॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

Archive for the 'हास्य व्यंग्य' Category


मेरा घोषणा पत्र

Posted by सागर नाहर on 23, December 2006

मित्रों
चुनाव आते ही चिठ्ठा जगत में इस सर्दी में भी सरगर्मी छा गयी है, सारे भूले बिसरे और जिन्होने अपनी दुकान मुहर्त के बाद खोली ही नहीं या कभी कभार खोली सब के सब मैदान में आ जुटे हैं, तो हम पीछे क्यों रहें हम भी अपने चिठ्ठे पर कई दिनों से जमी धूल को साफ़ कर मैदान में आ रहा हूँ, सारे उम्मीदवार सावधान हों जायें, इस वर्ष के स्वघोषित सर्वश्रेष्ठ हिन्दी चिठ्ठाकार की सवारी आ रही है।
सब लोगों ने अपने अपने चुनावी घोषणा पत्र तैयार कर लिये और अपने अपने चिठ्ठे पर प्रकाशित भी कर दिये तो भाई हम पीछे कैसे रहते, हम भी अपना घोषणा पत्र तैयार कर दिया हूँ। सारे लोगों ने अपने अपने घोषणा पत्र में अपने बारे में बड़ी बड़ी घोषणायें करी है कि ये करेंगे, वो करेंगे पर हम ऐसी वैसी कोई घोषणा नहीं कर रहे हैं। पहले आप इस उम्मीदवार के बारे में पूर्ण जानकारी ले लेवें।

  • एक भारतीय नेता में जो गुण होने चाहिये वे सारे के सारे गुण मुझमें है, मसलन दलबदलू हूँ, एक ठेठ देसी नेता की तरह जनता को कभी कभार ही दर्शन नेता हूँ, देता कुछ भी नहीं (टिप्पणी) पर पाने (टिप्पणी) की उम्मीद बहुत करता हूँ।
  • एक शातिर भारतीय नेता की तरह फ़ूट डालो और राज करो की नीती पर अमल करता रहता हूँ, लगातार चर्चा में रहने के लिये कुछ ना कुछ खुराफ़ात करता रहता हूँ। आज के जमाने में एक नेता को बिल्कुल ऐसा ही होना चाहिये, बाकी जिस तरह अटल जी जैसे कवि ह्रदय के लिये राजनीती उचित नहीं थी सो आज के सीधे सादे और गुरू और चेले जैसे नेताओं का राजनीती में क्या काम?
  • जनता को काम के जुगाड़ भी कभी कभार दे देता रहता हूँ।
  • सबसे खास बात यह है कि जज मण्डली में भी अपनी बहुत (जैक) पहूँच है।

और भी कई विशेषतायें मुझमें है जो आप अच्छी तरह जानते हैं। मैं खुद अपने मुँह से अपना बखान करूं ठीक नहीं लगता।

अब लीजिये पेश में है मेरा घोषणा पत्र:

  1. में एक भारतीय नेता की तरह चुनाव जीतने के बाद कभी कभार ही दर्शन दूंगा, यानि कभी कभार ही चिठ्ठा लिखूंगा, (धर्मेन्द जी को में आदर्श मानकर ये घोषणा पत्र तैयार कर रहा हूँ)और इसकी तैयारी मैने कुछ महीनों से शुरू भी कर दी है।
  2. मैने एक ऐसा सोफ़्टवेयर तैयार कर लिया है जो उन चिठ्ठाकारों के चिठ्ठों पर एक से ज्यादा नाम से औटोमैटिक पाँच पाँच टिप्पणियाँ कर देगा, मुझे वोट देंगे उनके लिये भले ही उन लोगों ने कुछ नया लिखा हो या नहीं। टिप्पनीयाँ कब-कब होगी ये चुनाव जीतने के बाद बताया जायेगा।
  3. हिन्दी चिठ्ठा जगत में भी गुटबाजी शुरू करवा दूंगा। मेरे चुनाव जीतने के बाद लोगों को एक दूसरे के चिठ्ठे पर असभ्य टिप्पनीयाँ करने की छूट होगी, विरोध करने वाले चिठ्ठाकार को कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी।
  4. एक दूसरे पर व्यक्तिगत आरोप लगाने और किसी को नीचा दिखाने की छूट होगी, किसी तरह का कोई प्रतिबंध स्वीकार नहीं किया जायेगा।
  5. जितने वादे कर रहा हूँ उनको पूरा कभी नहीं करूंगा, कि यही एक आदर्श नेता का गुण है।

