॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

आपने सुरत के रसावाले खमण खाये हैं कभी?

Posted by सागर नाहर on 24, फ़रवरी 2010

खाने पीने के मामले में सुरतीलालाओं का मिज़ाज़ बड़ा गज़ब का है, उन्हें ये रात दस बजे ये पता चले की वहां एक चाय का ठेला खुला है और क्या मस्त चाय बनती है तो फटाफट अपनी गाड़ी निकाल कर एक कट चाय पीने चले जयेंगे। कट चाय भले ही तीन की आती हो पर बीस रुपये का पेट्रोल खर्च करने में उन्हें बिल्कुल संकोच नहीं होता। आज भी काकी की पावभाजी खाने 18 किलोमीटर दूर कड़ोदरा चार रास्ता और एक अमरीकन मक्के का भुट्टा खाने के लिए दस किलोमीटर दूर कामरेज रोड़ पर आज भी लाइनें लगती है।

सुरत में खाने की एक से एक चीजें मिलती है जो आपको सुरत के अलावा कहीं नहीं मिलेगी और अगर मिल भी गई तो वो स्वाद नहीं मिलेगा जो सुरत में मिलता है। कई प्रख्यात चीजों में सुरती खमण सबसे खास है और ऊंधियु (ઉંધિયુ) हरे नारियल की पेटिस(લીલા નારેળ ની પેટીસ), गोटा (મેથી ના ગોટા) , लोचा (લોચો), खमणी (ખમણી ) , रतालु पूड़ी ( રતાળુ પુડી), घारी(ઘારી), पोंक(આંધણી વાની પોંક), राजा की लस्सी (રાજા ની લસ્સી) रेल्वे स्टेशन के सामने की  नवरंग की आईसक्रीम, बोम्बे ज्यूस का थिक शेक जिसे आपको मोटी स्ट्रा से खींच कर पीना पड़ता है आदि है।

इनमें से पोंक तो हरी ज्वार की बालियां होती है जिन्हें सर्दी के दिनों में राख (आंधळी वानी) में पकाया जाता है और फिर काली मिर्च की तेज बारीक पतली सी सेव (नमकीन ) के साथ खाया जाता है। बस इसका स्वाद बस खाकर ही अनुभव किया जा सकता है। एक चीज और भी है घारी जिसे चंदवी पड़वे के दिन ( शरद पूर्णिमा के दूसरे दिन) खाया जाता है और एक दिन में सुरती लाला लगभग 10 करोड़ की घारी खा जाते हैं।
ये हे सुरती खमण

आज से लगभग पैंतीस साल पहले ऐसे ही एक सुरती भाइयों की जोड़ी अशोक भाई और जेन्ती भाई  ने सुरतीयों के स्वाद शौक को ध्यान में रखकर कोई नई चीज बनाने का निश्चय किया और उसके बाद जो  चीज (वानगी ) बनी उसका नाम दोनों भाईयों  ने रखा रसावाळा खमण! (રસાવાળા ખમણ ) और उसके खाने के बाद खाने वाली लस्सी! (जी हां  एकदम गाढ़ी होने के कारण इस लस्सी को खाना पड़ता है आप इसे आसानी से पी नहीं सकते )

आज  इतने सालों के बाद भी रसावाळा खमण सुरती लोगों की पहली पसंद में से एक है। पहले चौक बाजार में गुजरात मित्र प्रेस के पास की गली में एक ठेले पर यह दुकान चालू की  और जब इसका स्वाद लोगों को भा गया तो इतनी भीड़ पड़ने लगी कि बाद में  रोड़ पर जगह जब कम  पड़ने लगी  और फिर  पास में ही एक दुकान में इस काम को चालू किया आज हाल यह  है कि  यह दुकान भी छोटी पड़ती है, और लोग रोड़ पर खड़े होकर इसे खाते हैं। और हां  इन्होसुरत के प्रख्यात जलाराम रसावाले खमण ने  आज भी अपने ठेले को  नहीं छोड़ा, दुकान भले ही बड़ी है लेकिन माल तो ठेले पर ही बिकता है।

