॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

हेट्‍स ऑफ यू, अभिनया

Posted by सागर नाहर on 1, February 2010

मैं अपने कॉफे में सिनेमा के टिकट भी बेचता हूं, क्यों कि मैने इजीमूवीज की  फ्रेन्चाईजी ले रखी है। इस काम के लिये  कुछ दिनों पहले मुझे एक थियेटर में जाना पड़ा, वहां एक बहुत बड़ा पोस्टर दिखा फिल्म थी शम्बो शिव शम्बो। इस पोस्टर पर एक नवोदित अभिनेत्री अभिनया का फोटो लगा था।

कॉफे में आकर उत्सुकता मैने गूगल में अभिनया को खोजा तो आश्चर्य चकित रह गया,  क्यों ?

आप जानेंगे तो आप भी दंग रह जायेंगे  कि मैं क्यों दंग था इस अभिनेत्री के बारे में जानकर। अगले दिन सुबह ही हिन्दी मिलाप के रविवारीय परिशिष्‍ट मिलाप मजा में अभिनया से संबधित एक छोटा सा संपादकीय लेख पढ़ा।

अब मैं  गूगल पर जो कुछ देखा-सुना उसे बताने की बजाय हिन्दी मिलाप (मजा) में जो कुछ पढ़ा उसे ही अक्षरश: यहाँ टंकित कर रहा हूँ।

प्रेरणा:

किसी सामान्य व्यक्‍ति को विकलांग (मूक-बधिर) का रोल करते हुए तो आपने कई फिल्मों  में देखा होगा (संजीवकुमार, जया भादुड़ी- फिल्म कोशिश) लेकिन क्या कभी किसी मूक-बधिर को, फिल्मों में सामान्य व्यक्ति का रोल करते हुए देखा है? जी हाँ, यह असंभव- सा लगने वाला कार्य कर दिखाया है- हैदराबाद की ही अभिनेत्री  ’अभिनया’ ने। सुनहरे पर्दे पर उस सुंदरी के चेहरे को देखकर किसी को विश्‍वास ही नहीं होगा कि  इतना अच्छा अभिनय करने वाली इस युवती  से प्रकृति ने सुनने और बोलने की शक्‍ति छीन ली है। श्रव्य और वाक शक्‍तियों से वंचित होने के बावजूद उसने अपनी मस्तिष्क की तीसरी शक्‍ति के द्वार खोल दिये हैं और तमिल फिल्म  ’नडोदिगल’ एवं तेलुगु फिल्म ’शम्भो शिव शम्भो’  में अपने अभिनय  से ’अभिनया’ ने अपनी विकलांगता को ही विकलांग कर दिया।

इस हैदराबादी अभिनेत्री ’अभिनया’  ने अपने अभिनय द्वारा अपनी खामोशी को शब्द दिये हैं।  अपने गूंगे और बहरेपन को हराने का लक्ष्य अभिनया ने बचपन से ही तय कर रखा था। मारेडपल्ली में मूक एवं बधिर  स्कूल और बाद में मॉन्टेसरी तथा सेन्ट एन्स स्कूल  तारनाका में पढ़ते हुए उसने सोचा था कि वह फिल्म स्टार बनेगी और अंतत: अपने लक्ष्य को प्राप्‍त कर लिया।

पिता आनंद वर्मा ने अपनी सुन्दर बेटी की पैदाइश के समय ही सोचा था कि वे उसे अभिनेत्री बनाएँगे। इसीलिए उन्होने अपनी बेटी का नाम ’अभिनया’ रख दिया। लेकिन उस समय उस पूर्व सैनिक को पता नहीं था कि उनकी बेटी सुन नहीं सकती और बाद में यह भी  पता चला कि कि वह बोल भी नहीं सकती। फिर भी उन्होने हिम्मत नहीं हारी। वे अभिनया को कई फिल्मों की शूटिंग पर ले जाते थे। जैसे जैसे वह बड़ी होने लगी, वह फिल्मों के पोस्टर्स की ओर इंगित कर, इशारों में ही उन्हें बताती कि एक दिन उन पर उसकी तस्वीर होगी।
माँ हेमलता बताती है कि संवादों के ले ’लिप-मूवमेन्ट’ समझते उसे देर नहीं लगती और मुश्किल से दो टेक में उसका शॉट ’ओके’ हो जाता है। उसके अभिनय को देखते हुए उसे एक और तमिल फिल्म के लिए साइन किया गया है।

सच है कि समस्या चाहे जो हो, संकट चाहे जैसा हो, इच्छा शक्‍ति और कुछ करने का मजबूत इरादा उस संकटों को रास्ते से हटने पर मजबूर कर देता है।… और निश्‍चित ही यह कान और ज़बान वालों के लिए प्रेरणास्त्रोत है।

सलाम अभिनया! आपकी इच्छा शक्‍ति को भी सलाम।

फोटो चेन्नै ओनलाईन से साभार

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IRCTC अब नये अंदाज में

Posted by सागर नाहर on 21, January 2010

भारतीय रेल केटरिंग एवं टुरिस्म कॉर्पोरेशन (IRCTC) ने अपनी बोरिंग साईट को बेहतर बनाने की दिशा में प्रयास चालू कर दिया है। उसकी नई साईट जो कि अभी बीटा वर्जन में है, (प्रयोग के लिये चालू है) का इन्टरफेस तो बढ़िया है ही, कुछ सुविधाओं में थोड़ा फेरबदल करने से साईट एकदम सुविधाजनक हो गई है। आईये चित्रों के माध्यम से देखें।

Plan my Travels के कॉलम में “कोटा” के अन्तर्गत पहले पन्ने पर ही लेडिज कोटा का ऑप्शन जोड़ दिया है, जो कि पहले दूसरे पन्ने (Booking वाले)पर था। इससे पता नहीं चलता था कि  फलाणा ट्रेन में लेडिज कोटा है या नहीं। अगर नहीं है तो रिजल्ट नहीं आयेगा, लेकिन इस नये जालस्थल में उस दिन चलने वाली सारी ट्रेन में लेडिज कोटा के बारे में बता देगा, जिससे बुकिंग करने में पहले से बहुत सुविधा होगी।

1A, FC, 2A, 3A, 3E, CC,  SL  और 2S क्लास में सीट की उपलब्धता के लिये आपको बार बार ऑप्शन बदल कर Find Trains पर क्लिक करने की आवश्यकता नहीं होगी।

Find Train पर क्लिक करने के बाद जो लिस्ट आद्ती है में .. Train  के सामने बने खाने में क्लिक करते ही सीट की उप्लब्धता, किराया, टाइम टेबल , दोनों स्टेशन की दूरी आदि जानकारी मिल जायेगी…Fare summary पर माऊस ले जाते ही किराये का विवरण मिल जायेगा.. …..चित्र देखें)

पहले ट्रेन के रास्ते के बारे में जानने के लिये Show Route पर क्लिक करना होता था, अब Train Name पर क्लिक करते ही पूरे रास्ते की जानकारी मिल जायेगी। बुकिंग वाले पेज पर Food Preference पर क्लिक करने से आप अपनी पसंद का सामिष या निरामिष भोजन पा सकेंगे।


Bed Roll पर क्लिक करने के बाद आप 25/- दे कर बेड रोल भी पा सकेंगे। ( ये दो सुविधायें शायद सभी ट्रेनों में नहीं होगी)
और भी कई सुविधायें है जो कि टिकट बुक करते समय पता चलेगी। फिलहाल जो कुछ बदलाव हुआ है वह भी बहुत अच्छा दिख रहा है।
और सुविधाओं के बारे में जानने के लिये यहां क्लिक करें… http://www.irctc.co.in/cgi-bin/beta.dll/irctc/services/home.do

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तैयारी करने में क्या हर्ज है?

Posted by सागर नाहर on 1, January 2010

तेलंगाना राज्य तो बनेगा तब बनेगा, पहले तैयारी कर लेने में क्या हर्ज है। कहीं बाद में मोटर साईकिल की नंबर प्लेट बनाने वालों ने अपने भाव बढ़ा दिये तो!

