॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

थैंक्यू टीवी चैनल्स!

Posted by सागर नाहर on 22, जनवरी 2009

आप चौंक गये ना शीर्षक पढ़ कर!

मैं अपना कॉफे रात को दस- सवा दस बजे बन्द कर घर जाता हूं तब तक श्रीमतीजी का लगभग सारा काम निबट चुका होता है या फिर कभी किसी कारण से नहीं भी निबटा तो काम के साथ साथ टीवी देखना भी चालू रहता है, और ना चाहते हुए भी टीवी सीरीयल्स का डोज लेना पड़ता है।

ichhha-utran

 

पहले कहानी घर-घर की  उसके बाद क्यूं कि… उसके बाद कभी कभार मुझे समाचार देखने का मौका मिलता पर अक्सर होता ये कि 11 बजे अधिकतर चैनल और उनके रिपोर्टर अजीब से स्वर में (चैन से सोना है तो..) क्राईम समाचार पढ़ रहे होते। अंत में  डिस्कवरी चैनल पर कुछ देखा ना देखा और नींद आ जाती।

सास बहू ब्रांड की चमक फीकी होने लगी तभी एन डी टी वी के इमैजिन चैनल  का जन्म हुआ और  अब जस्सू बेन… और फिर मैं तेरी परछाई हूं, देखने पड़ते। ये अलग बात है कि धारावाहिक  स्टार के धारावाहिकों से लाख दर्जे बेहतर थे, पर धीरे धीरे जस्सू बेन भी बोर करने लगी और मैं तेरी परछाई… का समय बदल गया, तो कुछ देर (साढ़े दस से ग्यारह) तक समाचार या अपना कोई पसंदीदा चैनल/कार्यक्रम देखने का मौका मिल जाता, क्यों कि अब 11 बजे बालिका वधू “आनंदी” और साढ़े ग्यारह बजे उतरन की “इच्छकी” इंतजार कर रही होती। 🙂 

ये दो धारावाहिक दूसरे धारावाहिकों की वनिस्पत अच्छे लगते हैं, “आनंदी” ,”इच्छकी” और “तपस्या” का अभिनय बड़े बड़ों को दांतो तले उंगली दबवा देता है,  परन्तु ग्यारह बजे के बाद इन्हें देख पाना मुश्किल है, कई बार तो देखते देखते नींद आ जाती है।

पिछले हफ्ते इमैजिन चैनल ने खुश कर दिया कि अब जस्सू बेन…. शुक्र,शनि- रवि को आया करेगी। हाश!!!! यानि सोमवार से लेकर गुरुवार  तक दस से ग्यारह बजे तक कोई ऐसा धारावाहिक किसी भी चैनल पर नहीं बचा  जिसे जबरन देखना पड़ेगा। अब टी वी से वास्तव में  मुक्ति मिलेगी, रेडियो विविध भारती पर गाने भी सुने जा सकेंगे, पुस्तकें जिन्हे कई दिनों से पढ़ने का समय नहीं मिल रहा था, उसके लिये एक घंटा मिल सकेगा।

अब बताईये टीवी चैनल्स को धन्यवाद कहना सही है कि नहीं?

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11 Responses to “थैंक्यू टीवी चैनल्स!”

  1. Tarun said

    अपने लिये तो इनका आना ना आना दोनों बराबर हैं

  2. हम तो पहले ही इनसे मुक्त हैं… हालांकि मराठी के चैनल्स भी अब एकता कपूर के प्रभाव में आ रहे हैं, लेकिन फ़िर भी हिन्दी चैनलों जितना “गिरने” में अभी वक्त लगेगा… इसलिये रात 11 बजे तक एक बार न्यूज़ हेडलाईन्स और सिर्फ़ मराठी चैनल… बस फ़िर नींद…

  3. हम तो आज़ाद है और भगवान की दया से घर की महिलाओं का भी धारावाहिक-नशा उतर गया है. यानी टीवी से मुक्ति.

    आपको खुश देख हमें भी खुशी हो रही है….”हैप्पी टीवी स्वीच ऑफ डेज़…” 🙂

  4. yunus said

    हम्‍म । हम भी खुशनसीब हैं । ऐसा कोई रोग हमारे घर में नहीं है ।
    अच्‍छा है कि आप पढ़ें और विविध भारती सुनें ।
    है कि नहीं ।

  5. Amit said

    टीवी? वो क्या होता है?? 😉

    अपना तो मूर्ख बक्से यानि कि टीवी से नाता टूटे बौत टैम हो गया जी, अब तो कार्टून नेटवर्क भी देखना नहीं होता क्योंकि उस पर अजीबोगरीब कार्टून आते हैं (पोकेमॉन और पता नहीं क्या-२), जो अपने को पसंद थे (एक्समेन, जस्टिस लीग, सुपरमैन, स्कूबी डू) वो तो बन्द हो गए या बेकार हो गए। हिस्ट्री चैनल हमारा केबल वाला अब दिखाता नहीं (लगता है कि डीटीएच लगवाएँगे तभी देखने को मिलेगा), और रोज़ाना के साबुनों (सोप्स) में अपने को कोई रूचि नहीं, इसलिए टीवी देखना छूटा हुआ है।

    यदा कदा चलते फिरते थोड़ा बहुत देख लिया जाता है जैसे कि एनडीटीवी इमैजिन पर चल रही रामायण में आजकल ज़रा रोचक सा मामला आ रहा है राम और रावण के युद्ध का, तो बस वह देख लिया जाता है। बालिका वधु ठीक ठाक कार्यक्रम है, उसकी हर बात से सहमति नहीं (जो अंत में सीख दी जाती है), नियमित नहीं देखा जाता, कभी कभार देख लिया यदि और कुछ काम न हुआ तो!! 🙂

  6. mamta said

    bhai hum to t.v dekhte hai aur aajkal to sirf colors hi dekh rahe hai .

    vaise saas-bahu serials bund ho gaye ye sabse khushi ki baat hai kyunki baad me humne unhe dekhna bund kar diya tha .

  7. Abhishek said

    हम तो वैसे ही नहीं देखते 🙂

  8. janemaan said

    dhanywad sagar
    aap ke is vishleshan ke liye
    mujhe bahut pasand aaya
    aasha hai ke is rag se main bach gya hu , kyukoi jab se pune aaya hu tv dekhna hi nahi ho pata , lekin jab main aapne ghar jo ki sriganga nagar (rajsathan ) main hai , tha ..tab mummy aor bahan ki wajah se saas bahu ki bimari se gahshit tha.
    lekin ab main ek sawsth jivan bita raha hu

  9. जब टीवी देखने का मन करता था घर में नहीं था . अब तो मन ही नहीं होता !

  10. TV is TV it”s taste is never ending…

  11. सागर जी, बधाई की आप आपको कई चीजें झेलनी नहीं पड़ रही है। टीवी सीरियल किसी भारी यातना से कम नहीं है। मैं तो अपना लैपटाप लेकर जेल जाना पसंद करुंगा बजाय टीवी सीरियल देखने के। सारे सीरियल ही ऐसे हैं जो हमारा समय बर्बाद कर रहे हैं। बस थोडा सा रंग ढंग बदलता है तो लगता है नया है लेकिन है सब एक ही स्‍क्रीन के क्राकरोच।
    हालांकि, मैं तो अब न्‍यूज भी टीवी पर कम ही देखता हूं क्‍योंकि खबरें भी कम हो गई है टीवी न्‍यूज चैनलों पर।
    आम आदमी को तो छोडि़ए यदि आतंककारियों या तालिबानियों को ऐसे सीरियल लगातार दो साल दिखा दिए जाएं तो आत्‍महत्‍या कर लेंगे। शायद यही वजह है कि जहां भी तालीबानी गए उन्‍होंने टीवी और सिनेमा बंद करा दिए।

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