अब ऐसे महान और योग्य उम्मीदवार के होते हुए आप योग्य उम्मीदवार की तलाश में उनके पुराने चिठ्ठे ना खंगालें , अपना समय ना बर्बाद करें। मुझे मेरे चुनाव चिन्ह “॥ दस्तक॥” को नोमिनेट कर अपने पवित्र और कीमती मत को सार्थक करें। मेरे इस घोषणा पत्र के बावजूद भी मुझे इस वर्ष का श्रेष्ठ चिठ्ठाकार घोषित नहीं किया गया तो मैं अपने पूर्ण होशो हवास में घोषणा करता हूँ कि मैं सन्यास ले लूंगा ( भाई चिठ्ठा कारी से ही, आप कुछ और समझे थे क्या?)
अब नारा वाराभी लगाओगे या यह काम भी उस ठाकुर की तरह मुझे ही करना होगा? :)

( इस घोषणा पत्र से कोई आहत ना हों, लेख के सबसे नीचे लगे स्माईली :) पर ध्यान देकर अन्यथा ना लें :)

यह लेख सिर्फ़ हँसी- मजाक या विनोद के लिये लिखा गया है, मुझसे कई धुरंधर इस मैदान में है।

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सागर को हँसाना है

Posted by सागर नाहर on 13, December 2006

आजकल गिरिराज जी को एक नया शौक चढ़ा है, सागर भाई को हँसाने का। दरअसल हुआ यूँ कि जब भी मैं गूगल पर लोग इन करता सबसे पहले कविराज का संदेश मिलता कि इस लिंक पर मेरी नयी रचना पढ़ो और टिप्पणी दो। “महाराज पहले क्या कम सजा थी कि कविता पढ़ो जो उपर से टिप्पणी करने की दुहरी सजा दे रहे हो”|

एक दिन हमारे मुँह से निकल ही गया कि भाई हमसे यह कविता पढ़ी सुनी नहीं जाती कुछ हँसने हँसाने की बात करो यार! तो मजा आये।

हमारी इस बात पर तो गिरीराज जी के सर पर धुन सवार हो ही गयी कि वे हमें हँसा कर ही छोड़ेंगे, और इसके सबसे पहले उन्होने हमारे नये और बहुत ही होनहार चिठ्ठाकार भुवनेश जी को पकड़ा कि हमे (सागर को) हँसाये वे बेचारे कहते ही रहे कि “क्या आप कोई मसखरे हैं क्या -जो दूसरों को हंसाने का ठेका लें,” पर कविराज भी ठहरे असली राजस्थानी, चिपक गये और भुवनेश जी से लिखवा कर ही छोड़ा, उससे पहले आपने महान काम यह किया कि भुवनेश जी से आपकी जो बातचीत हुई उसको ही चिठ्ठे पर डाल दिया और हमें हँसाने का प्रयास किया, फ़िर पकड़ा प्रतीक भाई को कि एक लेख लिखो या दस कविता पढ़ कर टिप्पणी दो, बेचारे प्रतीक भाई दस कविता से बचने के चक्कर में अमरीका से लेकर कुवैत और दिल्ली से लेकर कानपुर तक चक्कर लगा लिये और एक लेख लिख दिया।

