॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

अल मदद

Posted by सागर नाहर on 14, सितम्बर 2006

आज हिन्दी दिवस के दिन  आप सब के सामने अपनी  व्यथा  व्यक्त कर रहा हूँ, खासकर हिन्दी को लेकर! पिछले वर्ष यहाँ सिकन्दराबाद में परिवार को लाने के बाद दोनो बच्चों को स्थानीय हिन्दी माध्यम की स्कूल में भर्ती करवा दिया, एक तो स्कूल बहुत दूर और शिक्षा का स्तर बाप रे बाप। स्कूल की शिक्षकाओं को “ए” और “रा” में फ़र्क पता नहीं! और सारे रिश्तेदार कहते कि बच्चों को हिन्दी माध्यम में पढ़ा कर उनका भविष्य क्यों बर्बाद कर रहे हो।
स्कूल अनुशाषन का यह आलम कि हर दूसरे दिन  बच्चों की किताबें- कापियाँ फ़टी हुई मिलती, एकाद बार कपड़े तक फ़ाड़ दिये गये, जब जाकर प्रधानाध्यापक जी से इस बारे में शिकायत करी तो उनका जवाब था ” मैं क्या करूं ? आपके बच्चे को नया शर्ट सिलवा दूँ।”
राम राम करते और रोज बच्चों को समझाते समझाते एक वर्ष पूरा किया और इस साल उन्हें घर के पास में एक अंग्रेजी माध्यम के विध्यालय में भर्ती करवा दिया, बड़ा हर्षवर्धन कक्षा ५ और  छोटे वाले चैतन्य को पिछले वर्ष कक्षा १ के अच्छे परिणाम को देखते हुए तीसरी में बिठा दिय गया । अब अनुशाषन वगैरह की तकलीफ़ तो मिट गयी पर नयी परेशानी शुरू हो गई बच्चों को अंग्रेजी सही नहीं आती, रोज स्कूल आकर रोना धोना। जो बच्चे कक्षा में प्रथम आते रहे अब एकदम पिछड़ गये हैं। स्कूल वालों का कहना है कि एक दो बच्चों पर विशेष ध्यान दे पाना मुश्किल है, आप बच्चों को घर पर ट्यूशन पढ़ाईये। बच्चों की माँ और मुझे हम दोनो को अंग्रेजी नहीं आती, ट्यूशन के लिये जानकारी ली तो  पता चला कि उन दोनो के लिये एक महीने के ८००/- रुपये अदा करने होंगे, जो मेरे लिये असंभव है!

मेरी इच्छा यहि है कि दोनो बच्चे हिन्दी माध्यम के विध्यालय में पढ़ें परन्तु पास में कोई हिन्दी स्कूल नहीं कि उन्हें पढ़ने भेजा जा सके। ट्युशन पढ़ाना मुश्किल है।
कोई मुझे सलाह दे सकता है कि मुझे क्या करना चाहिये?

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8 Responses to “अल मदद”

  1. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह said

    धर्मसंकट धर्मसंकट धर्मसंकट धर्मसंकट धर्मसंकट
    कृपया बाल-बच्‍चेदार व्‍यक्ति सागर भाई जी की समस्‍याओ को हल करें। अभी मै इस श्रेणी मे नही आता हू।
    कहावत है न
    जाके पैर न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई
    बिना अनुभव के सलाह नही देना चाहिये।
    सागर भाई जी मै क्षमा चाहूगां।

  2. अभी भी हिन्दी रोजी रोटी की भाषा बनने की राह जोह रही है और सफ़र बहुत लंबा है. बच्चों को अंग्रेजी माध्यम मे पढ़ाना वक्त की आवश्यक्ता है. इसके बिना आप उनके समुचित विकास की राह को सीमित कर देंगे. हां, उन्हे साथ ही हिन्दी की महत्ता और उसके सम्मान के विषय मे समझायें और इस और वो जो भी योगदान कर सकें, उसके लिये प्रेरित करते रहें.
    बच्चों के सुनहरे भविष्य के लिये हार्दिक शुभकामनाऎं.

  3. सागरभाई आपकी यह समस्या भारत के लगभग सभी अभिभावको की समस्या हैं. हिन्दी में शिक्षा देना बिलकुल गलत नहीं हैं, पर पता नहीं क्यों हिन्दी-शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा हैं. एक वजह हैं नीजि क्षेत्र का हिन्दी-शिक्षा क्षेत्र में न आना. दुसरी बात हैं अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा भविष्य को सुनहरा बनाने के लिए अनिवार्य होती जा रही हैं. लोग मोटी फिस देने को तैयार हैं.
    दुख की बात यह हैं की अच्छी स्कूल तथा तमाम गुणवत्ताओं के बाद भी हमारे बच्चो की भाषा हिन्दी होने से वे क्या पढ़ रहे हैं उन्हे ही नहीं पता, बस रटे मार रहे हैं.
    ऐसे में हम क्या कर सकते हैं:
    1.आप अपने बच्चो को अंग्रेजी स्कुल में ही पढाएं क्योंकि अच्छी हिन्दी स्कूल उपलब्ध नहीं हैं. यह मेरा भी दर्द हैं.
    2. बच्चे अनजान भाषा में पढ़ कर कष्ट उठा रहें हैं तो हम भी थोड़ा कष्ट उठाएं और अंग्रेजी सिखे हर रोज थोड़ा समय देकर, डिक्शनरी आदी की मदद लेकर. बच्चो को पढ़ाते हुए.
    3.मंहगी स्कूल फिस तथा ट्युशन फिस का हल तो मैं भी नहीं निकाल पाया हूँ. इसमें मेरी जेब भी खुब ढ़िली हो रही हैं, बावजुद इसके की पत्नि तथा भाई अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान रखते हैं.

  4. नीरज दीवान said

    मैं हिन्दी स्कूल में पढ़कर अंग्रेज़ी का ज्ञान रखता हूं तो सागर भाई के बच्चे तो आज के माहौल में और भी बेहतर कर सकते हैं. फिर भी अब अंग्रेज़ी स्कूल में दाखिला करा दिया है तो मेरी सलाह यही है कि-
    बच्चों को यह कदापि न कहें कि अंग्रेज़ी कठिन भाषा है. निजी अनुभव है कि अंग्रेज़ी सरल और समृद्ध भाषा है.
    बच्चों को अंग्रेज़ी में सोचने-बोलने के लिए कहें. और कोशिश करें कि घर में अंग्रेज़ी में ही बच्चें बात करना शुरू करें. हर छोटी-बड़ी बातें अंग्रेज़ी में ही हों. अग्रेजी बुरी नहीं है लेकिन अंग्रेजियत से परहेज़ करें.
    भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम होती है. सभी भाषाओं का सम्मान करना हमारी तहज़ीब है वो चाहे हिन्दी हो या तेलुगू या फिर अग्रेज़ी.
    इसके अलावा आप पति-पत्नी हिन्दी में बातचीत करें ताकि बच्चे हिन्दी भी समझ सकें.
    बच्चों को एक साल के भीतर बहुत कुछ अंग्रेजी आ जाए इसके लिए बच्चों के कार्टून चैनल्स काम के साबित हो सकते हैं जहां अग्रेजी में गिटर-पिटर हो रही है.
    अनुवाद का बोझ दिमाग़ पर न लें, यह अंग्रेजी में सोचने नही देता. जो तेज़ अंग्रेज़ी मे बोलना चाहता है वह अंग्रेज़ी में सोचता है. जिस दिन बच्चों को आप मारे दर्द के उछलकर आउच कहते सुनेंगे तो यकीन मानें कि वहां से इसकी शुरआत होगी.
    खर्चा तो उठाना ही पड़ेगा. इसके लिए आपको आजीविका के और साधन की तलाश भी करनी होगी. मसलन दुकान में आप कुछ और तरह के काम कर सकते हैं.

  5. मैं हैरान हूँ समीर जी, संजय जी और नीरज जी की टिप्पणी से हैरान हूँ। जब इतने सुलझे हुए लोग, हिन्दी के इतने जानकार, इतनी बड़ी बड़ी बातें करने वाले इतनी आसानी से अंग्रेज़ी के सामने घुटने टेक रहे हैं तो बाकियों का क्या। मेरा अपनी बेटी को स्कूल में डालने का समय तो नहीं आया लेकिन मैं कसम खाता हूँ कि उसको हिन्दी में ही प्रथम वर्ग की शिक्षा दिलाऊँगा और वो इन अंग्रेज़ी में पढ़े बच्चों से कहीं आगे निकलेगी। अब तो मुझे इन लोगों के ब्लाग पढ़ने से पहले भी सोचना पड़ेगा।

  6. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह said

    रजनीश मंगला जी मै आपके बात का समर्थन करता हू, हिन्‍दी माध्‍यम किसी मामले मे अग्रेजी से पीछे नही है। आज इलाहाबाद के ल्‍वालादेवी तथा रानी रेवती देवी अपने जिले मे पहला स्‍थान रचाते है और कानपुर के बीएनएसडी शिक्षा निकेतन तो उत्‍तर प्रदेश मे पहला स्‍थान रखते है। औा ये विद्यालय है जिसके छात्र वरीयता सूची मे प्रथम 21 स्‍थान मे दो तिहाई से ज्‍यादा स्‍थान कब्‍जा करते है। और ये हिन्‍दी माध्‍यम के ही है।
    सागर भाई जी आप तो हैदाराबाद मे रहते हे मै तो एक तुच्‍छ सी सालह देना चाहुगा कि आप अपने बच्‍चो को तेलगु माध्‍यम से क्‍यो नही पढते, किसी भी भाषा मे पढे किन्‍तु भारतीय भाषा मे पढे। किसी अच्‍छे तेलगु के स्‍कूल मे दाखिला करा दे। बाद मे अच्‍छी हिन्‍दी भी घर के बात व्‍यवहार के कारण आ जायेगी।

  7. रजनीश भाई

    मैने अंग्रेजी के आगे घुटने टेकने की बात बिल्कुल नही की और ना ही मै यह कहता हूँ कि हिन्दी माध्यम मे पढ़ने से कोई हानि है. मै स्वयं भी शुरु से ही हिन्दी माध्यम मे पढ़ा हूँ मगर जैसे ही व्यवसायिक कार्यक्रम मे पढ़ने की बात आई तो चार्ट्ड ऎकाउन्टेन्सी तो हिन्दी मे होती नही थी और अगर मै हिन्दी का डंका बजाता रहता तो क्या यह पाठ्यक्रम मेरे लिये संभव था. क्या आप और हम सभी यहां पर अपनी रोजी रोटी के लिये अंग्रेजी का इस्तेमाल नही कर रहे हैं? इस भाषा मे खराबी क्या है? भाषा तो भाषा है, सभी तो अच्छी हैं. अब कुछ अधिक मान्यता प्राप्त हैं, कुछ इस ओर अग्रसर हैं. हां, हिन्दी के विकास के लिये जो भी कार्य हो सकते हैं, उसमे हम सामर्थ के अनुसार योगदान दें, तो एक दिन हमारी अपनी हिन्दी भी इसी मुकाम को हासिल करेगी जब यह रोजी रोटी की भाषा भी बनेगी अंतराष्ट्रिय स्तर पर. मगर हर अच्छे कार्य की तरह इसमे भी वक्त तो लगेगा, हांलाकि इस विषय मे बहुत कुछ कहने को है, मगर फिर कभी. आशा है, आप शब्दों से ज्यादा भावनाओं पर ध्यान देंगे. बिटिया के सुनहरे भविष्य के लिये शुभकामनाऎं.

  8. सागर भाई ,
    घर में हिन्दी पढाइएगा,जो भी समय मिले.
    बच्चों के साथ घटित वाकये को आपने ईमानदारी से रक्खा.कई जाली लोगों की कलई तो खुली.

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