॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

श्री भगवान दास जोपट की हंसिकायें

Posted by सागर नाहर on 21, नवम्बर 2008

लेखक परिचय
bhagwan-das-ji
श्री भगवान दास जोपट
निजाम हैदराबाद के बाह्य क्षेत्र के शमशीरगंज में 15 अगस्त 1946 को मध्यम वर्गीय राजस्थानी ब्राम्हण परिवार में जन्म
पिता स्व. वैध पं जगन्नाथ जी जोपट
आरंभिक शिक्षा कायस्थ माध्यमिक पाठशाला ( हिन्दी माध्यम), तदुपरांत राजकीय सिटी कॉलेज एवं बाबू जगजीवन राम कॉलेज में इण्टर तक अध्ययन।
लगभग पच्चीस वर्षों तक हैदराबाद विश्‍वविध्यालय, हिन्दी विभाग से सन्नद रहने के उपरांत स्वैच्छिक सेवा निवृत।
एक व्यंग्य संग्रह : “भैंस संस्कृति” प्रकाशित ( आ.प्र. हिन्दी अकादमी के अनुदान सहयोग से।
विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं स्मारिकाओं, साहित्य की अनियमित पत्रिकाओं में व्यंग्य लेख प्रकाशित, रेडियो से प्रसारित।
छिटपुट रूपेण कविता, कहानी, आलोचना, रिपोर्ताज, संस्मरण आदि विधाओं में भी लेखन।
विगत एक वर्ष से कविता प्रधान मासिक “गोलकोण्डा दर्पण” में पत्रिका वीथिका स्तम्भ लेखन।
लघु पत्रिका आन्दोलन से रचनात्मक जुड़ाव।
संप्रति स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य।
हिन्दी लेखक संघ, गीत चांदनी, कादम्बिनी क्लब, साहित्य संगम, साहित्य सुमन, सांझ के साथी आदि संस्थाओं के सक्रिय सदस्य


सुर बदले, साज बदले पर गाना वही पुराना है,
मराठी अस्मिता तो महज बहाना है।
उनकी आंखो में बसा वोट बैंक का खज़ाना है,
कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना है।

***

कभी वे मनुस्मृति को गरियाती थी
आज वे मनुवादियों को गले लगाती है।
सत्ता के भी अजब- गजब खेल हैं,
माया से माया का यह कैसा मेल है।
***
गोडसे की गोली खाकर,
गांधी ने कहा
हे राम!
गांधी परिवार के राज में
जनता भज रही है
राम-राम-राम
***
उनका दावा है कि  वे
अव्वल दर्जे के सेक्यूलरिस्ट हैं
अल्प संख्यक और बहुसंख्यक के
अलग- अलग चश्में इसकी मिसाल है।
पहले ताला खुलवाया
फिर ढांचा ढ़हाया।
सेक्यूलरी कारनामों से उनकी पुरानी यारी है
अब देश ढ़हाने की बारी है।
***
धारा तीन सौ सत्तर के भी अपने जलवे हैं
देश के अन्दर देश जैसे कानूनी मसले हैं
एक तरफ सरकारी पैकेजों की भरमार है
तो दूसरी तरफ जीवन- यापन हेतू मारामार है
अभिशप्‍त जम्मू- कश्मीर का यही पसाना है
सत्ता के सौदागरों का यह प्रिय तराना है
***
उनका दावा है कि
जो कन्या उन्होने चुनी है
व्ह देश की भावी आंखे हैं।
मैने कहा
आपका चयन दूरण्देशी से परिपुर्ण है,
कन्या नेत्रहीन है।
***
जिन्दगी एक जुआ है,
स्टॉक मार्केट के मैदान में,
जो जीता वह नेता है।
जो हारा वह हर्षद मेहता है।
***
इधर जनपथ
उधर राजपथ
बीच में अग्निपथ
आम आदमी है
लथपथ-लथपथ-लथपथ
***
संविधान की अष्‍टम अनुसूची
के ढ़ोल में पोल है,
आंचलिक भाषाओं के समावेश ने
कर दिया हिन्दी में होल है।
***
इन दिनों मेरे देश की जनता के
कुछ यूं हो गये ज़ज़्बात
कि हिन्दी भी करने लगी
अंग्रेजी में बात।
घात-प्रतिघात जारी
सब्जी रोटी पर पित्जा बर्गर है भारी
कहे “जोपट” कविराय
सर्वत्र जल संकट है भारी
पेप्सी कोला पीकर
प्यास बुझाओ भाई।
***
चतुराई चूल्हे पड़ी
चक्की भई उदास
बहू ने सजाई किट्टी पार्टी
सास करे उपवास
***
निज बैंक बैलेंस
उन्नती सहै,
सब उन्नती को मूल।
बिनु निज बैंक बैलेंस के
मितत ना हिय को सूल।
***
दस जनपथ के घाट पे
भई लीडरन की भीर,
मनमोहन जी चन्दन घिसें
तिलक करे प्रियंका का वीर
***

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4 Responses to “श्री भगवान दास जोपट की हंसिकायें”

  1. एकदम झकास.

  2. यह टिप्पणी उड़नतश्तरी वालों की किसी कारण से प्रकाशित नहीं हो पाई

    राम राम राम—-बेहतरीन!! अच्छा लगा पढ़कर.

    समीर लाल

  3. उत्कृष्ट. इससे अधिक कुछ नहीं. आभार.

  4. Basant d jain said

    Bhai bahut khub

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