॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

सेवा का अनूठा तरीका

Posted by सागर नाहर on 16, अगस्त 2007

ज्ञानदत्तजी के चिट्ठे पर आज  ज्ञानजी ने पद्मावती सुब्रह्मण्यन के लेख का  हिन्दी अनुवाद किया है। लेख में सरलाबेन द्वारा किये जा रही अनोखी सेवा का  जिक्र किया है, निश्चय ही सरला बेन तो प्रशंषा की पात्र है ही; परन्तु पद्मावती जी और ज्ञानजी दोनों की भी प्रशंषा की जानी चाहिये, जिन्होने हमें  यह जानकारी दी।

राजस्थान के मेरे छोटे से कस्बे देवगढ़ में हमारे एक पड़ौसी प्रोफेसर हैं  श्री मदन लाल जी सोनी, जिन्हें हम आदर से बाऊसा (बड़े पिताजी) कहते हैं, और उनकी पत्नी को बाईजी। बाऊसा के बारे में एक किवंदती थी कि वे बहुत ही अक्खड़ हैं, किसी से सीधे मुंह बाट नहीं करते। पर बाद में पता चला कि वे बहुत ही स्वाभिमानी थे और गलत बात को किसी भी कीमत पर सहन नहीं करने की वजह से लोग  उनके बारे में इस तरह प्रचारित करते थे। बरसों तक उदयपुर में फिजिक्स पढ़ाने के बाद बाऊसा रिटायर हो कर देवगढ़ आ गये और एक उम्दा कार्य शुरु किया। जो कुछ हद तक सरलाबेन द्वारा किये जा रहे कार्यों  जैसा ही है।                               
देवगढ़ के आसपास लगभग सौ छोटे बड़े गाँव है और वहाँ बड़े अस्पताल भी नहीं है सो सभी रोगियों को देवगढ़ के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र में अपना इलाज करवाने आना पड़ता है।  किसी कारण से रोगी को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा  तो  उसे और रोगी के साथ अस्पताल में  रहने वाले रिश्तेदार भूखे मरने की नौबत आ जाती है। क्यों कि अस्पताल के आस पास कोई होटल नहीं है, और गाँव में  (अस्पताल से दूर)  होटल है तो भी बेचारे किसानों और गरीब लोगों को को होटल का खाना महंगा पड़ जाता है।

यह  बात  बाऊसा के ध्यान में आई और उन्होनें एक दिन अपने घर में काम वाली से कुछ रोटियाँ, लौकी की सब्जी, घी और खिचड़ी बनवा कर मुझे   साथ में  लेकर अस्पताल गये और वहाँ रोगियों को खाना  बाँटना शुरु किया, पहले कुछ दिन तो रोगी और रिश्तेदार  हिचकिचाये बाद में  मजबूरी में खाना  लेना शुरू कर दिया।

दस रोगियों के भोजन से शुरु हुआ सिलसिला पचास साथ लोगों के भोजन प्रति समय तक पहुँचा, इतना होने के बाद भी बाऊसा ने किसी से मदद नहीं मांगी अगर किसी ने सामने से दी तो मना भी नहीं किया। कुछ नेता लोगों ने अपने  सुझाव देने शुरु किये जो  राजनीती को बढ़ावा देते थे, यानि लोग चाहते थे कि यह कार्य किसी पार्टी के बैनर  के तहत चले तो बाऊसा ने उन्हें झिड़क दिया, वे कहते थे कि सेवा करनी ही है तो मेरे साथ यह टिफिन और केतली पकड़ कर चलो और खाना बाँटो।

 मुझे भी  खाना बाँटने के काम में इतना  मजा आता था कि कई बार होमवर्क करना अधूरा छोड़कर भी बाऊसा के साथ अस्पताल चला जाता था। जब  बाऊसा ने यक काम शुरु किया तब मैं   नवीं कक्षा में पढ़ता था  यह सिलसिला मेरे ग्याहरवीं की परीक्षा  होने तक चलता रहा और अब बाऊसा की अन्य लोग भी  सहायता करने लगे थे।   ग्याहरवीं  के बाद मेरी पढ़ाई छूट गई और गाँव भी।      

