॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

किकोड़े मात्र अस्सी रुपये किलो!

Posted by सागर नाहर on 25, September 2009

बिल्कुल हद हो गई जी। किकोड़ा की सब्जी और अस्सी रुपये किलो!! आश्चर्य ही हो गया । कल बाजार सब्जी लेने गये और कुछ  ठेलों पर बड़े करीने से सजाये एकदम हरे हरे  किकोड़े दिख गये। बरसों बाद दिखे सो बड़े उत्साह से जाकर भाव पूछा .. जवाब मिला साठ रुपये किलो।

बच्चों का पता नहीं क्यों पर वे वैसे भी आधी हरी सब्जियों से नाक- भौं सिकोड़ते हैं, वे तो खाने से रहे, सो हमने ढ़ाई सौ ग्राम मांगे तो ठेले वाले का कहना था, मैने किलो का भाव बताया है, पाव लेने हों तो पूरे बीस लगेंगे!!
हमारा तो मूड खराब हो गया, सब्जी वाले से बहस करने की इच्छा थी परन्तु  श्रीमती जी ने हाथ खींच लिया। मोंडा मार्केट में जाने के बाद दूसरी सब्जियां खरीदी गई पर हमारा मन तो उन्हीं किकोड़ों में अटका  रहा । एकाद और जनों के पास दिखा फटाफट एक से  (पाव का) भाव पता किया। भाव तो पचास ही था पर ना जाने क्यों उसने सामने से ही दस रुपये कह दिया हमने फटाफट उसके हाथ में दस रुपये थमा दिये।

आज सुबह बरसों बाद सब्जी भी खाई, और गांव को, खेतों को और बचपन को भी याद कर लिया। अरे ये वे किकोड़े हैं जो खेतों की बाड़ पर और इधर उधर यों ही उग आते हैं, इन्हें कोई भी तोड़ कर नहीं ले जाता क्यों कि हरेक के घर, खेत या बाड़े में मिल/उग जाते हैं। इन्हें तिनकों से जोड़ कर और ताजा लाल मिर्च की एक कतरन को बीच में जोड़कर हम तोता और ना जाने कौन कौन से जानवर बनाया करते थे। आज हंसी आती है कि उसे (तोते को) खड़े रखने के लिये हम प्रकृति से भी छेड़छाड़ कर लिया करते थे। वो कैसे? वो ऐसे कि हम एक पक्षी के चार पाँव लगाया करते थे, अलबत्त तिkantolaनकों के। :)

इस सब्जी का जिक्र पढ़ कर आपका भी मन हुआ होगा कि आखिर यह सब्जी है कैसी जिसके लिये एकाद महीने बाद एक पोस्ट ठेलने का मन बन गया। :) तो आपको सब्जी का फोटो बताने के लिये गूगल पर बहुत खोज की।
कई नामों से सर्च किया। करेले को bitter gourd कहते हैं सो इसकी बिरादरी से मिलते शब्दों को खोजा तो भी नहीं मिला। अचानक याद आया कि इन्हें गुजराती में कंटोळा (કંટોળા-Kantola) भी तो कहते है। अरे ये क्या! Kantola नाम खोजते ही तुरंत इसके फोटो मिल गये। लीजिये आपके लिये भी प्रस्तुत हैं कंटॊले का फोटो… आपकी भाषा में इन्हें क्या- क्या कहते हैं ये भी बताईये।

अब आपके मन में कंटोले की सब्जी खाने की इच्छा हुई होगी तो यह लीजिये इसकी सब्जी बनाने की रेसेपी-

कटोले की सब्जी
…..हां अगर भिण्डी फ्राई की तरह किकोड़े फ्राई बनायें जाये तो भी यह बहुत अच्छे लगते हैं।

फोटो इस जाल स्थल से लिया है, अगर किसी को आपत्ति हो तो बतायें, हटा दिया जायेगा।

Posted in सामान्य | 24 Comments »

भगवान इतनी ह्रदयविदारक मौत किसीको ना दे!

Posted by सागर नाहर on 4, September 2009

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ वाई.एस. राजशेखर रेड्डी के दुखद: निधन के बाद कल आश्‍चर्यजनक रूप से सभी गणेश मंडलों ने  गणेशजी की प्रतिमाओं का वसर्जन एकदम सादगी से किया।  पिछले वर्षों में प्रतिमाऒं के साथ अनेक लोक कलाकार अगल- अलग वेशभूषाओं में अपनी अपनी कला  का प्रदर्शन करते हैं. लेकिन कल सड़कों पर एक्का दुक्का ही गाड़ियां दिखाई दे रही थी। सिकन्दराबाद में पांच साल रहते हो गये लेकिन पहली बार पैटनी चौराहे  और अन्य रास्तों को को 70-80  की स्पीड से क्रोस किया जबकि आम दिनों में 30 की गति से भी इस चौराहे को पार करना मुश्किल होता है।

Y-S-Rajasekhara-Reddy.jpg

गणेश प्रतिमाओ के ले जारहे वाहनों पर/ के साथ पहली बार ना तो लाईट्स (हेलोजन) थी ना ही ढ़ोल- नगाड़े! लगभग हरेक वाहन पर सबसे आगे स्व. रेड्डी का आदमकद फोटो लगा हुआ था।

कल स्थानीय केबल ओपरेटरों ने भी समाचार चैनलों को छॊड़कर सभी मनोरंजन के चैनल को बंद कर दिया। तेलुगु के अलावा हिन्दी में मात्र स्टार न्यूज और अंग्रेजी में मात्र NDTV के अलावा सभी चैनलों को बंद कर दिया जिन्हें  स्व. मुख्यमंत्री के अंतिम संस्कार के बाद ही चालू किये जायेंगे।

तेलुगु चैनलों पर हेलिकॉप्टर के अलावा पांचों के शरीरों का जो हाल बताया वह दहला देने वाला था, स्थानीय लोग हाथों में उन शरीरों के अलग अलग अवशेष पकड़ कर ला  रहे थे, किसी के हाठ में किसी शव का हाथ था तो किसी के हाथ में एक मास का लोथड़ा!  बाद में उन्हें एक पोटली में बांध कर उपर उड़ रहे हेलिकॉप्टर में चढ़ाना पड़ा। भगवान इतनी ह्रदयविदारक मौत किसीको ना दे!

यह पंक्तिया लिखते समय कॉंग्रेस के कार्यकर्ता दुकान बंद करने का आग्रह (धमकी)  कर रहे हैं। सो आगे लिख  कर केफे का काँच फुड़वाने की बजाय घर ही जाना उचित होगा।

राम राम।

डॉ राजशेखर रेड्डी को हार्दिक श्रद्धान्जली।

फोटो गूगल से साभार।

Posted in दुखद: | 14 Comments »

डॉ नौतम भट्ट- एक अज्ञात भारतीय-वैज्ञानिक

Posted by सागर नाहर on 15, July 2009

या नींव के पत्थर!!

आपमें से  कितने लोगों ने डॉ नौतम भगवान लाल भट्ट का नाम सुना है?  अच्छा अब बताइये आपने अग्‍नि, पृथ्वी, त्रिशूल, नाग, ब्रह्मोस,धनुष, तेजस, ध्रुव, पिनाका, अर्जुन, लक्ष्य, निशान्त, इन्द्र, अभय, राजेन्द्र, भीम, मैसूर, विभुति, कोरा, सूर्य.. आदि नाम सुने हैं? अब आप पहचान गये होंगे कि ये सब भारत के शस्त्र हैं। अब मैं एक और प्रश्न पूछना चाहूंगा कि  कि इन सब शस्त्रों के साथ किसी सबसे पहले वैज्ञानिक का नाम जोड़ना हो तो आप किसका नाम जोड़ना पसन्द करेंगे? डॉ कलाम ही ना !! अगर  मैं कहूं कि डॉ. अब्दुल कलाम से पहले डॉ नौतम भगवान लाल भट्ट का नाम जोड़ना ज्यादा सही होगा तो?  आपको आश्‍चर्य होगा क्यों कि आज तक किसी ने डॉ साहब का नाम भी नहीं सुना।

मशहूर गुजराती मासिक पत्रिका सफारी ने सन् २००५ के  अक्टूबर अंक के संपादकीय में संपादक श्री हर्षल पुष्‍पकर्णा जी ने जब पाठकों से यह प्रश्न पूछा था तब तक मैं भी डॉ साहब के नाम से अन्जान था।  डॉ नौतम भट्ट का २००५ में देहांत हो गया था, और इतनी बड़ी शख्सियत के बारे में हम उनके निधन के बाद जान पाये कितना दुखद: है।

