिताभी और  फुरसतिया :)  होने लगा था इसलिये जारी रख दिया था।

हाँ तो मेरी पसन्द का अगला कार्यक्रम  है NDTV Profit का कार्यक्रम “अविष्कार इण्डिया” जो पता नहीं क्यों पिछले कुछ दिनों से बन्द कर दिया गया है। यह कार्यक्रम शायद अब भी अंग्रेजी में India innovates के नाम से आता हो! अविष्कार इण्डिया में भारत के उन वैज्ञानिकों को बताया जाता है, जिन्होनें बिना किसी शिक्षा या कम शिक्षा और  बिना  सहायता के ऐसे अचरज भरे अविष्कार किये हैं कि उन्हें देख कर हम आश्चर्य चकित हो जाते हैं।

दिलीप माधव साहू जो अभी मात्र १२वीं कक्षा के छात्र हैं और अपने नेत्रहीन चाचा की परेशानी को देखते हुए ब्रेल लिपी से ज्यादा सुगम एक नई लिपी का अविष्कार कर दिया है। उड़ीसा के एक और छात्र जिसका नाम अभी याद नहीं आ रहा है उसने अपनी मोटर साईकिल में ऐसे संशोधन किये हैं कि उसे चलाने में किसी अतिरिक्त ऊर्जा का दहन नहीं करना पड़ता यानि बिना पेट्रोल की मोटर साईकिल।अपनी मोटर साईकिल में एक बैटरी को इस तरह से फिट किया है कि जिससे वह चलते समय चार्ज होती रहती है और किसी भी प्रकार की उपरी ईंधन की जरूरत नहीं होती। बिहार में लगातार बाढ़ को देखते हुए  एक बुजुर्ग मोहम्मद सैदुल्लाह  ने  ८० वर्ष की उम्र में  एक ऐसी साईकिल का अविष्कार किया है जो पानी पर भी चल सकती है। इस तरह के और भी अविष्कारों की सूची यहाँ  और यहाँ है।

मेरी पसन्द का अगला कार्यक्रम वही है जो संजय भाई , डॉ टंडन साहब और प्रियंकर भाई साहब का भी है , यानि ” बा बहू और बेबी”!

यह एक गुजराती संयुक्त परिवार की कहानी है। जैसा मैने अपने एक लेख में बताया था कि ज्यादातर कहानियों में  एक ननंद होती है जो अपने मायके  में ही पड़ी रहती  है और बहुओं के खिलाफ अपनी माँ के कान भरती रहती है, इस कहानी में भी चारूबाळा यही करती रहती है पर सबसे बड़ी बात यह है कि सासू उस की बातों में नहीं आती। बाकी ज्यादातर कहानियों में सास बहू के खिलाफ हो जाते है , परन्तु इस कहानी में गोदावरी ठक्कर (बा) यानि सरिता जोशी अपनी बेटी की बातों में आकर उनकी बिना गलती, बहूओं को नहीं डाँटती। गुजराती नाटकों एक से एक  मंजे हुए कलाकारों के अभिनय से सजे इस धारावाहिक की एक कमी भी है और वह यह है कि यह कुछ ज्यादा ही गुडी-गुड़ी यानि राजश्री की फिल्मों की तरह है, फिर भी मुझे बहुत पसन्द है।

मैं इस अविष्कार इंडीया  पर अलग से एक विस्तृत लेख लिखना चाहता था परन्तु  धारावाहिकों की बात चली तो उसे यहीं शामिल कर लिया है और सीधे लिंक भी दे दिये हैं जिससे आपको विस्तृत जानकारी मिल सकेगी। आप भी किसी अच्छे कार्यक्रम के बारे में जानते हों तो हमें अवश्य बतायें।

(संपूर्ण)

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मेरे मनपसन्द धारावाहिक

Posted by सागर नाहर on 15, फ़रवरी 2007

मेरा पिछला लेख हिन्दी के बकवास धारावाहिकों पर था, परन्तु मैं आज आपको मेरे मनपसन्द कार्यक्रम के बारे में बताना चाहता हूँ। ऐसा नहीं है कि टीवी पर एकता कपूर के सास- बहू और षड़यंत्र ब्राण्ड  और जिन चुटकुलों पर कमर में गुदगुदी करके भी हँसी नहीं आती उन पर सिद्धू हँस हँस कर लोटपोट होते हों( कई बार तो प्रतियोगी के ” नमस्ते सिद्धू जी ” बोलने पर ही सिद्धूजी हँसने लगते हैं) इस तरह के ही कार्यक्रम आते हों, कई बहुत ही अच्छे कार्यक्रम भी आते हैं।

मेरा पसन्दीदा कार्यक्रम की लिस्ट में दो तो डिस्कवरी चैनल के कार्यक्रम हैं, पहला तो है आई शुडन्ट बी अलाईव (हिन्दी में) I Shouldn’t Be Alive इस कार्यक्रम में साहसिकों के द्वारा मुसीबत में फ़ँसने और बचने की घटना का पूरा नाटकीय रूपान्तरण बताया जाता है और साथ ही उन साहसिकों का साक्षात्कार भी बीच बीच में बताया जाता है।

