॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

बस करो अब!

Posted by सागर नाहर on 15, जून 2007

 सोचा था कि कोई पोस्ट कभी नहीं लिखेंगे पर देख रहा हूँ कि लोग नारद सहित जीतू भाई, अनूप जी  और संजय भाई के पीछे पड़े हैं कि माफ करते हो कि नहीं  वरना….

 एक गलती हुई और सजा मिली उसमें इतनी बात बढ़ाने की कोई जरूरत नहीं है। नारद ने पहली बार  सख्ती की है,  बाकी हद तो तभी हो गयी थी जब  किसी ने किसी  से पूछा था कि  आप गुजरात में थे, आपने कितने मुसलमान मारे? यह बात मामूली नहीं ही तब भी नारद ने कोई सख्ती नहीं की। आज पहली बार सही कदम उठाया है तो  लोगों को तकलीफ हो रही है, इसका मतलब क्या यही माना जाये कि आप अपने परिवार में गन्दगी चाहते हैं।

कुछ लोगों ने माफी मांगने का नाटक पहले किया और अपने लेखन से सनसनियाँ फैलाते रहे, कुछेक ने तो देवी देवताओं तक को नहीं छोड़ा। तब भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देकर बात  को रफा दफा कर दिया था, पर इस बार बात मामूली नहीं थी।  और जिस टिप्प्णी को लेकर महोदय ने इतना हंगामा किया  उन्हीं महाशय ने  एक नये ब्लॉगर की पहली पोस्ट में यह टिप्प्णी की है-

यार नट राज .. तुम तो दिल पे ले लेते हो. नाराज़ मत हुआ करो यार.. अब रेल गाड़िया तो गुजरात में भी जलाई जाती है और लोग वहाँ भी मारे जाते हैं .. अंतर इतना ही है की एक रोटी के लिए करता है और दूसरा धर्म के लिए , लगता है आपको रोटी की ज़रूरत नही .. तभी आप नाराज़ हो रहे हैं , तभी आपको जलती हुई रेल गाड़िया जल्दी दिखती हैं लेकिन भूख से मरते बच्चे नही .

 अब इस टिप्प्णी को क्या कहा जाये, बेचारे  नये चिट्ठाकार  ने सबको नमस्कार किया था और  उनका स्वागत  इस टिप्प्णी से किया गया। अब बताइये संजय की विवादित टिप्प्णी से ज्यादा बुरी है या नहीं यह टिप्प्णी?

नारद की कार्यवाही का समर्थन  नारद उवाच पर किया था और यहाँ भी करता हूँ, जो हुआ सही हुआ, अगर कोई भी चिट्ठाकार गलती करता है तो उसे सजा मिलनी ही चाहिये। 

संजय माफ कर देते हैं तो कहूंगा कि उनसे बड़ा नादान कोई नहीं है और  अगर  बाहर किया हुआ चिट्ठा वापस नारद पर लिया जाता है तो नारद के लिये इससे दुर्भाग्यपूर्ण बात कुछ भी नहीं होगी।

मैं सभी चिट्ठाकारों से आग्रह करता हूँ कि इस बात को भूलें और आगे बढ़ें। जो होता है सही के लिये ही होता है।लोगों को नारद  परिवार को साफ सुथरा रखने में मदद करनी चाहिये ना कि प्रबन्धकों को कोसना चाहिये।

Advertisements

14 Responses to “बस करो अब!”

  1. सही कहा भाईसा, अब पानी सर से ऊपर निकल चुका है, ये लोग सहनशीलता को कमजोरी मानने लगे हैं। नारद से मेरा आग्रह है कि इस पूरी नस्ल को ही नारद से निकाल फैंकों, इनका मकसद नारद की आड़ में नफ़रत फैलाना है, और कुछ नहीं।