आपकी उत्सुकता बढ़ गई होगी.. आगे का विवरण में सफारी के शब्दों को ही अनुवाद करने की कोशिश कर रहा हूँ। हिन्दी- गुजराती में लिखने की शैली थोड़ी अलग होती है सो कहीं कहीं छोटी बड़ी गलती रह पाना संभव है।Safari

अग्‍नि, पृथ्वी, त्रिशूल, नाग, ब्रह्मोस,धनुष, तेजस, ध्रुव, पिनाका, अर्जुन, लक्ष्य, निशान्त, इन्द्र, अभय, राजेन्द्र, भीम, मैसूर, विभुति, कोरा, सूर्य.. इस सब शस्त्रों के नाम के साथ अगर किसी एक व्यक्ति का नाम जोड़ना हो तो शायद   हमारे मन में ए. पी. जे. कलाम के अलावा दूसरा नाम याद नहीं आयेगा। कलाम के बाद अगर दूसरे नंबर पर जामनगर के नौतम भगवान लाल भट्ट का नाम अगर माना जाये तो?  देखा जाये तो उनका नाम दूसरे स्थान पर उचित नहीं माना जाना चाहिये, क्यों कि भारत में सरंक्षण शोध की नींव रखने वाले या सरंक्षण के क्षेत्र में  स्वावलंबन  के लिये जरूरी संसाधन/ संशोधन के पायोनियर डॉ कलाम नहीं बल्कि डॉ नौतम भट्ट थे, और कुछ समय पहले आपका ९६ वर्ष की उम्र में देहांत हुआ तब इस दुखद घटना को हमारे समाचार माध्यमों ने अपने चैनलों- अखबारों में बताया भी नहीं। सरंक्षण के क्षेत्र में उनके अतुल्य- अनमोल योगदान को  नमन करना तो दूर भारत में ( या गुजरात में) ज्यादातर लोगों ने उनका नाम भी नहीं सुना हो इसकी संभावना भी कम नहीं!

जामनगर में 1909 में जन्मे और भावनगर तथा अहमदाबाद में स्कूली शुरुआती शिक्षा के बाद  में बैंगलोर की इन्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ सायन्सिस में डॉ सी वी रमन  के सानिध्य में  फिजिक्स में MSc  पास करने वाले नौतम भट्ट ने 1939 में अमेरिका की मेसेचुएट्स इन्स्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी में इसी  विषय में डॉक्टरेट की पदवी हासिल की।  भारत की आजादी के 2 वर्ष बाद डॉ भट्ट सरंक्षण विभाग में जुड़े और नई दिल्ली में डिफेन्स साइन्स लेबोरेटरी की स्थापना की।  सेना के लिये  रेडार संशोधन विभाग की भी स्थापना की, जिसमें वर्षों बाद नई पीढ़ी के वैज्ञानिक अब्दुल कलाम के नेतृत्व में बनने वाली डिफेन्स रिसर्च लेबोरेटरी और उसके बाद डिफेन्स एवं रिसर्च डेवलेपमेन्ट ओर्गेनाईजेशन (DRDO) के नाम से मानी जाने वाली थी। इस संस्था में  1960-65  की अवधि में स्वदेशी संरक्षण तकनीक (डिफेन्स टेक्नोलोजी) का विकास करने के लिये बम के फ्यूज, हीलीयम नियोन लेसर, सोनार, सेमी कन्डक्टर, चिप, रेडार आदि  से संबधित शोध की गई वे सारी शोध नौतम भट्ट द्वारा डॉ कलाम जैसे युवा वैज्ञानिकों को दिये गये मार्गदर्शन की आभारी थी।  कई शोधों को रक्षा मंत्रालय द्वारा मिलिटरी (सेना) के लिये गोपनीय वर्गीकृत (classified) माना क्यों कि उनकी गोपनीयता बरकरार रखनी बहुत ही आवश्यक थी। सरंक्षण के क्षेत्र में डॉ नौतम भट्ट ने संशोधकों-वैज्ञानिकों की एक फौज ही खड़ी कर दी थी जो भविष्य में  अगिन, पृथ्वी एवं नाग जैसी मिसाइल्स और राजेन्द्र तथा इन्द्र जैसे रेडार, वायर गाईडेड टोरपीडो तथा एन्टी सबमरीन सोनार का निर्माण करने वाली थी। ध्वनिशास्त्र (acocstics)  में डॉ भट्ट के अपार ज्ञान का लाभ सोनार डिजाईनर को मिला ही लेकिन  दिल्ली में भारत के सर्वप्रथम 70mm के दो सिनेमा थियेटर ( ओडियन एवं शीला) के लिये आपने साऊंड सिस्टम तैयार की। मुंबई के बिरला मातुश्री सभागृह  की 2000 वॉट के स्पीकर्स वाली साउंड सिस्टम भी डॉ भट्ट ने ही बनाई थी।

राष्‍ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन के हाथों 1969 का पद्मश्री पुरुस्कार प्राप्‍त करने वाले डॉ भट्ट को भारत की डिफेन्स रिसर्च के भीष्‍म पितामाह के रूप में कितने लोग जानते हैं? लगभग कोई नहीं। इसका कारण है जेनेटिक्स के विशेषज्ञ डॉ हरगोविन्द खुराना, भौतिकशास्त्री चंद्रशेखर सुब्रमनियम, बेल टेलिफोन लेबोरेटरी के नियामक कुमार पटेल, अवकाश यात्री कल्पना चावला, रोबोटिक्स के प्रणेता राज रेड्डी आदि की तरह नौतम भट्ट भी अपना देश छोड़कर अमरीका में स्थायी हो गये होते तो आज उनका नाम भी गर्जना कर रहा होता, परन्तु भारत को रक्षा क्षेत्र में स्वावलम्बी बनाने की महत्वाकांक्षा को उन्होने खुद को हमारे लिये अंत तक अज्ञात ही रखा।

-हर्षल पुष्पकर्णा

जब मैने इन्टरनेट पर डॉ भट्ट के  नाम को सर्च किया तो कई घंटों खोजने के बाद मात्र पद्मश्री पुरुस्कार की लिस्ट में उनका नाम मिला,इसके अलावा कहीं किसी भी भाषा में कोई जानकारी नहीं मिली।
सन् 2009 डॉ नौतम भगवान लाल भट्ट की जन्म शताब्दी का वर्ष है  आप को हम नमन  करते हैं।

सफारी का जालस्थल

पोस्ट की चर्चा अमर उजाला में ( सौजन्य से अजय कुमार झा एवं पाबला साहब)

dastak-kiran-maheshwari-blog-print

_______________________________________________

Missiles

Posted in प्रेरणा | 16 Comments »

श्रीलक्ष्मी सुरेश: छोटी उम्र में बड़े कारनामे

Posted by सागर नाहर on 26, June 2009

जिस उम्र में छोटी बच्चियां गुड्डे- गुड्डियो के  विवाह करवाने के खेल खेला करती है, उस उम्र में केरल की एक छोटी सी बच्ची  श्रीलक्ष्मी सुरेश ने वेब डिजाईन करना शुरु कर दिया।sreelakshmi

छ: साल की उम्र में अपनी स्कूल की साईट बनाई उसके बाद श्रीलक्ष्मी रुकी नहीं और कुछ दिनों पहले उसने केरल बार काऊंसिल की साईट डिजाईन कर विश्‍व में सबसे छोटी वेब डिजाईनर होने का गौरव प्राप्‍त कर लिया।

आइये श्रीलक्ष्मी की डिजाईन की हुई साईटस देखते हैं।

श्रीलक्ष्मी  का जाल स्थल

लोगो का सर्च इन्जिन

Bar Counsel of Kerala

EDesigns इस कंपनी की सी ई ओ होने के कारण वह विश्‍व की सबसे छोटी सीईओ भी है।
श्रीलक्ष्मी की फोटो गैलरी

अपनी स्कूल की वेब साइट

***

विकीपीडिया पर श्रीलक्ष्मी सुरेश

Posted in प्रेरणा | 13 Comments »

अब पता चला बच्चू!

Posted by सागर नाहर on 19, May 2009

श्रीमतीजी गर्मी की छुट्टियां मनाने गाँव गई है बच्चों को साथ लेकर!  दो साल बाद गई है सो कह कर गई है कि डेढ़ महीने से पहले नहीं आने वाली, इधर अपनी हालत यहां पतली होती जा रही है।

जब निर्मला यहां थी, और मैं किसी काम से घर जाता; किसी भी समय तो वे या तो रसोई में कुछ काम कर रही होती या बर्तन मांज रही होती या फिर और कोई काम कर रही होती। कभी फुर्सत से पढ़ते लिखते  या कम से कम टीवी देखते भी नहीं पाया।
मैं रोज  उन पर चिढ़ जाता था।
पता नहीं जब देखो काम काम, हमेशा किचेन में या बाथरूम में घुसी रहती हो, काम है कितना बस खाना बनाना,  कपड़े धोना, पोछा लगाना घर की साफ सफाई रखना…और, और, और। पता नहीं कितना धीरे धीरे काम करती हो।  बस इतने से काम को करने के लिये तुम्हारे लिये समय कम पड़ता है!
पर अब जब वे यहां नहीं है तो पता चलता है कि कितना मुश्किल होता है, सुबह छ: साढ़े छ:  उठ कर  घर का काम शुरु करता हूं। पर काम है कि पूरा होता ही नहीं।
खाना बनाना सीखने के लिये घर के सब लोग दबाव डालते थे तब कहता था इसमें सीखना क्या? बस आटा गूंदो और रोटी बेल कर सेको। सब्जी तो यूं यूं बन जाती है।
यह  जितना आसान लगता था  आज जब आन पड़ी है तो उतना ही मुश्किल। आटा गूंदना कोई आसान काम नहीं दस दिन में चार बार तो आटे में पानी ज्यादा पड़ गया और उसे बराबर करने के लिये दो समय के खाने जितना आटा हो गया।  एक बार आटा इतना कड़क हो गया मानो रोटियांनहीं पापड़ बनाने हों।
इधर जब रोटी बेलता हूं तो तवे की रोटी जल जाती है, तवे की रोटी को संभालता हूं तो दूसरे गैस पर रखी सब्जी बढिया सी नये रंग की बन जाती है, ये रंग मेरे चेहरे से थोड़ा ही हल्का  होता है, कभी तो मेरे चेहरे के रंग को मात देती सब्जियां भी बन जाती है।
एक काम करता हूं तो दूसरा रह जाता है, कभी रोटी कच्ची रह जाती है तो कभी नई रोटी बेल नहीं पाता और तवा खूब गरम हो जाता है नई रोटी डाली नहीं कि तवे से चिपकी नहीं।
चलो जैसे तेसे खाना बन गया है, अरे अभी तो  तीन दिनों के कपड़े धोने है, और आठ बजने आई। मन कहता है क्या करूं कपड़े कल धोंऊं? लेकिन कल फिर चार जोड़ी हो जायेंगे, चार जोड़ी धोते धोते तो कमर टूट जायेगी।और फिर कल खाने का क्या होगा? मन मसोस कर एक जोड़ी कपड़े धोता हूं। अरे  आज तो झाड़ू भी नहीं लगा,  पोछा तो दस दिन में एक बार लगा! है भगवान क्या क्या करूं? अभी तो खाना बनाया उसके बरतन भी मांजने हैं। चलो जाने दो सब काम छोड़ देता हूं, कल खाना होटल में खा लूंगा।  दुकान खोलने में   ज्यादा देर हुई तो ग्राहक चिढ़ेंगे।

कितना आसान है ना पत्नियों पर चिढ़ना। है ना ?

:)

यह पोस्ट लिखने के बाद आज सुबह बनाई हुई तुरई की सब्जी खाने बैठा तो पता चला कि नमक दोनो ( शायद दो दिनों के) समय की सब्जी का तुरई की सब्जी में ही डाल दिया है, भला हो कि रात को दही जमा दिया था सो उससे खाना का लिया गया। वरना दौ कौर खानेर के बाद तो जीभ पर नमक की वजह से छाले पड़ गये हैं।

Posted in अनुभव, हास्य व्यंग्य | 31 Comments »

Posted by सागर नाहर on 22, April 2009

एक बात समझ में नहीं आती, जब  समाचार चैनलों को भाजपा से इतनी नफरत है कि दिन रात पानी पी पी कर उसे कोसने में लगे  रहते हैं।
जब ये इतने ही सिद्धान्तवादी हैं और इतने ही शर्म निरपेक्ष धर्म निरपेक्ष हैं तो फिर भाजपा के चुनाव के विज्ञापन भी अपने चैनलों पर क्यों दिखाते हैं।
हम एक तरफ तो आडवाणी जी को कंधार कांड के लिये  उन्हें दोषी मानते हैं और फिर विज्ञापनों में उन्हें “लौह पुरुष” बताने से भी गुरेज नहीं करते।

जब ये अपने सिधान्तों पर इतने अटल हैं तो क्यों नहीं इन विज्ञापनों को अपने चैनलों पर रोक लगा देते?

