॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

कुछ निन्दनीय पंक्तियाँ माँ के लिए

Posted by सागर नाहर on 14, जून 2006

माँ की शान में हजारों शब्द लिखे जा चुके हैं, हिन्दी चिठ्ठा जगत में भी अक्सर माँ पर कुछ ना कुछ लिखा जाता रहा है, अब कल ही अपने श्री अनूप शुक्ला जी ने अपने चिठ्ठे “फ़ुरसतिया” पर स्व. फ़िराक गोरखपुरी जी की कविता माँ प्रकाशित की, परन्तु क्या माँ की निन्दा की जा सकती है?
खासी भाषा के कवि किन फाम सिं नौगकिनरिह की एक कविता कुछ निन्दनीय पंक्तियाँ माँ के लिए की कड़ी यहाँ दे रहा हुँ मर्यादा की दृष्टि से कविता यहाँ प्रकाशित नही कर पा रहा हुँ और उसका लिंक दे रहा हुँ कविता के कुछ शब्द आघात जनक है, परन्तु कवि बहुत सहजता से अपने शब्दों को कह जाते हैं

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7 Responses to “कुछ निन्दनीय पंक्तियाँ माँ के लिए”

  1. हे राम

  2. कड़ी देने के लिए धन्यवाद। कविताओं-गीतों में माँ को बहुत पवित्र और महान माना गया है, परन्तु माँ भी तो मनुष्य ही है। उस दृष्टि से यह कविता हवा के ताज़े झोंके की तरह है। किसी झोंके में गन्ध अच्छी नहीं होती, यह तो वास्तविकता है। रति जी ने अनुवाद भी बहुत अच्छा किया है। कुछ जगहों पर कमज़ोर प्रूफ-रीडिंग अखर रही है।

  3. अद्भुत रचना है. ओ मां तुझे सलाम. मुझे मेरी मां की याद आ रही है. चलो अब उनको फ़ोन करता हूं. अरे भई, मेरी मां मुझे कभी डांटती तक नहीं है. 🙂 धन्यवाद सागर भाई

  4. मूल अंग्रेज़ी कविता यहाँ है।

  5. संसार में ना-ना प्रकार के लोग होते हैं. कुछ माएं ऐसी भी होती होगी.
    माँ के बारे में अपशब्द जींदगी में पहली बार पढ़ रहा हुं. क्योंकि कुमाता कभी नहीं होती.

  6. Anonymous said

    बेहतरीन कविता . यह कविता पाठक से गहन संवेदनशीलता, सहानुभूति और समझदारी की मांग करती है . कविता को सतही तरीके से नहीं समझा जा सकता . अन्तिम पंक्तियों में इस कविता को समझने की चाबी या कुंजी है . एक-दो बार चाबी घुमाइए कविता आपके सामने अपने प्रच्छ्न्न अर्थ के साथ खुलेगी . तब उस मां के जीवन संघर्ष के सामने माथा झुकाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं सूझेगा . अभाव ,उपेक्षा और गरीबी की भीषण मार झेल रहे भारत के असंख्य गांवों की स्त्रियों,विशेषकर दुर्गम पर्वतीय इलाकों का कठिन और लगभग अमानवीय परिस्थियों वाला जीवन जीनेवाली जनजातीय – ट्राइबल – समाज की स्त्रियों की दशा से अनजान आत्मकेन्द्रित मध्यवर्गीय नागर समाज जिसे सुकरात की भाषा में संतुष्ट सुअर की संज्ञा दी जा सकती है,वह इस कविता और इस कविता में वर्णित मां की पीड़ा,जिजीविषा और त्याग को समझने में सर्वथा अयोग्य रहेगा . कविता के सामने माथा झुकाकर जाना होता है तब वह समझदारी का आशीष देती है . कविता के बारे में असंवेदनशील शहरी समाज की सतही टिप्पणियां मुझे व्यथित करती हैं . अच्छी कविता-सच्ची कविता और उतना ही अच्छा अनुवाद .
    सागर भाई को धन्यवाद !
    प्रियंकर पालीवाल ,कोलकाता से

  7. हे राम ! सच में हम शहरियों के पल्ले इस कविता की गहराई नही पड़ी जैसा प्रियंकर जी ने कहा।

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