    नारद को चाहिये कि ऐसे दो-चार कदम और उठाये, मैं उसके साथ हूँ।

  2. afloo said

    प्रिय भाई सागर ,
    फिर से लिखना शुर करने के लिए हार्दिक शुभकामना।
    एक तरफ भूलने की बात करते हो और आप गुजरात में थे,आपने कितने मुसलमान मारे? जैसी आपत्तिजनक टिप्पणी को छाप कर याद दिला रहे हो । यह टिप्पणी क्या संजाल पर , मौजूद है ? क्या उस पोस्ट पर .’नारद’ पर छपने वाले किसी भी चिट्ठे के लेखक की टिप्पणी मौजूद है? बाकी टिप्पणियाँ कहाँ गयीं? कैसे गायब हुईं? क्या सभी आपत्तिजनक थीं? गैर आपत्तिजनक टिप्पणियों के हटने से बहस को धक्का पहुँचा , और पाठक उन्हें पढ़ने से हमेशा के लिए वंचित हो गए । इस दुर्भाग्यपूर्ण कार्रवाई के बाद तीन टिप्पणियाँ उस चिट्ठे पर अंग्रेजी में की गयी हैं , जिनमें से कोई नारद पर प्रदर्शित चिट्ठों का लेखक नहीं है । वह पोस्ट यहाँ पर मौजूद है ।

  3. मैं पहले भी आपके साथ था और अब भी आपका समर्थन करता हूँ। देखते हैं आपके लिखे का असर होता है या नहीं।

  4. संजय बेंगाणी said

    यह विचारों की नहीं संस्कारो की लड़ाई है.

  5. सागर भाई आपका पुनः स्वागत है, मुद्दा भी आपने बिलकुल सही उठाया है । ब्लॉग का उपयोग ज्ञान फ़ैलाने के लिये, लोगों को खुश करने के लिये होना चाहिये, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है, कुछ लोग अपने स्वार्थों की पूर्ति में लगे हैं नारद की आड में… एक बात जरूर कहूँगा कि ये देखना होगा कि शुरुआत कौन करता है, क्योंकि यदि एक व्यक्ति गन्दगी फ़ेंकना शुरु करेगा तो बाकी लोगों ने भी कम आटा नहीं खाया है, खून खौलना स्वाभाविक है, इसलिये बारीकी से यदि नजर रखी जाये तो पता चल जायेगा कि अपने-आप को पत्रकार कहलाने वाले कितने दूध से धुले हैं…

  6. masijeevi said

    मुझे आपके कहे पर इतना विश्‍वास तो है कि आप कह रहे हैं तो निश्‍चय ही ऐसा मानते हैं। किंतु इस प्रकरण पर पुन: विचार करें, स्‍वयं अपनी राय सहित मुझे एक भी असहमत(नारद की भूमिका से) स्‍वर ऐसा नहीं दिखा जिसने राहुल का समर्थन किया हो किंतु एक फुंसी के इलाज में हाथ काट देना अच्‍छा चिकित्‍सीय विवेक नहीं है- आपने राहुल को हटाया तो गिरीराज जी शाबासी देते हुए हम असहमतों की ‘पूरी नस्‍ल’ को समाप्‍त कर देने का आहावान करने लगे- और तो और औपचारिक रूप से सुनो नारद पर खम ठोंकते हुए कहा गया कि असहमत लोग खुद हट जाएं- एक इरीटेंट को दूर करने की कीमत कितने असहमत स्‍वरों को हटा कर चुकाएंगे- और यह प्रक्रिया भला यहीं क्‍यों थमेगी कल को लोग नारद की नियमावली में जुडवाएंगे कि मोदी पर कुछ न बोलो, ठाकरे का समर्थन करो, नसीर के विरोध की कसम खाओ, इस की ओर आंखे न तरेरो उस की ओर झांको मत….एक एग्रीगेटर नियम कायदे से चले पर उसकी कार्रवाई आलोचना से की कसौटी पर तो कसी ही जाएगी। प्रियंकर, धुरविरोधी, नसीर, मैं खुद, इरफान, अविनाश आदि ने अपने अपने स्‍वर व तरीके से इसका विरोध किया लेकिन हम न तो आपस में कोई गैंग न हैं न ही अनिवार्यत आपस में सहमत हैं पर नारदीय शब्‍दावली में हम सब एक गैंग ही नहीं वरन ‘नस्‍ल’ हैं जिसे उखाड़ फेंकना चाहिए-

    सागर भाई विवेक तात्‍कालिक उन्‍माद से परे जाकर विचार करने की मांग करता है( अगर आज धुरविरोधी और नसीर को लतियाया जा रहा है तो ये इन पर थमने वाली प्रक्रिया नहीं है, इसलिए सचेत मत रखें, अंध समर्थन न दें।

