॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

फ्रेश से सब्जियां क्यों ना लूं?

Posted by सागर नाहर on 1, जून 2007

बुधवार , , 16 मई

कुछ दिनों पहले बाजार से निकलते समय सड़क के किनारे एक ठेले में गाजरें देखी, बड़ी लाल और अच्छी दिखी तो  याद आया कि गाजर का हल्वा खाये बहुत दिन हो गये चलो आज गाजर ले लेतें हैं। इससे श्रीमती जी भी खुश हो जायेंगी, क्यों कि घर की ज्यादातर खरीदी  का काम मैडम ही करती है।
स्कूटर  साईड में रोक उससे भाव करवाया, ठेले वाले ने भाव बताया २० रुपये किलो, हमें भी बड़ा आदमी बनने का शौक चढ़ा  और उससे कहा  पन्द्रह रुपये में देना है तो दो किलो दे दो, ठेले वाले ने बिना हील हुज्जत दो किलो गाजरें दे दी, घर  आकर बड़े खुश होते हुए कहा देखो आज मैं तुमसे सस्ती और अच्छी गाजरें लाया हूँ, श्रीमतीजी को जब भाव पता चला तो मुँज लटका कर बोली, दस रुपये में तो अपने घर के नीचे मिल जाती है। अब उन्होने पैकेट हाथ में लेते ही कहा कि ये गाजरें तो दो किलो नहीं है मैने कहा मैने अपने सामने तुलवाई है एकदम बराबर है पर उन्होने कहा लगी शर्त ये अगर दो किलो हो तो!!  मैं  भी तैश में आकर बोला ठीक है और घर के सामने जियाजी के जनरल स्टोर्स पर एलेक्ट्रोनिक काँटे पर जाकर तुलवाया तो वजन निकला 1710 ग्राम यानि 290  ग्राम वजन में कम और भाव में 5  रुपये ज्यादा, अब गाजरें किस भाव पड़ी संजय भाई बताना जरा? अपन का गणित जरा कमजोर है।
कोई इन्सान एक बार बेवकूफ बने तो उसे अक्ल आ जानी चाहिये पर अपन राम जी ने ना सुधरने की कसम खा रखी है और इस तरह एक बार एक किलो टमाटर में  200 ग्राम कम और एक बार 2 किलो अंगूर में 225 ग्राम कम तुला कर घर ले कर आये हैं, आश्चर्य की बात यह है कि एक बार ठगाने के बाद मुझे यूं लगा कि मैने भाव कम करने को कहा इसलिये उन ठेले वालों ने डंडी मारी होगी तो उसके बाद भाव भी कम नहीं करवाया। फिर भी  मेरे साथ धोखा हुआ।
 महावीर जयन्ति के दिन दुकान की छूट्टी थी शाम को सोचा पास में ही हेरीटेज का नया सुपर मार्केट (फ्रेश)  खुला है चल कर आते हैं कुछ सब्जी भी खरीद लेंगे। और टहलना भी हो जायेगा। तो साहब हम  पहुँचे हेरिटेज फ़्रेश में। सबसे पहले अंगूर  देखे एकदम ताजा और अच्छे  दाम 27.90 प्रति किलो, दो किलो अंगूर लिये अपने हाथों से ही तोलना था कहीं कोई गड़बड़ नहीं। थोड़ा सामान और सब्जियाँ खरीदी बिल हुआ लगभग 70 रुपये।
अब बाहर उन्हीं अंगूरों के भाव सुनिये 35 रुपये किलो और वजन में डंडी मारने की शर्तिया गारंटी। अब मैं क्यों खरीदूं ठेले से हल्की और कम वजन सब्जियाँ?  कुछ दिनों पहले रांची में रिलायन्स के फ़्रेश में तोड़फोड़ और  कल इन्दौर में   विरोध  हो रहा है। मैं ज्यादा पैसे वाला नहीं पर जानबूझ कर अपनी मेहनत की कमाई को इस तरह क्यों फैंक दूं?
पहले तो दो घंटे अपनी दुकान बंद कर चिलचिलाती धूप में  मंडी जाओ जहाँ स्कूटर पार्क करने तक की जगह नहीं मिलती (और इधर उधर पार्क कर दिया तो ट्रेफिक पुलिस की गाड़ी उठा ले जाती है और कम से कम पचास रुपये  देने पड़ते हैं।) फिर सब्जियाँ ढूंढ़ो, भाव हर सब्जी वाले के अलग सो मोल भाव करवाओ, तौलते समय खास ध्यान रखो( अब यह बात अलग है कि कितना ही ध्यान रखो सब्जी वाला अपना काम कर ही लेगा)। पचास नखरे होंगे आधा किलो से कम सब्जी नहीं मिलेगी।छांट के नहीं ले सकते आदि आदि..।  हजार झंझट पाल कर सब्जी लाने की बजाय फ़्रेश से  चाहे जितनी सब्जी ला सकते हैं। अभी यह चिठ्ठा लिखने से थोड़ी देर पहले मैं कुछ सब्जी खरीदने गया पर देर हो जाने की वजह से सब्जियाँ नहीं मिली मात्र नींबू और मिर्ची मिली।  सौ ग्राम मिर्ची और पाव नींबू खरीद कर 11 रुपये का सामान मिल गया। जब कि रात नौ बजे मंडी खुली नहीं होती।
 अब कई लोग कहेंगे गरीबों के पेट पे लात मार रहे हैं  फ्रेश आदि .. पहले मैं भी यही सोचता था पर कई ठगाने के बाद पता नहीं क्यों मेरी सोच बदलने लगी है  कि, मुझे अपने पैसों के बदले अच्छा सामान मिला  और सस्ता मिला तो मैं वहीं से सामान खरीदना पसंद करूंगा।  कल को ठेले वाला सही तौल कर सही सामान देगा तो उनसे  खरीदने में भी मुझे कोई गुरेज नहीं होगा।

संबधित कड़ी

टिप्पणीयाँ


written by Pankaj Bengani, मई 16, 2007
कुछ दिनों पहले सब्जीवालों ने रांची में रिलायंस फ्रेश के स्टोर पर हमला भी किया था.
कुछ तर्क ऐसे भी दिए जाते हैं कि रिलायंस और भी कई सारे व्यापार करता ही है, तो गरीब सब्जीवालों के पेट पर क्यों लात मार रहा है.
मुझे लगता है कि, इन सब चिजों को रोका नही जा सकता, आप रिलायंस को रोकोगे तो भारती तैयार खडा है. दुसरी बात यह है कि यह बाजार बहुत बडा है. रिलायंस के स्टोर गली गली में खुल नही सकते हैं. तो मेरे हिसाब से तो सबके पास मौके बराबर हैं. जरूरत है गुणवत्ता बनाए रखने कि.
हमारे घर के आसपास लगभग सारे बडे स्टोर हैं, रिलायंस फ्रेश है, बिग बज़ार है, स्टार बज़ार है, सुभिक्षा है, ट्रु मार्ट है.. लेकिन फिर भी हमारे घर का अधिकतर सामान एक छोटी सी दुकान से आता है. क्योंकि उसके वहाँ वही सामान इनसे भी सस्ता मिलता है.

थोड़ा समाजवादी हो जाएं..
written by नीरज दीवान, मई 16, 2007
ये स्टोर वगैरह से कोई गुरेज़ नहीं है. अपनी चिंता पूंजी के केंद्रीयकरण को लेकर है. दूरगामी सोच के मुताबिक़ किसी भी बज़ार पर पूंजीवादी का एकाधिकार हो तो ख़तरनाक साबित होता है. सरकार को नियंत्रित तरीक़े से ही पॉलिसी बनानी होंगी.
यहां यह भी अहम है कि भले ही उपभोक्ता को डिपार्टमेंटल स्टोर से ख़रीदी गई सब्ज़ी सस्ती पड़ती हो लेकिन फुटपाथ पर दुकान चला रहे ग़रीब की रोज़ी रोटी कैसे चलेगी? बिचौलिये भी समाज का हिस्सा हैं. थोक विक्रेता भी. बड़ी तादादा है. लाखों में.. उनके परिवार पर बुरा असर न पड़े, यह ध्यान देने योग्य है. इस पर पूरी जानकारी इकट्ठी करनी चाहिए कि ऐसे स्टोर्स का समाज की आर्थिक सेहत पर कैसा प्रभाव पड़ रहा है.

दो अच्छी बाते
written by arun, मई 16, 2007
१.बडी खुशी की बात है सागर भाई लौट आये धन्यवाद संजय,जी
२.भाई हमने तो दोनो जगह देख ली और आप वाला (संजय बैगाणी) रास्ता पकडा रेट मे अगर यह कहते है सस्ता है तो हमे नही लगा.हा पर सब्जी मंडी की गन्दगी से बचाव जरुर है .पर भाई हमे हमारे मुहल्ले मे रोज आते सब्जी वालो से भी शिकायत नही है

सच है लेकिन सोचना भी जरूरी है
written by परमजीत बाली, मई 16, 2007
भाई आप की बात सच है कि कुछ फुट्पाथ पर सब्जी बेचने वाले ईमानदार नही होते। लेकिन सभी ऎसे नही हैं। इस लिए उनके पेट का भी ध्यान रखना जरूरी है।

उपभोक्ता का फायदा
written by जीतू, मई 17, 2007
मै तो भई एक बात मानता हूँ, एकाधिकार का डर नही रहेगा। अभी रिलायंस आया है, पीछे पीछे भारती आ रहा है, उसके पीछ केरफ़ोर लाइन लगाकर खड़ा है। इन सबकी लड़ाई से उपभोक्ता का ही फायदा होना है। नुकसान होगा, वो ये होगा कि आप रिलायंस फ्रेश मे सिर्फ़ सब्जियां खरीदने जाओगे, और खरीदकर बहुत कुछ लाओगे, क्योंकि डिसप्ले ही इतना जबरदस्त होगा। लेकिन ये तो हर जगह होगा। माल सस्ता होगा, होड़ बढेगी लेकिन फायदा उपभोक्ता का ही होगा। अमीर और अमीर होगा और गरीब और गरीब, लेकिन ग्लोबलाइजेशन के ये फायदे नुकसान तो होने ही है।