क्या इन कथित साम्प्रदायिक पार्टियों को कोसने का काम भी हम  पैसा लेकर ही करते हैं?

****

सबसे बड़े मूर्ख तो वे हैं जो ऐसे चैनलों को अपने विज्ञापन  देते हैं।

और आखिर में हम (आम आदमी)  क्या है?

Posted in सामान्य | 9 Comments »

भोपाल स्टेशन पर एक मजेदार घटना

Posted by सागर नाहर on 4, April 2009

कई बार कैसे कैसे मजेदार वाकये हो जाते हैं कि वे हमें जिन्दगी भर याद रह जाते हैं। कल ऐसा ही वाकया मेरे साथ हुआ।
कल शाम (2-04-2009) भोपाल रेल्वे स्टेशन पर मैं, मेरी बहन किरन और चाचीजी सिकन्दराबाद आने के लिये ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। भारतीय रेल की परंपरा को कायम रखते हुए संपर्क क्रान्ति एक्सप्रेस मात्र एक घंटे लेट थी।

हम तीनों आपस में बात कर ही रहे थे कि मैने एक आदमी को देखकर एकदम से चाचीजी से कहा देखो डायचन्दजी! (डायचन्द जी हमारे रिश्तेदार हैं) चाचीजी ने देखा वाकई डायचन्दजी आ रहे थे हम बात कर ही रहे थे कि डायचन्दजी पास आये तो पता चला कि वे डायचन्दजी से मिलती जुलती शक्ल वाले कोई और ही इन्सान हैं।

थोड़ी देर बाद किरन बोली देखो शेषगिरी राव! ( शेषगिरी राव मेरे चाचाजी के खास दोस्त हैं) हमने देखा कि शेषगिरी राव आ रहे हैं पर ये भी शेषगिरी राव नहीं थे। हम इस बात पर खुब हंस ही रहे थे कि एक युवक मेरे सामने से अपने दोस्त के साथ बात करते निकले मैने तुरंत उन्हें आवाज दी नितिन जी – नितिनजी, पर नितिनजी ने सुना ही नहीं। चाचीजी और किरन मजाक करने लगे आज सबको मिलती जुलती शक्ल वाले इन्सान कैसे दिख रहे हैं!nitin1

मेरा मन नहीं माना मैं उन नितिनजी के पीछे भागा पीछे से ध्यान से देखा वे हल्के से लंगड़ा कर चल रहे थे और कपड़े भी नितिनजी के व्यक्तित्व से मेल खाते नहीं दिख रहे थे, मैने आज तक नितिनजी को ऐसे कपड़े पहले नहीं देखा था, पर फिर भी मन नहीं माना मैं पीछे चलता रहा, अब वे स्टेशन के मेन गेट पर खड़े खड़े अपने दोस्त से बातें करने लगे। मैं एकदम उनके पीछे खड़ा हो गया कि शक्ल से कन्फ्यूजन हो सकता है आवाज से तो नहीं। आवाज से तो पता चल जायेगा कि वे नितिनजी हैं या नहीं।

कुछ देर खड़ा रहा पर स्टेशन के शोरगुल में उनकी आवाज मुझे सुनाई नहीं दी, अब मैं उनके सामने खड़ा हो गया शायद उनकी नजर मुझ पर पड़ जाये तो हो सकता है कि वे अगर नितिनजी ही हों तो मुझे पहचान लेंगे पर उनकी नजर मुझ पर पड़ी ही नहीं और मेरी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि मैं उनसे जाकर पूछ लूं कि आप नितिनजी  हैं या कोई और…।

थक कर मैं वापस अपने परिजनों के पास आ गया और चाचीजी ने भी खासा मजाक उड़ाया पर मेरा मन नहीं मान रहा था मैने कहा इस बात का पता कल लगाना ही पड़ेगा।
आज नितिनजी ओनलाईन दिखे, देखिये हम दोनों के बीच क्या बात हुई