देखिये लोगो ने अभी से अपनी गाड़ियों में नंबर प्लेट किस तरह बदलना शुरु कर दिया है।  लोग भी कितने आशावादी होते हैं।

इस फोटो में साफ दिख रहा है कि किस तरह AP  के ऊपर रंग पोत कर वहाँ TG  लिखा गया है।

आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

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बहुत दिन भए

Posted by सागर नाहर on 24, December 2009

एकाद दिन पहले; कई दिनों के बद लवलीजी से चैट हो रही थी। अचानक लवलीजी ने कहा आपको पंकज बैंगानीजी और गुड़िया (डॉ गरिमा) खोज  रहे हैं। लवलीजी ने पंकजभाई के ब्लॉग की उस पोस्ट का लिंक बताया जिसमें मेरे सहित कुछ और ब्लॉगर के गुमशुदा होने की खबर प्रकाशित हुई थी।

यह पोस्ट पढ़ कर बढ़िया लगा। अहसास हुआ कि आज भी पुराने साथी हैं जो याद करते हैं, चाहते हैं कि कुछ ना कुछ ब्लॉग पर लिखता रहूँ।

दरअसल एकाद महीने पहले स्कूल से लौटते समय चिरंजीवी हर्षवर्धन अपने पाँव को तुड़वा बैठे। (Hairline factrure in Hip bone)। यह दुर्घटना हुई शनिवार की शाम। पाँव में सूजन ना देख हमारे रिश्तेदारों का सुझाव था कि मोच होगी, हाड़वैद ( हड्डी के देशी , बिना डिग्री के डॉक्टर) के पास ले चलते हैं।

डॉक्टर आई मीन हाड़वैद ने देखते ही कहा, एक्सरे निकलवाना पड़ेगा। फिर एक्सरे वाले के पास भागे, एक्सरे निकल्वा कर फिर हाड़वैद के पास गये। उसने कहा फेक्चर है लेकिन मैं पट्टी बांध देता हूँ। मैने  साफ मना कर दिया, अगर फेक्चर है तो मैं डॉक्टर की सलाह के बिना कोई पट्टी नहीं बंधवाऊंगा।

हमारे रिश्तेदार, जन पहचान वाले लोग बहुत नाराज हुए क्यों कि मैने हाड़वैद से पट्टी बंधवाने की उनकी बात नहीं मानी थी। खैर अगले दिन डॉक्टर ने देख भी लिया , और फेक्चर की बजाय क्रेक होने की वजह से प्लास्टर बांधने की  बजाय बेड रेस्ट करने को कहा। दीवाली भी  हर्ष की वॉकर के सहारे ही गुजरी। पटाखे ना चला पाने  की मायूसी भी उनके चेहरे पर साफ दिखी।
इन सब झंझटों के चलते ब्लॉग की दुनिया से एकदम दूरी बन गई, पहले तो समय ही नहीं  मिलता था, और डेढ़ दो महीने के बाद जब थोड़ा  समय मिलने लगा तो क्या लिखूं… के चक्कर में कुछ लिखना ही नहीं हो पाया।
अब हर्ष भी एकदम ठीक हो चुके हैं… समय भी मिलने लगा है देखते हैं वापसी होती है या नहीं।
पुनश्च: पिछले दिनों एक ऐसा काम कर दिया  जिसके लिए सालों से बचता रहा था, और वह था मोबाईल फोन खरीदना। आजकल फोन से बातें कम फोटो ज्यादा खींचे जा रहे हैं। कुछ फोटो यहां दे रहा हूँ।

ये कॉंग्रेस के कर्यकर्ता कम प्रचारक हैं, पर इनके पाँव में चप्पल तक नहीं है।  इसे कहते हैं,  डेडिकेशन!


दूसरे चित्र में यह एक प्रसिद्ध शहर का रेल्वे स्टेशन है, मेटल डिटेक्टर भी लगा है पर   वहाँ खड़े रहने  वाली पुलिस  हमेशा नदारद रहती है। पहले गोल घेरे में एक महिला मेटल डिटेक्टर से अन्दर जा रही है, वहीं दूसरे चित्र में दो युवक एक हेण्डबेग ले कर आराम से डितेक्टर की बजाय बाहर आने वाले  रास्ते से अन्दर जा रहे हैं।

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किकोड़े मात्र अस्सी रुपये किलो!

