॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

Archive for the ‘सामान्य’ Category

छोड़िए अंकल… लाईट लीजिए न!

Posted by सागर नाहर on 1, जुलाई 2017

क्या आप बता सकते हैं कि नीचे लिखे हुए शब्दों/वाक्यों का अर्थ क्या है?

“बाधा मैं काम के इस भाग को बहुत ही चुनौतीपूर्ण पाया. यह कोई है जो मानसिक रूप से या शारीरिक रूप से विकलांग था की भूमिका लेने के शामिल किया गया। यह लोग जो एक विकलांग व्यक्ति जानता था या एक से संबंधित थे जो खासकर के लिए मुश्किल था. सबसे पहले,हर भूमिका में पाने के लिए, हम एक साथी खोजने के लिए और फिर अपने मुंह में चार उँगलियों के साथ एक बातचीत की कोशिश की थी। यह बहुत मुश्किल था क्योंकि यह कुछ भी है कि समझा जा सकता उच्चारण मुश्किल था”।.

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नहीं ना!


यह सिकन्दराबाद की एक प्रख्यात स्कूल से बच्‍चों को दिए गये प्रोजेक्ट का एक पैरा है। बच्चों को तीन विषय दिए गये थे माँ, विकलांग, और भारतीय पर्वतारोही! बच्‍चों ने लेख लिखने का आसान तरीका निकाला विकिपीडिया से उनके अंग्रेजी लेख खोजे और उन्हें गूगल ट्रांसलेटर की सहायता से हिन्दी में बदल कर स्कूल में जमा करवा दिया और प्रसन्नता की बात यह है कि बच्चों का यह प्रोजेक्ट पास हो गया। ना लिखने वाले ने पढ़ा, ना जाँचने वाले ने!

कुछ दिनों पहले बच्चे पेन ड्राईव में यह लेख लेकर प्रिंट करवाने के लिए आए थे, मैने उन्हें बताया कि यह लेख गलत है, एक भी वाक्य सही नहीं है तो उनका कहना था , छोड़िए अंकल… लाईट लीजिए!मेरे पास लाईट लेने के अलावा कोई रास्ता न था

देखिए दो लेखों के स्क्रीन शॉट।

Facebook Post of November 23, 2013

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बचपन की मिठाई – मीठी नुकती

Posted by सागर नाहर on 15, फ़रवरी 2017


बचपन में किसी दावत से जीम कर आते तो मम्मी-पापाजी या अड़ौस-पड़ौस के काकासा- काकीसा पूछते “सागर-आज क्या जीम कर आए हो”? हम उन्हें बड़ी खुशी से बताते चने की दाल की और मीठी कैरी या मीठी मैथी की सब्जी! वे फिर पूछते अरे मिठाई में क्या था? हम कहते नुकती (मीठी बूंदी) या बेसन की चक्की (बर्फी) कभी बालूशाही और कभी सिर्फ जलेबी।

Nukti.jpg जीमाने वाला या परोसगारी करने वाला (हमारे यहाँ पुरस्कारी कहते हैं) भी मनुहार कर के एकाद टुकड़ा जबरन थाली में रख ही देता और हम उपरी मन से ना-नुकर करते उस मिठाई को फटाफट खा लेते ताकि दूसरे परोसगार को भी मनुहार करने का मौका मिल सके।
आहा! बचपन के उन जीमणों का क्या लुत्फ़ आता था।

आजकल अक्सर दावतों में जाना होता रहता है लेकिन वो आनन्द – लुत्फ़ नहीं रहा। बीस तरह की मिठाईयां, बीस तरह के चाट-पूड़ी आदि के स्टॉल, आठ तरह की रोटियां, दस तरह की सब्जियां और चार पाँच तरह की आईसक्रीम! पेट भर जाता है लेकिन मन कभी नहीं भरता, बीस तरह की मिठाईयों में एक भी ऐसी नहीं होती जो बचपन की नुकती और चक्की की बराबरी कर सके, और ना ही दस तरह की सब्जियां उस चने की दाल की या कैरी या मीठी मैथी की। जिमाने वाला कोई नहीं होता ना ही कोई मनुहार कर एक टुकड़ा मिठाई और खाने का आग्रह करने वाला।

बचपन! अभी तो मन भर के जीमे भी नहीं थे और तुम चले भी गए… काश एक बार फिर से लौट आते।

फेसबुक पर 21 जून 2014 को पोस्ट

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हिन्दी कहानियां और गुड़

Posted by सागर नाहर on 2, फ़रवरी 2017

गुड़ आज भले ही सामान्य चीज हो गई है लेकिन जब आधुनिक मिठाईयाँ और चॉकलेट नहीं थी तब यह मेहमानों को मिठाई के रूप में भी परोसा जाता रहा होगा। हमारे यहाँ तो आज भी सगाई जब पक्की मानी जाती है जब लड़के वाले गुड़-चावल जीम लें। भांजे या भांजी के विवाह में मामा जब मायरा (मामेरा) लेकर आता है तो बहन उसे गुड़-चावल खिलाती है।

हिन्दी कहानियों में भी कहानीकारों ने गुड़ का अपनी कहानियों में जिक्र किया है। मुंशी प्रेम चन्द की कहानी “मन्दिर” में यह वर्णन है-

