॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

Archive for the ‘प्रेरणा’ Category

हेट्‍स ऑफ यू, अभिनया

Posted by सागर नाहर on 1, फ़रवरी 2010

मैं अपने कॉफे में सिनेमा के टिकट भी बेचता हूं, क्यों कि मैने इजीमूवीज की  फ्रेन्चाईजी ले रखी है। इस काम के लिये  कुछ दिनों पहले मुझे एक थियेटर में जाना पड़ा, वहां एक बहुत बड़ा पोस्टर दिखा फिल्म थी शम्बो शिव शम्बो। इस पोस्टर पर एक नवोदित अभिनेत्री अभिनया का फोटो लगा था।

कॉफे में आकर उत्सुकता मैने गूगल में अभिनया को खोजा तो आश्चर्य चकित रह गया,  क्यों ?

आप जानेंगे तो आप भी दंग रह जायेंगे  कि मैं क्यों दंग था इस अभिनेत्री के बारे में जानकर। अगले दिन सुबह ही हिन्दी मिलाप के रविवारीय परिशिष्‍ट मिलाप मजा में अभिनया से संबधित एक छोटा सा संपादकीय लेख पढ़ा।

अब मैं  गूगल पर जो कुछ देखा-सुना उसे बताने की बजाय हिन्दी मिलाप (मजा) में जो कुछ पढ़ा उसे ही अक्षरश: यहाँ टंकित कर रहा हूँ।

प्रेरणा:

किसी सामान्य व्यक्‍ति को विकलांग (मूक-बधिर) का रोल करते हुए तो आपने कई फिल्मों  में देखा होगा (संजीवकुमार, जया भादुड़ी- फिल्म कोशिश) लेकिन क्या कभी किसी मूक-बधिर को, फिल्मों में सामान्य व्यक्ति का रोल करते हुए देखा है? जी हाँ, यह असंभव- सा लगने वाला कार्य कर दिखाया है- हैदराबाद की ही अभिनेत्री  ’अभिनया’ ने। सुनहरे पर्दे पर उस सुंदरी के चेहरे को देखकर किसी को विश्‍वास ही नहीं होगा कि  इतना अच्छा अभिनय करने वाली इस युवती  से प्रकृति ने सुनने और बोलने की शक्‍ति छीन ली है। श्रव्य और वाक शक्‍तियों से वंचित होने के बावजूद उसने अपनी मस्तिष्क की तीसरी शक्‍ति के द्वार खोल दिये हैं और तमिल फिल्म  ’नडोदिगल’ एवं तेलुगु फिल्म ’शम्भो शिव शम्भो’  में अपने अभिनय  से ’अभिनया’ ने अपनी विकलांगता को ही विकलांग कर दिया।

इस हैदराबादी अभिनेत्री ’अभिनया’  ने अपने अभिनय द्वारा अपनी खामोशी को शब्द दिये हैं।  अपने गूंगे और बहरेपन को हराने का लक्ष्य अभिनया ने बचपन से ही तय कर रखा था। मारेडपल्ली में मूक एवं बधिर  स्कूल और बाद में मॉन्टेसरी तथा सेन्ट एन्स स्कूल  तारनाका में पढ़ते हुए उसने सोचा था कि वह फिल्म स्टार बनेगी और अंतत: अपने लक्ष्य को प्राप्‍त कर लिया।

पिता आनंद वर्मा ने अपनी सुन्दर बेटी की पैदाइश के समय ही सोचा था कि वे उसे अभिनेत्री बनाएँगे। इसीलिए उन्होने अपनी बेटी का नाम ’अभिनया’ रख दिया। लेकिन उस समय उस पूर्व सैनिक को पता नहीं था कि उनकी बेटी सुन नहीं सकती और बाद में यह भी  पता चला कि कि वह बोल भी नहीं सकती। फिर भी उन्होने हिम्मत नहीं हारी। वे अभिनया को कई फिल्मों की शूटिंग पर ले जाते थे। जैसे जैसे वह बड़ी होने लगी, वह फिल्मों के पोस्टर्स की ओर इंगित कर, इशारों में ही उन्हें बताती कि एक दिन उन पर उसकी तस्वीर होगी।
माँ हेमलता बताती है कि संवादों के ले ’लिप-मूवमेन्ट’ समझते उसे देर नहीं लगती और मुश्किल से दो टेक में उसका शॉट ’ओके’ हो जाता है। उसके अभिनय को देखते हुए उसे एक और तमिल फिल्म के लिए साइन किया गया है।

सच है कि समस्या चाहे जो हो, संकट चाहे जैसा हो, इच्छा शक्‍ति और कुछ करने का मजबूत इरादा उस संकटों को रास्ते से हटने पर मजबूर कर देता है।… और निश्‍चित ही यह कान और ज़बान वालों के लिए प्रेरणास्त्रोत है।

सलाम अभिनया! आपकी इच्छा शक्‍ति को भी सलाम।

फोटो चेन्नै ओनलाईन से साभार

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डॉ नौतम भट्ट- एक अज्ञात भारतीय-वैज्ञानिक

Posted by सागर नाहर on 15, जुलाई 2009

या नींव के पत्थर!!

आपमें से  कितने लोगों ने डॉ नौतम भगवान लाल भट्ट का नाम सुना है?  अच्छा अब बताइये आपने अग्‍नि, पृथ्वी, त्रिशूल, नाग, ब्रह्मोस,धनुष, तेजस, ध्रुव, पिनाका, अर्जुन, लक्ष्य, निशान्त, इन्द्र, अभय, राजेन्द्र, भीम, मैसूर, विभुति, कोरा, सूर्य.. आदि नाम सुने हैं? अब आप पहचान गये होंगे कि ये सब भारत के शस्त्र हैं। अब मैं एक और प्रश्न पूछना चाहूंगा कि  कि इन सब शस्त्रों के साथ किसी सबसे पहले वैज्ञानिक का नाम जोड़ना हो तो आप किसका नाम जोड़ना पसन्द करेंगे? डॉ कलाम ही ना !! अगर  मैं कहूं कि डॉ. अब्दुल कलाम से पहले डॉ नौतम भगवान लाल भट्ट का नाम जोड़ना ज्यादा सही होगा तो?  आपको आश्‍चर्य होगा क्यों कि आज तक किसी ने डॉ साहब का नाम भी नहीं सुना।

मशहूर गुजराती मासिक पत्रिका सफारी ने सन् २००५ के  अक्टूबर अंक के संपादकीय में संपादक श्री हर्षल पुष्‍पकर्णा जी ने जब पाठकों से यह प्रश्न पूछा था तब तक मैं भी डॉ साहब के नाम से अन्जान था।  डॉ नौतम भट्ट का २००५ में देहांत हो गया था, और इतनी बड़ी शख्सियत के बारे में हम उनके निधन के बाद जान पाये कितना दुखद: है।

आपकी उत्सुकता बढ़ गई होगी.. आगे का विवरण में सफारी के शब्दों को ही अनुवाद करने की कोशिश कर रहा हूँ। हिन्दी- गुजराती में लिखने की शैली थोड़ी अलग होती है सो कहीं कहीं छोटी बड़ी गलती रह पाना संभव है।Safari

अग्‍नि, पृथ्वी, त्रिशूल, नाग, ब्रह्मोस,धनुष, तेजस, ध्रुव, पिनाका, अर्जुन, लक्ष्य, निशान्त, इन्द्र, अभय, राजेन्द्र, भीम, मैसूर, विभुति, कोरा, सूर्य.. इस सब शस्त्रों के नाम के साथ अगर किसी एक व्यक्ति का नाम जोड़ना हो तो शायद   हमारे मन में ए. पी. जे. कलाम के अलावा दूसरा नाम याद नहीं आयेगा। कलाम के बाद अगर दूसरे नंबर पर जामनगर के नौतम भगवान लाल भट्ट का नाम अगर माना जाये तो?  देखा जाये तो उनका नाम दूसरे स्थान पर उचित नहीं माना जाना चाहिये, क्यों कि भारत में सरंक्षण शोध की नींव रखने वाले या सरंक्षण के क्षेत्र में  स्वावलंबन  के लिये जरूरी संसाधन/ संशोधन के पायोनियर डॉ कलाम नहीं बल्कि डॉ नौतम भट्ट थे, और कुछ समय पहले आपका ९६ वर्ष की उम्र में देहांत हुआ तब इस दुखद घटना को हमारे समाचार माध्यमों ने अपने चैनलों- अखबारों में बताया भी नहीं। सरंक्षण के क्षेत्र में उनके अतुल्य- अनमोल योगदान को  नमन करना तो दूर भारत में ( या गुजरात में) ज्यादातर लोगों ने उनका नाम भी नहीं सुना हो इसकी संभावना भी कम नहीं!

जामनगर में 1909 में जन्मे और भावनगर तथा अहमदाबाद में स्कूली शुरुआती शिक्षा के बाद  में बैंगलोर की इन्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ सायन्सिस में डॉ सी वी रमन  के सानिध्य में  फिजिक्स में MSc  पास करने वाले नौतम भट्ट ने 1939 में अमेरिका की मेसेचुएट्स इन्स्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी में इसी  विषय में डॉक्टरेट की पदवी हासिल की।  भारत की आजादी के 2 वर्ष बाद डॉ भट्ट सरंक्षण विभाग में जुड़े और नई दिल्ली में डिफेन्स साइन्स लेबोरेटरी की स्थापना की।  सेना के लिये  रेडार संशोधन विभाग की भी स्थापना की, जिसमें वर्षों बाद नई पीढ़ी के वैज्ञानिक अब्दुल कलाम के नेतृत्व में बनने वाली डिफेन्स रिसर्च लेबोरेटरी और उसके बाद डिफेन्स एवं रिसर्च डेवलेपमेन्ट ओर्गेनाईजेशन (DRDO) के नाम से मानी जाने वाली थी। इस संस्था में  1960-65  की अवधि में स्वदेशी संरक्षण तकनीक (डिफेन्स टेक्नोलोजी) का विकास करने के लिये बम के फ्यूज, हीलीयम नियोन लेसर, सोनार, सेमी कन्डक्टर, चिप, रेडार आदि  से संबधित शोध की गई वे सारी शोध नौतम भट्ट द्वारा डॉ कलाम जैसे युवा वैज्ञानिकों को दिये गये मार्गदर्शन की आभारी थी।  कई शोधों को रक्षा मंत्रालय द्वारा मिलिटरी (सेना) के लिये गोपनीय वर्गीकृत (classified) माना क्यों कि उनकी गोपनीयता बरकरार रखनी बहुत ही आवश्यक थी। सरंक्षण के क्षेत्र में डॉ नौतम भट्ट ने संशोधकों-वैज्ञानिकों की एक फौज ही खड़ी कर दी थी जो भविष्य में  अगिन, पृथ्वी एवं नाग जैसी मिसाइल्स और राजेन्द्र तथा इन्द्र जैसे रेडार, वायर गाईडेड टोरपीडो तथा एन्टी सबमरीन सोनार का निर्माण करने वाली थी। ध्वनिशास्त्र (acocstics)  में डॉ भट्ट के अपार ज्ञान का लाभ सोनार डिजाईनर को मिला ही लेकिन  दिल्ली में भारत के सर्वप्रथम 70mm के दो सिनेमा थियेटर ( ओडियन एवं शीला) के लिये आपने साऊंड सिस्टम तैयार की। मुंबई के बिरला मातुश्री सभागृह  की 2000 वॉट के स्पीकर्स वाली साउंड सिस्टम भी डॉ भट्ट ने ही बनाई थी।

राष्‍ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन के हाथों 1969 का पद्मश्री पुरुस्कार प्राप्‍त करने वाले डॉ भट्ट को भारत की डिफेन्स रिसर्च के भीष्‍म पितामाह के रूप में कितने लोग जानते हैं? लगभग कोई नहीं। इसका कारण है जेनेटिक्स के विशेषज्ञ डॉ हरगोविन्द खुराना, भौतिकशास्त्री चंद्रशेखर सुब्रमनियम, बेल टेलिफोन लेबोरेटरी के नियामक कुमार पटेल, अवकाश यात्री कल्पना चावला, रोबोटिक्स के प्रणेता राज रेड्डी आदि की तरह नौतम भट्ट भी अपना देश छोड़कर अमरीका में स्थायी हो गये होते तो आज उनका नाम भी गर्जना कर रहा होता, परन्तु भारत को रक्षा क्षेत्र में स्वावलम्बी बनाने की महत्वाकांक्षा को उन्होने खुद को हमारे लिये अंत तक अज्ञात ही रखा।

-हर्षल पुष्पकर्णा

जब मैने इन्टरनेट पर डॉ भट्ट के  नाम को सर्च किया तो कई घंटों खोजने के बाद मात्र पद्मश्री पुरुस्कार की लिस्ट में उनका नाम मिला,इसके अलावा कहीं किसी भी भाषा में कोई जानकारी नहीं मिली।
सन् 2009 डॉ नौतम भगवान लाल भट्ट की जन्म शताब्दी का वर्ष है  आप को हम नमन  करते हैं।

सफारी का जालस्थल

पोस्ट की चर्चा अमर उजाला में ( सौजन्य से अजय कुमार झा एवं पाबला साहब)

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Missiles

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श्रीलक्ष्मी सुरेश: छोटी उम्र में बड़े कारनामे

Posted by सागर नाहर on 26, जून 2009

जिस उम्र में छोटी बच्चियां गुड्डे- गुड्डियो के  विवाह करवाने के खेल खेला करती है, उस उम्र में केरल की एक छोटी सी बच्ची  श्रीलक्ष्मी सुरेश ने वेब डिजाईन करना शुरु कर दिया।sreelakshmi

छ: साल की उम्र में अपनी स्कूल की साईट बनाई उसके बाद श्रीलक्ष्मी रुकी नहीं और कुछ दिनों पहले उसने केरल बार काऊंसिल की साईट डिजाईन कर विश्‍व में सबसे छोटी वेब डिजाईनर होने का गौरव प्राप्‍त कर लिया।

आइये श्रीलक्ष्मी की डिजाईन की हुई साईटस देखते हैं।

श्रीलक्ष्मी  का जाल स्थल

लोगो का सर्च इन्जिन

Bar Counsel of Kerala

EDesigns इस कंपनी की सी ई ओ होने के कारण वह विश्‍व की सबसे छोटी सीईओ भी है।
श्रीलक्ष्मी की फोटो गैलरी

अपनी स्कूल की वेब साइट

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विकीपीडिया पर श्रीलक्ष्मी सुरेश

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सेवा का अनूठा तरीका

Posted by सागर नाहर on 16, अगस्त 2007

ज्ञानदत्तजी के चिट्ठे पर आज  ज्ञानजी ने पद्मावती सुब्रह्मण्यन के लेख का  हिन्दी अनुवाद किया है। लेख में सरलाबेन द्वारा किये जा रही अनोखी सेवा का  जिक्र किया है, निश्चय ही सरला बेन तो प्रशंषा की पात्र है ही; परन्तु पद्मावती जी और ज्ञानजी दोनों की भी प्रशंषा की जानी चाहिये, जिन्होने हमें  यह जानकारी दी।

राजस्थान के मेरे छोटे से कस्बे देवगढ़ में हमारे एक पड़ौसी प्रोफेसर हैं  श्री मदन लाल जी सोनी, जिन्हें हम आदर से बाऊसा (बड़े पिताजी) कहते हैं, और उनकी पत्नी को बाईजी। बाऊसा के बारे में एक किवंदती थी कि वे बहुत ही अक्खड़ हैं, किसी से सीधे मुंह बाट नहीं करते। पर बाद में पता चला कि वे बहुत ही स्वाभिमानी थे और गलत बात को किसी भी कीमत पर सहन नहीं करने की वजह से लोग  उनके बारे में इस तरह प्रचारित करते थे। बरसों तक उदयपुर में फिजिक्स पढ़ाने के बाद बाऊसा रिटायर हो कर देवगढ़ आ गये और एक उम्दा कार्य शुरु किया। जो कुछ हद तक सरलाबेन द्वारा किये जा रहे कार्यों  जैसा ही है।                               
देवगढ़ के आसपास लगभग सौ छोटे बड़े गाँव है और वहाँ बड़े अस्पताल भी नहीं है सो सभी रोगियों को देवगढ़ के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र में अपना इलाज करवाने आना पड़ता है।  किसी कारण से रोगी को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा  तो  उसे और रोगी के साथ अस्पताल में  रहने वाले रिश्तेदार भूखे मरने की नौबत आ जाती है। क्यों कि अस्पताल के आस पास कोई होटल नहीं है, और गाँव में  (अस्पताल से दूर)  होटल है तो भी बेचारे किसानों और गरीब लोगों को को होटल का खाना महंगा पड़ जाता है।

यह  बात  बाऊसा के ध्यान में आई और उन्होनें एक दिन अपने घर में काम वाली से कुछ रोटियाँ, लौकी की सब्जी, घी और खिचड़ी बनवा कर मुझे   साथ में  लेकर अस्पताल गये और वहाँ रोगियों को खाना  बाँटना शुरु किया, पहले कुछ दिन तो रोगी और रिश्तेदार  हिचकिचाये बाद में  मजबूरी में खाना  लेना शुरू कर दिया।

दस रोगियों के भोजन से शुरु हुआ सिलसिला पचास साथ लोगों के भोजन प्रति समय तक पहुँचा, इतना होने के बाद भी बाऊसा ने किसी से मदद नहीं मांगी अगर किसी ने सामने से दी तो मना भी नहीं किया। कुछ नेता लोगों ने अपने  सुझाव देने शुरु किये जो  राजनीती को बढ़ावा देते थे, यानि लोग चाहते थे कि यह कार्य किसी पार्टी के बैनर  के तहत चले तो बाऊसा ने उन्हें झिड़क दिया, वे कहते थे कि सेवा करनी ही है तो मेरे साथ यह टिफिन और केतली पकड़ कर चलो और खाना बाँटो।

 मुझे भी  खाना बाँटने के काम में इतना  मजा आता था कि कई बार होमवर्क करना अधूरा छोड़कर भी बाऊसा के साथ अस्पताल चला जाता था। जब  बाऊसा ने यक काम शुरु किया तब मैं   नवीं कक्षा में पढ़ता था  यह सिलसिला मेरे ग्याहरवीं की परीक्षा  होने तक चलता रहा और अब बाऊसा की अन्य लोग भी  सहायता करने लगे थे।   ग्याहरवीं  के बाद मेरी पढ़ाई छूट गई और गाँव भी।      

बाद में बाऊसा कई सालों तक यह कार्य करते रहे और आजकल खुद उनका  और बाईजी का स्वास्थय ठीक नहीं रहता और उम्र भी बहुत हो चुकी है,सो अब वे अपने बच्चों के पास उदयपुर रहते हैं। सुना है कि रोगियों को खाना देने का काम उनके जाने के बाद ज्यादा नहीं चल पाया।

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अदम्य इच्छाशक्ति की करामात

Posted by सागर नाहर on 8, अप्रैल 2007

आज सुबह आज तक चैनल पर सुप्रसिद्ध गायक अदनान सामी को देखा। अदनान सामी की छवि की मन में हद से ज्यादा मोटे- गोलमटोल और हमेशा हँसते- गाते इन्सान के रूप में बसी हुई थी पर यह क्या? अदनान बिल्कुल बदले हुए थे।

पूरा लेख  यहाँ पढ़ें।

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डॉ श्याम बेडसे MBBS

Posted by सागर नाहर on 23, फ़रवरी 2007

 सर्किट की लाख कोशिशों के बाद  भी मुन्ना भाई के  MBBS पास करने के अरमान भले ही पूरे ना हो  पाये हों पर श्याम भाई ने यह करिश्मा कर दिखाया है, और वह भी अपने जीवन के ५१ वें वर्ष में!

महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव में जन्मे श्याम  बेडसे की इच्छा थी कि वे डॉक्टर बने  और उन्होने १९७६ में मेडिकल  शिक्षा के लिये प्रवेश लिया और पारिवारिक कारणों से उन्हें एक साल बाद ही अपना शिक्षण अधूरा छोड कर घर गृहस्थी संभालनी पड़ी। उनका विवाह हुआ कल्पना से जो एक नर्स है। विवाह के बाद बच्चे हुए और घर गृहस्थी में श्याम ऐसे फँसे कि उनके अरमान धरे रह गये ।

एक दिन कल्पना को पता चला कि उनके पति की इच्छा थी कि  वे डॉक्टर बने। कल्पना ने अपने पति को प्रोत्साहित किया कि वे फिर से एक कोशिश करें। डॉ श्याम ने कोशिश की पर  उन्हें मायूसी हाथ लगी जब कई मेडिकल कॉलेजों ने उन्हें  दाखिला देने से मना कर दिया पर श्याम और कल्पना हिम्मत नहीं हारे, आखिरकार उन्हें दाखिला मिला और इस वर्ष श्याम ने  अपनी शिक्षा पूरी की और ३१ वर्ष बाद डॉक्टर बन ही गये।

श्याम बेडसे को अपनी पढ़ाई के दौरान कई  मुसीबतों का सामना करना पड़ा, एक बार तो उन्हें फर्जी डिग्री लेकर डॉक्टरी करने के आरोप में  दोनो पति पत्नी को सात दिन की जेल यात्रा भी करनी पड़ी यह बात अलग है कि सेशन कोर्ट ने उन्हें बाइज्जत बरी किया।  इस दौरान कल्पना ने ही  सारी गृहस्थी को  संभाला और पति तथा दोनो बच्चों की पढ़ाई के खर्चों का भी बंदोबस्त किया। इस वजह से डॉ श्याम अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपनी पत्नी कल्पना को देते हैं।

डॉ श्याम फिलहाल पुणे के बी जे मेडिकल कॉलेज में इंटर्नशिप कर रहे हैं और पूरी होने के बाद उनकी इच्छा है कि  वे आर्थिक रूप से अक्षम लोगों के लिये अस्पताल खोलें।

कहते हैं ना जहाँ चाह वहाँ राह और इस कहावत सच कर दिखाया डॉ श्याम ने। डॉ श्याम वाकई बधाई के पात्र हैं,  लगभग पन्द्रह मिनिट तक डॉ श्याम की  पूरी जीवनी को समाचार में बताने के लिये  स्टार न्यूज की टीम  भी  बधाई की पात्र है जिसने कई दिनों के बाद एक  सुखद: समाचार पर इतना ध्यान दिया।

पूरी खबर यहाँ और यहाँ पढ़ें

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क्यूं ना रोते बच्चे को हँसाया जाये

Posted by सागर नाहर on 1, नवम्बर 2006

ये हैं हैदराबाद के महक कोठारी, उम्र ८ वर्ष अंतिम इच्छा?………… जी इन्होने कोई अपराध नहीं किया है अपराध कुदरत ने इनके साथ किया है लाइलाज कैंसर से पीड़ीत हैं और ये अब कितना जी पायेंगे पता नहीं। इनकी अंतिम इच्छा थी पुलिस ऑफिसर बनना। जो शायद पूरी ना हो पाती पर थेन्क्स टू …..मेक ए विश फ़ाऊण्डेशन जिसकी मदद से महक को कल एक दिन के लिये जुबली हिल्स पुलिस थाने का विधिवत इंसपेक्टर बनाया गया और थाने का प्रभार सौंपा गया।
महाराष्ट्र के अरूण और रंजीता कोठारी जो अभी हैदराबाद में रहते हैं , के पुत्र महक की कुछ महीनों पहले तबियत खराब हुई और अस्पताल में परीक्षण के दौरान उसे गले का कैसर पाया गया, तब से महक अपोलो अस्पताल में अपना इलाज करवा रहा है। डॉक्टरों ने अरूण और रंजीता को बता दिया था कि महक शायद ज्यादा जी ना पाये, पर पुलिस ऑफ़िसर बन कर समाज के भ्रष्ट लोगं को हथकड़ियाँ पहनाने की इच्छा रखने वाले महक को पता नहीं है कि वह बहुत कम दिनों का इस दुनियाँ में मेहमान है।
अक्सर डॉक्टरों से अपना सपना बताते रहता था, इस दौरान संस्था के सदस्यों ने महक की तबियत का हाल चाल जानने की वजह से मुलाकात ली और उन्हें भी नन्हे महक की इच्छा पता चली, उन्होने महक की इच्छा पूरी करने का निश्चय किया और हैदराबाद की पुलिस आयुक्त श्रीमती तेजदीप कौर मेनन से मुलाकात की और पूरी बात बताई श्रीमती मेनन ने पुलिस महानिदेशक श्री स्वर्णजीत  सेन को  मामला बताया  तो श्री सेन,  महक की इच्छा पूरी करने को तैयार हो गये।
इसके बाद महक को इंसपेक्टर की वर्दी पहना कर महानिदेशक के पास ले जाया गया जहाँ उसे जुबली हिल्स थाने का एक दिन का प्रभार दिया गया। और आखिरकार महक की इच्छा पूरी हुई। महक पता नहीं अब कितने दिन जिये पर एक संस्था के सहयोग से एक दिन के लिये ही सही पर पुलिस ऑफ़िसर बन सका।

महक

1980 में अमरीका के क्रिस्टोफर नामक एक बालक जिसको ल्यूकोमिया नामक बीमारी हुई थी और उसकी इच्छा थी कि वो हाइवे पुलिसमैन बने उसके माता पिता की की दौड़धाम के बाद उसे एक दिन के लिये हाईवे पुलिस बनाया गया और इसी से मेक ए विश नाम की संस्था का उदय हुआ।
क्रिस्टोफर

भारत में सन १९९५ में गांधार नामक एक बालक जिसे भी ल्यूकोमिया नामक बीमारी हुई, गाधार के माता पिता उसका बोन मेरो बदलवाने के लिये उसे अमरीका के नोर्थ केलिफ़ोर्निया के ड्यूक अस्पताल ले गये। गांधार इस शर्त पर  अमरीका जाने के लिये तैयार हुआ कि वे उसे डिस्नीलैण्ड भी ले जायेंगे। उदय और गीता जोशी (गांधार के माता पिता) का इस दौरान इतना पैसा खर्च हुआ कि बिल भरना भी मुश्किल हो रहा था इसमें वे अपने बच्चे की इच्छा पूरा कैसे करते। इस दौरान उनका सम्पर्क मेक ए विश संस्था के एक स्वयं सेवक से हुआ और पूरी बात जानने के बाद उन्होने गांधार,गीता, उदय और भार्गवी (गांधार की बहन) को ६ दिन के डिस्नीलैण्ड भेजने का बंदोबस्त किया और गांधार की इच्छा पूरी हुई। भारत आने के बाद गांधार का निधन हो गया पर उदय और गीता के मन में एक नया विचार आया कि जैसे उनके बच्चे की इच्छा पूरी हुई उनको दूसरे बच्चों की इच्छा भी पूरी करनी चाहिये… बस यही विचार आगे बढ़ कर मेक ए विश की भारत शाखा के रूप में पनपा जिसने कल महक कोठारी की और उस जैसे लगभग सात हजार बच्चों की इच्छा पूरी की है ।

गांधार

छोटे बच्चों की इच्छाएं भी कैसी कैसी मासूम सी होती है कोई अलग अलग स्थानों पर घूमना चाहता है , कोई शाहरूख खान या अन्य फ़िल्मी सितारों से मिलना चाहता है तो कोई पायलट बनना चाहता है, तो कोई टीवी और कोई मात्र तोते खरीदना चाहता है । नीचे दिये गये फ़ोटॊ में तो एक बच्ची मात्र एक गुड़िया खरीदना चाहती थी। संस्था ने बिना हिम्मत हारे बच्चों की इच्छा पूरी की और कर रहा है। और हमारे सितारे भी धन्यवाद के पात्र हैं जो अपनी व्यस्तता के बीच भी समय निकाल कर अपनी जिंदगी की अंतिम घड़ियाँ गिन रहे बच्चों की अंतिम इच्छा पूरी करने में अग्रसर रहते हैं।
निदा फ़ाजली के शब्दों में कहें तो
घर से बहुत दूर है मस्जिद
चलो किसी रोते बच्चे को हँसाया जाये
with-salaman.jpgvenkatesh-payalat.jpgshimala-visit.jpgirafn-custom-officer.jpgfaheen-doll.jpgshiv-shankar-parrot.jpg

फोटो : The Hindu से एवं स्वतन्त्र वार्ता हैदराबाद

और

विषय make a wish से साभार

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एक मुस्लिम विद्वान: डॉ. कल्बे सादिक

Posted by सागर नाहर on 6, सितम्बर 2006

आज कल आए दिन मुस्लिम उलेमाओ के फ़तवे पढ़ने को मिलते है, कभी वन्देमातरम, कभी गुड़िया प्रकरण तो कभी इमराना प्रकरण! परन्तु कई बार न फ़तवों के बीच मुस्लिम विद्वान मौलाना डॉ कल्बे सादिक के विचार पढ़ने को मिलते रहते हैं, जो आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष भी हैं । श्री सादिक के विचार एवं वकत्वय मुस्लिम विचारधारा की बजाय वास्तविकता के धरातल पर होते हैं।

डॉ  कल्बे सादिक

इस बार कल्बे सादिक का वंदे मातरम के बारे में कहना है कि अगर वंदे मातरम् का अर्थ मातृभूमि को सलाम करना या उसकी प्रशंसा करना है तो मुसलमानों को कोई एतराज़ नहीं होना चाहिए और वंदे मातरम् कोई अहम या बड़ा मुद्दा नहीं है, उससे बड़ा मुद्दा तो अशिक्षा का है जिसकी वजह से कई बार मुसलमान गुमराह हो जाते हैं। शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है इसलिए 7 सितंबर को मुसलमान बच्चे को स्कूल ज़रूर जाना चाहिये और वहाँ प्रार्थनाओं में हिस्सा लें और वे वहाँवंदेशब्द के बिना ही राष्ट्र गीत गा सकते हैं.। क्यों कि अगर इसका अर्थ पूजा या इबादत से है तो मुसलमानों को इस पर एतराज़ होना स्वाभाविक है क्योंकि इस्लाम साफ़ शब्दों में बताता है कि अल्लाह को छोड़कर किसी और की पूजा नहीं की जा सकती|

मुस्लिम समाज में बढ़ती आबादी के बारे में भी श्री सादिक के विचार है कि इस्लाम में स्पष्ट है कि जनसंख्या पर नियन्त्रण होना चाहिए और यह समय का तकाजा भी है| और जब इस्लामी देशों में परिवार नियोजन की अनुमति है और ईरान जैसे देश में भी ये लागू किया गया जहाँ उलेमा (मुस्लिम धर्मगुरु) सत्ता में हैं, तो हिंदुस्तान के मुसलमानों में इस बारे में जागरूकता क्यों पैदा नहीं की जा सकती?”बच्चों के पैदा होकर मर जाने से क्या ये बेहतर नहीं कि बच्चे पैदा ही हों?

मौलाना सादिक मस्जिद में महिलाओं के नमाज पढ़े जाने को जायज ठहराते हैंउनका कहना है कि इस्लाम में पुरुष और महिलाओं को एक साथ नमाज पढ़ने में कहीं मना ही नहीं है। आप का कहना है कि औरतों के साथ मर्दों का नमाज पढ़ना सुन्नत/जायज है। पश्चिमी देशों में नमाज एक साथ ही पढ़ी जाती है। उन्होंने कहा कि मुसलमानो के सबसे बड़े धार्मिक स्थल काबा में दोनों सामूहिक रूप से एक साथ नमाज अदा करते हैं। उन्होंने भारत में भी स्त्रियों और पुरुषों की एक साथ नमाज अता करवाई है।

एसएमएस के जरिए तलाक दिए जाने को भी मौलाना सादिक गलत मानते हैं,वे कहते हैं कि निकाह से ज्यादा कठिन तलाक देना है। हालांकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कुछ अन्य सदस्यों से तलाक के तरीके पर उनका मतभेद है। उनका कहना है कि तीन बार तलाक कहे जाने पर भी तलाक नहीं हो सकता,जबकि बोर्ड के कुछ सदस्य तीन बार तलाक कह देने पर ही तलाक को वैध मान लेते हैं।

काश सारे मुस्लिम विद्वान और उलेमा, मौलाना सादिक कल्बे के विचारों से सहमत हों जायें तो हो सकता है कि मुस्लिम समाज में बढ़ती अशिक्षा और पिछड़ापन अपने आप दूर हो जायेगा।

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“क्रोकोडाईल हंटर” स्टीव इरविन नहीं रहे!

Posted by सागर नाहर on 4, सितम्बर 2006

आज की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण खबर यह है कि डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्राफ़िक और एनिमल प्लेनेट चैनल पर मगरमच्छों और अजगरों के साथ खेलते और उन्हें पकड़ते दिखते ऑस्ट्रेलिया के पर्यावरणविद स्टीव इरविन का एक जहरीली मछली के काटने से निधन हो गया है। स्टीव की बहादुरी के चलते उन्हेंक्रोकोडाईल हंटरभी कहा जाता था।

डिस्कवरी के लिये अनेक फ़िल्में बनाने वाले इस बहादुर को साँपो और मगरमच्छों से कभी डर नहीं लगा परन्तु ग्रेट बेरियर रीफ़ के पास समुद्र में हो रही एक शूटिंग के दौरान उन्हें एक छोटी सी स्टिंगरे नामक जहरीली मछली के काट लेने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया परन्तु स्टीव को बचाया नहीं जा सका। नीचे दिये चित्र में स्टिव अपने बच्चे और मगरमच्छ के साथ खेल रहे हैं, एक बार उन्होनें अपने छोटे से बच्चे को अजगर के बाड़े में छॊड़ दिया था इस वजह से उनकी बहुत आलोचना भी हुई थी।

हिन्दी चिट्ठा जगत की ओर से इस बहादुर को हार्दिक श्रद्धान्जली। steve

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with baby

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एक और गुमनाम विद्वान

Posted by सागर नाहर on 1, सितम्बर 2006

कुछ दिनों पहले वन्दे मातरम पर एक महान भारतीय वैज्ञानिक आचार्य प्रफ़ुल्ल चन्द्र राय पर एक लेख पढ़ा, ऐसे ही एक और विद्वान के बारे में आपको बताने जा रहा हुँ, जिन्होने वनस्पति शास्त्र जैसे कठिन विषय को गुजरात की जनता के लिये समझना आसान कर दिया।

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गाँधीजी की जन्मभूमि पोरबन्दर में सन १८४९ जन्में इन महान विद्वान का नाम था जयकृष्ण इन्द्रजी ठाकर (જયકૃષ્ણ ઇન્દ્રજી ઠાકર)  स्कूल की आठ आने की फ़ीस ना भर पाने की वजह से अंग्रेजी माध्यम से कक्षा तीन तक ही पढ़ पाये, क्यों कि कक्षा की फ़ीस रुपया महीना थी जो कि इन्द्रजी के लिये भर पानी मुश्किल थी।

मात्र कक्षा तीन तक पढ़ पने वाले इन्द्र जी को डॉ भगवान लाल इन्द्रजी का सानिध्य मिलते ही उन्होने इन्द्रजी के अन्दर छुपे विद्वान को पहचान लिया और उन्हीं की मदद से इन्द्र जी वनस्पती शास्त्र के महापंडित बने।

वनस्पति शास्त्र पर इन्द्रजी ने सबसे पहले १९१० में एक गुजराती पुस्तक लिखी जिसका नाम था वनस्पति शास्त्र इस पुस्तक को देख कर उस समय के अंग्रेज विद्वान चौंक गए और उन्होने इन्द्रजी से इस पुस्तक को अंग्रेजी में लिखने का आग्रह किया तब उनका उत्तर था:

आप अंग्रेज भारत के किसी भी प्रांत में पैदा होने वालि वनस्पति को पहचान सकते हो, हिन्द की वन्स्पति पर पुस्तक भी लिखते हो परन्तु हम हमारे यहाँ पैदा होने वाली वनस्पति को नहीं पहचान पाते हैं; आप जिस पद्दति से दुनियाँ भर की वनस्पति को पहचान लेते हो उसी पद्दति को में अपने देश वासियों को बताना चाहता हुँ अत: मैंने इस पुस्तक को गुजराती में ही लिखने का निश्चय किया है।

७५५ पृष्ठ की और १०रुपये मूल्य की इस पुस्तक में इन्द्र जी ने लगभग ६११ वनस्पतियों का वर्णन, वनस्पति को पहचानने के तरीके साथ ही गुजराती श्लोक और दोहे कविताओं के माध्यम से वनस्पति के उपयोग का विस्तृत वर्णन किया था। इसी पुस्तक को पढ़ कर गांधीजी ने अपने अफ़्रीका वास के दौरान नीम को दवाई के रूप में उपयोग में लिया था। पर अफ़सोस कि अपनी पत्नी के गहने गिरवी रख कर यह पुस्तक प्रकाशित करवाने के बाद भी यह पुस्तक इतनी नहीं बिक पाई। यानि पुस्तक की पहली आवृति बिकने में लगभग १७ वर्ष बीत गये पर इन्द्रजी निराश नहीं हुए और कच्छ के महाराजा के अनुरोध और सहयोग से उन्होने दूसरी पुस्तक लिखी जिसका नाम था कच्छ नी जड़ी बूट्टियों इस पुस्तक में इन्द्रजी ने लगभग १०० जड़ी बूटीयों का सचित्र परिचय दिया था। उस जमाने में वनस्पति शास्त्र की पुस्तकों को साहित्य की श्रेणी में नहीं रखा जाता था ( अब भी नहीं रखा जाता है) इस वजह से यह पुस्तक भी इतनी प्रसिद्ध नहीं हो पाई, परन्तु बनारस हिन्दू विश्व विध्यालय के पं मदन मोहन मालवीय ने इन्द्र जी को निमंत्रण दिया कि वे काशी आवें और वनस्पति शास्त्र में सहाय़ता करें।

मैं बड़ा अहसान मानूंगा यदि आप कृपाकर यहाँ आवें और विद्वानों की मंडली में काशी वास का सुख अनुभव करें और आयुर्वेद के उद्धार और उन्नति में सहायता पहुँचाने के लिये वनस्पति वनBotenical Garden बनाने में संमति और सहायता दें।

परन्तु वृद्धावस्था की वजह से इन्द्रजी, पं मदन मोहन मालवीय का पस्ताव स्वीकार नहीं सके और उन्होने लिखा:

अब यह शरीर ७६ वर्ष का जीर्ण हुआ है, कर्ण बधिर हुआ है, मुंह में एक दाँत शेष रहा है। बरसों तक जंगल में भटकने से अब कमर भी अकड़ रही है…. दीपोत्सव के बाद स्वास्थय होगा तो एक समय बनारस विश्वविध्यालय के आयुर्वेदिक विभाग में वनस्पति वन के दर्शन कर कृतार्थ होउंगा

(उस जमाने में पत्राचार की भाषा कितनी सुन्दर हुआ करती थी।)

परन्तु जयकृष्ण इन्द्रजी काशी नहीं जा पाये और सन १९२९ में लगभग ८० वर्ष की उम्र में वनस्पति शास्त्र के एसे प्रकांड विद्वान जयकृष्ण इन्दजी का निधन हो गया।

गुजरात समाचार (दिनांक28.10.2004) से साभार

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