Posted by सागर नाहर on 25, September 2009

बिल्कुल हद हो गई जी। किकोड़ा की सब्जी और अस्सी रुपये किलो!! आश्चर्य ही हो गया । कल बाजार सब्जी लेने गये और कुछ  ठेलों पर बड़े करीने से सजाये एकदम हरे हरे  किकोड़े दिख गये। बरसों बाद दिखे सो बड़े उत्साह से जाकर भाव पूछा .. जवाब मिला साठ रुपये किलो।

बच्चों का पता नहीं क्यों पर वे वैसे भी आधी हरी सब्जियों से नाक- भौं सिकोड़ते हैं, वे तो खाने से रहे, सो हमने ढ़ाई सौ ग्राम मांगे तो ठेले वाले का कहना था, मैने किलो का भाव बताया है, पाव लेने हों तो पूरे बीस लगेंगे!!
हमारा तो मूड खराब हो गया, सब्जी वाले से बहस करने की इच्छा थी परन्तु  श्रीमती जी ने हाथ खींच लिया। मोंडा मार्केट में जाने के बाद दूसरी सब्जियां खरीदी गई पर हमारा मन तो उन्हीं किकोड़ों में अटका  रहा । एकाद और जनों के पास दिखा फटाफट एक से  (पाव का) भाव पता किया। भाव तो पचास ही था पर ना जाने क्यों उसने सामने से ही दस रुपये कह दिया हमने फटाफट उसके हाथ में दस रुपये थमा दिये।

आज सुबह बरसों बाद सब्जी भी खाई, और गांव को, खेतों को और बचपन को भी याद कर लिया। अरे ये वे किकोड़े हैं जो खेतों की बाड़ पर और इधर उधर यों ही उग आते हैं, इन्हें कोई भी तोड़ कर नहीं ले जाता क्यों कि हरेक के घर, खेत या बाड़े में मिल/उग जाते हैं। इन्हें तिनकों से जोड़ कर और ताजा लाल मिर्च की एक कतरन को बीच में जोड़कर हम तोता और ना जाने कौन कौन से जानवर बनाया करते थे। आज हंसी आती है कि उसे (तोते को) खड़े रखने के लिये हम प्रकृति से भी छेड़छाड़ कर लिया करते थे। वो कैसे? वो ऐसे कि हम एक पक्षी के चार पाँव लगाया करते थे, अलबत्त तिkantolaनकों के। :)

इस सब्जी का जिक्र पढ़ कर आपका भी मन हुआ होगा कि आखिर यह सब्जी है कैसी जिसके लिये एकाद महीने बाद एक पोस्ट ठेलने का मन बन गया। :) तो आपको सब्जी का फोटो बताने के लिये गूगल पर बहुत खोज की।
कई नामों से सर्च किया। करेले को bitter gourd कहते हैं सो इसकी बिरादरी से मिलते शब्दों को खोजा तो भी नहीं मिला। अचानक याद आया कि इन्हें गुजराती में कंटोळा (કંટોળા-Kantola) भी तो कहते है। अरे ये क्या! Kantola नाम खोजते ही तुरंत इसके फोटो मिल गये। लीजिये आपके लिये भी प्रस्तुत हैं कंटॊले का फोटो… आपकी भाषा में इन्हें क्या- क्या कहते हैं ये भी बताईये।

अब आपके मन में कंटोले की सब्जी खाने की इच्छा हुई होगी तो यह लीजिये इसकी सब्जी बनाने की रेसेपी-

कटोले की सब्जी
…..हां अगर भिण्डी फ्राई की तरह किकोड़े फ्राई बनायें जाये तो भी यह बहुत अच्छे लगते हैं।

फोटो इस जाल स्थल से लिया है, अगर किसी को आपत्ति हो तो बतायें, हटा दिया जायेगा।

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भगवान इतनी ह्रदयविदारक मौत किसीको ना दे!

Posted by सागर नाहर on 4, September 2009

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ वाई.एस. राजशेखर रेड्डी के दुखद: निधन के बाद कल आश्‍चर्यजनक रूप से सभी गणेश मंडलों ने  गणेशजी की प्रतिमाओं का वसर्जन एकदम सादगी से किया।  पिछले वर्षों में प्रतिमाऒं के साथ अनेक लोक कलाकार अगल- अलग वेशभूषाओं में अपनी अपनी कला  का प्रदर्शन करते हैं. लेकिन कल सड़कों पर एक्का दुक्का ही गाड़ियां दिखाई दे रही थी। सिकन्दराबाद में पांच साल रहते हो गये लेकिन पहली बार पैटनी चौराहे  और अन्य रास्तों को को 70-80  की स्पीड से क्रोस किया जबकि आम दिनों में 30 की गति से भी इस चौराहे को पार करना मुश्किल होता है।

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गणेश प्रतिमाओ के ले जारहे वाहनों पर/ के साथ पहली बार ना तो लाईट्स (हेलोजन) थी ना ही ढ़ोल- नगाड़े! लगभग हरेक वाहन पर सबसे आगे स्व. रेड्डी का आदमकद फोटो लगा हुआ था।

कल स्थानीय केबल ओपरेटरों ने भी समाचार चैनलों को छॊड़कर सभी मनोरंजन के चैनल को बंद कर दिया। तेलुगु के अलावा हिन्दी में मात्र स्टार न्यूज और अंग्रेजी में मात्र NDTV के अलावा सभी चैनलों को बंद कर दिया जिन्हें  स्व. मुख्यमंत्री के अंतिम संस्कार के बाद ही चालू किये जायेंगे।

तेलुगु चैनलों पर हेलिकॉप्टर के अलावा पांचों के शरीरों का जो हाल बताया वह दहला देने वाला था, स्थानीय लोग हाथों में उन शरीरों के अलग अलग अवशेष पकड़ कर ला  रहे थे, किसी के हाठ में किसी शव का हाथ था तो किसी के हाथ में एक मास का लोथड़ा!  बाद में उन्हें एक पोटली में बांध कर उपर उड़ रहे हेलिकॉप्टर में चढ़ाना पड़ा। भगवान इतनी ह्रदयविदारक मौत किसीको ना दे!

यह पंक्तिया लिखते समय कॉंग्रेस के कार्यकर्ता दुकान बंद करने का आग्रह (धमकी)  कर रहे हैं। सो आगे लिख  कर केफे का काँच फुड़वाने की बजाय घर ही जाना उचित होगा।

राम राम।

डॉ राजशेखर रेड्डी को हार्दिक श्रद्धान्जली।

फोटो गूगल से साभार।

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डॉ नौतम भट्ट- एक अज्ञात भारतीय-वैज्ञानिक

Posted by सागर नाहर on 15, July 2009

या नींव के पत्थर!!

आपमें से  कितने लोगों ने डॉ नौतम भगवान लाल भट्ट का नाम सुना है?  अच्छा अब बताइये आपने अग्‍नि, पृथ्वी, त्रिशूल, नाग, ब्रह्मोस,धनुष, तेजस, ध्रुव, पिनाका, अर्जुन, लक्ष्य, निशान्त, इन्द्र, अभय, राजेन्द्र, भीम, मैसूर, विभुति, कोरा, सूर्य.. आदि नाम सुने हैं? अब आप पहचान गये होंगे कि ये सब भारत के शस्त्र हैं। अब मैं एक और प्रश्न पूछना चाहूंगा कि  कि इन सब शस्त्रों के साथ किसी सबसे पहले वैज्ञानिक का नाम जोड़ना हो तो आप किसका नाम जोड़ना पसन्द करेंगे? डॉ कलाम ही ना !! अगर  मैं कहूं कि डॉ. अब्दुल कलाम से पहले डॉ नौतम भगवान लाल भट्ट का नाम जोड़ना ज्यादा सही होगा तो?  आपको आश्‍चर्य होगा क्यों कि आज तक किसी ने डॉ साहब का नाम भी नहीं सुना।

मशहूर गुजराती मासिक पत्रिका सफारी ने सन् २००५ के  अक्टूबर अंक के संपादकीय में संपादक श्री हर्षल पुष्‍पकर्णा जी ने जब पाठकों से यह प्रश्न पूछा था तब तक मैं भी डॉ साहब के नाम से अन्जान था।  डॉ नौतम भट्ट का २००५ में देहांत हो गया था, और इतनी बड़ी शख्सियत के बारे में हम उनके निधन के बाद जान पाये कितना दुखद: है।

आपकी उत्सुकता बढ़ गई होगी.. आगे का विवरण में सफारी के शब्दों को ही अनुवाद करने की कोशिश कर रहा हूँ। हिन्दी- गुजराती में लिखने की शैली थोड़ी अलग होती है सो कहीं कहीं छोटी बड़ी गलती रह पाना संभव है।Safari

अग्‍नि, पृथ्वी, त्रिशूल, नाग, ब्रह्मोस,धनुष, तेजस, ध्रुव, पिनाका, अर्जुन, लक्ष्य, निशान्त, इन्द्र, अभय, राजेन्द्र, भीम, मैसूर, विभुति, कोरा, सूर्य.. इस सब शस्त्रों के नाम के साथ अगर किसी एक व्यक्ति का नाम जोड़ना हो तो शायद   हमारे मन में ए. पी. जे. कलाम के अलावा दूसरा नाम याद नहीं आयेगा। कलाम के बाद अगर दूसरे नंबर पर जामनगर के नौतम भगवान लाल भट्ट का नाम अगर माना जाये तो?  देखा जाये तो उनका नाम दूसरे स्थान पर उचित नहीं माना जाना चाहिये, क्यों कि भारत में सरंक्षण शोध की नींव रखने वाले या सरंक्षण के क्षेत्र में  स्वावलंबन  के लिये जरूरी संसाधन/ संशोधन के पायोनियर डॉ कलाम नहीं बल्कि डॉ नौतम भट्ट थे, और कुछ समय पहले आपका ९६ वर्ष की उम्र में देहांत हुआ तब इस दुखद घटना को हमारे समाचार माध्यमों ने अपने चैनलों- अखबारों में बताया भी नहीं। सरंक्षण के क्षेत्र में उनके अतुल्य- अनमोल योगदान को  नमन करना तो दूर भारत में ( या गुजरात में) ज्यादातर लोगों ने उनका नाम भी नहीं सुना हो इसकी संभावना भी कम नहीं!

जामनगर में 1909 में जन्मे और भावनगर तथा अहमदाबाद में स्कूली शुरुआती शिक्षा के बाद  में बैंगलोर की इन्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ सायन्सिस में डॉ सी वी रमन  के सानिध्य में  फिजिक्स में MSc  पास करने वाले नौतम भट्ट ने 1939 में अमेरिका की मेसेचुएट्स इन्स्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी में इसी  विषय में डॉक्टरेट की पदवी हासिल की।  भारत की आजादी के 2 वर्ष बाद डॉ भट्ट सरंक्षण विभाग में जुड़े और नई दिल्ली में डिफेन्स साइन्स लेबोरेटरी की स्थापना की।  सेना के लिये  रेडार संशोधन विभाग की भी स्थापना की, जिसमें वर्षों बाद नई पीढ़ी के वैज्ञानिक अब्दुल कलाम के नेतृत्व में बनने वाली डिफेन्स रिसर्च लेबोरेटरी और उसके बाद डिफेन्स एवं रिसर्च डेवलेपमेन्ट ओर्गेनाईजेशन (DRDO) के नाम से मानी जाने वाली थी। इस संस्था में  1960-65  की अवधि में स्वदेशी संरक्षण तकनीक (डिफेन्स टेक्नोलोजी) का विकास करने के लिये बम के फ्यूज, हीलीयम नियोन लेसर, सोनार, सेमी कन्डक्टर, चिप, रेडार आदि  से संबधित शोध की गई वे सारी शोध नौतम भट्ट द्वारा डॉ कलाम जैसे युवा वैज्ञानिकों को दिये गये मार्गदर्शन की आभारी थी।  कई शोधों को रक्षा मंत्रालय द्वारा मिलिटरी (सेना) के लिये गोपनीय वर्गीकृत (classified) माना क्यों कि उनकी गोपनीयता बरकरार रखनी बहुत ही आवश्यक थी। सरंक्षण के क्षेत्र में डॉ नौतम भट्ट ने संशोधकों-वैज्ञानिकों की एक फौज ही खड़ी कर दी थी जो भविष्य में  अगिन, पृथ्वी एवं नाग जैसी मिसाइल्स और राजेन्द्र तथा इन्द्र जैसे रेडार, वायर गाईडेड टोरपीडो तथा एन्टी सबमरीन सोनार का निर्माण करने वाली थी। ध्वनिशास्त्र (acocstics)  में डॉ भट्ट के अपार ज्ञान का लाभ सोनार डिजाईनर को मिला ही लेकिन  दिल्ली में भारत के सर्वप्रथम 70mm के दो सिनेमा थियेटर ( ओडियन एवं शीला) के लिये आपने साऊंड सिस्टम तैयार की। मुंबई के बिरला मातुश्री सभागृह  की 2000 वॉट के स्पीकर्स वाली साउंड सिस्टम भी डॉ भट्ट ने ही बनाई थी।