सुना है कविराज जी ने संजय भाई और अनूप शुक्ला जी को भी पटाया पर दाल गली नहीं।
अब कल हमे ही पकड लिया कि आप भी लिखो अब हमें यह समझ में नहीं आया कि कि हम अपने हँसने के लिये लेख कैसे लिखें तो गिरीराजजी का कहना था कि आप हँसने के लिये क्या करते हैं,उन्हीं नुस्खों को लिख दो।
भाई हम तो यह करते हैं कि निर्मला जी (भाई वे हमारी धर्मपत्नी है) को कहते हैं कि जरा हमारी कमर, बगल और तलुए में गुदगुदी करो हम हँसना चाहते हैं। निर्मला जी भी कम नहीं जब ही हँसाने की बात करता हूँ हमारी शादी का फ़ोटो थमा देती है जिनमें वे चालीस किलो की पतली सी दिखती हैं (अभी वजन कितना है मत पूछियेगा वरना हँसने के चक्कर में कहीं)………..पिटवा बैठोगे यार, आप लोग हमसे जबरदस्ती सब उगलवा कर हमारी हँसी को बन्द करवाने के चक्कर में हो ।
सुरत में मेरे एक सहयोगी थे जगदीश चौधरी हँसने -हँसाने के बादशाह हैं, दिन भर किसी ना मौका ढूँढ़ते रहते किसी ना किसी को बेवकूफ़ बना कर लोगों को हँसाते रहते थे, जब जगदीश मेरे नये नये सहयोगी बने थे मैने उन्हें एक दिन उन्हें चालान दिया और कहा कि ओनिडा का २१” का एक टीवी निकाल कर ले आओ जब वे टीवी लेकर आ रहे थे तो उन्होने टीवी के कार्टुन को उल्टा पकड़ा था, मैने उन्हें कहा

“जगदीश आपने यह क्या किया इस तरह कार्टून पकड़ने से तो टीवी की पिक्चर ट्युब के सारे रंग मिक्स हो जायेंगे “,

मेरे कहने का ढ़ंग कुछ ऐसा था कि बेचारे बुरी तरह डर गये और कहने लगे “आप बॉस से कुछ मत कहना मैं आगे से ध्यान रखूंगा।”
कुछ महीनों बाद जब जगदीश भाई को मेरी इस मजाक का सत्य पता चल गया तो उन्होनें अपनी आदत के अनुसार इसी तरह से किसी को बकरा बनाने की ठान ली, एक दिन एक नया नया टेम्पो वाला आया और बिल्कुल उसी तरह टीवी के कार्टून को पकड़ा जैसे कभी जगदीश ने पकड़ा था, और जगदीश ने देख लिया तो फ़ट से उस टेम्पो वाले को डराया” तुमने यह टीवी खराब कर दिया है मैं बॉस को कह दूंगा,” बेचारा टेंपो वाला जगदीश के सामने गिड़गिड़ाने लगा तो जगदीश ने उससे कहा चल एक ठंडा पिला दे बेचारा टेम्पो वाला क्या करता डेढ़ लीटर की ठंडे की बोटल ले कर आया तो पूरी की पूरी बोतल जगदीश ने साफ़ कर दी एक घूंट भी उस बेचारे को नहीं पिलाई। जगदीश ने इतनी उल्टी सीधी हरकतें हरकतें की है कि उन्हें कभी आपको बतायेंगे तो आप भी हँसे बिना नही रह सकेंगे।

आज भी जब जगदीश की वे हरकतें याद आती है तो अकेले में हँसी आ जाती है और देखने वाला यह सोचता होगा कि सागर का दिमाग सटक गया लगता है।
आखिरकार जब हमारी जिन्दगी में दुखों तकलीफ़ों की कोई कमी नहीं है, तो फ़िर क्यों हम कविताओं में दुख की विरह की बातें करें, हमारे एक वरिष्ठ चिठ्ठ्कार का कहना है कि “कल्पित माशूका के चक्कर में टेसुये बहाना फालतू का काम है।” उनकी इस बात से में सहमत हूँ।

