॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

गणतंत्र दिवस या गन तंत्र दिवस?

Posted by सागर नाहर on 26, जनवरी 2007

निठारी कांड के अभियुक्तों सुरेन्द्र और  मोनिन्दर की कल गाजियाबाद की अदालत में वकीलों ने जम कर पिटाई कर दी। कानून के रक्षक जब खुद कानून को हाथ में लेने लगें तो फिर अदालतों कि कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती, इससे तो अच्छा था कि दोनो अभियुक्तों को निठारी की जनता के हवाले कर दिया जाता।

इस तरह की एक घटना पूर्व में १३ अगस्त २००४, शुक्रवार   को नागपुर की अदालत में हुई जब बलात्कार के अभियुक अप्पू यादव को  तीस चालीस महिलाओं ने जबरन अदालत में घुस कर पीटा और उसी दौरान एक महिला ने उसे चाकू मार दिया जिससे अप्पू यादव  की मौत हो गयी, यानि अदालत के फ़ैसले से पहले ही अप्पू की शिकार महिलाओं ने उसे सजा दे दी। इस घटना के दो दिन पहले भी जब पुलिस सुनवाई के लिए अप्पू यादव को अदालत लेकर आ रही थी तब भी अप्पू के  साथ मारपीट  हुई थी लेकिन तब पुलिस ने इसे गुटबाज़ी का परिणाम बताकर टाल दिया था।

सुरत में एक ऐसी ही  घटना में दोहरी हत्या के आरोपी महेश देसाई को अदालत में गोली मार दी गयी और उस के पास खड़े एक वकील की भी मौत हो गयी, जिस बेचारे का अदालत में पहला दिन था।

निठारी के अभियुक्तों को कतई क्षमा नहीं किया जा सकता पर उन्हें सजा देने का कार्य अदालत का है जनता का नहीं।  गाजियाबाद की घटना में तो यह काम अगर अभियुक्तों के शिकार बच्चों के अभिवावक करते तो मान सकते हैं कि आक्रोश और दुख: में उन्होने यह कार्य किया होगा पर सबसे शर्मनाक बात यह थी की कानून के रखवाले वकीलों ने ही उन्हें पीटा और अगर पुलिस बीच बचाव नहीं करती तो शायद जान से मार भी देते। वकील अब कितनी ही सफाई दे कि यह काम वकीलों का नहीं जनता का है पर टीवी पर काले कोट वाले वकील मोनिन्दर को पीटते  स्पष्ट  दिखाई दे रहे थे।

Advertisements

10 Responses to “गणतंत्र दिवस या गन तंत्र दिवस?”

  1. सत्य वचन

  2. मुझे भी ‘वकीलो’ का सुन कर आश्चर्य हुआ था.

  3. बहुत सुन्दर, सच्चाई को खुबसुरती से उभारा है!

  4. बिलकुल सही कहा जी आपने कानुन के जानकार वकील लोग वहां किस प्रकार से नारेबाजी कर रहे थे । जिस प्रकार से अभियुक्तों कि पिटाई हुई, एसा लगता हे कि सब कुछ पहले से निर्धारित था ।

  5. ( Ise matra ek vyaktigat aur meri samajh bhar kee pratikriya samjhen)
    Main sachchayi nahi janta ki kya hua, haan gatana nindaneeya bhi ho sakti hai, kam se kam itanee dur aur yahan blog jagat me baith kar, to aur bhee nindaneeya . Haan kisi manasik rogi ke apraadh ka dand dene ke liye svayam usake jaisi harakaten karna bilkul nahi hai.
    Par janata ka gussa us kshan is rup ke fat pada to koi ashcharya kee baat bhi hai, vakeel bhee insan hi hain. Mujhe to garv hai ghaziabad ki janta par jisne apna rosh is rup me hi sahi, dikhaaya to.

  6. Divyabh said

    बिल्कुल सत्य कथन!!चाहे हम कितना ही क्रोध में क्यों न आ जाएँ पर कानून को हाथ में कभी नहीं लिया जा सकता…ऐसे अगर नियम ताक पर लगने लगे तो हो चला देश का कल्याण्…धन्यवाद अच्छा रहा…।

  7. सत्य वचन!

  8. Tarun said

    वकीलों का तो क्या कहें बस इन्ही की कसर रह गयी थी लात घूँसे की, और कहीं ये साजिश तो नही थी उन दो मुलजिमों को जनता के हवाले कर कुछ बडे नामों को छुपाने की

  9. मेरा मत इस घटनाक्रम के साथ तो नहीं, मगर मै आपका अभिनन्दन करता हूँ गणतंत्र दिवस के शुभावसर पर.

  10. Shrish said

    मैं आपसे पूर्णतया सहमत हूँ, कम से कम वकीलों को तो इस तरह का व्यवहार शोभा नहीं देता। लेकिन ईमानदारी से कहूँ तो यह खबर सुनकर दिल के किसी कोने में तसल्ली सी हुई, उन नरपिशाचों को भी पता चला होगा कि पीड़ा किसे कहते हैं। फांसी पर लटकाने से तो व्यक्ति पल भर में मर जाता है। वे तो नरपिशाच हैं जो चाहते हैं कि छूटने पर और भी हत्यायें करें। ऐसे अभियुक्तों के लिए तो स‍उदी अरब का पत्थरों से मार-मार कर सजा देने वाला प्रावधान ही ठीक है।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

 
%d bloggers like this: