॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

दावतों का मौसम

Posted by सागर नाहर on 30, सितम्बर 2007

पिछले कई दिनों तकनीकी  लेख लिखने का चस्का लगा था, आज बड़े दिनों बाद  चिठ्ठा लिख रहा हूँ। आजकल हमारे यहाँ  हैदराबाद में राजस्थानी परिवारों में का दावतों का मौसम चल रहा है। पिछले सप्ताह तो शायद  पूरे सात दिनों में   चार समय का खाना भी घर में  नहीं बना होगा। 

जब दावत नहीं होती इंतजार रहता है कि कब कहीं किसी दावत में जायें और जब जाना होता है तो लगातार इतनी बार की ऊब होने लगती है। सभी जगह एक ही मीनू- चना मसाला, एक हरी सब्जी और केर की सब्जी ( राजस्थानी सब्जी) , मिठाई में सभी जगह  दो  ही मिठाईयाँ गुलाब जामून और  काजू कतली.. उफ़्फ़  सभी जगह यही  आईटम खा-खा कर थक गये। जाओ तो परेशानी ना जाओ तो दूनी परेशानी। जिन चार समय हम नहीं गये  , ऐसा नहीं कि  उस समय दावत नहीं थी, दावत तो थी पर मैं चिढ़ कर नहीं गया।

कई लोग पेट भर कर खाना खा ले ने के बाद इस डर से कि यजमान कहीं नाराज ना हो जाये, फल फ्रुट की  स्टाल पर फल वल खा लेते हैं, बाद में पानी पूरी या चाट, उसके बाद आईसक्रीम और हद तो जब होती है तब आईसक्रीम खाने के तुरंत बाद केसर पिस्ता वाले गरम (उबलते) दूध की स्टॉल पर जा कर दूध भी पी लेते हैं। पता नहीं किस पेट में  डालते होंगे, और हजम भी कैसे हो जाता होगा। 🙂

अब आप दावतों का कारण सुनेंगे तो मन ही मन हँसे बिना नहीं रहेंगे।  वर्षाकाल के चार महीनों में जैन धर्म   में लोग  उपवास बहुत करते हैं तीन उपवास से लेकर एक एक महीने तक। इस उपवास के दौरान तपस्वी सिर्फ उबला पानी पीता है और  सूर्यास्त के बाद पानी भी नहीं पीता। इन उपवासों को  तपस्या कहा जाता है। इस तरह मेरी बड़ी दीदी ने पिछले साल एक महीने के लगातार उपवास की तपस्या की थी

तपस्या पूरी होने के बाद  जिस दिन तपस्वी आहार ग्रहण करता है उस दिन धूमधाम से  उनका स्वागत होता है और उस खुशी में  दावत रखी जाती है…….. बेचारा तपस्वी भूखा  रहे और लोग दावत उड़ायें। है ना मजे की बात। 🙂

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8 Responses to “दावतों का मौसम”

  1. दुर्भाग्य की बात यह है की तपस्याओं का असली महत्त्व तो कब का खो चुका है, अब तो आडम्बर और प्रपंच ही बचे है.
    मैं ऐसी दावतों का विरोधी रहा हूँ अतः जहाँ तक होता है शामिल नहीं होता. बाकि आपके मजे है, खूब उड़ाओ दावतें 🙂

  2. मिशनरी खब्बड़ लोगों को छोड़ दिया जाये तो दावत का एक प्रयोजन ये भी तो होता है कि समाज के सभी लोग, मित्र आदि इसी बहाने से एक दूसरे से मेल मिलाप भी तो करते हैं वरना आप अपने हर मित्र को हर हफ़्ते अपने घर तो बुला नहीं सकते। कभी अपने घर पर तो कभी किसी और के यहाँ दावत पर… मिलने मिलाने का सिलसिला यूँही चलता रहता है। बाकी अगर आपको दावत में गले तक भर भर कर खाने के द्रश्य अभी तक कौतूहलपूर्ण लगते हैं तो आपके लिये ईनो और हाजमोला हैं ना।

  3. सागर जी आपके ई मेल पते की आवश्यकता है। अगर मुझे योग्य समझें तो punit omar @ gmail. com पर भेजें।

  4. यह तो वही बात हो गई कि “आइए दावतों का मौसम है”!

    कहीं ऐसा तो नही हो रहा ना कि “खाइए खाइए, जी भर के खाइए, और फ़िर हाजमोला के गुण गाईए!”

  5. 🙂 ललचाते हो?

    मिशनरी खब्बड़- हा हा!! शब्दकोश में एक शब्द और बढ़ गया. 🙂

  6. तभी मैं कहूँ आजकल कम नजर आ रहे हैं आप..
    लगे रहिये 🙂

  7. Annapurna said

    यह तो अच्छी बात है कि आज भी लोग इतनी छोटी – छोटी बातों पर भी लोगों को बुलाते है और खाने में कोई कमी भी नही रखते।

    आप इन दावतों से नाराज़ मत होइए। कहीं सदभावना का यह दौर बन्द न हो जाए।

  8. ये क्या बिग बी दावत से नाराजगी, खूब खाईये, हाजमोला से पचाईये।

    वैसे तपस्या वाली बात सही है, कोई भुखा रहे, कोई दावत उड़ाये, ये बात ठीक नही, फिर भी मै तो खाने वाले डिपार्ट्मेंट से हूण इसलिये चलेगा 🙂

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