आज भी कला फ़िल्मों के कम सफ़ल होने का शायद यही कारण है कि कला फ़िल्मों के निर्देशक सच दिखाना चाहते हैं जो कोई देखना नहीं चाहते, कारण? कारण वही है कि क्यों हम फ़िल्में देख कर दुखी होवें, टेसुए बहायें। कादर खान और शक्ति कपूर की द्वि-अर्थी संवाद वाली बी ग्रेड की फ़िल्में तथा मिथुन चक्रवर्ती की फ़िल्में भले ही सफ़ल ना होती/ हुई हों पर सामान्य वर्ग को वे फ़िल्में बहुत भाती है क्यों कि बेचारे दिन भर मजदूरी कर, पसीना बहा कर घर आते हैं तब वे अपनी थकान इन हास्य फ़िल्मों से उतार लेते हैं. अगर ऐसे थके मजदूर को रोती फ़िल्में दिखायी जाये तो निश्चित ही वह पसंद नहीं करेगा।
बात कविता की चल रही थी और फ़िल्मों तक जा पहुँची, मेरा हाल भी उस मजदूर से कम नहीं है जो दिन भर की थकान हास्य- व्यंग लेखों में उतार लेता है, हाँ में रोती बिसूरती और हवा हवाई कवितायें जिनमें प्रेमिका की जुल्फ़ों, उसके रूप रंग, विरह- वेदना आदि का वर्णन होता हो या “पर उपदेश कुशल बहुतेरे ” की तरह की उपदेश देती कविताओं को पसन्द नहीं करता, हाँ हास्य- व्यंग पर लिखी कवितायें पसन्द है। जिसमें जिन्दगी की सच्चाई का वर्णन होता हो।

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टिप्पणी

Posted by सागर नाहर on 31, October 2006

संजयभाई की इस पोस्ट  पर जब टिप्पणी करने लगा तो बहुत लम्बी होने लगी सो उसे चिठ्ठे के रूप में यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ।

सबसे पहली बात कि मुझे टिप्पणी ना मिलने से कोई शिकायत नहीं है, मैने तो यूं ही मजाकिया लहजे में समीर लाल जी से शिकायत की कि आपने मेरे चिठ्ठे की चर्चा नहीं कि इसलिये उसे मात्र दो ही टिप्पणीयाँ मिली! :) ( वैसे यह बात आपको कैसे पता चली?
दूसरी बात यह है कि मुझे कई बार बहुत लेख अच्छे लगते हैं  जैसे सृजन शिल्पी जी , सुनील जी और उन्मुक्त जी पर टिप्पणी क्या दी जाय यह समझ में नहीं आता, क्यों कि इनके लेखों पर खाली वाह वाह नहीं की जा सकती।
सुनील जी के बहुत सारे लेखॊं पर मैने टिप्पणी नहीं की पर उन्होने जब एक बंगाली फ़िल्म की समीक्षा की जो मुझे बहुत अच्छी लगी  तो टिप्पणी की।
खाली वाह वाह करना मेरी फ़ितरत नहीं अगर लेख अच्छा लगता है तो टिप्प्णी कर देता हूँ वरना जै राम जी की ! जैसे मैने निधि जी के गूगल वाले लेख पर टिप्पणी नहीं की।
आलोचना के लिये मैं हमेशा तैयार हूँ पर कोई करे तब ना :) ताकि मुझे मेरी गल्तियाँ सही करने का मौका मिले।

( कहीं मैं महान लेखक तो नहीं हो गया जिसकी कोई आलोचना नहीं करता? :) )
इस लेख की प्रेरणा भी संजय भाई की उसी पोस्ट से मिली कि

“जब और कुछ न मिले तो टिप्पणी पर लिख कर टिप्पणियाँ बटोर लो”

