॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

नारायण मूर्ति जब साम्यवादी थे!

Posted by सागर नाहर on 20, अगस्त 2006


आज जीतू भाई ने अपने चिट्ठे के. आर.नारायण मूर्ति: एक परिचय में श्रीनारायण मूर्ति के जेल जाने की घटना को संक्षिप्त में लिखा था मैं उस घटना को यहाँ प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ। श्रीमती सुधा मूर्ति की पुस्तकके गुजराती अनुवाद जो कि श्रीमती सोनल मोदी ने તમે જ તમારો અજવાળો/तमे ज तमारो अजवाळो के नाम से किया है।


यह लेख रीड गुजराती पर प्रकाशित हुआ है मैने उस गुजराती अनुवाद को हिन्दी में अनुदित करने का प्रयास किया है। आज पता चला कि अनुवाद करना कितना मुश्किल होता है। रीड गुजराती के मृगेश भाई शाह को यह लेख तथा श्रीमती मूर्ति का फोटो हमतक पहूँचाने के लिये विशेष धन्यवाद।


प्रस्तुत है वह लेख जिसमें श्रीमती सुधा मूर्ति ने श्री नारायण मूर्ति के जेल जाने की घटना का विवरण दिया है।


भारत के सोफ़्टवेर क्षेत्र में इतिहास बनाने वाले मेरे पति श्री नारायण मूर्ति के विचारों में परिवर्तन लाने वाली घटना से आप ही अपना उजाला का श्री गणेश करती हूँ।


श्री मूर्ति की उम्र तब लगभग पच्चीस वर्ष की होगी बहुत ही शर्मीले और आदर्शवादी युवक ! फ्रांस की “सेसा” नाम की कंपनी के वे मुलाजिम थे, पेरिस के नवनिर्मित “चार्ल्स द गोल” एयर पोर्ट पर विमान में आते सामान के लिये सोफ़्टवेर बनाना उनका कार्यथा , उस जमाने में उनका तनख्वाह का स्तर बहुत ऊँचा था। अत्यन्त आदर्शवादी होने की वजह से अपनी जरूरत के हिसाब से पैसे रख कर बाकी के पैसे श्री मूर्ति अन्य पिछडे़ देशों के लिये कार्यरत संस्थाओं को दान में दे देते थे। इस तरह की साम्यवादी विचारधारा ने उन्हें वापस भारत आने को प्रेरित किया। श्रीमती सुधा मूर्ति आप को जान कर आश्चर्य होगा कि पेरिस से मैसूर ( अपने शहर ) वापस आते समय काबुल तक की यात्राउन्होनें ज्यादातर पैदल चल कर या अन्जाने लोगों की गाड़ियों में लिफ़्ट लेकर पूरी की थी, तब उन्होने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि यह यात्रा उनके विचारों में बहुत बड़ा परिवर्तन लाने वाली होगी।


सर्दी की सुबह थी, युरोप के दो साम्यवादी देश – युगोस्लाविया और बुल्गोरिया कि सरहद पर “नीस” नाम के गाँव में वे पहूँचे। ईटली से कई यात्रियों की गाड़ियों में लिफ़्ट लेकर औरज्यादातर पैदल चल कर वे यहाँ पहूँचे थे। रास्ते में उन्हें समझ में आ गयाथा कि साम्यवादी देश में जगह जगह कीजाँच पड़ताल, पूछताछ होने की वजह से बुल्गेरिया की राजधानी “सोफ़िया” तक पहूँचने के लिये ट्रेन की टिकिट ले लेना ही बेहतर होगा। वे स्टेशन पहुँचे, ट्रेन केआने के दो घंटे के बाद यात्रा चालू हुई क्यों कि एक एक यात्री के इमीग्रेशन के कागज़, पासपोर्ट की बारीकी से जाँच की गई- साम्यवाद की बलिहारी! श्री मूर्ति अपने कम्पार्टमेंट में अकेले ही थे। उन जैसे शांत, शर्मीले और अन्तरमुखी व्यक्ति को जैसे मनपंसद माहौल मिल गया, शान्ति से कोने में बैठ कर अपनी पुस्तक निकाल कर पढ़ने लगे।