क्या चिड़िया मारने के लिए बाज पालेंगे ?
written by प्रियंकर, मई 17, 2007
सागर भाई,
इसे कम तोलने की बेईमानी का बचाव न समझें . कम तोलना अपराध है . व्यवस्था दुरुस्त होनी ही चाहिए . चूंकि यह आपकी आंखों के सामने हो रहा है अतः यह अपराध ज्यादा दृश्य है . बड़े अपराध अदृश्य तरीके से होते हैं . बड़ा अपराध अपने में ही खोई आंखों को ‘फ़्रेश’ और तात्कालिक रूप से लाभकारी भी लग सकता है . इसके दुष्परिणाम सब्ज़ी-भाजी बेचने वालों को तत्काल दिख रहे हैं , मेरे और आपके जैसे आम आदमी को बाद में दिखेंगे . और तब तक इतनी देर हो जाएगी कि कुछ हो नहीं सकेगा . एक छोटी ही सही ,कम प्रोफ़ेशनल किस्म की सही, व्यवस्था नष्ट हो जाएगी . तब आप उस बड़ी पूंजी के सामने अरक्षित खड़े होंगे — उसके रहमो-करम पर — जो आपको भुनगा समझेगी . तब आपका विरोध सुनने वाला भी कोई नहीं होगा .
तब तक जो अभी कम तौल रहा है वह जीवन से हार कर या तो मर-खप चुका होगा या किसी दिन अचानक आकर आपकी गरदन पर उस्तरा लगा रहा होगा . और तब बात सिर्फ़ २००-३०० ग्राम के पैसों तक जाकर ही नहीं रुकेगी . खतरा बड़ा होगा . किसी भी अपराध को जस्टीफ़ाई नहीं किया जा सकता . पर आसन्न सामाजिक उथल-पुथल को थोड़ा अपने ‘स्व’
के बाहर जाकर वृहत्तर समाज का हिस्सा बनकर देखना होगा .
ये ठेलेवाले ,ये छोटे-मोटे वेंडर्स , ये कम पूंजी पर काम करने वाले असंगठित लोग हैं . कोई ठेले वाला कम तौल-तौल कर अंबानी बन गया हो ऐसा कभी देखने में नहीं आया . ये लोग हमारे समाज का दृश्य हिस्सा हैं . हमारा पड़ोस हैं. हमारी ज़रूरत की ‘सप्लाई चेन’ का अहम हिस्सा . ये हमें उधार भी देते हैं . हमारी खरी-खोटी भी सुन लेते हैं . ये उन्हें भी ‘केटर’करते हैं जो शायद इन माल्स और बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर में घुसने की हिम्मत न जुटा पाएं .सच तो यह भी है कि मध्य वर्ग का आदमी भी इन बड़े-बड़े चमक-दमक से भरे स्टोर्स से कैसी कुंठाएं लेके लौटता है ,यह किसी से छुपा नहीं है . इसलिए इन असंगठित लोगों पर आए संकट की धमक हम तक न पहुंचे यह हो नहीं सकता .
कल को रिलाएंस बड़े आक्रामक ढंग से साइबर कैफ़े की चेन खोलने पर तुल जाए और औसत साइबर कैफ़े मालिकों की आजीविका पर संकट घहराने लगे . आपके उपभोक्ता कुछ चमकीली योजनाओं के तात्कालिक लालच में उधर भाग जाएं . बल्कि कहा जाए कि रिलाएंस उनकी ‘पोचिंग’ कर ले तब भी क्या आप यही कहेंगे .
अपने बड़े भाई से बात कर रहे हैं . हृदय पर हाथ रख कर बोलिएगा . आपके सामने तो रिलाएंस की साइबर कैफ़े स्कीम का फ़्रेंचाइज़ी बनने का विकल्प फिर भी खुला होगा .
पर वह सब्ज़ी-भाजी की ठेलीवाला क्या करेगा . वह भी हमारी तरह का आदमी है . जिसकी बीबी है . बच्चे हैं . और वे इस लोकतांत्रिक सम्प्रभु गणराज्य में ज़िंदा रहना चाहते हैं .


written by प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह, मई 17, 2007
रिलांयस आदि के कारण एक तरफ किसानों का शोषण होगा और उचित मूल्‍य न मिलेगा। हाल मे एक रिर्पोट पढ़ी थी जिसमें किसानों से सुभिक्षा आदि कम्‍पनी 1 रूपये मे खरीद कर 2 से 4 रूपये तक मे बेचती हे। यानी कई गुना लाभ


written by सागर चन्द, मई 17, 2007
आप सभी का धन्यवाद जो स्वस्थ रूप से चर्चा की।
@ प्रियंकर भाईसा.
मैं आपकी हरेक बात से सहमत हूँ, पर मेरे लिये आज मह्तवपूर्ण है पैसा। जैसा मैने अपने अंतिम पैरा में लिखा है कि मुझे ठेले- बंडी वालों से सब्जियाँ खरीदने में कोई गुरेज नहीं है। बशर्ते मुझे हेरोटेज फ्रेश या बाजार से सस्ती और अच्छी सब्जियाँ मिले। जब बाजार में सस्ती सब्जियाँ मिल रही हो तो ठेले वालों के बीवी बच्चों के लिये मैं उनसे महंगी सब्जियाँ उनसे खरीदूं ये तो कोई बुद्धिमानी की बात नहीं होगी। आखिर मेरे बीवी बच्चों का ध्यान मुझे ही रखना होगा। मेरा परिवार भी इस गणतंत्र का हिस्सा है और मैं भी जिन्दा रहना चाहता हूँ।
उदाहरण मेने उपर दिया है जब अच्छे अंगू मात्र 27.90 प्रति किलो में मिल रहे हों तो क्या आप मात्र ठेले वालों के बच्चों की चिंता में उनसे सड़े अंगूर 35.00 प्रति किलो में खरीद लेंगे।