आपने खमण के बारे में जरूर सुना होगा इसे लोग ढोकळा भी कहते हैं । लेकिन सुरत से बाहर यह स्पंज रूप में मिलता है जिसे लोग नायलोन खमण कहते हैं| अहमदाबादी नायलोन खमण में तो इतना मीठा पानी डाला जाता है कि उन्हें निचो कर शर्बत के रूप में पी लो। सुरती खाद्य चीजें बाकी गुजरात से एक मामले में अलग होती है। जहाँ पूरे गुजरात में मीठी चीजें पसंद की जाती है ( कई जगह तो  होटलों में तो  पंजाबी चना मसाला में भी  मीथी दाल की तरह गुड़ डाला जाता है)  वहीं सुरत की चीजों में तीखापन या तेज मिर्ची  ज्यादा होती है।

अशोक भाई -जेन्ती भाई का रसावाळा खमण भी बहुत तेज स्वाद  वाला  होता है।  खमण में एक तरह का  सब्जी  डाल कर ग्राहक को दी जाती है, ( इस सब्जी की रेसेपी वे नहीं बताते)  जिसे खाते समय आपके  एक हाथ में रुमाल होना जरूरी है; नाक और आँख पोंछने के लिए। आपकी आँखों से आंसू बहते जायेंगे या नाक बहने लगी इस के तेज स्वाद की वजह से लेकिन आप इसे  पूरा खाये बिना इसकी प्लेट नहीं छोड़ सकते।

मिथुन भाई अपनी दुकान पर
आज अशोक भाई के पुत्र मिथुन भाई (9974622890) इस व्यवसाय को बखूबी संभाल रहे हैं। रसावाले खमण के साथ हांडवो, खमणी और भी कई चीजें है पर लोगों की पहली पसंद तो रसावाला खमण ही है।  मिथुन भाई कहते हैं   कि पिछले दिनों एनडीटीवी के विनोद दुआ भी उनकी दुकान पर आकर अपने कार्यक्रम “जायके का सफर” के लिए    रसावाला खमण का स्वाद चख चुके हैं।  कई किताबों में उनकी इस डिश के  बारे  में छप चुका है।  साथ में मिथुन यह कहना भी नहीं भूलते कि रसावाले खमण खाने के बाद जब तक आप हमारी लस्सी नहीं पीएंगे मजा नहीं आयेगा।जैकी भाई लस्सी वाला

उसी दुकान के एक हिस्से  में जेन्ती भाई के  पुत्र जैकी भाई (फोन: 09898277441 ) अपने पिताजी का  लस्सी का कारोबार संभालते हैं, मैं रसावाले खमण से तृप्त  होकर मुंह से सीऽऽ सीऽऽ की आवाज करते हुए जैकी भाई की तरफ बढ़ता हूं तो जैकी भाई यह जानकर कि मैं हैदराबाद से आया हूं और अपने ब्लॉग में उनके बारे में लिखने वाला हूं  वे अपने दुकान की पाँच अलग अलग तरह की लस्सी की सुरती लस्सी गिलासें तैयार करवाते हैं।  लगभग हर जगह लस्सी में मलाई या आईसक्रीम ऊपर  से डाली जाती है लेकिन जैकी भाई इनमें श्रीखंड डालते हैं। खमण की एक प्लेट खाने के बाद मुझमें इतनी बड़ी गिलास लस्सी पीने की ना हिम्मत थी ना पेट में जगह सो एक छोटी गिलास पीने का आग्रह मैं टाल नहीं पाता, मुझे उनकी अड़धी ग्लास (आधी गिलास)  बहुत भारी पड़ रही है अब साँस लेने की जगह भी पेट में नहीं बची।

