॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

थोड़ा मैं भी नोस्टेलजिया लूं

Posted by सागर नाहर on 5, फ़रवरी 2009

सर्दी आई नहीं कि अपने घर से दूर रह रहे सभी लोग सर्दी, गाँव  और घर को याद कर बुरी तरह नोस्टेलजिया रहे है। कोई तहरी खिला रहा है तो कोई खा रहा है। सब अपने बचपन में तापी धूप- अलाव, गुड़ मूंगफली, गज़क,कुतरी हुई गाजर- मूली को याद कर नोस्टेलजिया रहे हैं; इधर हैदराबाद में हमारा यह हाल है कि सर्दी के लिये बरसों से तरस रहे हैं। क्यों? पता है हैदराबाद में ढंग से सर्दी  पड़ना शुरु भी नहीं हुई कि तेज गर्मी पड़ने लगी है, दिन में तापमान  अभी  से 30 डिग्री के आसपास तो कभी-कभार उसके भी ऊपर जाने लगा है

दीपावली के दो दिन पहले जब बच्चों के लिये पटाखे खरीदने गये थे तब जरा सी सर्दी का अहसास हुआ था, और हमने अपने स्कूटर को और तेज चला कर उस ठंडी हवा- सर्दी के अहसास को अपने तन मन में समाने दिया। वो दिन और आज का दिन, ना तो ढंग से रजाई में लिपटकर सोने का आनंद ले सके ना ही गरम पानी से नहाने का। स्वेटर में अपने तन को घुसाये बरसों बीत गये।

बचपने में, गाँव में  शाम हुई नहीं कि अलाव जलाकर तापने के लिये घर से बहाना बना कर निकल जाते और देर तक (साढ़े आठ बजे तक!!!) तापते रहते, अलाव में तापना इतना आसान नहीं था, पहले उसके लिये जलाऊ  सामान जिसे हम “बाळ बुक्की” कहते थे वह ला कर पहले से जल रहे अलाव में डालना पड़ता था या अलाव जलाने वाले को बाळ बुक्की की रिश्वत देनी होती थी तब जाकर अलाव के सामने तापना मिलता था। बाळ बुक्की के रूप में रद्दी अखबार लाने वाले को ज्यादा देर तापने नहीं दिया जाता, क्यों कि  वह तो बड़े जल्दी जल जाते थे, जब कि  लकड़ी के टुकड़े , गत्ते- पुट्ठे  और इस तरह की देर तक जलने वाली चीजें लाने वालों को ज्यादा सम्मान मिलता और अलाव बुझने तक अंगारे तापने तक का मौका मिलता।

तापने के अलावा सर्दी  में खाने के लिये गर्मागर्म गुड़ की राबराबोड़ी की राब, कुळत-चावल  जिसमें नमक की जगह “ऊस” (ओस) डाला जाता है, और  हाँ  सबसे खास उड़द की दाल, बादाम, गोंद और ना जाने कितनी चीजों से बने लड्डू ( उड़दिया) और मेथी के लड्डू को कैसे भूल सकते हैं। यह चीजें तो सिर्फ सर्दी में ही खाई जाती है। उसके बाद फिर मकर सक्रान्ति के दिन “गेहूं का दूधिया खीच” उसके जैसी कई तरह की चीजें खाने मिलती। अब  तो इन चीजों को खाना तो दूर देखे बरसों  बीत गये।

ऐसा भी नहीं कि श्रीमतीजी को ये चीजें बनानी नहीं आती होगी,  गाजर का हल्वा और कुछ चीजें तो बनाती है पर पारम्परिक चीजें इल्लै….. हाँ उड़द मोगर (बिना छिलके वाली दाल)   के  लड्डू तो आज भी बनते हैं पर माँ के हाथ का स्वाद… आहा!

देखिये इन चीजों को याद करते  करते मुंह में पानी आने लगा  है। कहीं मैं भी नोस्टेलजिया तो नहीं रहा?

Advertisements

6 Responses to “थोड़ा मैं भी नोस्टेलजिया लूं”

  1. हां,ये बात तो है मां के हाथ के बने पक़वानो के स्वाद का कोई मुक़ाबला नही है।अब बहुएं बनाती ज़रुर है मगर उसमे वो मिठास नही होता।शायद प्यार कम और औपचारिकता ज्यादा होने की वजह से ऐसा होता होगा।

  2. सागर जी,
    अतीत मोह से कौन बच पाया है?उत्तर भारत में शीत भोजन पर्व लेकर आती है जो कई कई दिन चलता है.संधीना राजस्थान का पौष्टिक शीत आहार है.इस मोह को जीने के लिए अगला शीत प्रवास राजस्थान में कीजियेगा .

  3. मैं भी बचपन की यादों में खोने लगा था. वो दिन वापस आने से रहे…वे मिठाईयाँ भी नहीं….

  4. mamta said

    अब तो यादों से ही खुश होकर मजा ले लेते है सर्दियों का । 🙂

  5. हमने भी जमाने से ढंग की ठंडी नहीं देखी है। पिन्नियाँ, उड़दिया आदि बना तो लें परन्तु खाएगा कौन? माँ के हाथ वाला स्वाद नहीं आने का एक कारण हमारी बढ़ती उम्र व कम संवेदनशील स्वाद ग्रंथियाँ भी हो सकती हैं। अन्यथा हर पीढ़ी माँ के हाथ के स्वाद को ही क्यों याद करती ?
    घुघूती बासूती

  6. amit said

    नोस्टॉलजियालो खूब, यह तो अमुक जगह का दुर्गुण अथवा सद्गुण (जैसे चाहो देख लो) है कि सर्दी नहीं पड़ती। अभी दो दिन पहले बंगलूरू में मैंने भी यही अनुभव किया जब तापमान 25 दिग्री सेल्सियस महसूस किया!! 🙂

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

 
%d bloggers like this: