॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

चिठ्ठाकारों से दो दो मुलाकातें

Posted by सागर नाहर on 5, जुलाई 2007

कुछ दिन पहले यानि २३ मई को  किसी काम से साईबर कॉफे से बाहर जाना हुआ, वापस आकर नीचे बैठ कर कॉफे का ताला खोल रहा था मेरे एकदम पीछे  एक साया आकर खड़ा  हो गया मैने पीछे मुड़ कर देखा तो उस सुन्दर सजीले नौजवान ने मेरी कनपटी पर बंदूक की  तरह अपनी दोनो अंगुलियाँ रख दी,  और पू्छने लगे मुझे पहचानते हो? मैने अपनी याददाश्त पर जोर दिया पर कुछ जवाब नहीं दे पाया तो  साहब ने अपना परिचय दिया मैं डॉन हूँ!! मै कुछ समझता उससे पहले  उससे पहले हँसते हुए उन्होने कहा  मैं सुरेश चिपनूलकर हूँ।  और उज्जैन से आया हूँ।

हाँ तो यह थे अपने नये और उभरते चिठ्ठाकार सुरेश जी  जो आजकल अपने चिठ्ठे के माध्यम से हिन्दी फिल्मों के पुराने गाने हमें सुना रहे हैं।  सुरेश जी उज्जैन  रहते हैं पर हैदराबाद में इनकी साली साहिबा के यहाँ आये हुए थे सो  ब्लॉगर मीट करने  समय निकाल कर  मेरे यहाँ आये थे। हाथ और गले मिलने के बाद हम बैठे। चूंकि सुरेश जी और मेरा व्यवसाय एक ही है सो नये नये सोफ्टवेर से लेकर  मेरे ना लिखने तक कई बातें हुई। नारद को लेकर समय समय पर होते रहे  विवाद, और विवादास्पद चिठ्ठाकारों से लेकर राजनीती और खेल से लेकर फिल्मों पर  बातें हुई।

सुरेश जी ने मेरे पूर्व के लेखों को देखते हुए मुझे दो पुस्तकें भेंट की जिनका नाम यहाँ लिखना शायद ठीक नहीं होगा। इस तरह लगभग दो घंटे तक खूब बातें हुई, अब सुरेश जी के जाने का समय होने लगा था। आखिर खुशनुमा माहौल में  सुरेश जी ने हमसे विदा ली। इस मुलाकात में दुख: इस बात का रहा कि  हमारी श्रीमती जी  गाँव गई हुई थी सो मैं उन्हें खिलाने पिलाने का आग्रह नहीं  कर सका।

*** 

दूसरी मुलाकात  हुई जून महीने की २३ तारीख को। मेरा  राजस्थान जाने का कार्यक्रम था। बीच में सुरत श्रीमती जी के भाई  की मिजाज पुर्सी करनी थी क्यों कि कुछ दिनों पहले उनके साथ दुर्घटना हो गई थी  और  पाँव पर प्लास्टर लपेटे भाई साहब ५-६ महीने के लिये बिस्तर पर आराम फर्मा रहे थे। तो  मैने सोचा कि सुरत से अहमदाबाद चले जाते हैं तो एक साथ  कई चिठ्ठाकारों से मुलाकात हो जायेगी।

तो साहब मैं सुबह १० बजे मणिनगर रेल्वे स्टेशन पर उतरा  और वहाँ से पता किया कि बोडकदेव जाने के लिये क्या सही रहेगा। लोगों ने बताया कि  ओटो से तो बहुत दूर होगा आप बस से चले जाईये।  मैने सोचा कि उन्हें बताये बिना पहुंच जाता हूँ और जाते ही कहूंगा कि भाई  मैं वह दिल्ली से आया हूँ और मेरा नाम …..है। तो साहब बस कंडक्टर ने भी गंतव्य स्थान से बहुत पहले उतार दिया और चलते, भटकते और ओटो की यात्रा के बाद भी जब स्थान तक नहीं  नहीं पहुंच पाया तो पंकज भाई  को फोन करना पड़ा कि भाई मैं यहाँ खड़ा हूँ , मुझे आ कर ले जाओ। पाँच ही मिनिट में एक  दुबला पतला, अत्यन्त सौम्य  और शांत इन्सान कार लेकर मुझे  लेने आ गया। अब तो उन्हें परिचय देना ही पड़ा वरना ……. का नाम लेता तो शायद मुझे कार में भी बेठने देते कि नहीं!! 🙂

कुछ ही मिनिटों में छवि मल्टीमीडिया के दफ्तर में  था, वहाँ एक और दुबले पतले से और बहुत ही  हंसमुखे इन्सान ने मेरा स्वागत किया और बताया कि मैं संजय बैंगाणी हूँ। मैं तो दंग रह गया क्यों कि संजय भाई के फोटो देखने के बाद मन में एक  मोटे और लम्बे इन्सान की छवि बना रखी  थी यहाँ तो एकदम उल्टा मामला दिख रहा था। 🙂

संजय भाई के पीछे  एक दुबली पतली और साँवली सलोनी सी लड़की खड़ी थी  अपने चेहरे पर जबरदस्ती गंभीरता लपेटे थी  पर  जिसकी  आंखो  से में  स्पष्ट शरारत दिख  रही  यह चुलबुली लड़की खुशी थी जो हिन्दी की सबसे पहली पीजे (पॉडकास्ट जॉकी)  है। और हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ चिठ्ठाकारों ( डॉ सुनील दीपक, फुरसतियाजी, रवि रतलामी जी, जीतू भाई और समीर लाल जी) के साक्षात्कार तरकश पर हमें सुना चुकी है। उम्र में शायद 20+  होगी परन्तु देखने के बाद कोई कह  नहीं सकता कि खुशी  14-15  से ज्यादा की होगी।

पानी-  ( भाई मैं चाय नहीं पीता)   के बाद  हम चारों बैठे और बातों का सिलसिला चालू हुआ और  जैसा होना था,  बातें चिठ्ठाकारी से शुरुआत हुई, जिसमें नारद विवाद से ले कर  नारद टीम के नये प्रोजेक्ट् (जैसे संजय) के बारे में भी  चर्चा हुई।   राजथानी और गुजराती भाषा  पर बहुत  बातें   हुई, चुंकि मैं भी गुजरात में रह चुका हूँ सो  गुजराती  अच्छी बोल सकता हूँ सो मैने उन्हें  अलग अलग  लहजों में गुजराती  बोल कर सुनाई। मेहसाणा   तरफ की भाषा सुनाने पर खुशी बड़ी खुश हुई और  वन्स मोर की फरमाईश कर दी। बाद में इसी तरह राजस्थानी (मेवाड़ी और  मारवाड़ी)  को भी मैने अलग अलग तरीकों से बोल कर सुनाया।

बातों ही बातों लगभग डेढ़ बज गए थे अचानक संजय भाई को याद आया कि मुझे खाना खिलाना होगा, भूख तो जबरद्स्त लगी थी पर मेरे संकोची स्वभाव की वजह से ना नुकर करता रहा जो असफल रहा भाई – बहन  के सामने मेरी नहीं चली और मुझे घर जाना ही पड़ा।

घर पर संजय भाई की धर्मपत्नी श्रीमती निधीजी ने  हमारा स्वागत किया  और बेल का शर्बत पेश किया और  अगले कुछ मिनिटों में खाना लग चुका  था,  एकदम मेरे घर जैसा माहौल होने के बाद भी मेरा संकोच अभी दूर नहीं हो पाया था पर  भूख की वजह से खाना ही पड़ा।  खाना स्वादिष्ट था। खाने के बाद  बातें कर ही रहे थे कि एक और चिठ्ठाकार वहाँ पहुंच गये  और ये थे स्वयंभू तत्वज्ञानी रवि कामदार।🙂    रवि हिन्दी के सबसे पहले चिठ्ठाकार हैं जिनसे मेरी नोंक झोंक हुई।

घर पर सबके साथ बातें हुई इस बीच उत्कर्ष  भी आ चुके थे। उत्कर्ष,  संजय बैंगाणी  के सुपुत्र  हैं और शायद सबसे  पहले बाल चिठ्ठाकार है।  घर  पर  ब्लॉगर मीट जारी रही  उसके बाद फोटो भी खींचे गये जो आपने जोगलिखी पर देखे ही होंगे।

कुछ देर बाद एक बार फिर ऑफिस आये और फिर  ब्लॉगर मीट का तीसरा दौर  शुरु हुआ।  इस बार  सब सुनने वाले थे और बोलने वाले थे रवि कामदार। रवि की छवि मेरे मन में एक उद्दण्ड  नवयुवक की थी परन्तु मिलने के बाद  वह गलत साबित हुई। रवि   का इतनी कम उम्र में  इतना दुनियाँ, राजनीती  और अर्थशास्त्र  का ज्ञान  देखकर  में अभीभूत रह गया।

आखिरकार ४ बजे  मेरी बस का  समय हो रहा था सो सबको अलविदा कह कर एक सुखद यादों को लेकर  सभी दोस्तों से विदा ली। इस मुलाकात से एक  बात पता चली कि   संजय भाई की जो छवि एक कट्टर हिन्दूवादी  जैसी बनी हुई थी वह सरासर गलत है।  और कभी कभी आक्रामक दिखने वाले पंकज  असल जिन्दगी में बहुत शांत और गंभीर हैं और सुना है  उनके मित्र उन्हें शांति भाई कह कर बुलाते हैं।  क्यों शांति भाई  यह सच है ना?

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26 Responses to “चिठ्ठाकारों से दो दो मुलाकातें”

  1. दोनों मुलाकातों के लिये बधाई।
    हैदराबाद में होकर आपने मुझे बिना बताये ब्लागर मीट कर ली….ये अच्छी बात नही है।

  2. Ravi said

    तो अपने उज्जैनिया सुरेश जी हैदराबाद हुसैन सागर झील की सैर कर आए. वाह.

  3. Manish said

    shukriya is vivran ko hum tak pahuchane ke liye

  4. इस मीट के बारे में आपके नज़रिये से ही पढ़ना बाकी था,
    शुक्रिया!!

  5. पंकज बेंगाणी said

    “क्यों शांति भाई यह सच है ना?”

    अब खुद के मुँह से क्या तारिफ करूँ, पर आप कह रहे हैं तो गलत थोडे ही कहेंगे. ही ही. 🙂 एक दो से अनुमोदन भी करवा लीजिए. ना हो तो लालाजी को ही पकड लीजिए. हा हा

  6. mamta said

    विवरण अच्छा लगा पर हम फोटो नही देख पाए , क्लिक करने पर भी फोटो नही देख पाए कारण तो हम नही जानते है।

  7. अच्‍छा लगा

    पर किताब की बात कुछ हजम नही हो रही है। 🙂

  8. पढकर बहुत अच्छा लगा, अच्छा सिर्फ़ इसलिये नहीं कि आपने मुझे “सुन्दर सजीला नौजवान” कह दिया 🙂 , बल्कि इस बात का कि मेरे आग्रह पर आपने फ़िर से धमाकेदार वापसी की… अपनी इस मीटिंग के बारे में मैं नहीं लिख पाया (आपके आग्रह के बावजूद) (ये भी नहीं लिखा कि आपने भी मुझे एक किताब भेंट की), लेकिन आपने बेंगानी बन्धुओं और मेरी दोनों मुलाकातों की चर्चा करके उसकी भरपाई कर दी… ऐसे ही लगे रहिये, लिखते रहिये… साधुवाद

  9. Shrish said

    काफी दिनों बाद खुलकर लिखे आप, अच्छा लगा पढ़कर।

    कभी कभी आक्रामक दिखने वाले पंकज असल जिन्दगी में बहुत शांत और गंभीर हैं और सुना है उनके मित्र उन्हें शांति भाई कह कर बुलाते हैं।

    हे हे, शांति ‘भाई’ खुद कुछ नहीं करते, एक अंगुली हिलाते हैं और बंदा टपका दिया जाता है। 🙂

  10. @ सुरेश भाई
    अब साठ पैसंठ की उम्र के इन्सान को तो नौजवान ही कहा जायेगा ना ? 😉

  11. अच्छा लगा कि इसी बहाने मुलाकातों का दौर शुरु तो हुआ !

  12. bhuvnesh said

    mulakat ka vivaran padhakar accha laga 🙂

  13. yunus said

    वाह भई अच्‍छा लगा कि सबरे लोग एक दूसरे से मिल लिये । अब तो हमें भी हैदराबाद आने की खुजली होने लगी है । क्‍या करें आ ही जायें क्‍या ।

  14. बहुत बढ़िया लगा मुलाकातों की टोकरी देखकर. सब एक साथ परोस दिया. बहुत दिन बाद लिखे मगर बेहतरीन. अब हर महिने किसी न किसी को भेजना पडेगा ताकि लिखते रहो. 🙂

  15. arun said

    सुसवागतम वापसी पर ,हम खुश भये एक बंदा वापस आया पंगे के लिये (बहुत इंतजार करा कर)तैयार रहो जल्द पंगा लेगे आपसे 🙂

  16. I like your writing style. Nice reading.

    SB Shrestha

  17. नाहर जी आपका स्वागत है । हमारे बीच फिर से आने के लिए धन्यवाद ।
    घुघूती बासूती

  18. सागर भाई, अब तो मुझे ब्लॉगर भेंटवार्ता पढ़ने का ख़ासा चस्का लग गया है। और आपकी ब्लॉगर मीट पढ़कर इस हफ़्ते का डोज़ पूरा हो गया। अगली भेंटवार्ता का इंतज़ार रहेगा। 🙂

  19. बहुत ही मंजा हुआ लिखा है. आप चिट्ठाजगत छोड़ कर एक अच्छे लिखने वाले से वंचित किये हुए थे.
    हमसे गलती हुई, एक आध किताब ठीका सकते थे 🙂 अगली बार ध्यान रखा जाएगा.

    आपकी वापसी की यात्रा सुखद रही होगी..

    हम फिर मिलेंगे.

  20. उन्मुक्त said

    पढ़ कर अच्छा लगा।

  21. भई, पढ़ने में आनंद आगया।

  22. बहुत दिनों बाद वापसी देख कर बहुत खुशी हुयी. 🙂

  23. ratna said

    सागर भाई, बहुत दिन के बाद चिट्ठा जगत का चक्कर लगा रही हूँ. आपको यहाँ देख कर और पढ़ कर बहुत अच्छा लगा।

  24. […] it all) as the latter was on a visit to the US. Sagar also narrated his experience as he had two blogger meets, one of them on the way to his native village. While I also participated in a recent blogger meet […]

  25. मजेदार है भईया.. कभी भुले भटके इधर आ जाईयेगा… 😀

  26. Bahut acha hai!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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