बाद में बाऊसा कई सालों तक यह कार्य करते रहे और आजकल खुद उनका  और बाईजी का स्वास्थय ठीक नहीं रहता और उम्र भी बहुत हो चुकी है,सो अब वे अपने बच्चों के पास उदयपुर रहते हैं। सुना है कि रोगियों को खाना देने का काम उनके जाने के बाद ज्यादा नहीं चल पाया।

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9 Responses to “सेवा का अनूठा तरीका”

  1. नाहर जी, मेरे लिखने का ध्येय आपने सबसे अच्छी तरह समझा. ऐसे प्रेरक हमारे आसपास हैं. पर हम महान बनने का एक ऐसा विराट चरित्र ढ़ूंढ़ते हैं जो न कभी बन पाते हैं और न यत्न ही करते हैं. हम जिन्दगी में बाऊसा या सरलाबेन बन जायें तो यह धरती कितनी अच्छी बन जाये!
    बहुत धन्यवाद नाहर जी. इस पोस्ट ने ही हमें करीब ला दिया!

  2. ज्ञान जी को तो साधुवाद पहले ही दे आया था और आपको इस जानकारी को विस्तार देने हेतु साधुवाद. इस तरह का क्रम आप दोनों से भविष्य में भी आपेक्षित है.

  3. भईया… कुछ कहने के लिये नही है… जी टॉक पर मिलते हैं।

  4. जी ऐसा ही कार्यक्रम कुछ वर्षों से उज्जैन में भी सरकारी अस्पताल में चल रहा है, जिसमें जनसहयोग से लगभग सौ-डेढ सौ लोगों का भोजन (सब्जी-रोटी) अस्पताल में पहुँचाया जाता है। ऐसे ही लोग हैं असली समाजसेवी… और क्या कहूँ…

  5. Shiv Kumar Mishra said

    Bahut-bahut dhanyawaad Professor Sahab ke baare mein jaankari dene ke liye..Awashyakataa hai hamaare beech ke aise hi logon se prerana lene kee…Hamare beech mein rahne waale hamein jitna prerit karenge, utna shaayd itihaas ke mahapurush na kar sakein.

  6. नीरज दीवान said

    प्रेरणास्पद प्रसंग हैं। सेवा भावना से ही समता आती है।
    फिर भी एक प्रश्न दिमाग़ में कौंधता है। कुछ धनाड्य लोग एक हाथ से सैकड़ों ग़रीबों के हक़ छीनते हैं और दूसरे हाथ से कुछ की सेवा कर देते हैं। हालांकि उपयुक्त लेख से इसका कोई सीधा लेन-देन नहीं है। किंतु हमें उस पहलू पर भी ध्यान देना चाहिए जो दो चेहरे लगाकर समाजसेवा का ढोंग करते हैं।

  7. Prashant Priyadarshi said

    क्या संयोग है, आप कल ही मेरे ब्लोग पर आये थे और आज मैं भी भटकते हुये आपके ब्लोग पर आ गया।
    और सबसे मजेदार तो ये है कि आप मेरे जिस ब्लोग पर गये थे उस पर तो कोई भी नहीं जाता, यहां तक की मैं भी जाना छोड़ दिया था। मैं जब अपना Stat Counter Check कर रहा था तो देख, कोई भुले भटके मेरे उस ब्लोग से हो आया है। तब पता चला की वो तो आप हैं।
    आज तो काम से फ़ुरसत नहीं है, कल फ़ुरसत में बैठकर आपका चिट्ठा खंघालता हूं।

  8. bhuvnesh said

    प्रोफ़ेसर साब के कार्य के बारे में जानकारी पाकर खुशी हुई. समाज में जो कुछ रोज घटित हो रहा है उसके बीच ऐसी एकाध खबरें पढ़कर सुकून मिलता है.

  9. ऐसे प्रेरक प्रसंगों को प्रचारित करना भी परम पुण्य का काम है। इसके लिए धन्यवाद!

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