॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

अहमदाबाद में एक यादगार दिन

Posted by सागर नाहर on 21, अक्टूबर 2008

पिछली 4  अक्टूबर (रविवार) को मैं ६ घंटों लिए अहमदाबाद में था, दरअसल मैं राजस्थान जा रहा था  और हैदराबाद से अहमदाबाद की यात्रा के बाद अगली ट्रेन के लिये मुझे छ:- सात घंटों के  लिये  स्टेशन पर रुकना पड़ा।
स्टेशन पर पता  चला कि मेरे ग्रुप में एक यात्री का टिकट भूलवश  अहमदाबाद से आगे का नहीं  लिया  गया था, और  रविवार होने के कारण रिजर्वेशन का काऊंटर भी बंद हो चुका था सो मैने साईबर कॉफे में जाकर ब्लैक में (तत्काल में-150/- ज्यादा देकर खरीदे गये टिकट को ब्लैक में ही कहेंगे ना!!) )  बुक करवाकर प्रिंट ले लेने का निश्‍चय किया।  जब  मैं रेल्वे स्टेशन पर स्थित कॉफे में  पहुंचा तो  साईबर कॉफे को खुला छोड़कर मालिक नदारद थे, अब शुरु हुई  साईबर कॉफे की तलाश! बहुत देर इधर उधर भटकने के बाद  कोई कॉफे नहीं मिला, कई लोगों से पूछने के बाद किसी ने कॉफे बताने को राजी नहीं हुए।

दरअसल मैं हैदराबाद की ट्रेन से उतरने के कुछ ही देर बाद इस मिशन पर निकला था, सो नहा भी नहीं पाया था और एकदम भूत जैसा लग रहा था। (स्टेशन के बाथरूम में नहाना धोना इस मिशन के बाद ही हो पाया)

आखिरकार एक भले मानुस ने बताया कि आपको रिलीफ सिनेमा के पास एक कॉफे मिलेगा, चलते चलते जब मैं रिलीफ सिनेमा पहुंचने के बाद एक कपड़े की दुकान वाले से पूछा तो उसने भी एक बार मुझे नीचे से उपर तक घूरा और पूछा कहां से आये हो? मैने कहा हैदराबाद से !!  सुनते ही वह चौंक गया। अब मुझे मेरी गलती समझ में आई और गुजराती में बोलना शुरु किया और अपने आई डी कार्ड बताये,  तब जाकर मुझे  साईबर कॉफे का पता मिला।

अब मैने उन कपड़े की दुकान वाले भाई साब से पूछा  क्यों मुझे लोग अब तक कॉफे का पता नहीं बता रहे थे? तब उन्होने कहा कि बम ब्लॉस्ट होने के बाद यहाँ हर नागरिक एक तरह से चौकन्ना रहने लगा है। और हर नये आदमी को संदिग्ध समझने लगा है। देखा जाये तो यह अच्छा  ही है ।

खैर.. जब में कॉफे में पहुंचा तो अब  शुरु हुई साईबर कॉफे वाले की पूछताछ और रजिस्टर में इन्ट्री जैसा अमूमन में हम होटल में ठहरने के लिए करतेहैं।  इतनी जद्दोजहद के बाद जब मुझे जब कम्प्यूटर मिला तब तक रेल्वे ने चार्ट प्रिंट कर दिया था  सो टिकट भी नहीं मिला। इतनी मेहनत करने के बाद भी टिकट नहीं मिला और मेरे सहयात्री को सामान्य टिकट लेकर करनी पड़ी।

अब मजेदार बात आगे होती है,  रात को सूर्यनगरी  एक्सप्रेस से हमारी आगे की यात्रा थी, ट्रेन में जब बैठे तो पता चला कि लालू प्रसादजी ने रेल्वे को और ज्यादा मुनाफा दिलाने और  यात्रियों को परेशान करने का एक और नुस्खा खोज लिया है और वह है  साईड में जहाँ RAC  टिकट वाले लोग एक  बैठते हैं ( सिंगल सीट) उसमें अपर बर्थ और नीचे की  सीट के बीच में एक और स्लीपर सीट लगाना।  (७२ की बजाय ८४ सीट  का कोच बनाकर ) यहाँ देखें

दिन  को वह यात्री  तीन तीन वाली सीटिंग पर आ जायेगा। एक तरफ तीन और एक तरफ चार यात्री बैठेंगे। यानि  छह की बजाय अब सात यात्री उस पर बैठेंगे.. डिब्बे का हाल मानो अनारक्षित ( सामान्य)  डिब्बे सा हो गया है।

खैर… जब  ट्रेन में बैठे तो पता चला कि सभी यात्रियों के सीट के नंबर बदल गये हैं, हम चुपचाप खड़े हो गये कि जब टीटी आयेंगे सही नंबर पता चल जायेगा, भला हो एक यात्री का जिसने अपने मोबाईल से समस कर हमें सही सीट नंबर बता दिये। ( जी हाँ हम अभी तक बिना मोबाइल वाले हैं)  🙂

परन्तु जिस डिब्बे में में हमारे वह सहयात्री बैठे थे वहां हमारे सहयात्रियों से सब्र नहीं हुआ और पहले से उनकी सीट नंबर पर बैठे  यात्री को उठाने की जिद करने लगे ( उनका नंबर दूसरे कोच में था)  वह यात्री भी जिद पर अड़ गया। उसका कहना था कि  मैं इस सीट पर बैठ कर मुंबई से आ रहा हूं मैं नहीं उठूंगा।

झघड़ा झगड़ा इतना बढ़ गया कि बस दोनों लोग पीटते- पिटते बचे। ऐसा अक्सर बसों में होता है जब एजेंट एक ही सीट को चार चार यात्रिओं को बेच देते हैं, बस चलती रहती है, यात्री सीट के लिये झगड़ते रहते हैं।
इसके अनुभव भी कभी  फुर्सत में बतायेंगे।
बड़ी मुश्किल से  टीटी ने आकर परिस्थिती को संभाला और इस बीच वह हमारे उस सहयात्री  का टिकट चैक करना भूल गया जो सामान्य टिकट पर आरक्षित यात्रियों के डिब्बे में सफर कर रहा था।

यात्रा का आगे का विवरण और कभी..

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18 Responses to “अहमदाबाद में एक यादगार दिन”

  1. सही है, आपकी यात्रा विवरण मजेदार है। लेकिन कंही लगा कि आप बहुत जल्दी मे हो। यात्रा निबटाने के बाद विस्तार से विवरण लिखें, और ज्यादा मजा आएगा।

    झघड़ा : झगड़ा (ठीक कर लें, प्लीज)

  2. mamta said

    लालू के इस प्रस्ताव के बारे मे पढ़ा तो था और आपके अनुभव से जान पड़ता है कि इस तरह बिना सोचे-समझे सिर्फ़ मुनाफा कमाने के लिए ऐसा करना कितना ग़लत है ।

  3. शानदार यात्रा वर्णन

  4. भाई मेरे एक फोन तो करते….

    आपकी यात्रा सुखद रही होगी 🙂

  5. Amit said

    फिलहाल तो यह अतिरिक्त सीटों का मामला गरीब रथ वाली ट्रेनों में होगा लेकिन यदि चल निकला तो फिर अन्य ट्रेनों में भी लागू हो जाएगा! वाकई दिक्कत वाला काम हो जाएगा, उस समय फिर तीसरे दर्जे की एसी से फर्स्ट क्लास एसी में अपग्रेड करना पड़ेगा!! 😦

  6. मजेदार अनुभव रहा होगा ना…..

    मैं आपसे मिल नहीं पाया अफसोस रहेगा.. वैसे फोन कर लेते तो मैं टिकट देख लेता..

  7. @ अमितजी
    मेरे ध्यान से शायद सूर्यनगरी एक्सप्रेस की गिनती शायद गरीब रथ वाली ट्रेनों में नहीं होती है। परन्तु उसमें शुरुआत हो गई है।

  8. SHUAIB said

    आप कैसे भूल गए सागर भाई ?
    संजय या पंकज दोनों भाईयों मे किसी एक को सिर्फ फोन करदेते तो एक ब्लॉगरमीट भी होजाती और आपको साईबरकेफे ढूंडने मे तकलीफ भी ना होती। खैर आपतो खुद झंजट मे फंसे थे।
    अपनी यात्रा को आपने बहुत मज़े से बयान किया है। ट्रेन मे उन यात्रीयों का पिटते पिटते बचने और बस एजंट का एक ही सीट चार लोगों को बेचने की बात आपने बहुत साफगोई से बयान की है।

  9. ranju said

    आपका अनुभव तो मजेदार लगा ..आप कहाँ बार्दो होंद वाली हालत में है 🙂 बढ़िया लिखा आपने ..अहमदाबाद यात्रा की यादे जहन में ताजा हो गई …

  10. Abhishek said

    आप अभी तक बिना मोबाइल के हैं !
    वाह भाई… हम भी कभी ऐसा सोचते थे… लेकिन नहीं रह पाये 😦

  11. कितने ब्लॉगर बिना मोबाइल के हैं – यह जानना बड़ा रोचक रहेगा।

  12. रोचक अनुभव रहा, लालू अब ट्रेन के स्लीपर डिब्बों को भी “मुर्गी का दड़बा” या “सूअरों का बाड़ा” बनाने पर तुले हैं… कोई साधारण हेल्थ वाला माई का लाल साईड की बीच वाली बर्थ पर आराम से सोकर दिखा दे तो मैं लालू को इनाम दूं… लेकिन इस “चारा चोर” ने रेल्वे को बिहार जैसा बनाने की ठान ली है, जहाँ जनता इस व्यक्ति से जवाब तक नहीं माँगती कि 10-15 साल राज्य चलाने और बिहार में इतने प्राकृतिक संसाधन होने के बावजूद हम इतने गरीब क्यों हैं?

  13. काहे का गरीबरथ जी. बहुत सी गाड़ीयों में ऐसे बर्थ लग गए है.

    वैसे गरीबरथ में कितने गरीब यात्रा कर सकने की औकात रखते है? 🙂

  14. हे भगवान!! मुझे तो लगता है कि काफ़ी परेशानी हुई होगी, अहमदाबाद का माहौल इतना बदल गया है कि अपने ही देशवासियों पर शक किया जाता है, काश पहले से दिन फ़िर लौट आयें

  15. वाह, मजेदार अनुभव हुये !

  16. Lavanya said

    हैद्राबाद से अहमदाबाद की यात्रा का अच्छा बयान लिखा है आपने !

  17. काश आप भी मोबाईल वाले होते तो सुरत स्टेशन पर मूझे बुला कर मिल सकते । यह हम लोगोने मिलने का दूसरा मोका गंवाया ।
    फ़िर भी आप के अनुभव का बयान मझेदार है, काहे अनुभव कितना भी कटू हो ।
    पियुष महेता ।

    सुरत=395001.

  18. vartmaan samay-sandarbhon ka jeevant chitran!
    guptasandhya.blogspot.com

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