Posted by सागर नाहर on 25, September 2009
बिल्कुल हद हो गई जी। किकोड़ा की सब्जी और अस्सी रुपये किलो!! आश्चर्य ही हो गया । कल बाजार सब्जी लेने गये और कुछ ठेलों पर बड़े करीने से सजाये एकदम हरे हरे किकोड़े दिख गये। बरसों बाद दिखे सो बड़े उत्साह से जाकर भाव पूछा .. जवाब मिला साठ रुपये किलो।
बच्चों का पता नहीं क्यों पर वे वैसे भी आधी हरी सब्जियों से नाक- भौं सिकोड़ते हैं, वे तो खाने से रहे, सो हमने ढ़ाई सौ ग्राम मांगे तो ठेले वाले का कहना था, मैने किलो का भाव बताया है, पाव लेने हों तो पूरे बीस लगेंगे!!
हमारा तो मूड खराब हो गया, सब्जी वाले से बहस करने की इच्छा थी परन्तु श्रीमती जी ने हाथ खींच लिया। मोंडा मार्केट में जाने के बाद दूसरी सब्जियां खरीदी गई पर हमारा मन तो उन्हीं किकोड़ों में अटका रहा । एकाद और जनों के पास दिखा फटाफट एक से (पाव का) भाव पता किया। भाव तो पचास ही था पर ना जाने क्यों उसने सामने से ही दस रुपये कह दिया हमने फटाफट उसके हाथ में दस रुपये थमा दिये।
आज सुबह बरसों बाद सब्जी भी खाई, और गांव को, खेतों को और बचपन को भी याद कर लिया। अरे ये वे किकोड़े हैं जो खेतों की बाड़ पर और इधर उधर यों ही उग आते हैं, इन्हें कोई भी तोड़ कर नहीं ले जाता क्यों कि हरेक के घर, खेत या बाड़े में मिल/उग जाते हैं। इन्हें तिनकों से जोड़ कर और ताजा लाल मिर्च की एक कतरन को बीच में जोड़कर हम तोता और ना जाने कौन कौन से जानवर बनाया करते थे। आज हंसी आती है कि उसे (तोते को) खड़े रखने के लिये हम प्रकृति से भी छेड़छाड़ कर लिया करते थे। वो कैसे? वो ऐसे कि हम एक पक्षी के चार पाँव लगाया करते थे, अलबत्त ति
नकों के।
इस सब्जी का जिक्र पढ़ कर आपका भी मन हुआ होगा कि आखिर यह सब्जी है कैसी जिसके लिये एकाद महीने बाद एक पोस्ट ठेलने का मन बन गया।
तो आपको सब्जी का फोटो बताने के लिये गूगल पर बहुत खोज की।
कई नामों से सर्च किया। करेले को bitter gourd कहते हैं सो इसकी बिरादरी से मिलते शब्दों को खोजा तो भी नहीं मिला। अचानक याद आया कि इन्हें गुजराती में कंटोळा (કંટોળા-Kantola) भी तो कहते है। अरे ये क्या! Kantola नाम खोजते ही तुरंत इसके फोटो मिल गये। लीजिये आपके लिये भी प्रस्तुत हैं कंटॊले का फोटो… आपकी भाषा में इन्हें क्या- क्या कहते हैं ये भी बताईये।
अब आपके मन में कंटोले की सब्जी खाने की इच्छा हुई होगी तो यह लीजिये इसकी सब्जी बनाने की रेसेपी-
कटोले की सब्जी
…..हां अगर भिण्डी फ्राई की तरह किकोड़े फ्राई बनायें जाये तो भी यह बहुत अच्छे लगते हैं।
फोटो इस जाल स्थल से लिया है, अगर किसी को आपत्ति हो तो बतायें, हटा दिया जायेगा।
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Posted by सागर नाहर on 22, April 2009
एक बात समझ में नहीं आती, जब समाचार चैनलों को भाजपा से इतनी नफरत है कि दिन रात पानी पी पी कर उसे कोसने में लगे रहते हैं।
जब ये इतने ही सिद्धान्तवादी हैं और इतने ही शर्म निरपेक्ष धर्म निरपेक्ष हैं तो फिर भाजपा के चुनाव के विज्ञापन भी अपने चैनलों पर क्यों दिखाते हैं।
हम एक तरफ तो आडवाणी जी को कंधार कांड के लिये उन्हें दोषी मानते हैं और फिर विज्ञापनों में उन्हें “लौह पुरुष” बताने से भी गुरेज नहीं करते।
जब ये अपने सिधान्तों पर इतने अटल हैं तो क्यों नहीं इन विज्ञापनों को अपने चैनलों पर रोक लगा देते?