सुरती लोग जितना खाने के शौकीन होते हैं उतने ही खिलाने के और मेहमान नवाजी में तो उनका सानी कोई नहीं। जाते जाते मिथुन भाई की दुकान के बाहर दो लोगों को खमण खाते हुए बात करते सुनता हूं साल्लु आजे तो बहु तीख्खू छे @#$%^&* ( यहां वे अपने वाक्य के अंत में एक सुंदर सी गाली देना नहीं भूलते)  अरे! मैने आपको सुरत की  इतनी चीजें  अच्छी अच्छी चीजों के बारे  में बताया लेकिन  एक और खास चीज के बारे में बताना तो भूल ही गया; और वो है सुरत की गालियां! पक्के और  सच्चे सुरती  लोगों के मुँह से निकले एक वाक्य में अगर तीन गालियां ना निकले तो समझ लीजिये की बच्चा अभी नादान है, सुरत के रंग में नहीं रंगा।

मैं सच कह रहा हूँ ना अलबेला खत्री जी और पीयूष भाई मेहता जी?

(यह माईक्रोमेक्स का क्यू थ्री (Micromax Q3) एकदम बकवास फोन है बातें बड़ी बड़ी करते हैं और कैमरा  एकदम रद्दी है।आपने ऊपर के फोटो देखे हैं,  अगर इसके विज्ञापन से प्रभावित हो कर खरीदने की सोच रहे हैं तो ना ही खरीदें, पछतायेंगे।)

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24 Responses to “आपने सुरत के रसावाले खमण खाये हैं कभी?”

  1. आज की डायटिंग तो इसे पढ़कर ही निपट गई..कभी सूरा चले गये तो क्या होगा!! 🙂

  2. सूरा=सूरत

  3. सचमुच सुबह-सुबह आपने “वर्चुअल” नाश्ता करवा दिया सागर भाई…
    वैसे हम इनमें से दो आईटम “ऊंद्यो” और “गोटा” खा चुके हैं, क्योंकि हमारी सगी मामी जी गुजरात से ही हैं… 🙂 बाकी के आइटम तब खायेंगे जब बेंगाणी बन्धुओं से मिलने जायेंगे… 🙂

  4. बड़ी जायकेदार पोस्ट है, मजा आ गया. हम भी सूरतवासी है काहे कि घर है अपना उधर. उधर 10 साल रहे भी.

    एक बात आपने नहीं बताई वह है सुरती बोली. गुजराती है मगर हटके कुछ कुछ तुतलाती. सुनने में आनन्द आता है, बोलने में भी 🙂

  5. सागर भाई, आपके सुरत-प्रेम को नमन । हाँ, मैं शुद्ध और काफ़ी पीढीयोँसे मूल सुरती होने पर भी ख़ाने के मामलेमें अपने पचन-तंत्र के आदेश के अनुसार थोडा संयमित रहता हूँ । और साथमें कम्पनी के वगैर ऐसी चीज़ोंको ख़ाना मझा नहीं आता, क्यों कि मेरे हिसाबसे आजकल ज्यादा दाम ले कर एक ग्राहक को दो ग्राहक की क्वोन्टीटी जबरजस्ती बेची जाती है । इस लिये मं इच्छा होने पर भी इस आईटम का टेस्ट नहीं कर पाया हूँ, आज़तक़ । पर अगर सागरभाई अपनी अगली सुरत की मुलाक़ात के दौरान मेरा एडवान्समें दूरभाषी सम्पर्क करते है, और कार्यक्रम बनाते है तो उनका साथ ले कर इन दोनों चीज़ों को चख़ना या आधा ख़ाना-पीना ( यहाँ पीना का मतलब सिर्फ़ थीक शैइक या लसी है, क्यों कि मैं चाय और कोफ़ी से भी दूर हूँ और उनके कहने के अनुसार यहाँ पीना यानि ख़ाना ही है ) तय करेंगे ही करेंगे ।
    एक और बात की यह रसावाला खमन नाम मूल रूप से इन लोगो का आविष्कार नहीं है क्यों कि जब मैं 12-13 साल का था, करीब इ. स. 1962में तब सुरतमें बालाजी रोड पर रहता था और वहाँ एक कन्या हाई-स्कूल थी, बक्लि, आज भी है, बहा एक दूकानमें रसा वाले खमन मैंनें सबसे पहले देख़े और चख़े थे । हाँ, ख़मन में सब्जीयाँ नहीं होती थी पर सादे होते थे और रसे का स्वाद जयन्तिभाई की तरह शायद नहीं हो कर थोडा सिम्पल हो सकता है । वहाँ आज वे बिकते है या नहीं वह मूझे पता नहीं है और वे दूकानदार और जयन्तिभाई कोई कुटूम्बी है या नहीं वह भी पता नहीं है । पर ‘रसावले खमन’ यह नाम कमसे कम 1962 के पहेले का है ही है वह बात पक्की ।
    पियुष महेता ।
    (नानपूरा-सुरत-395001)

