॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

हिन्दी कहानियां और गुड़

Posted by सागर नाहर on 2, फ़रवरी 2017

गुड़ आज भले ही सामान्य चीज हो गई है लेकिन जब आधुनिक मिठाईयाँ और चॉकलेट नहीं थी तब यह मेहमानों को मिठाई के रूप में भी परोसा जाता रहा होगा। हमारे यहाँ तो आज भी सगाई जब पक्की मानी जाती है जब लड़के वाले गुड़-चावल जीम लें। भांजे या भांजी के विवाह में मामा जब मायरा (मामेरा) लेकर आता है तो बहन उसे गुड़-चावल खिलाती है।

हिन्दी कहानियों में भी कहानीकारों ने गुड़ का अपनी कहानियों में जिक्र किया है। मुंशी प्रेम चन्द की कहानी “मन्दिर” में यह वर्णन है-

“सुखिया-गुड़ मत खाओ भैया, अवगुन करेगा। कहो तो खिचड़ी बना दूँ।

जियावन-नहीं मेरी अम्माँ, जरा सा गुड़ दे दो, तेरे पैरों पड़ूँ।

माता इस आग्रह को न टाल सकी। उसने थोड़ा-सा गुड़ निकाल कर जियावन के हाथ में रख दिया और हाँड़ी का ढक्कन लगाने जा रही थी कि किसी ने बाहर से आवाज दी। हाँड़ी वहीं छोड़ कर वह किवाड़ खोलने चली गयी।

जियावन ने गुड़ की दो पिंडियाँ निकाल लीं और जल्दी-जल्दी चट कर गया।”

सर्वेश्‍वर दयाल सक्सेना की कहानी “सफेद गुड़” तो बच्चे के गुड़ खाने की इच्छा पर ही आधारित है-

“उसे अपने  साथी याद आ रहे थे जो उसे चिढ़-चिढ़ाकर गुड़ खा रहे थे। ज्यों-ज्यों उसे उनकी याद आती, उसके भीतर गुड़ खाने की लालसा और तेज होती जाती।”

गुड़ खाने की उसकी इतनी तीव्र अभिलाषा कि वह भगवान से प्रार्थना करने लगता है और जब उसकी इच्छा पूरी होने वाली होती ही है कि मस्जिद के बाहर मिली हुई अठ्ठन्नी पंसारी की दुकान में खो जाती है और वह गुड़ खाने की इच्छा पूरी नहीं कर पाता, तब उसका भगवान से विश्वास उठ जाता है। हालाँकि पंसारी उसे बिना पैसे गुड़ देने का प्रस्ताव देता है पर स्वाभिमानी लड़का नहीं लेता।

उसे विश्‍वास था  कि ईश्‍वर उसकी मदद करेंगे पर उसका सबूत उसे कभी नहीं मिला था। उस की गुड़ खाने की इच्छा  बार-बार लहरों की भाँति मन में उठ रही थी। तभी उसे ईश्‍वर का खयाल आया कि वे ही उसकी इच्छा की पूर्ति करेंगे। वह बचपन से उनकी पूजा करते आया है, कभी भी उनसे कुछ नहीं माँगा। उसने सोचा ईश्‍वर तो शक्‍तिशाली है वे सब कुछ जानते हैं तो क्या उसकी गुड़ खाने की इच्छा की पूर्ति नहीं कर सकते। जैसे ही यह खयाल आया वह उत्साह से भर गया और ईश्‍वर के सामने आँखें मूंदे एक मन से पूजा करने लगा “तभी माँ की आवाज आई, “बेटा पूजा से उठने के बाद बाजार से नमक ले आना”।  यह सुन उसे ऐसा लगा कि ईश्‍वर ने उसे पुकारा।

पूजा कर वह पैसे और झोला लिए खेतों  से होते हुए बाजार जा रहा था । शाम हो गयी थी। सूरज डूब रहा था। पूरे मन से ईश्‍वर का ध्यान लगाए वह जा रहा था। उसे अचानक अज़ान की आवाज आई। वहीं गाँव के सिरे में एक मस्जिद थी। उसने देखा कि सब नमाज के लिए इकट्‍ठे हो रहे थे। “ उसके भीतर एक लहर सी आयी और उसके पैर ठिठक गए।  आँखें पूरी तरह बन्द हो गयी। वह मन ही मन कह उठा 

“ईश्‍वर, यदि तु हो और मैने सच्‍चे मन से तुम्हारी पूजा की है तो मुझे पैसे दो-यहीं इसी वक्‍त!”

वह वहीं गली में बैठ गया जैसे ही उसका हाथ जमीन पर पड़ा उसे नीचे कुछ चिकना   सा लगा। जब उसने उसे देखा तो वह अठन्‍नी थी वह खुशी से भर गया और ईश्‍वर का शत् शत् धन्यवाद करने लगा। उसका विश्‍वास और अटूट हो गया। उसके मन में भक्‍ति से भरी लहर दौड़ गई। मन में चिल्लाने लगा “ भगवान मैं तुम्हारा बहुत छोटा सा सेवक हूँ। मैं सारा जीवन  तुम्हारी भक्‍ति करूंगा। मुझे कभी मत  बिसारना”।

इसी  विचार से भरा खुशी से वह अठन्‍नी को हथेली में दबाए पंसारी की दुकान में पहुँचा और बड़े ही गर्व से सफेद गुड़ मांगा। पंसारी की ओर अठन्‍नी फेंकी पर वह गद्दी में गिर के धनिये के डिब्बे में गिर गई। पंसारी ने डिब्बा देखा, चारों ओर ढूंढा पर कहीं कुछ न मिला। धनिये के डिब्बे को पलट कर भी देखा पर उसमें एक चिकना सा कंकड़ मिला यह देखकर उसके चेहरे का रंग उड़ गया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। “कहाँ गई मेरी अठन्‍नी!”

पंसारी भी हैरत में था। “देखते-देखते सबसे ताकतवर ईश्‍वर की उसके सामने मौत हो गई थी”। जेब से पैसे निकालकर नमक खरीदा और जाने लगा। यह देखकर पंसारी को उस पर दया आ गई वह उसे गुड़ बिना पैसे के देने लगा। पर वह  मुँह फिराये  रोते हुए वहाँ से चला गया क्यों कि उसने गुड़ ईश्‍वर से मांगा था, दुकनदार से नहीं। दूसरों की दया उसे नहीं चाहिए। उसके विश्‍वास के टुकड़े-टुकड़े हो चुके थे।

आज भी वह मस्जिद के रास्ते से गुजरता है पर ईश्‍वर से कुछ आशा नहीं करता।

क्या आपको कोई और कहानियां याद आती हैं जिनमें गुड़ का जिक्र हुआ हो।


Facebook Memories… Posted on February 02’2014

मन्दिर

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