4:21 PM me: नितिनजी, नमस्कार।
क्या आप कल भोपाल रेल्वे स्टेशन पर थे?
4:22 PM Nitin: jee haa
namaste maalik
kyo? aap bhi the?
4:23 PM me: हाँ, मैने आपको देखा भी, आवाज भी दी पर आपने सुना नहीं, तो आपका पीछा भी किया, आपके पीछे कई देर खड़ा रहा
आप किसी दोस्त के साथ थे
मेरी ट्रेन १ घंटे देर से थी
4:25 PM Nitin: arrre?
Sampark Kranti se aaye ho kya?
usi train me tha mai bhi
me: हाँ


देखा आपने जिन्हें मैं नितिनजी समझ रहा था वे नितिनजी ही थे। कैसा अजब संयोग था। आगे की बातचीत फोन पर हुई तब पता चला कि वे उसी ट्रेन के S2 कोच में थे और मैं S1 में|
ऐसा कोई वाकया कभी आपके साथ भी हुआ है? :)

नितिन बागला जी हिन्दी के जाने माने  ब्लॉगर  हैं।

Posted in सामान्य | 24 Comments »

रॉय सुलिवान; एक अनोखी शख्सियत

Posted by सागर नाहर on 2, April 2009

नेट पर सर्फिंग करते करते कई बार बड़ी अनोखी चीजें देखने को मिल जाती है, आज पता नहीं क्या सर्च करते करते  मैं रॉय सुलिवान (Roy Sullivan) के पन्ने तक पहुंचा।

आप पूछेंगे की रॉय सुलिवान में ऐसी क्या खास बात है तो  आप जान  कर  आश्‍चर्य चकित रह जायेंगे कि  रॉय पर सात बार आकाशी बिजली का प्रहार हुआ पर छोटी मोटी शारीरिक नुकसानियों के बावजूद रॉय  सकुशल बच गये, परन्तु पारिवारिक कारणों के चलते  रॉय ने 28 सितम्बर 1983 को आत्महत्या कर ली।


रॉय सुलिवान के बारे में ज्यादा जानें

यानि  बिजली के 10 करोड़ वोल्ट के  “शॉक ” से  ज्यादा मानसिक” शॉक” रॉय के लिये ज्यादा खतरनाक साबित हुआ।

रॉय की तरह आकाश से बिजली गिरने के बाद बचे (या बिजली के शिकार!) लोगों ने अपना एक समूह बना भी रखा है, जिसका नाम है Lightning Strike and Electric Shock Survivors international (LSESSI) जिसके कई सौ सदस्य है और इस समूह का अपना जाल स्थल भी है। इसके कई सदस्यों पर कई कई  बार बिजली के प्रहार हो चुके हैं।

Posted in ज्ञान- विज्ञान | 5 Comments »

1970 में भी चिट्ठे लिखे जाते थे?

Posted by सागर नाहर on 21, March 2009

चिट्ठाजगत.इन से लिया गया यह स्क्रिन शॉट तो यही कहता है! :)

chitthajagat.in

chitthajagat.in1

Posted in मनोरंजन, हास्य व्यंग्य | 16 Comments »

भई सब लोग ममताजी- यूनुस भाई को बधाई दो रे!

Posted by सागर नाहर on 27, February 2009

पिछले महीने ही हमने एक पोस्ट लिखी थी  अरे, सब लोग हमें बधाई दो रे! तभी हमने आपसे कहा था कि आपको जल्दी ही एक और खुशखबरी सुनायेंगे। हाँ तो खुशखबरी हम सबके प्रिय  यूनुस भाई के घर में आज सुबह आ चुकी है।

रेडियो सखी के नाम से जानी मानी, विविध भारती की अनाऊंसर और बतकही नामक ब्लॉग  की लेखिका  ममता जी और रेडियो के अलावा लेखन और ब्लॉगिंग का जाना माना नाम यूनुस खान दम्पति के यहाँ आज सुबह (26 फरवरी को ) ही पुत्र ने जन्म लिया है।

बच्चे का फिलहाल फोटो उपलब्ध नहीं है, उपलब्ध होते ही  पोस्ट किया जायेगा।

यह लिजिये ये है जूनियर  यूनुस जी!

img_21951

मेरी तथा हिन्दी चिट्ठा जगत की ओर से ममता सिंह-यूनुस खान जी एवं उनके पूरे परिवार  को ढ़ेरों बधाईयाँ।

Posted in सामान्य | 25 Comments »