काश!
written by प्रियंकर, मई 17, 2007
नहीं ! सागर भाई,
35.00 रु. प्रति किलो में सड़े अंगूर कोई नहीं खरीदेगा न आप और न मैं . काश ये सभी ठेलीवाले मिल कर छोटी-छोटी को-ऑपरेटिव बनाकर हर रिलाएंस फ़्रेश के सामने बड़े ठेले लगाकर अच्छे अंगूर 27.80 में बेच पाएं . तब हम और आप दोनों कितने खुश होंगे .

Think Twise
written by ankit, मई 17, 2007
sanjay bhaiya me aapki baat se kafi had tak sahmat hu lekin reliance ko support bhi nahi karna chahta kyo ki reliance ki policy Dherubhai ne kafi pehle hi bata de te Dheru bhai ke according agar ek bharti 1 Rs kharach karta hai to .60 paisa reliance ko jana chahiye to ab aap bataiye kya Reliance ke alawa koi dusra market me nahi kama sakta kya or ye to sabhi ko malum hai ki reliance ne fiber optical wires ke liye market me kya daav pech khele the.

प्रियंकर जी से सहमत
written by suresh chiplunkar, मई 17, 2007
प्रियंकर जी से मैं पूर्णतः सहमत हूँ कि अभी ये लोग जाल फ़ैला रहे हैं, मछलियाँ फ़ँसती जा रही हैं, फ़िर एक समय (जल्दी ही आयेगा) कि वे हमें आँखे दिखाने लगेंगे और सट्टेबाजी के द्वारा बाजार भाव इतना बढा दिया जायेगा कि आम आदमी अंगूर की तरफ़ देखने में भी शरमायेगा । एक उदाहरण देना चाहता हूँ – इन्दौर में आसपास से रोज टमाटर के लगभग पाँच से दस ट्रक आते हैं मण्डी में, एक दिन रिलायंस और बिग बाजार नें सारे ट्रक मिल-बाँटकर मुँहमाँगे दामों पर खरीद लिये, उस दिन इन्दौर में टमाटर सिर्फ़ इन्हीं दोनों के यहाँ मिल रहा था, और उन्होंने जो भी भाव तय किया वही मिला भी, क्योंकि जिसे टमाटर लेना होगा तो वह टमाटर ही लेगा, ककडी से काम नहीं चलेगा…ये तो एक छोटा सा उदाहरण है, अन्ततः पिसना तो हम जैसे निम्न-मध्यम वर्ग को ही है…

http://sunharesapne.blogspot.com/
written by नीरज शर्मा, मई 17, 2007
सागर जी यह सही है कि आज के इस प्रतिसपर्धी माहौल में ऐसे फ्रेश स्‍टोर्स की जरूरत है, पर उपभोक्‍ताओं को इन पर कडी नजर भी रखनी होगी कि कहीं ये एकाधिकारात्‍मक स्थितियॉं नहीं पैदा कर देवें। कहते हैं ना जो जागत है वो पावत है, जो सोवत है वो खोवत है। सो हमें जागरूक तो हर जगह रहना ही होगा।

