॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

घीसू – माधव और मुंबई का वह पोलिश वाला

Posted by सागर नाहर on 22, जुलाई 2007

दृश्य १:

स्थान सुरत,  गुजरात

सुरत में सन १९९८ में मेरी गिफ्ट आर्टीकल की दुकान थी, एक सुबह को आठ दस वर्षीय भिखारिन बच्ची अपने छोटे भाई  लंगड़ाती हुई आई और पैसे मांगे मैने एक रुपये का सिक्का निकाल कर दिया, और वो चली गई। पास में एक मित्र बैठा था उसने कहा यार मुझे यह लड़की लंगड़ी नहीं लगती! मैने कहा यार जाने दो जो हो।

कुछ देर बाद में मेरा दोपहर के खाने के लिये आधा किमी  दूर घर  जाना होता है, तब संयोग से वही लड़की भीख मांगने घर  तक आ पहुँचती है, लेकिन तब उसका रोल बदल गया होता है, वह लड़की अब लंगड़ी नहीं अंधी  है।  

दृश्य २:

स्थान: बान्द्रा टर्मिनस, मुंबई

मुझे सयाजी नगरी एक्सप्रेस से सुरत आना है और ट्रेन छूटने में अभी पन्द्रह मिनिट बाकी हैं, मैं गर्मी से बचने के लिये डिब्बे से बाहर आ जाता हूँ। तभी एक विकलांग ( दोनो पाँवों से अपाहिज) घिसटते हुए मेरे पास आते हैं;  एकदम फटेहाल!  मैने उन्हें  भिखारी समझ अपनी जेब से पैसे  निकाले और उनकी तरफ बढ़ा दिये, वे  मेरी तरफ हाथ जोड़ कर  बोलते हैं भाई साहब आप अपने जूते पोलिश करवा लीजिये खाली पाँच रुपये लूंगा!  मैने कहा पर मेरे जूते तो पोलिश किये हुए है, तो वे एकदम मायूस हो कर जाने लगते हैं और कहते हैं काश मैं भिखारी होता। मैं उन्हें रोकता हूँ और साफ जूतों  पर फिर से  पोलिश करवाता हूँ और जब उन्हें पाँच रुपये देता हूँ तो वे दो रुपए वापस दे देते हैं कि भैया मुझे जूतों पर ज्यादा पॉलिश नहीं लगानी पड़ी।

दृश्य ३: स्थान: हैदराबाद स्थित मेरा साईबर कॉफे

एक आदमी सांई बाबा के स्वांग में भीख मांगने आता है साथ में  उसकी पत्नी भी है, दोनो नशे में धुत्त! मैं काम में लगा हुआ हूँ और उन्हें जाने को कहता हूँ तो हटने का नाम ही नहीं लेते और  मुझे गंदी गालियाँ देते हुए  हाथापाई करने मेरी और बढ़ते हैं और दुकान में मौजूद  ग्राहक उन्हें बाहर खदेड़ देते हैं।

*****

यह लेख  आज नोटपैडजी के लिखे पुल के नीचे    नामक  बेहद मार्मिक लेख और अमित जी खुले पन्ने के लिखे  कुछ सपनों के मर जाने से  नामक प्रेरणास्पद लेख को पढ़ने के बाद  अपने अनुभव  बाँटने का मन हुआ।

नोटपैडजी ने लिखा “जिस समाज और व्यवस्था मे “मजूरी कोई करे और मज़ा कोई और लूटे “वाली स्थिति होगी वहाँ पेशेवर भिखारी और घीसू-माधव कैसे न होंगे ।”

इस बात से पूर्ण सहमत हो पाना जरा कठिन है, क्यों कि  मैने  जितना अनुभव किया है उस हिसाब से कई भिखारी  जान बूझ कर इस पेशे को छोड़ना नहीं चाहते क्यों कि उनकी  दिन की कमाई लगभग हजार से पन्द्रह सौ रुपये हैं। पिछले दिनों टीवी पर समाचार में  देखा था कि  मुंबई शहर में   कई लखपति भिखारी है। भरत शाह नाम के एक भिखारी के पास  ७५ लाख रुपये की सम्पति है।  और फ्लैट किराये पर दिये हुए है।  तो कई ऐसे मजदूर भी देखे हैं  जो अपने   परिवार का पेट ना भर पाने के बाद भी भीख मंगने को तैयार नहीं है।  बान्द्रा के उस  पालिश वाले भाई का  उदाहरण  आप उपर पढ़ ही चुके हैं।  तो साईं बाबा के स्वांग वाले ढीठ भी बहुत आसानी से दिख जाते  हैं।

“समाज में  मजदूरी कोई करे और मजा कोई लूटे” वाली  स्थिती  बनाने में  हमारा योगदान भी कम नहीं है। अब कल  ही एक पौधे बेचने वाला  (एकदम मरियल सा- मानों कई दिनों से खाना नहीं मिला हो)  अपनी साईकल पर बहुत से पौधे लादे  पौधे बेच रहा था, हमारे अपार्टमेन्ट से एक सभ्रांत महिला ने  उसे बुलाया और  पाँच पौधे  छंटवाये, बड़ी मुश्किल से पौधे वाले ने उन्हें अपनी टोकरी से पौधों को  निकाला और कीमत बताई सौ रुपये। जो एकदम वाजिब  लग रहे थे।  वह महिला  जिद पर अड़ गई कि देना है तो दो, मैं पचास  रुपये से एक पैसा ज्यादा नहीं दूंगी। अब बेचारे उसकी हालत ऐसी कि वह साईकिल खड़ी कर  पौधों को वापस टोकरी में भी नहीं लगा सकता था,  उसने बहुत समझाया कि लास्ट  सत्तर रुपये दे दीजिये पर वह महिला नहीं मानी    और उस मजबूर को उन पाँच पौधों को पचास रुपयों में ही देना पड़ा। शायद भूख का परिणाम…  और उसी शाम  एक पीजा वाला पता पूछते हुए आता है वह  उसी महिला का पता है बिल पर राशि अंकित है २०० रुपये। और कम से कम बीस रुपये तो टिप भी दी होगी। यानि  एक पीज़ा के लिये दौ सौ बीस रुपये खर्च किये जा सकते हैं पर पाँच पौधों के लिये एक मजबूर  को  बीस रुपये ज्यादा नहीं दिये जा सकते!!!

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8 Responses to “घीसू – माधव और मुंबई का वह पोलिश वाला”

  1. Shrish said

    दुनिया के रंग हजार।

  2. masijeevi said

    सही है किसी भी दिशा में सामान्‍यीकरण करने से सरलीकरण हो जाता है

  3. yunus said

    भैया मुंबई में तो रोज़ यही नज़ारे होते हैं । ठगने वाले ठग रहे हैं । ठगने वाले ठगे जा रहे हैं । और वाजिब काम करने वालों को उनका हक़ नहीं दिया जा रहा । सब्‍ज़ी वाले से महिलाएं खूब किच-किच करेंगे और पीत्‍ज़ा वाले को मज़े से लाल नोट टिप में देंगी ।

  4. सही है. जिन्दगी नित नए खेल नित नए खिलाडी दिखाती है. बस देखते जाइए. 🙂

  5. हम स्वयं को बदलेंगे तो समाज बदलेगा, समाज बदलेगा तो देश बदलेगा.

    कोई हजार कहे मगर सच्चाई यह है की आज भी काम करने वाले लोगो की कमी है.

    भीख देने का मतलब है आप मेहनत कर खाने वालो का अपमान कर रहे है.

    आपकी पिज्जा वाली बात सही है, वहीं कई ऐसे लोगो को भी देखा है जो मात्र मदद करने के लिए ही किसी से कुछ काम करवा लेते है और उसे पैसे दे देते है ताकी लेने वाले को भी बुरा न लगे.

    दुनिया बहू रंगी है, समस्या का सरलीकरण करना मुश्किल है.

  6. सभी नजारे मौजूद हैं समाज में. आपने अपने अनुभव बांटे, अच्छा लगा चिन्तन देखकर.

  7. Aapne Bahut acha likha Nahar ji, Aapke anubhav padh kar acha laga aur aapke is tark se bhi sahmat hu ki kuch log jaan bguj kar bhikh maagte hai aur kuch bhukhe rahkar bhi bhikh nahi magte………… Rohit Tripathi

  8. अच्छा लगा आपके अनुभवों को पढ़कर …….रीतेश गुप्ता

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