ट्रेन के रवाना होने का समय हो गया था तभी एक पतली, लम्बी और सुनहरे बालों वाली युवती ने उनके कम्पार्टमेंट में प्रवेश किया और उनके पास कर बैठ गई, परन्तु मूर्ति जिनका नाम! पुस्तक से उपर और युवती की तरफ़ देखा भी नहीं। वह युवती भी श्री मूर्ति को आसानी से कहाँ छोड़ने वाली थी। तभी तो स्त्री के लिये कहते हैं “स्त्रीणा असीक्षितं पटुत्वं”। किसी भी देश की स्त्री को चुप बैठे रहना पडे़ तो उसे सजा जैसा लगता है। क्यों सच है ना बहनों?


उस खूबसूरत युवती ने बात शुरु करने की पहल की, बात बात में उसे पता चला की श्री मूर्ति भारतीय है। उन दिनों भारत में भी साम्यवाद के लाल झंडे फ़हराते थे, अत: दोनों के बीच गरमा गर्म राजकीय चर्चा शुरू हो गई, धीरे धीरे व्यक्तिगत बातें भी होने लगी। युवती ने कहा,” मैं बुल्गेरिया कि राजधानी सोफ़िया शहर में रहती हूँ , और मुझे हमारी सरकार की तरफ़ से “कीव युनिवर्सिटी” से पी. एच. डी करने के लिये छातृवृति मिली थी। अध्ययन के दौरान मुझे एक लड़के से प्रेम हो गया और हम दोनों ने शादी करने का निश्च़य कर लिया।


मूर्ति को अब उसकी बातों में मजा आने लगा था।


” तो फ़िर क्या हुआ सरकार को आपत्ति हुई?


युवती ने कहा ” अरे प्रेम विवाह क्या किया यही मुसीबत हो गयी, हमारे देश में शादी करनी हो तो सरकार की इजाजत लेनी पड़ती है, और हमने ली भी पर सरकार ने बाद में आदेश दे दिया कि मुझे पी.एच.डी पूरी करने के बाद कुछ वर्ष बुल्गेरिया में ही बिताने होंगे, मेरे पति का अध्ययन भी अभी पूरा नहीं हुआ है , पूर्वी जर्मनी में नौकरी भी करते हैं इस वजह से कितने समय से वे वहीं रहते हैं और में यहाँ और हम आपस में लगभग छह महीने के बाद ही एक दूसरे मिल पाते हैं। सुखी विवाहित जीवन बिताने का सुंदर सपना, इस कठोर साम्यवादी सरकार के निष्ठुर कानून ने छिन्न भिन्न कर दिया है। श्री मूर्ति जैसे अन्जाने व्यक्ति के साथ बात करते करते वह युवती भावुक हो गई और आँख से आँसू टपक पड़े।


उस युवती की परिस्थिती जान कर श्री मूर्ति के दिल को भी ठेस लगी, श्री मूर्ति के मुँह से निकल गया


“ये कैसी सरकार! पूँजीवाद हो या साम्यवाद विवाह, नौकरी और प्रेम करने की अभिव्यक्ति जैसी व्यक्तिगत विषयों पर तो मनुष्य का खुद का ही अधिकार होना चाहिये ना”? उस युवती के पास में कब से एक युवक आ कर बैठा था, एक दो बार उसने भी चर्चा में भाग लेने का प्रयत्नी भी किया परन्तु बातें फ़्रेन्च में हो रही थी सो उसे खास समझ में नहीं आ रही थी , थोड़ी देर में वो युवक दो युनिफॉर्म पहने मोटे से पुलिसमैन को लेकर आया, उसमें से एक ने श्री मूर्ति को कोलर से पकड़ कर अपनी सीट से खींच लिया और दूसरा उस युवती की बाँह पकड़ कर चलने लगा, स्टेशन आने पर श्री मूर्ति को जबरन ट्रेन से बाहर निकाल कर प्लेटफॉर्म पर बनी हुई एक छोटी सी कोठरी में कैद कर लिया गया। कोठरी भी कैसी? जिसमें नाम मात्र के लिये एक खिड़की और एक ओर एक बदबूदार चोकड़ी, जिसे बाथरूम या शौचालय जो इच्छा हो मान लो।