सागर भाई दृश्य बदल भी सकता है
written by अतुल शर्मा, मई 17, 2007
सागर भाई कल ही इन्दौर में रिलायन्स फ़्रेश की शुरुआत हुई है और कंपनी ने मंडी से सारे आम उठा लिए थे। अब ठेले वाले कुछ कर ही नहीं सकते। आपकी बात आज अच्छी लग रही है कि ठेले और फुटपाथ पर फल-सब्जी बेचने वाले बहुत बेईमानी करते हैं। इसके पीछे कई सामाजिक-आर्थिक कारण हो सकते हैं। परंतु जिन दूरगामी परिणामों की ओर प्रियंकरजी संकेत कर रहे हैं हो सकता वे बहुत जल्दी ही सामने आ जाएँ। इसके लिए प्रियंकरजी का सुझाया गया सहकारिता का मंत्र ही कारगर होगा।


written by सागर चन्द, मई 17, 2007
अंकितजी अतुल भाई और सुरेश जी
आपकी बात से सहमत हूँ और भविष्य के प्रति चिंतित भी पर क्या ठेले- बंडी वालों का भी इसमें दोष कम नहीं है। मैं यह भी मानता हूं कि बड़े दुकानदार भी बेईमानी करते हैं, कम तोलते हैं। पर देखती आंखॊ तो सहन नहीं किया जा सकता ना!प्रियंकर भाई साहब की बात बिल्कुल सही है कि छोटे दुकानदारों और व्यापारियों को संगठित होना चाहिये, पर क्या संगठित होने की बाद भी बेईमानी की लगी आदत छूट जायेगी? सरकारों को भी फ़्रेश जैसे सुपर स्टोरों पर लगाम कसनी चाहिये ताकि मंडी का सारा माल खुद ना खरीद सकें पर जब सरकारें ही व्यापारियों से मिली हुई हो तब इन बातों के कोई मायने नहीं रह जाते।
इस स्तम्भ को लिखने से मेरा अर्थ यही था कि मैं यह जान पाऊं कि मेरा मन जिस तरह बदल रहा है क्या वह सही है, और आप सबके विचार जान कर बहुत अच्छा लगा। कई बार हम मिथ्या धारणायें बना लेते हैं शायद मैं भी इस का शिकार हुआ हो सकता हूँ। आप सबने बहुत सही तरीके से चर्चा की इसके लिये मैं आप सब का बहुत आभारी हूँ। कुछ और भी संशय है जिनके बारे में अगले लेख में आपसे जानने की कोशिश करूंगा।

Reliance Fresh Stores
written by Chandrakant Joshi, मई 21, 2007
It is really sad that media, as well as India’s politicians, have been playing a dirty game in the name of saving the poor vegetable vendor. Frankly, even if 30000 of these perished because a Reliance or a Bharti came into retail, more than 30,00,000 consumers like me benfit in many ways. The problem is that we do not go to vote. The neighborhood vegetable mandi is a corrupt institution that needs to be closed as fast as possible. Why would a farmer not sell it to a Reliance or a Bharti when he is getting better prices and better payment security? These big institutions have the money to change the market dynamics for the consumers as well as the producers of goods. The only people who benefit if these are not allow to come up are brokers who are keeping neta jis on their payroll.

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One Response to “फ्रेश से सब्जियां क्यों ना लूं?”

  1. सागर भाई , रिलायसं के कूदने से अभी तो नहीं लेकिन आगे चलकर दूरगामी परिणाम दिखने शुरु हो जायेगें. वैसे इधर मैने भी स्पेन्सर्स से सब्जी खरीदी है लेकिन सच कहूं कि मजा नहीं आया , अरे भाई जब तक मोल भाव न करो , मौसम के हाल से लेकर राजनिति पर चर्चा न करो तो ऐसा मजा इन माल मे कहां , रही बात कम तौलने की तो सब सब्जी वाले ऐसे नही होते . सडक से सब्जी लेने की अपेक्षा मंडी से सब्जी लेने मे घटतौली कम ही मिलती है.

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