धन्यवाद संजयभाई एक नया विषय सुझाने के लिये।

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सुरत से वापसी

Posted by सागर नाहर on 9, October 2006

निशा के निधन के बाद सुरत की चार दिन की यात्रा के बाद कल यानि 8-10-2006  को सुरत से वापसी हो ही गई! सुरत जाने के लिये मन बड़ा उत्साहित था पर निशा के निधन के बाद  सुरत जाना बड़ा मुश्किल लग रहा था कि कैसे निशा के पापा मम्मी से मिलना होगा, भगवान  कभी दुश्मन को भी ऐसा दुख:  ना दे।
पहली बार हिन्दी के उपयोग से तकलीफ़ हुई, दोष हिन्दी का नहीं हमारा ही था, हुआ यूँ कि सुरत से सिकदराबाद का टिकट जब मैने लिया तो उसमें RCA 28, 29, 30 था; 7.10.2006  को सुबह रेल्वे पूछताछ कार्यालय में टेलीफ़ोन पर पूछा, और उससे पहले भाषा चयन करने के समय हिन्दी पसंद कर ली। जब सामने से बताया गया कि आपके टिकट का कोच नं है एस एक  और सीट नं है 27,29,30 मैने गलती से एस एक को एस एट  सुन लिया और गाड़ी के आते ही आराम से  S8 में अपनी सीट पर जाकर पसर गये। दो टी टी ने टिकट भी देखा और कुछ नहीं कहा,रात्रि लगभग 8 बजे  पूना स्टेशन पर दूसरे यात्री आये और हमसे उठने को कहा, जब उनका टिकट देखा तो वाकई वह सीट उन्ही की थी, जा कर टी टी को पकड़ा उन्होने चार्ट देखा तो मुझसे कहा यह सीट आपकी नहीं है आपकी सीट तो एस वन में है। सुनते ही मेरे होश उड़ गये क्यों कि रेल्वे के नियम के मुताबिक दो स्टेशन तक यात्री अपनी सीट पर नहीं पाया जाता तो उसका आरक्षण रद्द हो जाता है, और गाड़ी रवाना होने के लगभग ६ घंटे और पाँच छ: स्टेशन निकल चुके थे खैर….. भाग कर जाकर एस वन के टी टी को पकड़ा तो पता चला कि अभी तक उन्होने किसी को सीट दी नहीं थी। सारा सामान और परिवार को लेकर एस एक में आये और बुद्धु कहलाये सो बोनस में…..।

सुरत यात्रा के दौरान हिन्दी के नये चिट्ठाकार श्री अफ़लातून जी से फ़ोन पर “ब्लॉगर मीट” भी हुई। श्री अफ़लातून जी, गुजराती के सुप्रसिद्ध  और साहित्य अकादमी के पुरुस्कृत साहित्यकार श्री नारायण जी देसाई के सुपुत्र है, पर बोलने के लहजे में कहीं भी गुजराती नहीं सुनाई दी तो उन्होने बताया कि वे बचपन से ही बनारस में रहे हैं सो वे ज्यादा अच्छी गुजराती बोल नहीं सकते पर पढ़ लेते हैं। बातों बातों में पता चला कि अफ़लातून जी अपने फ़ुरसतिया जी उर्फ़ अनूप शुक्ला जी के सहपाठी रह चुके है, और आजकल मलयालम लेखकों को चिट्ठाकारी सिखा रहे हैं।

सुरत में बाढ़ आए २ महीने भी नहीं हुए पर सुरत की साफ़- सफ़ाई  को देख कर लगता ही नहीं की सुरत में कभी इतनी भयंकर बाढ़ आई होगी। शरद पूर्णिमा के दूसरे दिन एक त्यौहार मनाया जाता है जिसे चंदवी पड़वो कहा जाता है। इस त्यौहार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस दिन सुरत में एक मिठाई बनती है जिसे घारी कहा जाता है, करोड़ो रुपये की खाई जाती है, गरीब से गरीब सुरती भी कम से कम १ किलो तो खरीदकर खाता ही है, घारी का भाव २००/- प्रति किलो होता है और मिठाई का एक नंग कम से कम १०० ग्राम का होता है। सुरत बाढ़ के नुकसान को देखते हुए लग रहा था कि इस बार मिठाई की खपत कम होगी पर वाह रे सुरत की जनता , सारा गम/ नुकसान भुल कर  घारी खाने दौड़ पड़ी।

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रूठी-रूठी सजनी मनाऊं कैसे…?

Posted by सागर नाहर on 30, September 2006

पत्नी को कैसे खुश रखें इस विषय पर अनेक लेख पढ़ने के बाद हमें पता चला कि जिस तरह पति के दिल का रास्ता उनके पेट से हो कर जाता है, उसी तरह पत्नी के दिल में जाने का रास्ता रसोईघर से हो कर जाता है। यानि आप कुछ पकवान बना कर उन्हें खिलायें तो फ़िर सजनी रूठी रह ही नहीं सकती; और यही अगर यह काम उन्हें सरप्राईज के तौर पर कर चौंका दिया जाये तो रूठी सजनी के मान जाने के १०० प्रतिशत चांस है। तो साहब हम भी एक दिन किसी बात पर पत्नी के साथ मनमुटाव हो जाने पर उन्हें मनाने की कोशिश में इस सिद्धान्त को प्रयोग में लाने की कोशिश कर बैठे, और इस प्रयोग का निष्कर्ष कुछ इस तरह से निकला कि पत्नी मानने की बजाय ……ऐसे कठिन प्रश्न मत पूछिये प्लीज ।

सबसे पहले तो पाक शास्त्र की किताबों को कुछ दिन तक छुप छुप कर पढ़ा, और अन्तरजाल पर सारे पाक कला वाले जालस्थलों की खाक छान कर नमक और पिसी शक्कर तथा हल्दी और धनिये के पाऊडर में फ़र्क अच्छी तरह समझ लिया। एक दिन जब मोहतरमा किसी काम से बाजार गई हुई थी तब हमने मौका देख कर अपने उस सारे ईन्टरनेटिये ज्ञान को आजमाने का निश्चय कर लिया।
सबसे पहले कुछ ” मीठा हो जाये” की तर्ज पर हमने हलवा बनाने का निश्चय किया, अब संयोग से उस समय पुस्तक कहीं मिल नहीं पाई और हमने अपने मन से ही डरते- डरते हलवा बनाने की तैयारी कर ली, गेहुँ का आटा कढ़ाई में लेकर उसे सेकने लगे अब हड़बड़ाहट में यह याद नहीं आया कि घी को आटे को सेकने से पहले डालते है सिकने के बाद या आटे के साथ? सो हम आटे को बिना घी डाले ही सेकने लगे और जब आटे के सिकने की खुशबु आने लगी तो हमने घबरा कर की कहीं ज्यादा सिक जाने पर जल ना जाये; घी की बजाय़ पास में पड़ी गिलास में से पानी कढ़ाई में डाल दिया फ़िर थोड़ी देर के बाद जब पानी सूखने लगा हमने हलवे को पौष्टिक बनाने के लिहाज से चार बड़े चम्मच भर कर घी कढ़ाई में डाल दिया और बाद में चीनी भी डाल दी।

और……. तभी एक बड़ी गड़बड हो गई और पत्नी घर वापस आ गयी, और रसोई में से आते हलवे की महक (आप कुछ भी कहो हम तो महक ही कहेंगे!) से सीधी रसोई में चली आयी और रसोई में बिखरे बर्तनों और बने हलवे को देख अपना माथा ठोक लिया। हमने बड़ी मासूमियत से उन्हे पूछा क्या हुआ? उन्होने कहा “मेरा सर”। हमने चुपचाप रसोई से बाहर निकलने में ही अपनी भलाई समझी।

थोड़ी देर बाद पत्नी एक प्लेट में हमारा बनाया हुआ हलवा ले कर आयी और हमसे बड़े प्यार से हलवे को खाने के लिये आग्रह करने लगी, हम उनके चेहरे पर छाई मुस्कुराहट को देख कर और अपने प्रयोग को सफ़ल मान कर उन सारे अन्तरजाल पर पाक विधियाँ लिखने वाले लेखकों को मन ही मन धन्यवाद देते हुए एक चम्मच भर कर हलवा अपने मुँह में रखा और, अरे यह क्या यह तो हलवे की बजाय लाई बन गई थी जिससे हम बचपन में अपनी फ़टी किताबें चिपकाया करते थे, हमारे बिगड़े चेहरे को देख कर पत्नी जोर- जोर से हँसने लगी और फ़िर उस दिन उन्होने हमें पास में बिठाकर हलवा बनाना सिखाया।