  7. आदरणीय मसीजीवी भाई साहब
    अगर फुंसी नासूर बनने लगे तो हाथ को काट देना ही समझदारी है। और नौबत हाथ काटने की ही थी। अगर हाथ नहीं काटा जायेगा तो कल को हर कोई अपने या दूसरॊं के चिट्ठे पर एक दूसरे को गालियाँ देता फिरता नजर आयेगा। तब क्या होगा? आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं।
    दूसरी बात मैने किसी नस्ल को हटाये जाने का समर्थन नहीं किया है। जोशीजी के चिट्ठे पर टिप्प्णी को एक बार फिर से पढ़ लीजिये।
    मेरा यह लेख तात्कालिक उन्माद नहीं है बहुत सोच विचार कर लिखा गया लेख है। बाकी आप जानते ही हैं कि मैने लिखना ही छोड़ दिया था। मैने धुर विरोधी जी या किसी और को लतियाया नहीं है बस सबसे नारद का समर्थन करने का आग्रह किया है।
    आप मेरे लिये आदरणीय है आप जानते हैं, आप और धुरविरोधी जी किसी गैंग के सदस्य नहीं है इतना भी मैं जानता और मानता हूँ, पर गैंग तो है इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता। इस गैंग के सदस्य कौन कौन है आप भी भली भाँति जानते हैं।

  8. पुनः लेखन में वापसी पर आपका स्वागत है। एकदम सही बात उठायी आपने। अब तक मैं इस विषय पर अपने विचार टिप्पणी से ही रख रहा था लेकिन अब शायद मुझे भी अपने विचार लिखने ही पड़ेंगे।

  9. मसीजीवी जी से कहना रह गया था कि मैने कब सुनो नारद पर ऐसा कहा था कि असहमत लोग हट जायें? सुनो नारद पर की गई मेरी टिप्प्णी यहाँ प्रस्तुत है
    बहुत सही निर्णय, मैं आपके इस कार्य की सराहना करता हूँ। बहुत पहले यह कार्य हो जाना चाहिये था…. खैर देर अब भी नहीं हुई।
    देर आये दूरस्त आये….।
    1:06 PM

  10. मसिजीवीजी,

    क्या आप सचमुच इस गैंग/नस्ल के बारे में नहीं जानते? आप और धुरविरोधीजी खूब लड़े है इनसे, फिर आप ऐसा कैसे कह सकते हैं? आश्चर्य!!!

  11. masijeevi said

    मित्र सागर, मेरे कहने का आशय यह नहीं था कि ये आपके शब्‍द हैं- प्रतिबंध के समर्थन के स्‍वर थे, उनके संदर्भ मे अपनी राय बनाने के लिए आग्रह था बस।

    जी कुछ लोगों से लगातार लड़ा हूँ, संवाद के वातावरण को विषैला किए जाने के विरुद्ध- आगे भी लड़ूंगा- और खुलेआम। पर आपकी राय के भिन्‍न मुझे पूरा यकीन है कि वे भिन्‍न ‘नस्‍ल’ नहीं हैं। और याद करें कि उनपर सवाल खड़े किए जाने के समय उन्‍होंने हमारे इस हक पर सवालिया निशान नहीं लगाया (लगाते तो भी उन्‍हें ऐसा करने नहीं दिया जाता) इसीलिए उन्‍हें इंगेज करने की जरूरत है। यहॉं तक कि कोई कार्रवाई करने की जरूरत हो तो भी- एकजुट होकर किसी ‘नस्‍ल’ की एथनिक क्‍लींजिंग की कोशिश तो नहीं ही की जानी चाहिए। इसका उत्‍सव मनाने की कोई जरूरत नहीं थी। जब हम अपने बीच के इन लोगों से संवाद नहीं स्‍थापित नहीं कर पाएंगे तो कौन करेगा– हसन जमाल 🙂

  12. “…संवाद के वातावरण को विषैला किए जाने के विरुद्ध- आगे भी लड़ूंगा- और खुलेआम। पर आपकी राय के भिन्‍न मुझे पूरा यकीन है कि वे भिन्‍न ‘नस्‍ल’ नहीं हैं। ”
    मसिजीवी के साथ मेरा हाथ भी गिन लें.

  13. आपका कहना सही है भाई जी,

  14. YOU all write in unicode font?

    http://millionairenew.blogspot.com

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

 
%d bloggers like this: