॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

और हम क्या कर सकते हैं?

Posted by सागर नाहर on 28, नवम्बर 2008

कल स्कूल से चैतन्य को लिवाने गया तो पता चला किसी बच्चे ने उसे पीट दिया है। छोटे बच्चों की लड़ाई में जब कारण का पता चलता है तो हमारे पास मुस्कुराने के अलावा कुछ नहीं होता है। पर रास्ते भर चैतन्य मुट्ठियाँ भींचता रहा और  गुस्से में कुछ बुदबुदाता रहा। जब घर  पहुंचे तो उसने अपनी मम्मी से कहा “उस लड़के को तो मैं छोड़ूंगा नहीं, आप देख लेना मम्मी! मुझे बरबस हंसी आ गई मैने चैतन्य से कहा जब आपको उस लड़के ने पीटा तब क्यों छोड़ दिया था?

आजकल हमारा भी यही हाल है, हर कोई आकर हमें मारकर चला जाता है, कभी बम से कभी बंदूक से तो कभी किसी और तरीके से। हमारे पास चैतन्य की तरह मुट्ठियाँ भींचने के अलावा कुछ भी नहीं होता।

*****

परसों दोपहर अचानक ही सिकन्दराबाद स्टेशन सिलसिलेवार बम धमाके हुए  और एकदम अफरातफरी मच गई,  फटाफट अग्निशमन दल, पुलिस और संबधित विभाग हरकत में आ गये, खून से लथपथ घायलों को एम्बुलेंस में लाद कर अस्पताल पहुंचाया गया। कुछ देर बाद पता चला कि यह सब राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन द्वारा जनता को जागरूक किये जाने के लिए  ने एक अभ्यास “मॉक ड्रिल” था।

Mok-Drill

पर जब हमारे पहचान वालों तेलुग समाचार चैनलों पर  इस कार्यवाही को देखा, पूरा समाचार जाने बिना परेशान  हो गये। इधर उधर दौड़ मचा दी, सभी पहचान वालों को फोन कर दिया कि सिकन्दराबाद स्टेशन पर बम फटे हैं कोई उधर ना जाये।

रात को घर पहुंच कर जैसे ही समाचार चैनल लगाये फिर उसी तरह के समाचार  देखकर  एकदम यूं लगा मानों मुंबई में  भी मॉक ड्रिल ही है पर अफसोस यह मॉक ड्रिल नहीं था।

मुंबई में हुए  आतंकवादी  हमले में   मारे गये सभी नागरिकों और शहीद हुए सभी बहादुरों को हार्दिक श्रद्धान्जली। देश हर बार की तरह एक बार फिर उनकी शहादत को भुला देगा और उनकी शहादत को यूं ही जाया होने देगा, और आतंकवादी एक बार फिर निर्दोष लोगों को मारेंगे, फिर कोई मोहन चंद शर्मा, हेमंत करकरे, विजय सालस्कर और अशोक काम्टे अपनी देशभक्ति के जोश में  देश पर शहीद हो जायेंगे और नामर्द नेता एक बार फिर बकवास करेंगे ” हम  किसी को छोड़ेंगे नहीं। जिन्हें पकड़ चुके हैं उन्हें फांसी पर लटकाने में आनाकानी करेंगे। एक बार फिर गृहमंत्री अपने सूट बदल बदल कर आयेंगे और चैनलों परपनी सफाई पेश करेंगे।
टीवी चैनल इस बीच फिर नाग, भूत- भूतनी और एलियन को गाय का दूध पिलाने बैठ जायेंगे।
….और हम क्या करेंगे? एक बार फिर चैतन्य की तरह मुट्ठियाँ भींचते हुए अगली पोस्ट लिखने बैठ जायेंगे। हद है बेबसी की भी।

फोटो हिन्दी मिलाप से साभार

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8 Responses to “और हम क्या कर सकते हैं?”

  1. kush said

    श्रद्धान्जली

  2. हद ही है बेबसी की….

  3. सही है – कल से दूसरे विषयों पर लेखन होगा। फिर मानवतावादी इन आतंकवादियों के पक्ष में माहौल बनाने लगेंगे। आज सेकुलर ब्लॉग ठेलकों की पोस्टें नहीं हैं। हफ्ते भर बाद आयेंगे! 🙂

  4. मेरी हालत भी चैतन्य जैसी ही है.

  5. यूनुस said

    इस बेबसी पर खीझ और गुस्‍सा आता है मित्र ।
    टी वी देखकर तो और ज्‍यादा गुस्‍सा आता है ।
    कितना निर्मम समय है ये ।

  6. अनिता कुमार said

    सही,बेबसी का एहसास बहुत गहरा है

  7. बहुत अच्छा लिखा है !

  8. A S MURTY said

    Sagarji Namaskar. Well written article. While it is true that the Jawans, the Commandos of NSG, the Mumbai Police and the Military etc. have played their crucial part in total dedication and the bulk of the blame lies with the politicians of our country, let us not also forget that it was the intelligence failure which allowed these terrorists to have easy access to Mumbai. Had the Coast Guard, the Mumbai Police and the Navy been much more alert, the battle would have been in the deep sea rather than at the Taj, the Oberoi or the Nariman House. And precisous lives, including those of our brave jawans and the commandos would not have been lost. Where were the likes of Shivraj Patil (since resigned), M K Narayan (the NSA), the Ministers for State of Home Affairs (there are are two such Ministers in the Union Cabinet), the Chief Minister, the State Home Minister for the full three days when the battle was being raged in the heart of Mumbai and the entire operation was being telecast by all the TV channels day in and day out ? Shame on our country’s politicians, without exception. But let us also ponder on this _ Aur Hum Kya Kar Sakte Hain ?”. We can do a lot but we do not do. Our mentality is to plead our “bebasi” and comment on our helplessness. No, we Indians should rise above it. We must move onto the streets and take part in all the affairs, instead of sitting in the comfort of our homes and watching the events unfold ‘helplessely’. This will not do if we are to survive as a nation first and to progress. We must stop the blame-game at our own doorsteps. If anyone is to be blamed for the state of affairs that we are in today, it us all collectively as Indians. We have failed ourselves and we have failed our nation. We have failed our forefathers who gave us this freedom. We have betrayed their fond hope of seeing India emerge as a strong nation. We are divided, let us accept this fact. On every front, we have our own regional, religious, caste, social status feelings and we just cannot act unitedly. And this gives a lot of room for being attacked and being bullied by all and sundry. We must not sulk with this feeling of “Aur Hum Kya Kar Sakte Hain”.

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