राष्‍ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन के हाथों 1969 का पद्मश्री पुरुस्कार प्राप्‍त करने वाले डॉ भट्ट को भारत की डिफेन्स रिसर्च के भीष्‍म पितामाह के रूप में कितने लोग जानते हैं? लगभग कोई नहीं। इसका कारण है जेनेटिक्स के विशेषज्ञ डॉ हरगोविन्द खुराना, भौतिकशास्त्री चंद्रशेखर सुब्रमनियम, बेल टेलिफोन लेबोरेटरी के नियामक कुमार पटेल, अवकाश यात्री कल्पना चावला, रोबोटिक्स के प्रणेता राज रेड्डी आदि की तरह नौतम भट्ट भी अपना देश छोड़कर अमरीका में स्थायी हो गये होते तो आज उनका नाम भी गर्जना कर रहा होता, परन्तु भारत को रक्षा क्षेत्र में स्वावलम्बी बनाने की महत्वाकांक्षा को उन्होने खुद को हमारे लिये अंत तक अज्ञात ही रखा।

-हर्षल पुष्पकर्णा

जब मैने इन्टरनेट पर डॉ भट्ट के  नाम को सर्च किया तो कई घंटों खोजने के बाद मात्र पद्मश्री पुरुस्कार की लिस्ट में उनका नाम मिला,इसके अलावा कहीं किसी भी भाषा में कोई जानकारी नहीं मिली।
सन् 2009 डॉ नौतम भगवान लाल भट्ट की जन्म शताब्दी का वर्ष है  आप को हम नमन  करते हैं।

सफारी का जालस्थल

पोस्ट की चर्चा अमर उजाला में ( सौजन्य से अजय कुमार झा एवं पाबला साहब)

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Missiles

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श्रीलक्ष्मी सुरेश: छोटी उम्र में बड़े कारनामे

Posted by सागर नाहर on 26, June 2009

जिस उम्र में छोटी बच्चियां गुड्डे- गुड्डियो के  विवाह करवाने के खेल खेला करती है, उस उम्र में केरल की एक छोटी सी बच्ची  श्रीलक्ष्मी सुरेश ने वेब डिजाईन करना शुरु कर दिया।sreelakshmi

छ: साल की उम्र में अपनी स्कूल की साईट बनाई उसके बाद श्रीलक्ष्मी रुकी नहीं और कुछ दिनों पहले उसने केरल बार काऊंसिल की साईट डिजाईन कर विश्‍व में सबसे छोटी वेब डिजाईनर होने का गौरव प्राप्‍त कर लिया।

आइये श्रीलक्ष्मी की डिजाईन की हुई साईटस देखते हैं।

श्रीलक्ष्मी  का जाल स्थल

लोगो का सर्च इन्जिन

Bar Counsel of Kerala

EDesigns इस कंपनी की सी ई ओ होने के कारण वह विश्‍व की सबसे छोटी सीईओ भी है।
श्रीलक्ष्मी की फोटो गैलरी

अपनी स्कूल की वेब साइट

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विकीपीडिया पर श्रीलक्ष्मी सुरेश

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अब पता चला बच्चू!

Posted by सागर नाहर on 19, May 2009

श्रीमतीजी गर्मी की छुट्टियां मनाने गाँव गई है बच्चों को साथ लेकर!  दो साल बाद गई है सो कह कर गई है कि डेढ़ महीने से पहले नहीं आने वाली, इधर अपनी हालत यहां पतली होती जा रही है।

जब निर्मला यहां थी, और मैं किसी काम से घर जाता; किसी भी समय तो वे या तो रसोई में कुछ काम कर रही होती या बर्तन मांज रही होती या फिर और कोई काम कर रही होती। कभी फुर्सत से पढ़ते लिखते  या कम से कम टीवी देखते भी नहीं पाया।
मैं रोज  उन पर चिढ़ जाता था।
पता नहीं जब देखो काम काम, हमेशा किचेन में या बाथरूम में घुसी रहती हो, काम है कितना बस खाना बनाना,  कपड़े धोना, पोछा लगाना घर की साफ सफाई रखना…और, और, और। पता नहीं कितना धीरे धीरे काम करती हो।  बस इतने से काम को करने के लिये तुम्हारे लिये समय कम पड़ता है!
पर अब जब वे यहां नहीं है तो पता चलता है कि कितना मुश्किल होता है, सुबह छ: साढ़े छ:  उठ कर  घर का काम शुरु करता हूं। पर काम है कि पूरा होता ही नहीं।
खाना बनाना सीखने के लिये घर के सब लोग दबाव डालते थे तब कहता था इसमें सीखना क्या? बस आटा गूंदो और रोटी बेल कर सेको। सब्जी तो यूं यूं बन जाती है।
यह  जितना आसान लगता था  आज जब आन पड़ी है तो उतना ही मुश्किल। आटा गूंदना कोई आसान काम नहीं दस दिन में चार बार तो आटे में पानी ज्यादा पड़ गया और उसे बराबर करने के लिये दो समय के खाने जितना आटा हो गया।  एक बार आटा इतना कड़क हो गया मानो रोटियांनहीं पापड़ बनाने हों।
इधर जब रोटी बेलता हूं तो तवे की रोटी जल जाती है, तवे की रोटी को संभालता हूं तो दूसरे गैस पर रखी सब्जी बढिया सी नये रंग की बन जाती है, ये रंग मेरे चेहरे से थोड़ा ही हल्का  होता है, कभी तो मेरे चेहरे के रंग को मात देती सब्जियां भी बन जाती है।
एक काम करता हूं तो दूसरा रह जाता है, कभी रोटी कच्ची रह जाती है तो कभी नई रोटी बेल नहीं पाता और तवा खूब गरम हो जाता है नई रोटी डाली नहीं कि तवे से चिपकी नहीं।
चलो जैसे तेसे खाना बन गया है, अरे अभी तो  तीन दिनों के कपड़े धोने है, और आठ बजने आई। मन कहता है क्या करूं कपड़े कल धोंऊं? लेकिन कल फिर चार जोड़ी हो जायेंगे, चार जोड़ी धोते धोते तो कमर टूट जायेगी।और फिर कल खाने का क्या होगा? मन मसोस कर एक जोड़ी कपड़े धोता हूं। अरे  आज तो झाड़ू भी नहीं लगा,  पोछा तो दस दिन में एक बार लगा! है भगवान क्या क्या करूं? अभी तो खाना बनाया उसके बरतन भी मांजने हैं। चलो जाने दो सब काम छोड़ देता हूं, कल खाना होटल में खा लूंगा।  दुकान खोलने में   ज्यादा देर हुई तो ग्राहक चिढ़ेंगे।

कितना आसान है ना पत्नियों पर चिढ़ना। है ना ?

:)

यह पोस्ट लिखने के बाद आज सुबह बनाई हुई तुरई की सब्जी खाने बैठा तो पता चला कि नमक दोनो ( शायद दो दिनों के) समय की सब्जी का तुरई की सब्जी में ही डाल दिया है, भला हो कि रात को दही जमा दिया था सो उससे खाना का लिया गया। वरना दौ कौर खानेर के बाद तो जीभ पर नमक की वजह से छाले पड़ गये हैं।

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Posted by सागर नाहर on 22, April 2009

एक बात समझ में नहीं आती, जब  समाचार चैनलों को भाजपा से इतनी नफरत है कि दिन रात पानी पी पी कर उसे कोसने में लगे  रहते हैं।
जब ये इतने ही सिद्धान्तवादी हैं और इतने ही शर्म निरपेक्ष धर्म निरपेक्ष हैं तो फिर भाजपा के चुनाव के विज्ञापन भी अपने चैनलों पर क्यों दिखाते हैं।
हम एक तरफ तो आडवाणी जी को कंधार कांड के लिये  उन्हें दोषी मानते हैं और फिर विज्ञापनों में उन्हें “लौह पुरुष” बताने से भी गुरेज नहीं करते।

जब ये अपने सिधान्तों पर इतने अटल हैं तो क्यों नहीं इन विज्ञापनों को अपने चैनलों पर रोक लगा देते?

क्या इन कथित साम्प्रदायिक पार्टियों को कोसने का काम भी हम  पैसा लेकर ही करते हैं?

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सबसे बड़े मूर्ख तो वे हैं जो ऐसे चैनलों को अपने विज्ञापन  देते हैं।

और आखिर में हम (आम आदमी)  क्या है?

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