एक दिन फ़िर से मौका मिला इस बार पत्नी बाथरूम में थी और हमने नाश्ता बनाने का निश्चय किया। इस बार हमने मीठे की बजाय कुछ नमकीन बनाने का सोचा और सुबह का समय था तो हमें लगा  उपमा सही रहेगा, इस बार हमने कोई गलती नहीं की। घी में बराबर सूजी को सेंक लिया, जब सूजी सिक गई और गुलाबी की जगह काले रंग की होने लगी हमने एक बार फ़िर से पानी डाल दिया, अब पानी कितना डाला था?….. यार आपसे कितनी बार कहा है इतने मुश्किल सवाल मत पूछा करें; पर आप भी कहाँ मानने वाले हो!

थोड़ी देर बाद पानी सूख जाना चाहिये था पर पानी नहीं सूखा और पत्नी बाथरूम से बाहर आ गई और हमारे बने सूजी की महक से खुश होते हुए हमसे पूछा,
“क्या बना है नाश्ते में?”
हमने कहा “उपमा”
उन्होने सोचा कि उन्होने हलवा बनाना सिखाया था अत: उपमा भी सही बनाया होगा तो उन्होने रसोई में आकर हमारे बने उपमे को देखा और एक बार फ़िर से सर ठोक लिया, इस बार हमसे “क्या हुआ” पूछने की हिम्मत नहीं रही क्यों कि हमें पता था कि इस बार हमने उपमे की जगह राब यानि तरल उपमा बना दिया था, जिसे खाने की बजाय कप में भर कर पीया जा सकता था। इस बार तो हमारे इस नये पकवान का नामकरण भी नहीं हो पाया और सारा का सारा हमारे हाथों से ही फ़ैंक देना पड़ा, फ़ैंकते समय हमारे मन की हालत का आप अन्दाजा भी नहीं लगा सकते।
एक बार वेब दुनियाँ पर सोन पापड़ी की विधी देखकर काले रंग की एकदम सख्त बर्फ़ी भी बनाई है, जिसे खाने की कोशिश में मेरा दाँत शहीद होते होते बचा है, तो एक बार बरतन मांजने की कोशिश भी करी, पर नाकामयाब रहे। एक बार पोछा लगाने का मन हुआ और पानी में फ़िनाईल की बजाय सिरका भी डाला है। हुँ ना मैं मासूम! कभी कभी लगता है महिलायें सच कहती हैं कि पत्नियों को अपने पति को इन्सान बनाने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है।

परन्तु मित्रों मैंने भी निश्चय कर लिया है कि एक दिन मैं अपनी पत्नी को अपने पाक ज्ञान का लौहा मनवा कर रहूँगा। जब अटल जी बिना विवाह किये भी गा सकते हैं ” हार नहीं मानूंगा…” तो मैं क्यों नहीं?
क्या आप भी अपनी रूठी सजनी को मनाना चाहते हैं? हमारे अनुभवों का लाभ जरूर लें।

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बेचारे पति!

Posted by सागर नाहर on 31, August 2006

पिछले दिनों निधि जी ने अपने चिट्ठे गोरी का पति गोरिल्ला में बताया कि पत्नियों को अपने पति को इन्सान बनाने के लिये उन्हें गढ़ने और छीलने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है” यह पढ़ कर हम भी तैश में आ गये और टिप्पणी लिख दी कि

क्या पतियों को कम मशक्कत करनी पड़ती है? अगर हम भी विवरण लिखनें लगें तो…..!! “

निधि जी कहाँ रुकने वाली थीं उन्होने भी चुनौती दे दी कि

जी शौक़ से लिखिये। हमने कब रोका? अपनी मेहनत का लेखा-जोखा प्रस्तुत करना चाहते हैं, अवश्य करिये। लेखिका नें नहीं कहा कि पत्नियाँ सर्व-गुण-संपन्न होती हैं।

और फ़ैसला भी अपने पक्ष में करवा लिया!! :(

निधि जी की चुनौती के जवाब में तो नहीं पर निधि जी को यह बताने की कोशिश करी है की पति कितने मासूम और सीधे होते हैं, भला हो एक मित्र का जिन्होने एक मेल में कुछ चित्र भेज कर मेरी मुश्किल आसान कर दी, देखिये आप भी कितने मासूम होते हैं बेचारे पति,और……. पत्नियाँ कितनी सर्व गुण समपन्न होती हैं?