भयानक सर्दी… ऐसी विकट परिस्थिती में भी श्री मूर्ति को उस युवती की चिंता हुई क्यों कि इस जड़ साम्यवादी देश में नागरिकों के अधिकार और फर्ज की चर्चा ने ही उन्हें इस परिस्थिती में ला पटका था। मैने क्या गल्ती की? कब तक ये लोग मुझे इस तरह कैद में रखने वाले हैं? भविष्य में मेरे साथ क्या होने वाला है ? इन लोगों ने इस काल कोठरी मेंअगर मेरी यहाँ हत्या कर दी तो मेरे परिवार वालों को तो कभी पता भी नहीं चलेगा।


मूर्ति को मैसूर स्थित अपना घर याद आने लगा, पिताजी कुछ दिनों पहले ही रिटायर हुए थे और उन्हें लकवा भी हो गया था, तीन बहनों का विवाह करना बाकी था। इतनी भयानक सर्दी में भी उनका शरीर पसीना पसीना हो गया, मिनीट कब घंटों में व्यतीत हो गये, पासपोर्ट और घड़ी पुलिस अधिकारी ले गये थे। नब्बे घंटों से (पुन: नब्बे घंटो से) अन्न का एक दाना भी पेट में नहीं गया था। एक युग जितना समय बीतने के बाद एक ऑफिसर कोठरी में आया, फ़िर से मूर्ति को घसीट कर प्लेटफॉर्म पर लाया गया और ट्रेन में एक सुरक्षाकर्मी के साथ उन्हें बिठा दिया गया।


“तुम्हारा पासपोर्ट तुम्हे इस्ताम्बुल पहुँचने के बाद ही दिया जायेगा”- भारी स्वर में एक ऑफिसर बोला।


“पर मैने क्या गल्ती की थी?”


” तुमने हमारी सरकार के विरूद्ध एक शब्द भी बोलने की हिम्मत कैसे की? ये थी तुम्हारी भूल और हाँ…………

वह युवती कौन थी? ऑफिसर ने पूछा?” वो तो मेरी तरह एक यात्री ही थी”

“तो फ़िर उसे इतनी होशियारी करने की क्या जरूरत थी?”


“सर हम तो आपस में बातें ही कर रहे थे इसमें किसी को क्या तकलीफ है?


“हमारे देश में इस तरह की चर्चा करने को कोई स्थान नहीं है, समझे? इट इस अगेन्स्ट अवर रूल”

“सर उस लड़की का क्या हुआ”


“इस विषय में तुम ना ही बोलो तो तुम्हारे लिये बेहतर होगा, हमने तुम्हारा पासपोर्ट देखा, तुम भारतीय हो इस वजह से बच गये हो क्यों कि भारत हमारा मित्र देश है ( उन दिनों भारत में साम्यवादी विचारधारा जोरों पर थी)।


अब शांति से अपना रास्ता नापो” इतना कह कर ऑफ़िसर ने मूर्ति के कम्पार्टमेंट का दरवाजा सख्ती से बंद कर दिया”ट्रेन रवाना हुई नब्बे घंटों से भूखे मुर्ति को थकान और भूख की वजह से नींद आ रही थी, परन्तु मन में विचारों का तुमुल युद्ध चालु था। आज मूर्ति पक्के साम्यवादी थे , कार्ल मार्क्स, लेनिन, माओ और हो चिन मिन के विचारों को मानते थे, पेरिस की सड़कों के किनारे बने कॉफ़े में कॉफ़ी पीते पीते साम्यवाद की अनगिनत चर्चायें की थी परन्तु पिछले चार दिनों के अनुभव ने उनके विचारों में जबर्दस्त परिवर्तन हो गया था। दूसरों की विचारधारा को जहाँ स्थान ना हो ऐसी जड़ व्यवस्था पर उन्हे भयंकर नफ़रत हो गई। अरे, बोलने की स्वतन्त्रता जैसे मूलभूत अधिकार भी इन्सान को ना मिल सके ऐसे साम्यवाद से मुझे क्या लेना? मूर्ति को तभी समझ में आ गया कि लाल झंडों के झूलूसों और युनियन लीडरों की भाषणबाजी से भारत की गरीबी कभी दूर नहीं हो सकती, उसके लिये हमें नौकरी के नये मौके पैदा करने ही होंगे।


श्री मूर्ति ने उसी वक्त अपने दिमाग में से साम्यवाद को हमेशा के लिये निकाल कर फैंक दिया और पूँजीवाद के रास्ते से परन्तु नीती से भारत से की गरीबी हटाने में अपना योगदान देने का निश्चदय कर लिया। भारत वापस आने पर उन्होने दो तीन नौकरी बदली, खुद कि सोफ्ट्रोनिक कंपनी की स्थापना की, पटणी में कम्प्युटर सोफ्टवेर विभाग के हेड भी बने, परन्तु दिल में सोफ़्टवेर कंपनी की स्थापना करने एवं हजारों को नौकरी देने का सपना अभी भी जीवित था। पक्के साम्यवादी मूर्ति अब पूँजीवादी बन चुके थे, समय का बहाव किसे नहीं बदलता?


आगे की बात तो आप सभी जानते ही हैं… “इन्फोसिस ” की विकास की कहानी… भारत के सोफ़्टवेर को दुनिया भर में चमकाने और हजारों लोगों को नौकरी देने वाली कंपनी के बारे में………

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12 Responses to “नारायण मूर्ति जब साम्यवादी थे!”

  1. rdgujarati said

    thank you for tranlating for hindi readers.

    bye

    from :
    mrugesh shah (editor, readgujarati.com)

  2. बहुत ही अच्छा लिखा है नाहर भाई।

  3. साम्यवादी देशो के आइसे काले कानुनो से अनजान तो नही थी लेकिन ऐसा नारायण मूर्थी के साथ हुआ पढकर आश्चर्य हुआ !

  4. बहुत ही अच्छा अनुवाद किया है।

    धन्यवाद।

  5. […] मध्यमवर्गीय परिवारिक संस्कार वाले बच्चे इतना संकट उठाकर वापस आने की हिम्मत नहीं जुटा पाते कि नये सिरे से जिंदगी शुरू कर सकें। अब हर आदमी डा.नारायण मूर्ति तो होता नहीं। […]

  6. R.Singh said

    If you study Dr. Naraain Murthy closely, he did not change. Earlier also he was thinking about upliftment of society and later on also he thought of doing the same, but change was that instead of sharing poverty ,he started sharing wealth. This is the basic difference between Samajbad,Samyabad at one end and Gandhiji’s Trustiship at the other.King Janak( Ram’s father -in-law and Sita’s father) was called VIDEH. If we call Narayan Murty also VIDEH, Main nahi samajhta ki yah Atishyokti hogi(I do not think this will be exageration). If you go in detail of trustiship principle,you will understand that he followed that principle in its letter and spirit.

  7. भाई जी,
    आपने जो लेख प्रस्‍तुत किया वह बहुत ही मार्मिक, व्‍यवहारिक तथा शिक्षा प्रद था। आपने नयी बात भी बतायी कि ऐसे थे नारायण मूर्ति।

  8. आपकी ये वाली पोस्ट यहां डाली है। आशा है कि आपको अच्छा लगेगा।

  9. आशा है इस लेख को पढ़कर तथाकथित साम्यवादियों की दिमाग में कुछ जरुर घुसेगा. और बर्बाद अर्थव्यवस्था तथा बन्द होती मिलों के बारे में नारेबाजी से हटकर कुछ सोचेगें. लगे रहो नाहर भाई.

  10. sonal modi said

    Thanks for translating in Hindi. I read this today only.You have done an excellent job.
    sonal modi.

  11. सँबन्धित सभी लोगोँसे इस ब्लागको नेपालीमे रुपान्तरण करने के लिए और प्रकाशनके लिए अनुमति चाहता हुँ। मैने कल ही ब्लागको नेपालीमे रुपान्तरण कर लिया है और शायद आज मे अपनी ब्लाँगमे पोस्ट करुँगा। नारायणमूर्तीजीके जीवनीके इस हिस्से से मै बहुत प्रभावित हुँ। आपकी सोचने हमे हमेशा प्रभावित किया है।

    धन्यवाद,
    एस.बी.श्रेष्ठ

  12. […] जब साम्यवादी थिए! सागर चन्द नाहर के नारायण मूर्ति जब साम्यवादी थे! (नेपाली अनुवादक: […]

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