“सुखिया-गुड़ मत खाओ भैया, अवगुन करेगा। कहो तो खिचड़ी बना दूँ।

जियावन-नहीं मेरी अम्माँ, जरा सा गुड़ दे दो, तेरे पैरों पड़ूँ।

माता इस आग्रह को न टाल सकी। उसने थोड़ा-सा गुड़ निकाल कर जियावन के हाथ में रख दिया और हाँड़ी का ढक्कन लगाने जा रही थी कि किसी ने बाहर से आवाज दी। हाँड़ी वहीं छोड़ कर वह किवाड़ खोलने चली गयी।

जियावन ने गुड़ की दो पिंडियाँ निकाल लीं और जल्दी-जल्दी चट कर गया।”

सर्वेश्‍वर दयाल सक्सेना की कहानी “सफेद गुड़” तो बच्चे के गुड़ खाने की इच्छा पर ही आधारित है-

“उसे अपने  साथी याद आ रहे थे जो उसे चिढ़-चिढ़ाकर गुड़ खा रहे थे। ज्यों-ज्यों उसे उनकी याद आती, उसके भीतर गुड़ खाने की लालसा और तेज होती जाती।”

गुड़ खाने की उसकी इतनी तीव्र अभिलाषा कि वह भगवान से प्रार्थना करने लगता है और जब उसकी इच्छा पूरी होने वाली होती ही है कि मस्जिद के बाहर मिली हुई अठ्ठन्नी पंसारी की दुकान में खो जाती है और वह गुड़ खाने की इच्छा पूरी नहीं कर पाता, तब उसका भगवान से विश्वास उठ जाता है। हालाँकि पंसारी उसे बिना पैसे गुड़ देने का प्रस्ताव देता है पर स्वाभिमानी लड़का नहीं लेता।

उसे विश्‍वास था  कि ईश्‍वर उसकी मदद करेंगे पर उसका सबूत उसे कभी नहीं मिला था। उस की गुड़ खाने की इच्छा  बार-बार लहरों की भाँति मन में उठ रही थी। तभी उसे ईश्‍वर का खयाल आया कि वे ही उसकी इच्छा की पूर्ति करेंगे। वह बचपन से उनकी पूजा करते आया है, कभी भी उनसे कुछ नहीं माँगा। उसने सोचा ईश्‍वर तो शक्‍तिशाली है वे सब कुछ जानते हैं तो क्या उसकी गुड़ खाने की इच्छा की पूर्ति नहीं कर सकते। जैसे ही यह खयाल आया वह उत्साह से भर गया और ईश्‍वर के सामने आँखें मूंदे एक मन से पूजा करने लगा “तभी माँ की आवाज आई, “बेटा पूजा से उठने के बाद बाजार से नमक ले आना”।  यह सुन उसे ऐसा लगा कि ईश्‍वर ने उसे पुकारा।

पूजा कर वह पैसे और झोला लिए खेतों  से होते हुए बाजार जा रहा था । शाम हो गयी थी। सूरज डूब रहा था। पूरे मन से ईश्‍वर का ध्यान लगाए वह जा रहा था। उसे अचानक अज़ान की आवाज आई। वहीं गाँव के सिरे में एक मस्जिद थी। उसने देखा कि सब नमाज के लिए इकट्‍ठे हो रहे थे। “ उसके भीतर एक लहर सी आयी और उसके पैर ठिठक गए।  आँखें पूरी तरह बन्द हो गयी। वह मन ही मन कह उठा 

“ईश्‍वर, यदि तु हो और मैने सच्‍चे मन से तुम्हारी पूजा की है तो मुझे पैसे दो-यहीं इसी वक्‍त!”

वह वहीं गली में बैठ गया जैसे ही उसका हाथ जमीन पर पड़ा उसे नीचे कुछ चिकना   सा लगा। जब उसने उसे देखा तो वह अठन्‍नी थी वह खुशी से भर गया और ईश्‍वर का शत् शत् धन्यवाद करने लगा। उसका विश्‍वास और अटूट हो गया। उसके मन में भक्‍ति से भरी लहर दौड़ गई। मन में चिल्लाने लगा “ भगवान मैं तुम्हारा बहुत छोटा सा सेवक हूँ। मैं सारा जीवन  तुम्हारी भक्‍ति करूंगा। मुझे कभी मत  बिसारना”।

इसी  विचार से भरा खुशी से वह अठन्‍नी को हथेली में दबाए पंसारी की दुकान में पहुँचा और बड़े ही गर्व से सफेद गुड़ मांगा। पंसारी की ओर अठन्‍नी फेंकी पर वह गद्दी में गिर के धनिये के डिब्बे में गिर गई। पंसारी ने डिब्बा देखा, चारों ओर ढूंढा पर कहीं कुछ न मिला। धनिये के डिब्बे को पलट कर भी देखा पर उसमें एक चिकना सा कंकड़ मिला यह देखकर उसके चेहरे का रंग उड़ गया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। “कहाँ गई मेरी अठन्‍नी!”

पंसारी भी हैरत में था। “देखते-देखते सबसे ताकतवर ईश्‍वर की उसके सामने मौत हो गई थी”। जेब से पैसे निकालकर नमक खरीदा और जाने लगा। यह देखकर पंसारी को उस पर दया आ गई वह उसे गुड़ बिना पैसे के देने लगा। पर वह  मुँह फिराये  रोते हुए वहाँ से चला गया क्यों कि उसने गुड़ ईश्‍वर से मांगा था, दुकनदार से नहीं। दूसरों की दया उसे नहीं चाहिए। उसके विश्‍वास के टुकड़े-टुकड़े हो चुके थे।

आज भी वह मस्जिद के रास्ते से गुजरता है पर ईश्‍वर से कुछ आशा नहीं करता।

क्या आपको कोई और कहानियां याद आती हैं जिनमें गुड़ का जिक्र हुआ हो।


Facebook Memories… Posted on February 02’2014

मन्दिर

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गुजराती अलग्योज्ञा “हरखा”

Posted by सागर नाहर on 21, जनवरी 2016

Facebook Memories… Posted on Jan 20’2014

गुजराती पत्रिका चित्रलेखा का दीपावली विशेषांक 2006 में योगेश पंड्या की कहानी “आंगळियात” (उंगली पकड़ कर आने वाला) पढ़ रहा हूँ। कहानी का नायक “हरखा” प्रेमचन्द की कहानी “अलग्योज्ञा” के “रग्घू” से मिलता जुलता लग रहा है।

त्रिभोवनदास का विवाह पैंतीस पार उम्र में एक विधवा समता से हुआ जो अपने पहले पति की सन्तान के साथ सात साल के “हरखा” उंगली पकड़ कर लेकर आती है। विवाह के छठवें साल में दो जुड़वा बच्चों शान्तिलाल और भोगीलाल को जन्म दे कर समता चल बसती है। हरखा अपने दोनों भाईयों और अपने बीमार पिता की मानों माँ बन कर सेवा करता है। दोनों बच्चे बड़े होकर अपनी मर्जी से विवाह कर लेते हैं और पिता की परवाह किए बिना शहर चले जाते हैं।

त्रिभोवनदास के मन में यह बात हमेशा कचोटती रहती है कि वह हरखा का विवाह नहीं कर सके लेकिन हरखा को इस बात का कतई दु:ख नहीं है वह हमेशा पिता की सेवा को ही अपना सौभाग्य मानता है।

शान्तिलाल और भोगीलाल एक दिन जायदाद के बँटवारे के लिए अपने पिता को परेशान करते हैं, त्रिभोवनदास कह देते हैं कि जायदाद के दो हिस्से होंगे एक “हरखा” का और दूसरे में तुम दोनों का। दोनों नाराज होकर अदालत में केस कर देते हैं, इधर कोर्ट के चक्करों और अपने दोनों बच्चों के कारण चिढ़े त्रिभोवन दास अपनी सारी जायदाद हरखा के नाम कर सिधार जाते हैं।

शान्तिलाल-भोगीलाल जायदाद हथियाने के लिए एक खराब चरित्र की स्त्री काली को हरखा के घर में भेजते हैं, जो हरखा पर अपने शील भंग करने का आरोप लगाती है, पर हरखा पहले ही उसे गुंडों से बचा कर उसे बहन मान चुका होता है। पुलिस के सामने हरखा के एक तमाचे से काली सब बक देती है कि उसे पैसे देकर शान्तिलाल और भोगीलाल ने भेजा था।

अपने सहोदर भाईयों की इस करतूत से दु:खी हो कर हरखा अपनी सारी जायदाद दोनों भाईयों के नाम कर घर छोड़ कर चला जाता है।

प्रेमचन्द की कहानी अलग्योज्ञा का अन्त “मुलिया” और “केदार” के विवाह के साथ सुखद होता है लेकिन आंगळियात का अंत दुख:द।

लेकिन जब भी मैं यह कहानी पढ़ता हूँ मन रग्घू और हरखा में तुलना करने लगता है।

अलग्योज्ञा

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एक सुरीली शाम

Posted by सागर नाहर on 21, दिसम्बर 2015

हैदराबाद की संस्था KMR Foundation ने कल हैदराबाद की शाम सुरीली बना दी।
संस्था ने “जश्न-ए-दक्खन के नाम से शास्त्रीय संगीत का दो दिवसीय कार्यक्रम दिनांक 19 और 20 दिसंबर को Srinidhi International School के ऑडिटोरियम में आयोजित किया था।

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पहले दिन यानि शनिवार का कार्यक्रम नहीं सुन-देख पाए उसका दुःख रहेगा क्योंकि उसमे 107 वर्षीय उस्ताद रशीद खां साहब, पंडित अमिय रंजन बनर्जी और पंडित पुष्कर लेले की गायकी के अलावा विदुषी अनुपमा भगत का सितार वादन था।
परन्तु दूसरा दिन यानि कल रविवार को मौक़ा लपक लेने में कोई चूक नहीं की।
सबसे पहले युवा गायिका विदुषी पेल्वा नायक ने राग मारवा में धमार से शुरुआत करने के बाद होली खेलत नंदलाल और अंत में राग दुर्गा- झपताल में ख़्वाजा मोरी.. बंदिश सुनाकर समां बांध दिया।

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उनके बाद आए पं. बिश्वजीत रॉय चौधरी जिन्होंने सरोद पर राग छायानट सुनाया और आपके साथ तबले पर संगत पं रामदास पलसुले ने इस जुगलबंदी को श्रोता बिरादरी ने बहुत पसंद किया और खूब तालियां बटोरी।

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अंत में आईं विदुषी मालिनी राजुरकर जी, जिन्होंने शुरुआत की बागेश्वरी अंग के चंद्रकौंस की बंदिश “नाहीं, तुम बिन न कोई जग में उपकारी” सुनाई और उसके बाद दूसरी बंदिश “नैनन नींद न आणी, सखी” सुनाई।

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विदुषी मालिनी राजुरकर

उसके बाद खमाज राग में टप्पा “चाल पहचानी” सुनाया। अन्त में राग भैरवी में निबद्ध पंडित बलवंत राव भट्ट की बंदिश “साध लेना षड्ज अपना- स्वर तुम्हारे हैं सभी सुनाई जिसे सुनकर श्रोता झूमने लगे।
अभी मन भी नहीं भरा था कि समय की कमी के कारण कार्यक्रम समाप्त करना पड़ा।
एक ख़ास बात दिखी वह थी इतने बड़े कलाकारों की विनम्रता! पं. पुष्कर लेले और विदुषी पेल्वा नाईक भी मालिनी जी का गायन आम श्रोताओं के बीच बैठ कर सुन रहे थे।
आयोजकों ने इस कार्यक्रम में आने के लिए कोई शुल्क तो नहीं रखा बल्कि श्रोताओं के आने जाने के लिए मुफ़्त में बसों के और अल्पाहार का भी इंतजाम किया था।
बहुत बहुत धन्यवाद KMK Foundation आपने इतने बड़े कलाकारों को हमें सुनने का मौक़ा दिया।

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गर्मी की छुट्टियाँ: यादें

Posted by सागर नाहर on 2, जून 2013

रीठेल पोस्ट

लो फिर से मौसम में गर्मी आ गई, यहाँ हैदराबाद का तापमान 35 डिग्री से उपर जाने लगा है। दोपहर को सड़कें सूनी सूनी हो जाती है। तेज गर्म हवाओं के साथ धूल उड़ने लगी है अभी से। पर देखता हूँ बच्चों को चैन नहीं, धूप हो या छांव उन्हें खेलने से रोक पाना बड़ा मुश्किल काम है। आज बैठे बैठे अचानक ही बचपन की गर्मी की छूट्टियाँ याद आ गई। अंतिम परीक्षा के दिन पर्चा हल होते ही मानो कैद में से छूटे। कापियाँ किताबें आले में धर कर खेलने लग जाते (वैसे भी उन्हें पढ़ते थे ही कब ?)


हमारे मोहल्ले में मेरे तीन चार दोस्त हुआ करते थे और उन दोस्तों के दोस्तों को मिलाकर दस पन्द्रह लड़के मिल जाते थे। सबसे अच्छे दोस्त थे पारस और विजयेन्द्र जिसे हम विजू कहते थे। पारस तो जैन और विजू सिंधी था, पर यारी ऐसी कि सब एक थाली में खाना खा लेते थे।। पारस उम्र में लगभग चार-पाँच साल बड़ा था हमसे, पर दोस्त बड़ा गहरा था। जब मम्मी घर से बाहर नहीं निकलने देती दोपहर की तेज धूप में पारस के बुलाने पर; तो पारस हमें खेलने बुलाने के लिये नित्य नये नये तरीके ढूंढ लेता था, कभी सीटी, कभी कुत्ते की या कभी बिल्ली की आवाज निकालकर बुलाता पर पता नहीं कैसे मम्मी को पता चल जाता और हमें बाहर नहीं जाने देती। तब कुढ़ते और सोने का अभिनय करते हुए मम्मी के इधर उधर होने का इंतजार करते जैसे ही मम्मी इधर उधर हुई या सुस्ताने लगती कि हम बाहर भाग जाते।


फिर होती धमाचौकड़ी शुरु। एक ही खेल से थोड़ी देर में बोर हो जाते थे। और खेल भी हर घंटे में बदल जाते थे सात पत्थरों को बीच में रखकर गेंद से मारकर उन्हें फिर से जमाने वाला खेल सीतोलिया, चोर पुलिस, एक पाँव उपर रख कर और एक पाँव से दूसरों पकड़ने वाला लंगड़ी टांग, नदी पहाड, कंचे, गिल्ली डंडा आदि। गिल्ली डंडा और कंचे पापाजी नहीं खेलने देते थे पर फिर भी खेल लेते थे जब पापाजी दफ्तर में होते थे। कंचो में कई नये खेल इजाद किये थे जिसमें एक था “भूल चूक पीली माटी” जिसमे सभी खिलाड़ी अपने अपने समान संख्या में कंचे उसे देते जिसका नंबर होता था। वह उन कंचों को दूर बने एक छोटे से छेद जिसके के पास एक लाइन बनी होती थी, उस तरफ भूल चूक पीली माटी कह कर फ़ेंकता था, भूल चूक नहीं बोलने पर एक कंचे की सजा मिलती थी। अगर एक भी कंचा छेद में चला गया तो सारे कंचे उसके अगर नहीं गया तो दूसरों के कहे कंचे पर निशाना लगना होता था। निशाना सही लग गया तो ठीक वरना दूसरे का नंबर और हाँ क्रिकेट। उसे कैसे भूल सकते हैं।


स्पंज वाली लाल गेंद से क्रिकेट खेलते। जब नालियों में गेंद में भीग जाती तब निकाल कर फिर खेलने लगते। तब नाली में हाथ डालने पर भी कोई हिचक नहीं होती थी। पारस तो नाली के पास ही खड़ा होकर फ़िल्डिंग करता था। हर गेंद पर छक्का लगता था और भीगी स्पंज की गेंद से जो दीवारों पर निशान बनते वे आज भी कई पुराने मकानों पर बने हुए हैं क्यों कि उन मकानों के मालिक मद्रास या बैंगलोर रहते हैं और सालों तक अपने घर नहीं आते। जब भी राजस्थान जाना होता है उन निशानों में मेरे लगाये छक्के पर बने निशान को ढूंढने की असफल कोशिश करता हूँ। असफल इसलिये कि हमारे गांव छोड़ देने के बाद भी मोहल्ले में बच्चे तो बड़े होने ही थे और उन बच्चों ने भी हमसे दीवार पर गेंद से निशान बनाने का पराक्रम सीखा था ठीक उसी तरज जैसे हमने अपने से बड़े बच्चों से सीखा था।


उन दिनों हम के श्रीकांत, अज़हर और नवजोत सिद्धू के साथ विवियन रिचर्डस के दीवाने हुआ करते थे और अपने हर चौके और छक्के पर यूं इतराते कि मानो हम भी भविष्य के के. श्रीकांत या सिद्धू होंगे, यह भूल जाते कि विपक्षी टीम में भी कपिल देव या गावस्कर समझने वाले खिलाड़ी होंगे और फिर हमारी गेंदो की भी धुनाई होती। कोई भी बच्चा आउट होने पर नहीं मानता था कि वह आउट हो गया है क्यों कि विकेट कहाँ होते थे, दीवारों पर कोयले से तीन लकीरें खींच लेते थे। बाकायदा अंपायर भी हुआ करता था पर उसकी सुने कौन?


एक बार इसी तरह पारस अंपायर बना हुआ था और मैं बैटिंग कर रहा था, एक गेंद पर मैं आऊट नहीं था पर पारस ने मुझे आऊट घोषित कर दिया। मैने अंपायर को यानि पारस को ही पकड़ कर पीट दिया। उस जमाने में यह डर नहीं था कि अंपायर को पीटने पर खेलने पर साल दो साल का प्रतिबंध लग जायेगा। उसी शाम को पारस ने ही बदला ले लिया। चोर पुलिस खेलते समय मैं चोर बना था और पारस पुलिस….  😦


कभी कभार जे एस साईकिल वाले से “अध्या” (छोटी साईकिल) जो आधे घंटे के लिये पच्चीस पैसे में किराये मिलती थी, घर से चुराये पैसों ( भाई मैं नहीं चुराता था यह सब पारस ही करता था) से ले जाकर घंटो तक करणी माता के मंदिर के पास तो कभी दशहरा मैदान में चलाते रहते। जे एस साईकिल वाले के नौकर को थोड़ी सेटिंग कर रखी थी सो समय लिखने में मेरे पक्ष में गड़बड़ कर देता था।


वर्षों बाद जब जे एस मिले तब राज का पता चला कि उन्हें सब पता था कि कौन कितनी साइकिल चलाता है और पैसे कितने देता है। उस दिन जे एस भाई ने अनुरोध किया कि मैं उनकी बड़ी साइकिल किराये पर लूं, मैने एकाद घंटे साईकिल चलाई और जब पैसे देने लगा तो उसने पैसे लेने से साफ मना कर दिया तब पता चला कि गाँवों में लोगों का एक दूसरे के प्रति कितना स्नेह है। मैं उस साईकिल वाले का कुछ नहीं लगता था पर जो प्रेम उससे मिलता था उसका वर्णन कर पाना संभव नहीं है।


साइकिल चलाने से थक जाते तो वही एक बरगद के पेड़ के नीचे प्याऊ थी जहाँ दोनो हाथों को आगे कर माई को कहते पानी पिलाने को तो माई एक जग जिसकी लम्बी नली से पानी बाहर निकलता था, को हमारे छोटे-छोटे हाथों में डालकर हमें पानी पिलाती। आधा पानी हाथों से निकल कर कोहनी से होते हुए कपड़ों को भीगोता और आधा मुंह में जाता। इस तरह पानी पीने में जो आनन्द मिलता वह आज फ्रिज के ठंडे पानी मे भी नहीं मिलता। बड़ा मन होता है प्याऊ का पानी पीने का पर अब ना तो उस जगह माई है और ना ही प्याऊ। वहीं पास में एक पान का गल्ला है जहाँ से लोग एक रुपये का पानी का पाउच खरीद लेते हैं और अपनी प्यास बुझा लेते हैं। मानो दुनियाँ की रफ्तार के साथ प्याऊ भी पिछड़ेपन का प्रतीक बन गई है।


आगे फिर कभी।

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एक बार यूं हुआ-१

Posted by सागर नाहर on 25, अगस्त 2012

एक बार यूं हुआ कि अलवर महाराजा जयसिंहजी इंगलैण्ड यात्रा पर गए!! उस समय तक भारत के अधिकतर राजा-महाराजा अंग्रेजों से अपनी गद्दी बचाने के लिए अंग्रेजों की खुशामाद कर रहे थे, परन्तु राजा जयसिंहजी उनमें से नहीं थे। देशभक्ति उनमें कूट-कूट कर भरी हुई थी, और देशभक्तिख का खुमार उनमें छाया रहता था। वे अंग्रेजों को बिल्कुल भी भाव नहीं देते थे। 1890 में जब अलवर की प्रख्यात कॉलेज में पहले दिन पढ़ने के लिए गए तब वे श्रंगार किए हाथी पर बैठ कर गए और गोरे साहबों के कॉलेजियन संतानों पर अपनी एक अलग छाप छोड़ी।

एक बार यूं हुआ (एक वार एवु बन्यु)” लोकप्रिय गुजराती मासिक पत्रिका “सफारी” का एक कॉलम है। जिसमें कई मजेदार घटनाओं के बारे में पाठकों को बताया जाता है।, अगस्त 2002 के अंक में ऐसी ही एक घटना का जिक्र है जिसका हिन्दी अनुवाद मैं आगे कर रहा हूँ।
सफारी वह पत्रिका है जिसे पढ़ने और समझने के लिए मैने गुजराती सीखी थी, गुजराती नहीं जानने वालों के लिए आनन्द की बात यह है कि अब यह पत्रिका अंग्रेजी में भी प्रकाशित होती है। उम्मीद है कि शायद कभी ना कभी सम्पादक मंडल हिन्दी पाठकों पर भी नजर-ए-इनायत करेंगे।

गोरे उन्हें बिल्कुल पसन्द नहीं थे और यह नापसन्दगी उन्होने कभी छिपाई भी नहीं। अंग्रेजी के अच्छे जानकार होने और धाराप्रवाह अंग्रेजी बोल सकने के बावजूद अंग्रेजों के साथ संस्कृत में बात करते।

इंगलैण्ड की राजधानी लंदन में यात्रा के दौरान एक शाम महाराजा जयसिंह सादे कपड़ों में बॉन्ड स्ट्रीट में घूमने के लिए निकले और वहां उन्होने रोल्स रॉयस कम्पनी का भव्य शो रूम देखा और मोटर कार का भाव जानने के लिए अंदर चले गए। शॉ रूम के अंग्रेज मैनेजर ने उन्हें “कंगाल भारत” का सामान्य नागरिक समझ कर वापस भेज दिया। शोरूम के सेल्समैन ने भी उन्हें बहुत अपमानित किया, बस उन्हें “गेट आऊट” कहने के अलावा अपमान करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।"सफारी "अगस्त 2002" की स्कैन कॉपी"

अपमानित महाराजा जयसिंह वापस होटल पर आए और रोल्स रॉयस के उसी शोरूम पर फोन लगवाया और संदेशा कहलवाया कि अलवर के महाराजा कुछ मोटर कार खरीदने चाहते हैं।

कुछ देर बाद जब महाराजा रजवाड़ी पोशाक में और अपने पूरे दबदबे के साथ शोरूम पर पहुंचे तब तक शोरूम में उनके स्वागत में “रेड कार्पेट” बिछ चुका था। वही अंग्रेज मैनेजर और सेल्समेन्स उनके सामने नतमस्तक खड़े थे। महाराजा ने उस समय शोरूम में पड़ी सभी छ: कारों को खरीदकर, कारों की कीमत के साथ उन्हें भारत पहुँचाने के खर्च का भुगतान कर दिया।

भारत पहुँच कर महाराजा जयसिंह ने सभी छ: कारों को अलवर नगरपालिका को दे दी और आदेश दिया कि हर कार का उपयोग (उस समय के दौरान 8320 वर्ग कि.मी) अलवर राज्य में कचरा उठाने के लिए किया जाए।


विश्‍व की अव्वल नंबर मानी जाने वाली सुपर क्लास रोल्स रॉयस कार नगरपालिका के लिए कचरागाड़ी के रूप में उपयोग लिए जाने के समाचार पूरी दुनिया में फैल गया और रोल्स रॉयस की इज्जत तार-तार हुई। युरोप-अमरीका में कोई अमीर व्यक्‍ति अगर ये कहता “मेरे पास रोल्स रॉयस कार” है तो सामने वाला पूछता “कौनसी?” वही जो भारत में कचरा उठाने के काम आती है! वही?

बदनामी के कारण और कारों की बिक्री में एकदम कमी आने से रोल्स रॉयस कम्पनी के मालिकों को बहुत नुकसान होने लगा। महाराज जयसिंह को उन्होने क्षमा मांगते हुए टेलिग्राम भेजे और अनुरोध किया कि रोल्स रॉयस कारों से कचरा उठवाना बन्द करवावें। माफी पत्र लिखने के साथ ही छ: और मोटर कार बिना मूल्य देने के लिए भी तैयार हो गए।

महाराजा जयसिंह जी को जब पक्‍का विश्‍वास  हो गया कि अंग्रेजों को वाजिब बोधपाठ मिल गया है तो महाराजा ने उन कारों से कचरा उठवाना बन्द करवाया। परन्तु ब्रिटिशराज का विरोध तो चालू ही रहा। उनका प्रमुख नारा था “अंग्रेजों वापस जाओ”!
भारत के दूसरे राजा-महाराजा भी कहीं जयसिंहजी की देखा देखी अंग्रेजों के सामने अपना सर ना उठाने लगें इस डर से सन 1933 में उन्हें पदभ्रष्‍ट कर आजनम देशनिकाले की सजा दी और फ्रान्स भेज दिया।

चार वर्ष बाद 1937 में वहीं उनका निधन हो गया। अलवर की जनता ने महाराजा के अन्तिम दर्शनों की ऐसी जिद पकड़ी की स्व. महाराजा के शव को विविध रसायनों से सुरक्षित कर खास विमान से भारत लाना ही पड़ा।

ब्रिटिश प्रतिनिधी कोनराड कोर्फिल्ड ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि “अन्तिम यात्रा के समय रास्ते के दोनों तरफ राज्य की जनता आक्रन्द कर रही थी।“

महान क्रान्तिकारी महाराजा ने गुलामी के समय में भी अपने स्वाभिमान को बरकरार रखा, जब कि भारत स्वतंत्र होने के बाद भी ब्लैकमेलर अमरीका के राजकीय दबाव के सामने बात-बात में झुक जाते नेताओं का मानस कितना गुलामी भरा है।

एक बार फिर से गुजराती से हिन्दी में अनुवाद की कोशिश की है, कुछ भाषाओं में कुछ शब्द ऐसे होते हैं कि उनका एकदम स्टीक अनुवाद करना बहुत मुश्किल होजाता है, फिर भी बहुत कोशिश की है कि एकदम सही अनुवाद कर सकूं। इस सुन्दर जानकारी के लिए थैन्क्स “सफारी”

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सम्मान का अपमान

Posted by सागर नाहर on 26, जुलाई 2011

देश के एक मंत्री इस हद तक मूर्खता भी कर सकते हैं, और वो भी जयराम रमेश… पता नहीं था।  गांधीजी के वे तथाकथित अनुयायी जो गांधीजी की तरफ उंगली करने पर तलवारें खींच लेते हैं……कुछ कहेंगे?

फोटो राजस्थान पत्रिका से साभार

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कुछ कविताएं रुला देती है

Posted by सागर नाहर on 22, जून 2011

पिछले दिनों फादर्स डे पर फेसबुक में नीरज दीवान ने अपने स्टेट्स पर लिखा

…….बुज़ुर्गों का साया भी सुरक्षा कवच जैसा होता है..लगता है कि “हां..कोई है अपने साथ”-उनका दुनिया में रहना ही संबल देता है। जाने पर आप एकाएक अकेले हो जाते हैं..अब कुछ ऐसा ही है। पिता पर कोई गीत?

तो नेट पर खोजने पर कुछ अच्छे हिन्दी गीत और कविताएं मिली , लेकिन फिर पता नहीं क्या सूझा कि गुजराती में खोजने लगा, तो अनायास ही कुछ ऐसी कविताएं मिल गई, जिन्हें पढ़ कर आँख से आँसू छलक गए। बार- बार पढ़ी। फिर इच्छा हुई  कि इनका हिन्दी अनुवाद कर हिन्दी के पाठकों को भी पढ़वाते हैं। मैने फेसबुक  पर कवियत्री से अनुमति लेकर उनका हिन्दी अनुवाद किया।

ये कविता सुरत की युवा कवियत्री एषा दादा वाला ने लिखी है। इतनी कम उम्र में ऐषा ने कई गंभीर कविताएं लिखी है।

किसी प्रादेशिक भाषा से हिन्दी में अनुवाद इतना आसान नहीं होता। कई शब्द ऐसे होते हैं जिनको हम  समझ सकते हैं लेकिन उनका दूसरी भाषा उनके उचित शब्द खोजना मुश्किल होता है। मसलन गुजराती में एक शब्द  है “निसासो” यानि  एक हद तक हिन्दी में हम कह सकते हैं कि “ठंडी सी दु:खभरी साँस छोड़ना! लेकिन गुजराती में निसासो शब्द एक अलग भाव प्रस्तुत करता है।  जब कविता को अनुवाद करने की कोशिश की तो इस तरह के कई शब्दों पर आकर  अटका।

खैर मैने बहुत कोशिश की कि कविता का मूल भाव या अर्थ खोए बिना उसका सही अनुवाद कर सकूँ, अब कितना सफल हुआ यह आप पाठकों पर…

डेथ सर्टिफिकेट :
प्रिय बिटिया
तुम्हें याद होगा
जब तुम छोटी थी,
ताश खेलते समय
तुम  जीतती और मैं हमेशा हार जाता

कई बार जानबूझ कर भी!
जब तुम किसी प्रतियोगिता में जाती
अपने तमाम शील्ड्स और सर्टिफिकेट
मेरे हाथों में रख देती
तब मुझे तुम्हारे पिता होने का गर्व होता
मुझे लगता मानों मैं
दुनिया का सबसे सुखी पिता हूँ

तुम्हें अगर कोई दु:ख या तकलीफ थी
एक पिता होने के नाते ही सही,
मुझे कहना तो था
यों अचानक
अपने पिता को इतनी बुरी तरह से
हरा कर भी कोई खेल जीता जाता है कहीं?

तुम्हारे शील्ड्स और सर्टिफिकेट्स
मैने अब तक संभाल कर रखे हैं
अब क्या तुम्हारा “डेथ सर्टिफिकेट” भी

मुझे ही संभाल कर रखना होगा?