क्या इन कथित साम्प्रदायिक पार्टियों को कोसने का काम भी हम पैसा लेकर ही करते हैं?
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सबसे बड़े मूर्ख तो वे हैं जो ऐसे चैनलों को अपने विज्ञापन देते हैं।
और आखिर में हम (आम आदमी) क्या है?
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Posted by सागर नाहर on 4, April 2009
कई बार कैसे कैसे मजेदार वाकये हो जाते हैं कि वे हमें जिन्दगी भर याद रह जाते हैं। कल ऐसा ही वाकया मेरे साथ हुआ।
कल शाम (2-04-2009) भोपाल रेल्वे स्टेशन पर मैं, मेरी बहन किरन और चाचीजी सिकन्दराबाद आने के लिये ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। भारतीय रेल की परंपरा को कायम रखते हुए संपर्क क्रान्ति एक्सप्रेस मात्र एक घंटे लेट थी।
हम तीनों आपस में बात कर ही रहे थे कि मैने एक आदमी को देखकर एकदम से चाचीजी से कहा देखो डायचन्दजी! (डायचन्द जी हमारे रिश्तेदार हैं) चाचीजी ने देखा वाकई डायचन्दजी आ रहे थे हम बात कर ही रहे थे कि डायचन्दजी पास आये तो पता चला कि वे डायचन्दजी से मिलती जुलती शक्ल वाले कोई और ही इन्सान हैं।
थोड़ी देर बाद किरन बोली देखो शेषगिरी राव! ( शेषगिरी राव मेरे चाचाजी के खास दोस्त हैं) हमने देखा कि शेषगिरी राव आ रहे हैं पर ये भी शेषगिरी राव नहीं थे। हम इस बात पर खुब हंस ही रहे थे कि एक युवक मेरे सामने से अपने दोस्त के साथ बात करते निकले मैने तुरंत उन्हें आवाज दी नितिन जी – नितिनजी, पर नितिनजी ने सुना ही नहीं। चाचीजी और किरन मजाक करने लगे आज सबको मिलती जुलती शक्ल वाले इन्सान कैसे दिख रहे हैं!
मेरा मन नहीं माना मैं उन नितिनजी के पीछे भागा पीछे से ध्यान से देखा वे हल्के से लंगड़ा कर चल रहे थे और कपड़े भी नितिनजी के व्यक्तित्व से मेल खाते नहीं दिख रहे थे, मैने आज तक नितिनजी को ऐसे कपड़े पहले नहीं देखा था, पर फिर भी मन नहीं माना मैं पीछे चलता रहा, अब वे स्टेशन के मेन गेट पर खड़े खड़े अपने दोस्त से बातें करने लगे। मैं एकदम उनके पीछे खड़ा हो गया कि शक्ल से कन्फ्यूजन हो सकता है आवाज से तो नहीं। आवाज से तो पता चल जायेगा कि वे नितिनजी हैं या नहीं।
कुछ देर खड़ा रहा पर स्टेशन के शोरगुल में उनकी आवाज मुझे सुनाई नहीं दी, अब मैं उनके सामने खड़ा हो गया शायद उनकी नजर मुझ पर पड़ जाये तो हो सकता है कि वे अगर नितिनजी ही हों तो मुझे पहचान लेंगे पर उनकी नजर मुझ पर पड़ी ही नहीं और मेरी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि मैं उनसे जाकर पूछ लूं कि आप नितिनजी हैं या कोई और…।
थक कर मैं वापस अपने परिजनों के पास आ गया और चाचीजी ने भी खासा मजाक उड़ाया पर मेरा मन नहीं मान रहा था मैने कहा इस बात का पता कल लगाना ही पड़ेगा।
आज नितिनजी ओनलाईन दिखे, देखिये हम दोनों के बीच क्या बात हुई
4:21 PM me: नितिनजी, नमस्कार।
क्या आप कल भोपाल रेल्वे स्टेशन पर थे?
