॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

अपराध बोध

Posted by सागर नाहर on 23, जनवरी 2007

बीस जनवरी को एक बार फिर केबल चोरी हुआ और पूरे दिन दुकान बन्द रही। सुबह सोचा कि नैट का तो  पता नहीं तब तक प्रिंटर की कार्टिज ले आते हैं। बाजार से सारा काम निबटा कर आते समय जुबली बस स्टैण्ड से मेरे स्कूटर से थोड़ा आगे एक स्प्लेण्डर मोटर साईकिल पर एक सवार अपने पीछे एक आदमी को बिठाये जा रहा था,सवार ने हेलमेट लगाया हुआ था पर पीछे वाले ने नहीं। स्थान ऐसा कि पाँच छ: रास्ते वहाँ मिलते हैं, सामने से दो बसें आ रही थी। मुझे और उस सवार को दायीं तरफ मुड़ना था, मैं तो बस  की गति देखकर रुक गया( वैसे भी मेरी गाड़ी धीरे चलाने की आदत है)  पर मोटर साईकिल वाला नहीं रुका उसे लग रहा था कि बस के आने से पहले वह निकल जायेगा पर अफ़सोस ऐसा हुआ नहीं और अन्तिम समय उसने बस को हाथ से रोकने की कोशिश की पर बस भला कहाँ रुकती है हाथों से और रुकी  भी नहीं और ऐसी जोरदार टक्कर हुई कि दोनो लोग उछल गये।  नीचे गिरते ही  ड्राईवर तो  हेलमेट पहने होने की वजह से बच गया पीछे वाले का सर फट गया। मैने जल्दी से अपनी गाड़ी रोकी और उसे उठाया तो खून के फ़व्वारे निकलते देख कर घबरा गया। तभी बस का ड्राईवर, यात्री और बहुत सारे लोग आ गये आनन फ़ानन में एम्बुलेन्स को भी फ़ोन कर दिया गया पर मेरे अवचेतन मन ने कहा कि अब यह बच सकता है तू यहाँ से निकल ले वरना कानूनी पचड़ों में फ़ँस जायेगा, और मैं अपने घर आ गया।  दुर्घटना स्थल से मेरा घर कोई आधा कि.मी दूर होगा पर वह आधा किमी  मुझे कैसे गाड़ी चलाई मुझे होश नहीं था। मैने अपनी जिन्दगी में अपनी आँखों के सामने पहली बार ऐसी दुर्घटना देखी थी सो अभी तक मानसिक रूप से सहज नहीं हो पाया, वही दृश्य दिखता रहता है। यह भी पता करने की हिम्मत नहीं हुई  कि वह आदमी बचा या नहीं!

मन में एक अपराध बोध भी होता रहता है कि मुझे वहाँ रुकना चाहिये था। क्या मैने वहाँ ना रुक कर कोई गलती की? क्यों कि बचाने के लिये बहुत से लोग एकत्रित हो चुके थे। 

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10 Responses to “अपराध बोध”

  1. Pankaj Bengani said

    भाईसा, अगर हर आदमी यही सोचकर निकल लेता तो?

    वैसे, इमानदारी से कहुँ तो आप की जगह मै होता तो मै भी निकल ही लेता! पर फिर सोचता हुँ मेरा एक्सीडेंट हुआ होता तो?

  2. पंकज भाई मैं भागा नहीं लोग इकठ्ठा हो गये थे और उनके पास मोबाईल भी थे मेरे पास नहीं, उन्होने एम्बुलेन्स और पुलिस को फोन कर दिया था, अगर वहाँ कोई नहीं होता या लोग इकठ्ठा नहीं होते तो मैं वहाँ जरूर रुकता।

  3. अब तो खैर नही रुके तो नही ही सही. मगर आप हैं संवेदनशील तभी तो न रुकने की टीस है. पुलिस/कोर्ट वगैरह मौके के हालात जानने के लिये इतना चक्कर लगवाते हैं कि चाहते हुये भी आदमी इस तरह की घटनाओं से दूरी बना लेता है. जो होना था सो हुआ, आप मन भारी न करें. उस बंदे के लिये प्रार्थना कर लें और चिट्ठे में मन लगायें.

  4. इससे आपकी संवेदनशील के साथ-साथ मौके की नजाक़त को समझ सकने की होशियारी का भी पता चलता है। पुलिस और अदालत की कार्यशैली ऐसी है कि आप ऐसे मामलों में चाहकर भी शराफत नहीं दिखा सकते। परसाई जी का निबंध “मातादीन चाँद पर” इस विडंबना पर बहुत सटीक ढंग से व्यंग्य करता है।

  5. न रुकने की टीस को सार्वजनिक कर पाना बहुत ही ईमानदारी का परिचायक है।

  6. सागर साहब आपकी इस अपराध बोध ने लिखने पर मजबूर कर दिया मगर समझ नहीं आ रहा क्या लिखुँ और किसे सान्त्वना दूँ और किसे दोषँ। आशा है वह आदमी बच गया हो।

  7. Divyabh said

    सर,अपराध बोध तो ठीक है, मात्र लिखकर हीं कर लिया, लेकिन शायद 99% लोग भी यही करते हैं मरने बाला मर जाता है और हम उसे सांत्वना प्रदान करते हैं वो भी ब्लाग के माध्यम से…अभी भी कुछ नही जाता पुन: इस कार्य को मैदान में जाकर करें तो निश्चय ही मन का बोझ हलका हो जाएगा…मैं बंधुओं की प्रतिक्रिया पर हैरान हूँ… कहते हैं पहले साहित्यिक क्रांति पहले आती है,परंतु यह हालात रहें तो 100 वर्ष भी कम पड़ेगे…धन्यवाद मेरी बात को अन्यथा ना लें क्योंकि मैं रोड पर दौड़ने बाला आदमी हूँ…थोड़ी सोच अलग है>

  8. Tarun said

    सृजन शिल्पी की बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ, आप संवेदनशील हैं आपकी कार्य से यही पता चलता है

  9. हर घटना कुछ सीख दे जाती है. मन भरी न रखे. आप जो कर सकते थे आपने वही किया. आगे का काम पुलिस व डॉक्टर का है.
    कानून को बदल कर लोगो को ऐसे मौके पर सहायता कर सके इसलिए प्रोत्साहन देना चाहिए.
    हेलमेट पहने (मैं नहीं पहनता)
    सावधानी से नियमपूर्वक वाहन चलाएं
    कहीं दूर्घटना हो तो एमब्युलेंस को फोन करें
    यही शिक्षा मिलती है.

  10. आपका अंतर्द्वंद्व आपकी संवेदनशीलता का परिचायक है तो आपकी आत्मस्वीकारोक्ति आपकी व्यक्तिगत ईमानदारी का . और रही बात आपके पलायन की तो वह भी सहज मानवीय कमजोरी का ही लक्षण है . अगर भारत में इतने उल्टे-सीधे कानूनी और गैरकानूनी पचड़े न हों तो शायद आम आदमी रुकने और मदद करने में ऐसी कोताही न बरते .

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