  6. एक और अचरज की बात तो सागरभाईने जो सुरत की (उनके अनुसार मीठे (?)लहज़े से बोली गई गाली की बात ) तो मेरी अपनी ही नहीं मेरे सुरत और मुम्बईमें रहने वाले चचेरे भाईओंको किसी को इस प्रकारकी गालियाँ बोलने की आदत नहीं है । हमारा गालि कोष गधे, बदमाश और मुर्ख़ पर समाप्त हो जाता है । वह भी कभी कभी । गुस्से में भी इतने तक़ ही । यह आदत बचपन से ही रही है, जबसे सागर भाई नें लिख़ी या नहीं लिख़ी पर इशारे से बताई गाली, गाली है वैसा ज्ञान प्राप्त हुआ । और मैं वह भी मानता हूँ, कि जब इन्सान के पास अपनी गलत बातेँ किसी पर थोपनेमें असफ़लता मिलती है तब गालि-गलौच का आशरा सामने वाले को भयभीत करने के लिये दुनियामें सभी जगह गाली-प्रदान की सहाय ली जाती है ।
    पियुष महेता-सुरत-395001.

  7. kavita said

    sagarji bahut khub maaal uda kar aa rahe hai surat se.lassi aur malai vali ab khud hi sochiye mere muh me kitana paaani aa raha hoga.(meri doodh malai vali post yaad hai na?)

  8. आती हूँ आपके घर काम -काज से फुर्सत पा कर … 🙂

  9. anitakumar said

    अब तो लगता है सूरत जाना ही पड़ेगा ये रसावाले खमण खाने। लस्सी तो यहां भी खाई है बादाम काजू के साथ श्रीखंड के साथ नहीं, दादर स्टेशन के बाहर जो लस्सी मिलती है वो काफ़ी मशहूर है।
    इन रसावाले खमण के बारे में पढ़ कर मुझे याद आ रहा है कि अलिगढ़ में भी एक ऐसी ही मशहूर दुकान हुआ करती थी जहां आलू की कचौड़ी मिला करती थी और आदमी सी सी न करे और नाक कान से धुँआ न निकले तो दुकानदार अपनी दुकान बंद करने को तैयार था। आलू की कचौड़ी खाने के बाद उसी की दुकान से खाया जाता था मोतीचूर के लड्डू…॥:)

  10. सूरत के खानपान के चर्चे पढ़ कर मेरा मन कर रहा है कि इक बार सूरत घूम कर आयें

  11. वाह जी अब तो हमें सूरत जाना पड़ेगा, ये खमण खाने के लिये… नहीं तो महावीर सेमलानी जी से मँगवा कर खा सकते हैं।

  12. वाह!जा आ गया। सूरत का खमण तो नहीं खाया किन्तु गुजरात के बहुत से पकवान जो आपने गिनवाए हैं खाए हैं। और आप सही कह रहे हैं, गुजरात के अलग अलह भागों में भोजन का स्वाद बहुत अलग होता है। कभी सूरत भी जाएँगे।
    घुघूती बासूती