4:22 PM Nitin: jee haa
namaste maalik
kyo? aap bhi the?
4:23 PM me: हाँ, मैने आपको देखा भी, आवाज भी दी पर आपने सुना नहीं, तो आपका पीछा भी किया, आपके पीछे कई देर खड़ा रहा
आप किसी दोस्त के साथ थे
मेरी ट्रेन १ घंटे देर से थी
4:25 PM Nitin: arrre?
Sampark Kranti se aaye ho kya?
usi train me tha mai bhi
me: हाँ
देखा आपने जिन्हें मैं नितिनजी समझ रहा था वे नितिनजी ही थे। कैसा अजब संयोग था। आगे की बातचीत फोन पर हुई तब पता चला कि वे उसी ट्रेन के S2 कोच में थे और मैं S1 में|
ऐसा कोई वाकया कभी आपके साथ भी हुआ है?
नितिन बागला जी हिन्दी के जाने माने ब्लॉगर हैं।
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Posted by सागर नाहर on 27, February 2009
पिछले महीने ही हमने एक पोस्ट लिखी थी अरे, सब लोग हमें बधाई दो रे! तभी हमने आपसे कहा था कि आपको जल्दी ही एक और खुशखबरी सुनायेंगे। हाँ तो खुशखबरी हम सबके प्रिय यूनुस भाई के घर में आज सुबह आ चुकी है।
रेडियो सखी के नाम से जानी मानी, विविध भारती की अनाऊंसर और बतकही नामक ब्लॉग की लेखिका ममता जी और रेडियो के अलावा लेखन और ब्लॉगिंग का जाना माना नाम यूनुस खान दम्पति के यहाँ आज सुबह (26 फरवरी को ) ही पुत्र ने जन्म लिया है।
बच्चे का फिलहाल फोटो उपलब्ध नहीं है, उपलब्ध होते ही पोस्ट किया जायेगा।
यह लिजिये ये है जूनियर यूनुस जी!

मेरी तथा हिन्दी चिट्ठा जगत की ओर से ममता सिंह-यूनुस खान जी एवं उनके पूरे परिवार को ढ़ेरों बधाईयाँ।
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Posted by सागर नाहर on 5, February 2009
सर्दी आई नहीं कि अपने घर से दूर रह रहे सभी लोग सर्दी, गाँव और घर को याद कर बुरी तरह नोस्टेलजिया रहे है। कोई तहरी खिला रहा है तो कोई खा रहा है। सब अपने बचपन में तापी धूप- अलाव, गुड़ मूंगफली, गज़क,कुतरी हुई गाजर- मूली को याद कर नोस्टेलजिया रहे हैं; इधर हैदराबाद में हमारा यह हाल है कि सर्दी के लिये बरसों से तरस रहे हैं। क्यों? पता है हैदराबाद में ढंग से सर्दी पड़ना शुरु भी नहीं हुई कि तेज गर्मी पड़ने लगी है, दिन में तापमान अभी से 30 डिग्री के आसपास तो कभी-कभार उसके भी ऊपर जाने लगा है
दीपावली के दो दिन पहले जब बच्चों के लिये पटाखे खरीदने गये थे तब जरा सी सर्दी का अहसास हुआ था, और हमने अपने स्कूटर को और तेज चला कर उस ठंडी हवा- सर्दी के अहसास को अपने तन मन में समाने दिया। वो दिन और आज का दिन, ना तो ढंग से रजाई में लिपटकर सोने का आनंद ले सके ना ही गरम पानी से नहाने का। स्वेटर में अपने तन को घुसाये बरसों बीत गये।
