Posted by सागर नाहर on 26, June 2009
Posted in प्रेरणा | 11 Comments »
Posted by सागर नाहर on 19, May 2009
श्रीमतीजी गर्मी की छुट्टियां मनाने गाँव गई है बच्चों को साथ लेकर! दो साल बाद गई है सो कह कर गई है कि डेढ़ महीने से पहले नहीं आने वाली, इधर अपनी हालत यहां पतली होती जा रही है।
जब निर्मला यहां थी, और मैं किसी काम से घर जाता; किसी भी समय तो वे या तो रसोई में कुछ काम कर रही होती या बर्तन मांज रही होती या फिर और कोई काम कर रही होती। कभी फुर्सत से पढ़ते लिखते या कम से कम टीवी देखते भी नहीं पाया।
मैं रोज उन पर चिढ़ जाता था।
पता नहीं जब देखो काम काम, हमेशा किचेन में या बाथरूम में घुसी रहती हो, काम है कितना बस खाना बनाना, कपड़े धोना, पोछा लगाना घर की साफ सफाई रखना…और, और, और। पता नहीं कितना धीरे धीरे काम करती हो। बस इतने से काम को करने के लिये तुम्हारे लिये समय कम पड़ता है!
पर अब जब वे यहां नहीं है तो पता चलता है कि कितना मुश्किल होता है, सुबह छ: साढ़े छ: उठ कर घर का काम शुरु करता हूं। पर काम है कि पूरा होता ही नहीं।
खाना बनाना सीखने के लिये घर के सब लोग दबाव डालते थे तब कहता था इसमें सीखना क्या? बस आटा गूंदो और रोटी बेल कर सेको। सब्जी तो यूं यूं बन जाती है।
यह जितना आसान लगता था आज जब आन पड़ी है तो उतना ही मुश्किल। आटा गूंदना कोई आसान काम नहीं दस दिन में चार बार तो आटे में पानी ज्यादा पड़ गया और उसे बराबर करने के लिये दो समय के खाने जितना आटा हो गया। एक बार आटा इतना कड़क हो गया मानो रोटियांनहीं पापड़ बनाने हों।
इधर जब रोटी बेलता हूं तो तवे की रोटी जल जाती है, तवे की रोटी को संभालता हूं तो दूसरे गैस पर रखी सब्जी बढिया सी नये रंग की बन जाती है, ये रंग मेरे चेहरे से थोड़ा ही हल्का होता है, कभी तो मेरे चेहरे के रंग को मात देती सब्जियां भी बन जाती है।
एक काम करता हूं तो दूसरा रह जाता है, कभी रोटी कच्ची रह जाती है तो कभी नई रोटी बेल नहीं पाता और तवा खूब गरम हो जाता है नई रोटी डाली नहीं कि तवे से चिपकी नहीं।
चलो जैसे तेसे खाना बन गया है, अरे अभी तो तीन दिनों के कपड़े धोने है, और आठ बजने आई। मन कहता है क्या करूं कपड़े कल धोंऊं? लेकिन कल फिर चार जोड़ी हो जायेंगे, चार जोड़ी धोते धोते तो कमर टूट जायेगी।और फिर कल खाने का क्या होगा? मन मसोस कर एक जोड़ी कपड़े धोता हूं। अरे आज तो झाड़ू भी नहीं लगा, पोछा तो दस दिन में एक बार लगा! है भगवान क्या क्या करूं? अभी तो खाना बनाया उसके बरतन भी मांजने हैं। चलो जाने दो सब काम छोड़ देता हूं, कल खाना होटल में खा लूंगा। दुकान खोलने में ज्यादा देर हुई तो ग्राहक चिढ़ेंगे।
कितना आसान है ना पत्नियों पर चिढ़ना। है ना ?
यह पोस्ट लिखने के बाद आज सुबह बनाई हुई तुरई की सब्जी खाने बैठा तो पता चला कि नमक दोनो ( शायद दो दिनों के) समय की सब्जी का तुरई की सब्जी में ही डाल दिया है, भला हो कि रात को दही जमा दिया था सो उससे खाना का लिया गया। वरना दौ कौर खानेर के बाद तो जीभ पर नमक की वजह से छाले पड़ गये हैं।
Posted in अनुभव, हास्य व्यंग्य | 31 Comments »
Posted by सागर नाहर on 22, April 2009
एक बात समझ में नहीं आती, जब समाचार चैनलों को भाजपा से इतनी नफरत है कि दिन रात पानी पी पी कर उसे कोसने में लगे रहते हैं।
जब ये इतने ही सिद्धान्तवादी हैं और इतने ही शर्म निरपेक्ष धर्म निरपेक्ष हैं तो फिर भाजपा के चुनाव के विज्ञापन भी अपने चैनलों पर क्यों दिखाते हैं।
हम एक तरफ तो आडवाणी जी को कंधार कांड के लिये उन्हें दोषी मानते हैं और फिर विज्ञापनों में उन्हें “लौह पुरुष” बताने से भी गुरेज नहीं करते।
जब ये अपने सिधान्तों पर इतने अटल हैं तो क्यों नहीं इन विज्ञापनों को अपने चैनलों पर रोक लगा देते?
क्या इन कथित साम्प्रदायिक पार्टियों को कोसने का काम भी हम पैसा लेकर ही करते हैं?
****
सबसे बड़े मूर्ख तो वे हैं जो ऐसे चैनलों को अपने विज्ञापन देते हैं।
और आखिर में हम (आम आदमी) क्या है?
Posted in सामान्य | 9 Comments »
Posted by सागर नाहर on 4, April 2009
कई बार कैसे कैसे मजेदार वाकये हो जाते हैं कि वे हमें जिन्दगी भर याद रह जाते हैं। कल ऐसा ही वाकया मेरे साथ हुआ।
कल शाम (2-04-2009) भोपाल रेल्वे स्टेशन पर मैं, मेरी बहन किरन और चाचीजी सिकन्दराबाद आने के लिये ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। भारतीय रेल की परंपरा को कायम रखते हुए संपर्क क्रान्ति एक्सप्रेस मात्र एक घंटे लेट थी।
हम तीनों आपस में बात कर ही रहे थे कि मैने एक आदमी को देखकर एकदम से चाचीजी से कहा देखो डायचन्दजी! (डायचन्द जी हमारे रिश्तेदार हैं) चाचीजी ने देखा वाकई डायचन्दजी आ रहे थे हम बात कर ही रहे थे कि डायचन्दजी पास आये तो पता चला कि वे डायचन्दजी से मिलती जुलती शक्ल वाले कोई और ही इन्सान हैं।
थोड़ी देर बाद किरन बोली देखो शेषगिरी राव! ( शेषगिरी राव मेरे चाचाजी के खास दोस्त हैं) हमने देखा कि शेषगिरी राव आ रहे हैं पर ये भी शेषगिरी राव नहीं थे। हम इस बात पर खुब हंस ही रहे थे कि एक युवक मेरे सामने से अपने दोस्त के साथ बात करते निकले मैने तुरंत उन्हें आवाज दी नितिन जी – नितिनजी, पर नितिनजी ने सुना ही नहीं। चाचीजी और किरन मजाक करने लगे आज सबको मिलती जुलती शक्ल वाले इन्सान कैसे दिख रहे हैं!
मेरा मन नहीं माना मैं उन नितिनजी के पीछे भागा पीछे से ध्यान से देखा वे हल्के से लंगड़ा कर चल रहे थे और कपड़े भी नितिनजी के व्यक्तित्व से मेल खाते नहीं दिख रहे थे, मैने आज तक नितिनजी को ऐसे कपड़े पहले नहीं देखा था, पर फिर भी मन नहीं माना मैं पीछे चलता रहा, अब वे स्टेशन के मेन गेट पर खड़े खड़े अपने दोस्त से बातें करने लगे। मैं एकदम उनके पीछे खड़ा हो गया कि शक्ल से कन्फ्यूजन हो सकता है आवाज से तो नहीं। आवाज से तो पता चल जायेगा कि वे नितिनजी हैं या नहीं।
कुछ देर खड़ा रहा पर स्टेशन के शोरगुल में उनकी आवाज मुझे सुनाई नहीं दी, अब मैं उनके सामने खड़ा हो गया शायद उनकी नजर मुझ पर पड़ जाये तो हो सकता है कि वे अगर नितिनजी ही हों तो मुझे पहचान लेंगे पर उनकी नजर मुझ पर पड़ी ही नहीं और मेरी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि मैं उनसे जाकर पूछ लूं कि आप नितिनजी हैं या कोई और…।
थक कर मैं वापस अपने परिजनों के पास आ गया और चाचीजी ने भी खासा मजाक उड़ाया पर मेरा मन नहीं मान रहा था मैने कहा इस बात का पता कल लगाना ही पड़ेगा।
आज नितिनजी ओनलाईन दिखे, देखिये हम दोनों के बीच क्या बात हुई
4:21 PM me: नितिनजी, नमस्कार।
क्या आप कल भोपाल रेल्वे स्टेशन पर थे?
4:22 PM Nitin: jee haa
namaste maalik
kyo? aap bhi the?
4:23 PM me: हाँ, मैने आपको देखा भी, आवाज भी दी पर आपने सुना नहीं, तो आपका पीछा भी किया, आपके पीछे कई देर खड़ा रहा
आप किसी दोस्त के साथ थे
मेरी ट्रेन १ घंटे देर से थी
4:25 PM Nitin: arrre?
Sampark Kranti se aaye ho kya?
usi train me tha mai bhi
me: हाँ
देखा आपने जिन्हें मैं नितिनजी समझ रहा था वे नितिनजी ही थे। कैसा अजब संयोग था। आगे की बातचीत फोन पर हुई तब पता चला कि वे उसी ट्रेन के S2 कोच में थे और मैं S1 में|
ऐसा कोई वाकया कभी आपके साथ भी हुआ है?
नितिन बागला जी हिन्दी के जाने माने ब्लॉगर हैं।
Posted in सामान्य | 21 Comments »
Posted by सागर नाहर on 2, April 2009
नेट पर सर्फिंग करते करते कई बार बड़ी अनोखी चीजें देखने को मिल जाती है, आज पता नहीं क्या सर्च करते करते मैं रॉय सुलिवान (Roy Sullivan) के पन्ने तक पहुंचा।
आप पूछेंगे की रॉय सुलिवान में ऐसी क्या खास बात है तो आप जान कर आश्चर्य चकित रह जायेंगे कि रॉय पर सात बार आकाशी बिजली का प्रहार हुआ पर छोटी मोटी शारीरिक नुकसानियों के बावजूद रॉय सकुशल बच गये, परन्तु पारिवारिक कारणों के चलते रॉय ने 28 सितम्बर 1983 को आत्महत्या कर ली।
रॉय सुलिवान के बारे में ज्यादा जानें
यानि बिजली के 10 करोड़ वोल्ट के “शॉक ” से ज्यादा मानसिक” शॉक” रॉय के लिये ज्यादा खतरनाक साबित हुआ।
रॉय की तरह आकाश से बिजली गिरने के बाद बचे (या बिजली के शिकार!) लोगों ने अपना एक समूह बना भी रखा है, जिसका नाम है Lightning Strike and Electric Shock Survivors international (LSESSI) जिसके कई सौ सदस्य है और इस समूह का अपना जाल स्थल भी है। इसके कई सदस्यों पर कई कई बार बिजली के प्रहार हो चुके हैं।
Posted in ज्ञान- विज्ञान | 5 Comments »
Posted by सागर नाहर on 21, March 2009
चिट्ठाजगत.इन से लिया गया यह स्क्रिन शॉट तो यही कहता है!


Posted in मनोरंजन, हास्य व्यंग्य | 16 Comments »
Posted by सागर नाहर on 27, February 2009
पिछले महीने ही हमने एक पोस्ट लिखी थी अरे, सब लोग हमें बधाई दो रे! तभी हमने आपसे कहा था कि आपको जल्दी ही एक और खुशखबरी सुनायेंगे। हाँ तो खुशखबरी हम सबके प्रिय यूनुस भाई के घर में आज सुबह आ चुकी है।
रेडियो सखी के नाम से जानी मानी, विविध भारती की अनाऊंसर और बतकही नामक ब्लॉग की लेखिका ममता जी और रेडियो के अलावा लेखन और ब्लॉगिंग का जाना माना नाम यूनुस खान दम्पति के यहाँ आज सुबह (26 फरवरी को ) ही पुत्र ने जन्म लिया है।
बच्चे का फिलहाल फोटो उपलब्ध नहीं है, उपलब्ध होते ही पोस्ट किया जायेगा।
यह लिजिये ये है जूनियर यूनुस जी!

मेरी तथा हिन्दी चिट्ठा जगत की ओर से ममता सिंह-यूनुस खान जी एवं उनके पूरे परिवार को ढ़ेरों बधाईयाँ।
Posted in सामान्य | 24 Comments »
Posted by सागर नाहर on 5, February 2009
सर्दी आई नहीं कि अपने घर से दूर रह रहे सभी लोग सर्दी, गाँव और घर को याद कर बुरी तरह नोस्टेलजिया रहे है। कोई तहरी खिला रहा है तो कोई खा रहा है। सब अपने बचपन में तापी धूप- अलाव, गुड़ मूंगफली, गज़क,कुतरी हुई गाजर- मूली को याद कर नोस्टेलजिया रहे हैं; इधर हैदराबाद में हमारा यह हाल है कि सर्दी के लिये बरसों से तरस रहे हैं। क्यों? पता है हैदराबाद में ढंग से सर्दी पड़ना शुरु भी नहीं हुई कि तेज गर्मी पड़ने लगी है, दिन में तापमान अभी से 30 डिग्री के आसपास तो कभी-कभार उसके भी ऊपर जाने लगा है
दीपावली के दो दिन पहले जब बच्चों के लिये पटाखे खरीदने गये थे तब जरा सी सर्दी का अहसास हुआ था, और हमने अपने स्कूटर को और तेज चला कर उस ठंडी हवा- सर्दी के अहसास को अपने तन मन में समाने दिया। वो दिन और आज का दिन, ना तो ढंग से रजाई में लिपटकर सोने का आनंद ले सके ना ही गरम पानी से नहाने का। स्वेटर में अपने तन को घुसाये बरसों बीत गये।
बचपने में, गाँव में शाम हुई नहीं कि अलाव जलाकर तापने के लिये घर से बहाना बना कर निकल जाते और देर तक (साढ़े आठ बजे तक!!!) तापते रहते, अलाव में तापना इतना आसान नहीं था, पहले उसके लिये जलाऊ सामान जिसे हम “बाळ बुक्की” कहते थे वह ला कर पहले से जल रहे अलाव में डालना पड़ता था या अलाव जलाने वाले को बाळ बुक्की की रिश्वत देनी होती थी तब जाकर अलाव के सामने तापना मिलता था। बाळ बुक्की के रूप में रद्दी अखबार लाने वाले को ज्यादा देर तापने नहीं दिया जाता, क्यों कि वह तो बड़े जल्दी जल जाते थे, जब कि लकड़ी के टुकड़े , गत्ते- पुट्ठे और इस तरह की देर तक जलने वाली चीजें लाने वालों को ज्यादा सम्मान मिलता और अलाव बुझने तक अंगारे तापने तक का मौका मिलता।
तापने के अलावा सर्दी में खाने के लिये गर्मागर्म गुड़ की राब, राबोड़ी की राब, कुळत-चावल जिसमें नमक की जगह “ऊस” (ओस) डाला जाता है, और हाँ सबसे खास उड़द की दाल, बादाम, गोंद और ना जाने कितनी चीजों से बने लड्डू ( उड़दिया) और मेथी के लड्डू को कैसे भूल सकते हैं। यह चीजें तो सिर्फ सर्दी में ही खाई जाती है। उसके बाद फिर मकर सक्रान्ति के दिन “गेहूं का दूधिया खीच” उसके जैसी कई तरह की चीजें खाने मिलती। अब तो इन चीजों को खाना तो दूर देखे बरसों बीत गये।
ऐसा भी नहीं कि श्रीमतीजी को ये चीजें बनानी नहीं आती होगी, गाजर का हल्वा और कुछ चीजें तो बनाती है पर पारम्परिक चीजें इल्लै….. हाँ उड़द मोगर (बिना छिलके वाली दाल) के लड्डू तो आज भी बनते हैं पर माँ के हाथ का स्वाद… आहा!
देखिये इन चीजों को याद करते करते मुंह में पानी आने लगा है। कहीं मैं भी नोस्टेलजिया तो नहीं रहा?
Posted in सामान्य | 6 Comments »
Posted by सागर नाहर on 25, January 2009
यह शीर्षक कहीं पढ़ा- पढ़ा सा लगता है ना!
आज से दो साल पहले जिन मित्रों ने चिट्ठा लिखना शुरु कर दिया था वे सब अपने दिमाग पर जोर देंगे तो याद आ जायेगा कि ये शब्द कहां पढ़े थे।
नहीं याद आया ना! चलिये मैं ही बता देता हूं यह पोस्ट हम सबकी प्रिय निधि श्रीवास्तव ने लिखी थी। एक जमाने की मशहूर चिट्ठाकारा और मेरी बहन निधि श्रीवास्तव पहले खूब लिखती थी और क्या खूब लिखती थी!
फिर अचानक अमितजी की तबियत खराब हो गई और निधि अपने घर- परिवार की देखभाल में व्यस्त हो गई सो चिट्ठा लिखना छूट सा गया; हां बीच बीच में एकाद पोस्ट से अपनी स्थिती से अवगत कराती रही।
निधि ने अपनी इस पोस्ट में ये पंक्तियाँ लिखी थी -
इस बीच अपने चिटठे पर की गयी टिप्पणियों को देखने की भी फुर्सत नहीं मिली । हम अपने नये खिलौने के साथ इतना व्यस्त थे कि आभास ही नही हुआ कब तीन दिन ग़ुज़र गये। इससे पहले कि अटकलों का दौर शुरू हो, हम ही बताये देते हैं कि खबर क्या है ।
उस समय तो पाठकों ने इन लाईनों और शीर्षक को पढ़ कर पता नहीं क्या क्या अटकलें लगाई थी,
पर इस बार यह अटकल नहीं है, यानि निधि और अमितजी के यहां 7 जनवरी 2009 को पुत्ररत्न का जन्म हुआ है।

कबीर श्रीवास्तव
शिशु का नाम पहले “कबीर” रखा जाना था बाद में शायद “अद्यन्त’ निश्चय हुआ। फिलहाल नामकरण हुआ नहीं है सो हम कबीर ही मान लेते हैं।
हिन्दी चिट्ठाजगत तथा मेरी ओर से से निधि-अमित जी को यह शुभ समाचार सुनाने के लिये ढ़ेरों बधाईयाँ एवं कबीर को स्नेह-आशीर्वाद।
पहले इस पोस्ट को
अक्षरग्राम पर लिखी थी पर किसी कारणवश दो दिन से अक्षरग्राम खुल नहीं रही सो इसे यहां पोस्ट की है।
और हाँ बहुत जल्दी एक और शुभ समाचार सुनने के लिये तैयार रहिये….

ना, ना! अभी नहीं बतायेंगे कि वो कौन सुनाने वाला है।
९
Posted in सामान्य | 23 Comments »
Posted by सागर नाहर on 22, January 2009
आप चौंक गये ना शीर्षक पढ़ कर!
मैं अपना कॉफे रात को दस- सवा दस बजे बन्द कर घर जाता हूं तब तक श्रीमतीजी का लगभग सारा काम निबट चुका होता है या फिर कभी किसी कारण से नहीं भी निबटा तो काम के साथ साथ टीवी देखना भी चालू रहता है, और ना चाहते हुए भी टीवी सीरीयल्स का डोज लेना पड़ता है।
|
पहले कहानी घर-घर की उसके बाद क्यूं कि… उसके बाद कभी कभार मुझे समाचार देखने का मौका मिलता पर अक्सर होता ये कि 11 बजे अधिकतर चैनल और उनके रिपोर्टर अजीब से स्वर में (चैन से सोना है तो..) क्राईम समाचार पढ़ रहे होते। अंत में डिस्कवरी चैनल पर कुछ देखा ना देखा और नींद आ जाती।
सास बहू ब्रांड की चमक फीकी होने लगी तभी एन डी टी वी के इमैजिन चैनल का जन्म हुआ और अब जस्सू बेन… और फिर मैं तेरी परछाई हूं, देखने पड़ते। ये अलग बात है कि धारावाहिक स्टार के धारावाहिकों से लाख दर्जे बेहतर थे, पर धीरे धीरे जस्सू बेन भी बोर करने लगी और मैं तेरी परछाई… का समय बदल गया, तो कुछ देर (साढ़े दस से ग्यारह) तक समाचार या अपना कोई पसंदीदा चैनल/कार्यक्रम देखने का मौका मिल जाता, क्यों कि अब 11 बजे बालिका वधू “आनंदी” और साढ़े ग्यारह बजे उतरन की “इच्छकी” इंतजार कर रही होती।
ये दो धारावाहिक दूसरे धारावाहिकों की वनिस्पत अच्छे लगते हैं, “आनंदी” ,”इच्छकी” और “तपस्या” का अभिनय बड़े बड़ों को दांतो तले उंगली दबवा देता है, परन्तु ग्यारह बजे के बाद इन्हें देख पाना मुश्किल है, कई बार तो देखते देखते नींद आ जाती है।
पिछले हफ्ते इमैजिन चैनल ने खुश कर दिया कि अब जस्सू बेन…. शुक्र,शनि- रवि को आया करेगी। हाश!!!! यानि सोमवार से लेकर गुरुवार तक दस से ग्यारह बजे तक कोई ऐसा धारावाहिक किसी भी चैनल पर नहीं बचा जिसे जबरन देखना पड़ेगा। अब टी वी से वास्तव में मुक्ति मिलेगी, रेडियो विविध भारती पर गाने भी सुने जा सकेंगे, पुस्तकें जिन्हे कई दिनों से पढ़ने का समय नहीं मिल रहा था, उसके लिये एक घंटा मिल सकेगा।
अब बताईये टीवी चैनल्स को धन्यवाद कहना सही है कि नहीं?
Posted in सामान्य | 11 Comments »