*****************

पगफेरा
बिटिया को अग्‍निदाह दिया,
और उससे पहले ईश्‍वर को,
दो हाथ जोड़ कर कहा,
सुसराल भेज रहा हौऊं,
इस तरह  बिटिया को,
विदा कर रहा हूँ,
ध्यान तो रखोगे  ना उसका?
और उसके बाद ही मुझमें,
अग्निदाह देने की  ताकत जन्मी
लगा कि ईश्‍वर ने भी मुझे अपना
समधी बनाना मंजूर कर लिया

और जब अग्निदाह देकर वापस घर आया
पत्‍नी ने आंगन में ही पानी रखा था
वहीं नहा कर भूल जाना होगा
बिटिया के नाम को

बिना बेटी के घर को दस दिन हुए
पत्नी की बार-बार छलकती  आँखें
बेटी के व्यवस्थित पड़े
ड्रेसिंग टेबल और वार्डरोब
पर घूमती है
मैं भी उन्हें देखता हूँ और
एक आह निकल जाती है

ईश्‍वर ! बेटी सौंपने से पहले
मुझे आपसे रिवाजों के बारे में
बात कर लेनी चाहिए थी
कन्या पक्ष के रिवाजों का
मान तो रखना चाहिए आपको
दस दिन हो गए
और हमारे यहाँ पगफेरे का  रिवाज है।

दोनों कविताएं *एषा दादावाला*
अनुवाद: सागर चन्द नाहर

कविता को अनुवाद करने  में कविताजी वर्मा का सहयोग रहा, उनका बहुत बहुत धन्यवाद।

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पलाश की चाय और दस्तक के पाँच साल

Posted by सागर नाहर on 12, मार्च 2011

बीस फरवरी  को मेरी दो भांजियों के विवाह के लिए नागपुर जाना हुआ। विवाह में मम्मीजी के मामाजी ईश्वर लालजी श्रीमाल भी आए थे और यहीं मुलाकात हुई उनके मामाजी के सुपुत्र यानि मम्मीजी के मामाजी (मेरे नानाजी) और नागपुर निवासी डॉ शान्तिलाल जी कोठारी से।

डॉ शान्तिलालजी Academy of Nutrition Improvement के President हैं। समाज सेवा के साथ- साथ आप HIV/Aids के रोगियों के लिए भी बहुत काम करते हैं। बातों बातों में पता चला कि डॉ कोठारी की एक छोटी सी फेक्ट्री भी है जिसमें वे सोयाबीन का दूध बनाते हैं। नानाजी डॉ कोठारी ने हमें उनकी फेक्ट्री में आने का न्यौता दिया तो मैं , चाचाजी , मौसाजी और एक मित्र, चारों वर्धा रोड़ स्थित उनकी फेक्ट्री पर पहुँच गये। (/span>

नानाजी से बातें करते कई आश्चचर्यजनक बातें चली मसलन सोयाबीन को अगर उचित प्रोसेस के बिना आहार में शामिल किया जाये तो वह बहुत ही हानिकारक हो सकता है। एक सुप्रसिद्ध स्वास्थय पत्रिका में छपा एक लेख बताया जिसमें सोयाबीन को सीधे पीस पर उसका दूध बनाकर दही और पनीर बनाने कर उसका सेवन करने पर स्वास्थय लाभ होता है। डॉ कोठारी ने बताया कि उपरोक्त लेख को पढ़कर स्वास्थय पत्रिका को नोटिस भी दिया है कि या तो वे साबित करें कि इस तरह से सोयाबीन के सेवन से स्वास्थय लाभ होता है या फिर पाठकों को गलत जानकारी देने के लिए अगले अंक में क्षमा मांगे।

अचानक मेरी नजर टेबल पर रखे कुछ पैकेट्स पर पड़ी जिसमें सूखे फूलों की पंखुड़िया रखी थी। मैं उन्हें उठा कर देख रहा था जिस पर लिखा हुआ था पलाश की चाय! पलाश तो हमारे यहाँ बहुतायत होता है उसके सूखे फूल तो बोरियां भर कर मिल सकते हैं, हमारी बात का विषय अब पलाश और लाखोड़ी दाल पर आ गया। डॉ साहब से पता चला कि लाखोड़ी दाल भी बहुत लाभप्रद होती है लेकिन दुष्प्रचार की वजह से अब उसका सेवन बहुत कम हो गया है। महुआ के फूल भी बहुत लाभप्रद होते है लेकिन महुआ से शराब भी बनती है और इस वजह से हमने उसके गुणों को पहचानने की कोशिश ही नहीं की। हरी सब्जियों में तरोटा ( हिन्दी नाम पता नहीं) स्वास्थय के लिए पालक से भी ज्यादा लाभप्रद होता है।

डॉ साहब ने वहाँ काम कर रही एक महिला को कुछ इशारा किया और कुछ देर में पलाश की बनी चाय आ गई। यह चाय पीले रंग की थी। चाय का पहला घूंट भरते ही जो आनन्द मिला उसका वर्णन यहाँ कर पाना मुश्किल है। इतना स्वादिष्ट और स्फूर्तिदायक पेय पलाश जैसी मामूली चीज से बनता है और हमें पता ही नहीं।

बातें बहुत करनी थी बहुत सी चीजों की जानकारी लेनी बाकी थी लेकिन समयाभाव के कारण हमें वहाँ से जल्दी निकलना पड़ा। पूरे रास्ते हमारी बातों का विषय यही रहा कि कैसी अद्‍भुद चीजें हमारे आस-पास है लेकिन हम जानते ही नहीं और उनकी अवेहलना करते हैं।

संबधित कड़ियाँ

http://www.indiatogether.org/2006/aug/hlt-iodised.htm

http://www.virusmyth.com/aids/news/indiaconfrep.htm

इस पोस्ट के साथ ही हिन्दी चिट्ठाजगत में दस्तक के पाँच साल पूरे हुए , आप सभी के सहयोग के लिए धन्यवाद।

फोटो indiatogether.org से साभार

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