बचपने में, गाँव में शाम हुई नहीं कि अलाव जलाकर तापने के लिये घर से बहाना बना कर निकल जाते और देर तक (साढ़े आठ बजे तक!!!) तापते रहते, अलाव में तापना इतना आसान नहीं था, पहले उसके लिये जलाऊ सामान जिसे हम “बाळ बुक्की” कहते थे वह ला कर पहले से जल रहे अलाव में डालना पड़ता था या अलाव जलाने वाले को बाळ बुक्की की रिश्वत देनी होती थी तब जाकर अलाव के सामने तापना मिलता था। बाळ बुक्की के रूप में रद्दी अखबार लाने वाले को ज्यादा देर तापने नहीं दिया जाता, क्यों कि वह तो बड़े जल्दी जल जाते थे, जब कि लकड़ी के टुकड़े , गत्ते- पुट्ठे और इस तरह की देर तक जलने वाली चीजें लाने वालों को ज्यादा सम्मान मिलता और अलाव बुझने तक अंगारे तापने तक का मौका मिलता।
तापने के अलावा सर्दी में खाने के लिये गर्मागर्म गुड़ की राब, राबोड़ी की राब, कुळत-चावल जिसमें नमक की जगह “ऊस” (ओस) डाला जाता है, और हाँ सबसे खास उड़द की दाल, बादाम, गोंद और ना जाने कितनी चीजों से बने लड्डू ( उड़दिया) और मेथी के लड्डू को कैसे भूल सकते हैं। यह चीजें तो सिर्फ सर्दी में ही खाई जाती है। उसके बाद फिर मकर सक्रान्ति के दिन “गेहूं का दूधिया खीच” उसके जैसी कई तरह की चीजें खाने मिलती। अब तो इन चीजों को खाना तो दूर देखे बरसों बीत गये।
ऐसा भी नहीं कि श्रीमतीजी को ये चीजें बनानी नहीं आती होगी, गाजर का हल्वा और कुछ चीजें तो बनाती है पर पारम्परिक चीजें इल्लै….. हाँ उड़द मोगर (बिना छिलके वाली दाल) के लड्डू तो आज भी बनते हैं पर माँ के हाथ का स्वाद… आहा!
देखिये इन चीजों को याद करते करते मुंह में पानी आने लगा है। कहीं मैं भी नोस्टेलजिया तो नहीं रहा?
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Posted by सागर नाहर on 25, January 2009
यह शीर्षक कहीं पढ़ा- पढ़ा सा लगता है ना!
आज से दो साल पहले जिन मित्रों ने चिट्ठा लिखना शुरु कर दिया था वे सब अपने दिमाग पर जोर देंगे तो याद आ जायेगा कि ये शब्द कहां पढ़े थे।
नहीं याद आया ना! चलिये मैं ही बता देता हूं यह पोस्ट हम सबकी प्रिय निधि श्रीवास्तव ने लिखी थी। एक जमाने की मशहूर चिट्ठाकारा और मेरी बहन निधि श्रीवास्तव पहले खूब लिखती थी और क्या खूब लिखती थी!