एक अंक में कहानी कुछ यूं थी एक कबीले की खोज में चार साहसिक अपने घर से निकलते हैं और जंगल में भटक जाते हैं। बाद में उन में झगड़ा होता है और दो नदी मार्ग से जाने की जिद करते हैं और दो थल मार्ग से। उस कार्यक्रम में जल मार्ग से आगे बढ़ने वाले साहसिकों पर पड़ने वाली मुसीबतों को बताया गया था कि कैसे वे दोनो भी अलग पड़ जाते हैं। लगभग 7-8 दिन तक भूखे प्यासे और लगभग मरणासन्न अवस्था में भटकने के बाद वे दोनों तो आपस में मिल जाते हैं परन्तु थल मार्ग पसन्द करने वाले नहीं बच पाते।

कल रात को बताये अंक में एक वन विशेषज्ञ पायलट का छोटा विमान अफ़्रीका के जंगल में टूट जाता है, और उनके दोनो पाँव की हड्डियाँ टूट जाती है और बुरी तरह से घायल हो जाते हैं कि चलना तो ठीक करवट भी नहीं बदल सकते। पूरी रात कैसे उन्हें उस भयानक जंगल में गुजारनी पड़ती है बताया गया था। एक बार तो अफ्रीकन शेर उनको शिकार करने वाला ही होता है कि वे लगभग अपाहिज हालत में अपने दिमाग से शेर से बचते पाते हैं और दूसरी बार लकड़बग्घे से। इतना रोमांचक कार्यक्रम थे वह कि उस को यहाँ लिखने से अनुभव नहीं किया जा सकता बस देखना होता है। एक अंक में कुछ साहसिक कम्बोडिया के जंगलों में ख्मैर रूज के सैनिकों के हाथों पड़ जाते हैं और बड़ी मुश्किल से बच कर बाहर निकलते हैं।

मेरा दूसरा पसंदीदा कार्यक्रम है (हनी वी आर किलिंग दी किड्स) Honey we are killing the kids यह कार्यक्रम बच्चों के मोटापे और उनकी आदतों पर आधारित है। इस कार्यक्रम में बच्चों की मोटापे की परेशानी से गुजर रहे किसी परिवार को स्टूडियो में बुलाया जाता है, और सूत्रधार डॉ लिजा हार्क उनसे बच्चों की आदतों और खानपान के बारे में जानने के बाद कम्पयूटर की विशालकाय स्क्रीन पर बताती है कि बच्चे बीस साल से लेकर चालीस तक के होने पर कैसे कैसे दिखेंगे। यह बहुत डरावना अनुभव होता है माता पिता के लिये।

फिर शुरू होता है डॉ लिजा का उपचार जिसमें पहले हफ्ते खाने पीने की आदतों को सुधारने पर ध्यान दिया जाता है, फिर सोने- उठने के समय से लेकर खेलने तक पर ध्यान दिया जाता है। टीवी पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है और यहाँ तक की माता पिता की जिम्मेदारियाँ तक बदल दी जाती है, अगर बच्चे पिता के ज्यादा निकट है और उनके अनुशाषन में है तो अब घर की पूरी जिम्मेदारी माँ को दी जाती है। जिससे कई बार बच्चे तो बच्चे , माता- पिता भी नियम तोड़ देते हैं। एक बात का खास ध्यान दिया जाता है कि घर के सारे सदस्य एक साथ बैठ खाना खायें। जिससे आपस में अपनत्व बढ़े।

दो -तीन हफ्तों के बाद उन्हें फिर से स्क्रीन पर दिखाया जाता है कि बच्चे अब कैसे दिखेंगे और उस के हिसाब से आगे का कार्यक्रम निर्धारित किया जाता है। आखिरकार डॉ लिजा का उपचार पूरा होता है और अब एक बार फिर से बच्चों को स्क्रीन पर बताया जाता है कि अब बच्चे चालीस की उम्र के होने पर कैसे दिखेंगे। परिणाम बहुत ही आश्चर्य जनक होते हैं। अगर समय मिले तो एक बार इस कार्यक्रम को जरूर देखें।

मेरा तीसरा पसंदीदा कार्यक्रम स्टार प्लस पर आ रहा धारावाहिक “एक चाबी है पड़ौस में ” है। एक छोटे कस्बे के मोहल्ले कर्नल गंज में कुछ परिवारों की कहानी है। इस मोहल्ले में कुछ मध्यम वर्गीय परिवार रहते हैं। जिनमें एक मुस्लिम है,गुजराती उर्मी है ,बंगाली है ,पंजाबी भी है। सारे लोग मिल जुल कर रहते हैं, नाकारा बच्चे भी हैं जो दिन भर कैरम खेलते रहते हैं पर उनमें अटूट दोस्ती है। कभी कभार आपस में ढ़िशूम – ढ़िशूम भी कर लेते हैं। सबसे आकर्षक है वरूण बडोला। कुल मिला कर एक सामान्य कहानी जिसमें कहीं कोई षड़्यन्त्र नहीं करते, करोड़ों की बातें नहीं होती। उपर जो लिंक दिया है उसमें उर्मी (पात्र का नाम है, अभिनेत्री का नाम याद नहीं) और वरूण भी दिख रहे हैं। जो एक दूसरे से प्रेम करते हैं पर इजहार नहीं कर पाते।

जब दूरदर्शन नया नया आया था तब इस तरह के कई धारावाहिक आते थे, अब वो बात कई बरसों के बाद एक चाबी…. ने कर दिखाई है। आम आदमी की कहानी होने की वजह से यह धारावाहिक देखते समय ऐसा महसूस होता है कि मानों हम भी इस कहानी का एक हिस्सा हों। इस कार्यक्रम को आप नहीं देखा तो आपने बहुत कुछ “मिस” कर दिया है।इस शनिवार को मत भूलें। बहुत ही सुन्दर धारावाहिक है यह।

(जारी…)

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