पैसा कहाँ है?

where-is-the-money.jpg

चलो….अपनी जेब बताओ!

show me

नहीं मैं नहीं दुंगा …. बचाऽऽओ

i'll not give the money

मुझे लेने दो

i m going

आखिर मिल ही गये पैसे, अब मैं चली शोपिंग करने…….बॉय

bye

(इस चिट्ठे पर कई कोशिश  के बाद भी यह  फ़ोटो  उपलोड नहीं हो पा रहे थे, अत: इस के लिये निधि जी की मदद भी लेनी पड़ी….धन्यवाद निधि)

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एक पत्र पति के नाम

Posted by सागर नाहर on 19, August 2006

लोग कई  बार हमें  फ़ालतु से मेल भेजते रहते हैं, कई बार बड़े मजाकिया मेल भी मिलते हैं, ऐसा ही एक मेल कुछ दिनों पहले  मुझे मिला, जिसे मैने भी आगे अपने मित्रों को फ़ॉरवर्ड कर दिया, मित्रों की सलाह थी की  अगर इसे चिट्ठे  के रूप में  पोष्ट किया जाता तो अच्छा होता! तो मित्रों पेश है एक पत्नी का लेखा पत्र अपने पति के नाम! एक पत्र

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चुटकुले: अन्तिम प्रविष्टी

Posted by सागर नाहर on 14, August 2006

Akshargram Anugunj एक विधवा और एक विधुर ने आपस में शादी कर ली, दोनों के पहले से दो-दो बच्चे थे और शादी के बाद दो बच्चे और हुए।

एक दिन पत्नी ( जो पहले विधवा थी) ने अपने नये पति को फ़ोन कर कहाजी सुनते हो आप जल्दी से घर आओ आपके बच्चे और मेरे बच्चे मिल कर हमारे बच्चों को पीट रहे हैं। *****

संता सिंह जी ने इन्डियनयर लाईन्स के दफ़्तर में फ़ोन किया और पूछा, मैडम मुझे यह बतायें कि दिल्ली से लंदन पहुँचने में प्लेन कितना समय लेगा?ऑपरेटर ने कहाएक मिनीट सर

ठीक हैकहकर संता सिंह जी ने फ़ोन रख दिया।

****एक प्रश्न: कुत्ते विवाह क्यों नहीं करते ?

उत्तर: बेचारे वैसे(बिना विवाह) ही कुत्ते की जिन्दगी जो जी रहे होते है।*********

विश्व्विख्यात नायगरा के जल प्रपात के पास एक गाईड पर्यटकों से कह रहा थातो जनाब यही है वह विश्व विख्यात जल प्रपात जिसकी आवाज इतनी तेज है कि इसके पास से २० सुपर सोनिक विमान अगर एक साथ निकल जाये तो हमे उसकी आवाज सुनाई नहीं देगीहाँ तो मैं महिलाओं से अनुरोध करता हुँ कि जरा धीरे से बोलें ताकि सब लोग इस जल प्रपात की आवाज सुन कें**********

एक इन्टरव्यु के दौरान अधिकारी ने अन्दर आते उम्मीदवार को पूछा हम सफ़ाई के मामले में बड़े सख्त हैं, क्या आपपने जूते बाहर रखे मैट से साफ़ कर कर अन्दर आये हैं?उम्मीदवार ने कहा जी हाँ सर।

अधिकारी ने कहा हम सच बोलने के मामले में भी बड़े सख्त हैं, बाहर ऐसा कोई मैट नहीं रखा है जिस पर जूते साफ़ किये जा सके।

******एक आशिक ने एक लड़की से कहा मैं तुम्हे बिना छुए भी चूम