फिर अचानक अमितजी की तबियत खराब हो गई और निधि अपने घर- परिवार की देखभाल में व्यस्त हो गई सो चिट्ठा लिखना छूट सा गया; हां बीच बीच में एकाद पोस्ट से अपनी स्थिती से अवगत कराती रही।
निधि ने अपनी इस पोस्ट में ये पंक्तियाँ लिखी थी -
इस बीच अपने चिटठे पर की गयी टिप्पणियों को देखने की भी फुर्सत नहीं मिली । हम अपने नये खिलौने के साथ इतना व्यस्त थे कि आभास ही नही हुआ कब तीन दिन ग़ुज़र गये। इससे पहले कि अटकलों का दौर शुरू हो, हम ही बताये देते हैं कि खबर क्या है ।
उस समय तो पाठकों ने इन लाईनों और शीर्षक को पढ़ कर पता नहीं क्या क्या अटकलें लगाई थी,
पर इस बार यह अटकल नहीं है, यानि निधि और अमितजी के यहां 7 जनवरी 2009 को पुत्ररत्न का जन्म हुआ है।

कबीर श्रीवास्तव
शिशु का नाम पहले “कबीर” रखा जाना था बाद में शायद “अद्यन्त’ निश्चय हुआ। फिलहाल नामकरण हुआ नहीं है सो हम कबीर ही मान लेते हैं।
हिन्दी चिट्ठाजगत तथा मेरी ओर से से निधि-अमित जी को यह शुभ समाचार सुनाने के लिये ढ़ेरों बधाईयाँ एवं कबीर को स्नेह-आशीर्वाद।
पहले इस पोस्ट को
अक्षरग्राम पर लिखी थी पर किसी कारणवश दो दिन से अक्षरग्राम खुल नहीं रही सो इसे यहां पोस्ट की है।
और हाँ बहुत जल्दी एक और शुभ समाचार सुनने के लिये तैयार रहिये….

ना, ना! अभी नहीं बतायेंगे कि वो कौन सुनाने वाला है।
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Posted by सागर नाहर on 22, January 2009
आप चौंक गये ना शीर्षक पढ़ कर!
मैं अपना कॉफे रात को दस- सवा दस बजे बन्द कर घर जाता हूं तब तक श्रीमतीजी का लगभग सारा काम निबट चुका होता है या फिर कभी किसी कारण से नहीं भी निबटा तो काम के साथ साथ टीवी देखना भी चालू रहता है, और ना चाहते हुए भी टीवी सीरीयल्स का डोज लेना पड़ता है।
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पहले कहानी घर-घर की उसके बाद क्यूं कि… उसके बाद कभी कभार मुझे समाचार देखने का मौका मिलता पर अक्सर होता ये कि 11 बजे अधिकतर चैनल और उनके रिपोर्टर अजीब से स्वर में (चैन से सोना है तो..) क्राईम समाचार पढ़ रहे होते। अंत में डिस्कवरी चैनल पर कुछ देखा ना देखा और नींद आ जाती।
सास बहू ब्रांड की चमक फीकी होने लगी तभी एन डी टी वी के इमैजिन चैनल का जन्म हुआ और अब जस्सू बेन… और फिर मैं तेरी परछाई हूं, देखने पड़ते। ये अलग बात है कि धारावाहिक स्टार के धारावाहिकों से लाख दर्जे बेहतर थे, पर धीरे धीरे जस्सू बेन भी बोर करने लगी और मैं तेरी परछाई… का समय बदल गया, तो कुछ देर (साढ़े दस से ग्यारह) तक समाचार या अपना कोई पसंदीदा चैनल/कार्यक्रम देखने का मौका मिल जाता, क्यों कि अब 11 बजे बालिका वधू “आनंदी” और साढ़े ग्यारह बजे उतरन की “इच्छकी” इंतजार कर रही होती।
ये दो धारावाहिक दूसरे धारावाहिकों की वनिस्पत अच्छे लगते हैं, “आनंदी” ,”इच्छकी” और “तपस्या” का अभिनय बड़े बड़ों को दांतो तले उंगली दबवा देता है, परन्तु ग्यारह बजे के बाद इन्हें देख पाना मुश्किल है, कई बार तो देखते देखते नींद आ जाती है।
पिछले हफ्ते इमैजिन चैनल ने खुश कर दिया कि अब जस्सू बेन…. शुक्र,शनि- रवि को आया करेगी। हाश!!!! यानि सोमवार से लेकर गुरुवार तक दस से ग्यारह बजे तक कोई ऐसा धारावाहिक किसी भी चैनल पर नहीं बचा जिसे जबरन देखना पड़ेगा। अब टी वी से वास्तव में मुक्ति मिलेगी, रेडियो विविध भारती पर गाने भी सुने जा सकेंगे, पुस्तकें जिन्हे कई दिनों से पढ़ने का समय नहीं मिल रहा था, उसके लिये एक घंटा मिल सकेगा।
अब बताईये टीवी चैनल्स को धन्यवाद कहना सही है कि नहीं?
