॥दस्तक॥

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

रूठी-रूठी सजनी मनाऊं कैसे…?

Posted by सागर नाहर on 30, सितम्बर 2006

पत्नी को कैसे खुश रखें इस विषय पर अनेक लेख पढ़ने के बाद हमें पता चला कि जिस तरह पति के दिल का रास्ता उनके पेट से हो कर जाता है, उसी तरह पत्नी के दिल में जाने का रास्ता रसोईघर से हो कर जाता है। यानि आप कुछ पकवान बना कर उन्हें खिलायें तो फ़िर सजनी रूठी रह ही नहीं सकती; और यही अगर यह काम उन्हें सरप्राईज के तौर पर कर चौंका दिया जाये तो रूठी सजनी के मान जाने के १०० प्रतिशत चांस है। तो साहब हम भी एक दिन किसी बात पर पत्नी के साथ मनमुटाव हो जाने पर उन्हें मनाने की कोशिश में इस सिद्धान्त को प्रयोग में लाने की कोशिश कर बैठे, और इस प्रयोग का निष्कर्ष कुछ इस तरह से निकला कि पत्नी मानने की बजाय ……ऐसे कठिन प्रश्न मत पूछिये प्लीज ।

सबसे पहले तो पाक शास्त्र की किताबों को कुछ दिन तक छुप छुप कर पढ़ा, और अन्तरजाल पर सारे पाक कला वाले जालस्थलों की खाक छान कर नमक और पिसी शक्कर तथा हल्दी और धनिये के पाऊडर में फ़र्क अच्छी तरह समझ लिया। एक दिन जब मोहतरमा किसी काम से बाजार गई हुई थी तब हमने मौका देख कर अपने उस सारे ईन्टरनेटिये ज्ञान को आजमाने का निश्चय कर लिया।
सबसे पहले कुछ ” मीठा हो जाये” की तर्ज पर हमने हलवा बनाने का निश्चय किया, अब संयोग से उस समय पुस्तक कहीं मिल नहीं पाई और हमने अपने मन से ही डरते- डरते हलवा बनाने की तैयारी कर ली, गेहुँ का आटा कढ़ाई में लेकर उसे सेकने लगे अब हड़बड़ाहट में यह याद नहीं आया कि घी को आटे को सेकने से पहले डालते है सिकने के बाद या आटे के साथ? सो हम आटे को बिना घी डाले ही सेकने लगे और जब आटे के सिकने की खुशबु आने लगी तो हमने घबरा कर की कहीं ज्यादा सिक जाने पर जल ना जाये; घी की बजाय़ पास में पड़ी गिलास में से पानी कढ़ाई में डाल दिया फ़िर थोड़ी देर के बाद जब पानी सूखने लगा हमने हलवे को पौष्टिक बनाने के लिहाज से चार बड़े चम्मच भर कर घी कढ़ाई में डाल दिया और बाद में चीनी भी डाल दी।

और……. तभी एक बड़ी गड़बड हो गई और पत्नी घर वापस आ गयी, और रसोई में से आते हलवे की महक (आप कुछ भी कहो हम तो महक ही कहेंगे!) से सीधी रसोई में चली आयी और रसोई में बिखरे बर्तनों और बने हलवे को देख अपना माथा ठोक लिया। हमने बड़ी मासूमियत से उन्हे पूछा क्या हुआ? उन्होने कहा “मेरा सर”। हमने चुपचाप रसोई से बाहर निकलने में ही अपनी भलाई समझी।

थोड़ी देर बाद पत्नी एक प्लेट में हमारा बनाया हुआ हलवा ले कर आयी और हमसे बड़े प्यार से हलवे को खाने के लिये आग्रह करने लगी, हम उनके चेहरे पर छाई मुस्कुराहट को देख कर और अपने प्रयोग को सफ़ल मान कर उन सारे अन्तरजाल पर पाक विधियाँ लिखने वाले लेखकों को मन ही मन धन्यवाद देते हुए एक चम्मच भर कर हलवा अपने मुँह में रखा और, अरे यह क्या यह तो हलवे की बजाय लाई बन गई थी जिससे हम बचपन में अपनी फ़टी किताबें चिपकाया करते थे, हमारे बिगड़े चेहरे को देख कर पत्नी जोर- जोर से हँसने लगी और फ़िर उस दिन उन्होने हमें पास में बिठाकर हलवा बनाना सिखाया।

एक दिन फ़िर से मौका मिला इस बार पत्नी बाथरूम में थी और हमने नाश्ता बनाने का निश्चय किया। इस बार हमने मीठे की बजाय कुछ नमकीन बनाने का सोचा और सुबह का समय था तो हमें लगा  उपमा सही रहेगा, इस बार हमने कोई गलती नहीं की। घी में बराबर सूजी को सेंक लिया, जब सूजी सिक गई और गुलाबी की जगह काले रंग की होने लगी हमने एक बार फ़िर से पानी डाल दिया, अब पानी कितना डाला था?….. यार आपसे कितनी बार कहा है इतने मुश्किल सवाल मत पूछा करें; पर आप भी कहाँ मानने वाले हो!


थोड़ी देर बाद पानी सूख जाना चाहिये था पर पानी नहीं सूखा और पत्नी बाथरूम से बाहर आ गई और हमारे बने सूजी की महक से खुश होते हुए हमसे पूछा,

“क्या बना है नाश्ते में?”
हमने कहा “उपमा”
उन्होने सोचा कि उन्होने हलवा बनाना सिखाया था अत: उपमा भी सही बनाया होगा तो उन्होने रसोई में आकर हमारे बने उपमे को देखा और एक बार फ़िर से सर ठोक लिया, इस बार हमसे “क्या हुआ” पूछने की हिम्मत नहीं रही क्यों कि हमें पता था कि इस बार हमने उपमे की जगह राब यानि तरल उपमा बना दिया था, जिसे खाने की बजाय कप में भर कर पीया जा सकता था। इस बार तो हमारे इस नये पकवान का नामकरण भी नहीं हो पाया और सारा का सारा हमारे हाथों से ही फ़ैंक देना पड़ा, फ़ैंकते समय हमारे मन की हालत का आप अन्दाजा भी नहीं लगा सकते।
एक बार वेब दुनियाँ पर सोन पापड़ी की विधी देखकर काले रंग की एकदम सख्त बर्फ़ी भी बनाई है, जिसे खाने की कोशिश में मेरा दाँत शहीद होते होते बचा है, तो एक बार बरतन मांजने की कोशिश भी करी, पर नाकामयाब रहे। एक बार पोछा लगाने का मन हुआ और पानी में फ़िनाईल की बजाय सिरका भी डाला है। हुँ ना मैं मासूम! कभी कभी लगता है महिलायें सच कहती हैं कि पत्नियों को अपने पति को इन्सान बनाने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है।

परन्तु मित्रों मैंने भी निश्चय कर लिया है कि एक दिन मैं अपनी पत्नी को अपने पाक ज्ञान का लौहा मनवा कर रहूँगा। जब अटल जी बिना विवाह किये भी गा सकते हैं ” हार नहीं मानूंगा…” तो मैं क्यों नहीं?
क्या आप भी अपनी रूठी सजनी को मनाना चाहते हैं? हमारे अनुभवों का लाभ जरूर लें।

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5 Responses to “रूठी-रूठी सजनी मनाऊं कैसे…?”

  1. “रूठी सजनी को मनाना चाहते हैं? हमारे अनुभवों का लाभ यहाँ से लें।”
    और प्रयोग अपनी रिश्क पर करे, हो सकता हैं अच्छी भली सजनी रूठ जाए. 🙂

  2. ट्राई करके देखता हूँ.

  3. “परन्तु मित्रों मैंने निश्चय कर लिया है कि एक दिन मैं अपनी पत्नी को अपने पाक ज्ञान का लौहा मनवा कर रहूँगा।”

    सही है, लगे रहो मुन्ना भाई. सफलता आपके कदम चूमेगी.

    शुभकामनाऎं.

  4. ritu bansal said

    सागर
    तुमने बहुत बड़ा चान्स लिया । अब मत लेना वरना लेने के देने पड़ जाएँगें । पत्नी तो तुम्हारे प्रेम की
    भूखी होती है । उसे वही दिया करो । सस्नेह

  5. PD said

    🙂
    और कुछ कहने को नहीं मिल रहा है.. सिर्फ एक स्माईली..
    🙂

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