  13. naresh said

    बहुत विस्तार से जानकारी करा दी सुरती कल्चर की | आप ने एक जगह की लस्सी टेस्ट नहीं की है वो है जनता डेयरी (शिन्गापुर वाड़ी) | मै वहा तकरीबन १० साल रहा हूँ | शायद अपने गाँव को भी इतना नहीं जान पाया हूँ जितना कि सूरत के बारे में जानता हूँ | आपने जो बाते इस शहर के बारे में लिखी है वो बिलकुल सत्य है | रस्सा वाला खम्मन तो लगभग रोज दोपहर के नाश्ते में होता ही था क्यों कि मै घूमने फिरने का ही काम करता था |

  14. संजय अनेजा said

    वाह सागर भाई, इतनी जबरदस्त जानकारी दी आपने। अब ये तो नाइंसाफ़ी है न कि इन चीजों को टेस्ट करने के लिये सूरत जाना पड़ेगा, आउटलेट खुलवाने की सलाह नहीं दी क्या इन्हें? अब सूरत की सूरत देखने की कोई सूरत बने तो रसावाले खमण खाने को मिलें। आपको व आपके परिवार को होली की बहुत-बहुत शुभकामनायें।

  15. ePandit said

    आपकी पोस्ट पढ़कर हमें भूख लग आई। कुछ खाने का देखते हैं जुगाड़, बाकी कभी जिन्दगी में चक्कर लगा तो आपके बताये खमण खायेंगे। 🙂

  16. कहने का अब मन नहीं, वह तो इस रसावाला खम्मण में भटक गया है
    अब तो बस सूरत जाने की सोच रहे 🙂

  17. सूरत जाना पड़ेगा। रसा वाला खम्मण खाने के लिए। वैसे यहाँ कोटा में उस के मुकाबले की कचौड़ियाँ बनाते हैं।

  18. बहुत ही जायकेदार पोस्ट है।

    ये सूरत वाले तो खाने में इन्दौरियों जैसे ही निकले 🙂

  19. सागरभाई,
    काशी का मरण और सूरत का भोजन ऐसी गुजराती में कहावत है|हम सूरत तो ज्यादा गए नहीं है,पर सूरत की घारी बहोत खाई है|रही खमण की बात वो तो भाई बरोड़ा में भी खमण का ज्यादा चलन है|हर गली नुक्कड़ पे एक खमण की दुकान मिल ही जाये|गुजराती पैसे कमाते है और खर्च भी करते है|भारत में हम बहोत जगह पर गए है,कोई भी पर्यटन स्थल हो हमने वहा ज्यादातर गुजराती पाए है|गुजरात के शहर की एक खाने की आयटेम प्रशिध्ध होती है|जैसे बरोड़ा की भाखरवडी और सोलापुरी चेवडा,अहमदाबाद के भजिये,डाकोर के गोटे|अब ये अहमदाबाद की साबरमती जेल के केदियो के बने भजिये खाने के लिए भी लम्बी लाइन लगती है|सुभाष ब्रिज के पास साबरमती जेल की दुकान है|वही कैदी ही सब सञ्चालन करते है|
    कुछ तकनिकी मुस्किल से हमने ब्लॉग डिलीट करके नया बनाया है|आप मुलाकात लेते रहना|आपके प्रतिभाव आवकार्य है|

  20. Basant jain surat said

    Wah sagar bhai thanks 4 delicious khana kha kha ke me to mota ho gaya hu

  21. kiran said

    thanks sagar bhai aap ne to nam kama liya kiran (Amroli)surat

  22. kiran said

    sagar ji mere ko bhul gaye hai kiya kiran kothari 09879164737 Amroli (surat)

  23. Rakesh jaipur said

    sagar ji aap kaha ho abhi

  24. સુરત નું જમણ ને કાશી નું મરણ bilkul saty baat hai . meree amma Susheela Godiwala ke poorvaj Suratee hain …humare Ghar per Suratee aur U.P. ka bhojan bana
    karta tha aur Vivaah ke baad Jain family mei Jainee Food bhee khaya aur seekha hai …Nice post.

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