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Posted by सागर नाहर on 16, January 2009
क्रिसमस की आठ दस दिन की छुट्टियां और उससे पहले दशहरे- दीवाली की छुट्टियों में दोपहर को हर्षवर्धन और चैतन्य नाहर दोपहर अक्सर गेम खेलने आते रहते थे। गेम खेलते खेलते पता नहीं कब मेल का एकाउंट खोलना सीख गया। उसे घर में अपनी मम्मी को कहते सुना मम्मी आज मैने याहू में अपना एकाउंट बनाया, आज मैने जीमेल में अपना एकाउंट बनाया।
मैं देख रहा था कई दिनों से वह गेम खेलने के बजाय विकीपीडिया आदि पर ज्यादा ध्यान दे रहा है, सो मैने उसे रोका भी नहीं। आज शाम ग्राहकी ज्यादा नहीं थी सो मैने उसे बिठाया और खाना खाने चला गया। खाना खाकर आया तब अचानक कम्प्यूटर के मॉनिटर पर नजर पड़ी तो वहां ब्लॉगर का डेशबोर्ड दिखाई दिया। मेने सोचा कहीं मैं गलती से जीमेल साइन आऊट किये बिना तो घर नहीं चला गया और तुक्के से कहीं उसने ब्लॉगर खोला हो तो मेरा डेशबोर्ड खुल गया हो।
जैसे ही उसने मुझे देखा धड़ाधड़ विन्डो बन्द करने लगा, मैने सोचा कहीं अन्जाने में गलत साईट तो नहीं खोल ली जिसे मुझसे छुपाने के लिये फटाफट उन्हें बन्द कर रहा है, मैने झट से उसका हाथ पकड़ लिया जिससे वह सारी विन्डो बन्द ना कर सके। जब मैने एक एक साईट को देखा तो आश्चर्य चकित रह गया, क्यों कि एक तो जीमेल खुला हुआ था, दूसरा हर्षनाहर-स्टेर्न्थस के नाम से एक ब्लॉग और तीसरा उसका डेशबोर्ड!!!! उसके ब्लॉग वाले पेज पर पोस्ट में बस एक ही लाइन लिखी थी
maine apna blog abhi abhi banaya hai
यानि भाई साहब अपना ब्लॉग बना चुके थे! मैने आज तक उसे ब्लॉग बनाना नहीं सिखाया, मेल खोलना नहीं सिखाया ( अभी दस साल जो पूरे किये हैं) और महाशय ब्लॉग बनाना सीख गये। कहां मैं अब ब्लॉगिंग के मामले में उदासीन होता जा रहा हूँ तो नया ब्लॉगर तैयार हो रहा है।
किसी ने सच ही कहा है “पूत के पाँव पालने में ही” नजर आने लगते हैं।
आज अजीब सी खुशी का अहसास हो रहा है, ऐसी खुशी दूसरी बार मिल रही है, पहली बार तो जब तब पापाजी ने गाँव से फोन कर मुझे बताया कि आज गूगल पर कुछ सर्च करते समय तरुण को( उनके सहायक) मेरा ब्लॉग दिखा और वह होली वाली पोस्ट पढ़ कर भावुक हो गये। पापाजी ने कहा नियमित लिखा करो जिससे लेखनी सुधर जायेगी।
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Posted by सागर नाहर on 2, December 2008
देर सवेर ही सही पर चैनल आज तक को अक्ल आई और उसने कल (1.12.2008) को सुबह अपने विशेष कार्यक्रम में मुंबई आतंककांड में हुई दस गलतियों में इलेक्ट्रोनिक मीडिया को जरूरत से ज्यादा छूट देने को भी माना/ शामिल किया।
कहीं ऐसा तो नहीं कि आज तक के कैमरामैन सीधा प्रसारण करने में सही जगह ले पाने में नाकाम रह गये थे, और खुद प्रसारण नहीं कर पाये तो दूसरों के सर ठीकरा फोड़ दिया?
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Posted by सागर नाहर on 28, November 2008
कल स्कूल से चैतन्य को लिवाने गया तो पता चला किसी बच्चे ने उसे पीट दिया है। छोटे बच्चों की लड़ाई में जब कारण का पता चलता है तो हमारे पास मुस्कुराने के अलावा कुछ नहीं होता है। पर रास्ते भर चैतन्य मुट्ठियाँ भींचता रहा और गुस्से में कुछ बुदबुदाता रहा। जब घर पहुंचे तो उसने अपनी मम्मी से कहा “उस लड़के को तो मैं छोड़ूंगा नहीं, आप देख लेना मम्मी! मुझे बरबस हंसी आ गई मैने चैतन्य से कहा जब आपको उस लड़के ने पीटा तब क्यों छोड़ दिया था?
आजकल हमारा भी यही हाल है, हर कोई आकर हमें मारकर चला जाता है, कभी बम से कभी बंदूक से तो कभी किसी और तरीके से। हमारे पास चैतन्य की तरह मुट्ठियाँ भींचने के अलावा कुछ भी नहीं होता।
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परसों दोपहर अचानक ही सिकन्दराबाद स्टेशन सिलसिलेवार बम धमाके हुए और एकदम अफरातफरी मच गई, फटाफट अग्निशमन दल, पुलिस और संबधित विभाग हरकत में आ गये, खून से लथपथ घायलों को एम्बुलेंस में लाद कर अस्पताल पहुंचाया गया। कुछ देर बाद पता चला कि यह सब राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन द्वारा जनता को जागरूक किये जाने के लिए ने एक अभ्यास “मॉक ड्रिल” था।

पर जब हमारे पहचान वालों तेलुग समाचार चैनलों पर इस कार्यवाही को देखा, पूरा समाचार जाने बिना परेशान हो गये। इधर उधर दौड़ मचा दी, सभी पहचान वालों को फोन कर दिया कि सिकन्दराबाद स्टेशन पर बम फटे हैं कोई उधर ना जाये।
रात को घर पहुंच कर जैसे ही समाचार चैनल लगाये फिर उसी तरह के समाचार देखकर एकदम यूं लगा मानों मुंबई में भी मॉक ड्रिल ही है पर अफसोस यह मॉक ड्रिल नहीं था।
मुंबई में हुए आतंकवादी हमले में मारे गये सभी नागरिकों और शहीद हुए सभी बहादुरों को हार्दिक श्रद्धान्जली। देश हर बार की तरह एक बार फिर उनकी शहादत को भुला देगा और उनकी शहादत को यूं ही जाया होने देगा, और आतंकवादी एक बार फिर निर्दोष लोगों को मारेंगे, फिर कोई मोहन चंद शर्मा, हेमंत करकरे, विजय सालस्कर और अशोक काम्टे अपनी देशभक्ति के जोश में देश पर शहीद हो जायेंगे और नामर्द नेता एक बार फिर बकवास करेंगे ” हम किसी को छोड़ेंगे नहीं। जिन्हें पकड़ चुके हैं उन्हें फांसी पर लटकाने में आनाकानी करेंगे। एक बार फिर गृहमंत्री अपने सूट बदल बदल कर आयेंगे और चैनलों परपनी सफाई पेश करेंगे।
टीवी चैनल इस बीच फिर नाग, भूत- भूतनी और एलियन को गाय का दूध पिलाने बैठ जायेंगे।
….और हम क्या करेंगे? एक बार फिर चैतन्य की तरह मुट्ठियाँ भींचते हुए अगली पोस्ट लिखने बैठ जायेंगे। हद है बेबसी की भी।
फोटो हिन्दी मिलाप से साभार
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