॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

स्वाधीनता? वाकई!!!!

Posted by सागर नाहर on 15, अगस्त 2006

सबसे पहले नीरज भाई को उनकी सबसे बढ़िया प्रविष्टी लिखने के लिये बधाई। भारत को आजाद हुए ५९ साल हो गये और लगभग ४९ वर्ष  पहले साहिर लुधियानवी ने फ़िल्म “फ़िर सुबह होगी ” के लिये गाने लिखे थे फ़िल्म तो नहीं चल पाई पर गाने आज भी उतने ही प्रासंगिक लगते है जितने १९४७ या फ़िल्म की रिलीज के वर्ष १९५८ में लगते थे। फ़िल्म का संगीत खैयाम साहब ने दिया था तो इतना बढ़िया है कि कुछ कह नहीं सकते।

 नोश फ़रमाईये

चीनोअरब हमारा, हिन्दोस्ताँ हमारा

रहने को घर नहीं है, सारा जहाँ हमारा  

खोली भी छिन गयी है बेन्चें भी छिन गयी हैं

सड़कों पर घूमता है अब कारवाँ हमारा

जेबें है अपनी खाली, क्यों देता वरना गाली

वो सन्तरी हमारा , वो पासबाँ हमारा  जितनी भी बिल्डिंगे थी सेठों ने बाँट ली है

मालूम क्या किसी को, दर्दनिहाँ हमारा   पतला है हाल अपना, लेकिन लहू है गाढ़ा

फ़ौलाद से बना है, हर नोजवाँ हमारा

मिल जुल के इस वतन को, एसा सजायेंगे हम

हैरत से मुँह ताकेगा सारा जहाँ हमारा

चीनो अरब हमारा (वाकई?)

(क्या बोल्ड किये शब्दों में साहिर जी ने कोई व्यंग किया है या सच्चाई बयाँ की है?) दूसरी नज़्म :आसमां पे है खुदा और ज़मीं पे हम
आजकल वो इस तरफ़ देखता है कम
आसमां पे है खुदा और ज़मीं पे हम
आजकल किसी को वो टोकता नहीं,
चाहे कुछ भी किजीये रोकता नहीं
हो रही है लुट मार फट रहे हैं बम
आसमां पे है खुदा और ज़मीं  पे हम
आजकल वो इस तरफ़ देखता है कम
किसको भेजे वो यहां हाथ थामने
इस तमाम भीड का हाल जानने
आदमी हैं अनगिनत देवता हैं कम
आसमां पे है खुदा और ज़मीं पे हम
आजकल वो इस तरफ़ देखता है कम
जो भी है वो ठीक है ज़िक्र क्यों करें
हम ही सब जहां की फ़िक्र क्यों करें
जब उसे ही गम नहीं तो क्यों हमें हो गम
आसमां पे है खुदा और ज़मीं  पे हम
आजकल वो इस तरफ़ देखता है कम
आप सब को भारत के स्वतन्त्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनायें।

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5 Responses to “स्वाधीनता? वाकई!!!!”

  1. “जितनी भी बिल्डिंगे थी सेठों ने बाँट ली है”
    क्या आज़ाद भारत में सबको समान अवसर नहीं मिलें हैं?
    बजाय तिरस्कार और धृणा के सफल लोगो से प्रेरणा लें और राष्ट्र को समृद्ध करें.
    (यह किसी पर व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं हैं पर वर्षो तक वामपंथ के प्रभाव से फिल्मो में ऐसे कई संवाद लिखे जाते रहे. व्यवसाईयों से घृणा कर समाजवादीयों ने तथा वामपंथीयो ने क्या पा लिया?
    एक मजेदार संवाद “सेठ कारखाने में हम पसीना बहाते हैं तब तुम कमाते हो, तुमने क्या किया हैं?”
    अरे अगले ने कारखाना लगाया हैं, तुं भी लगा और चला के देख यह भी कोई आसान नहीं हैं.

  2. इन वर्षों मे हमारी प्रगती उल्लेखनीय रही है और वाकई काबिले तारीफ़. सिक्के के इस पहलू को नजर अंदाज नही किया जा सकता.भविष्य और उज्ज्वल होगा, ऎसा मेरा विश्वास है.
    स्वतंत्रता दिवस पर आपको एवं सभी को बहुत शुभकामनाऎ एवं बधाई.

  3. संजय भाई
    क्या आप भी, जरा बोल्ड किये शब्दों को देखिये, मैं उन पर ध्यान आकर्षित कराना चाहता था। आप क्या ले बैठे। 🙂

  4. आप क्या कहना चाहते थे यह तो समझ लिया था, पर मौका देख मन का गुबार निकाल लिया था बस. 😉

  5. मैं संजय बेंगाणी जी की बात से सहमत हूँ।

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